Reminiscences

उदबोधन महात्मा गाँधी पूज्य मालवीय जी, सर राधाकृष्णन, भाइयों और बहनों तीर्थयात्रा आप सब जानते हैं कि आजकल मुझमें न तो सफर करने की ताकत ही रही है और न इच्छा ही, लेकिन जब मैंने इस विश्वविद्यालय के ‘रजत महोत्सव’ की बात सुनी और मुझे सर राधाकृष्णन का निमन्त्रण मिला तो मैं इन्कार न कर सका । आप जानते हैं कि मालवीय जी के साथ मेरा कितना गाढ़ सम्बन्ध है। अगर उनका कोई काम मुझसे हो सकता है तो मुझे उसका अभिमान रहता है, और अगर मैं उसे कर सकूँ तो अपने को कृतार्थ समझता हूँ। इसलिए जब सर राधाकृष्णन का पत्र मुझे मिला तो मैंने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। यहाँ आना मेरे लिए तो एक तीर्थ में आने के समान है। यह विश्वविद्यालय मालवीय जी महाराज का सबसे बड़ा और प्राणप्रिय कार्य है। उन्होंने हिन्दुस्तान की बहुत-बहुत सेवायें की हैं, इससे आज कोई इन्कार नहीं कर सकता। लेकिन मेरा ख्याल यह है कि उनके महान कार्यों में इस कार्य का महत्त्व सबसे ज्यादा रहेगा। 25 साल पहले, जब इस विश्वविद्यालय की नींव डाली गई थी, तब भी मालवीय जी महाराज के आग्रह और खिंचाव से मैं आ पहुँचा था। उस समय तो मैं यह सोच भी नहीं सकता था कि जहाँ बड़े-बड़े राजा, महाराजा और खुद वाइसराय आने वाले हैं, वहाँ मुझ जैसे फकीर की क्या जरूरत हो सकती है। तब तो मैं ‘महात्मा’ भी नहीं बना था। अगर कोई मुझे ‘महात्मा’ के नाम से पुकारते भी थे तो मैं यही सोच लेता था कि महात्मा मुंशीराम जी के बदले भूल से किसी ने पुकार लिया होगा। उनकी कीर्ति तो मैंने दक्षिण अफ्रीका में ही सुन ली थी। हिन्दुस्तान धन्यवाद और सहानुभूति का सन्देश भेजने वालों मे एक वे भी थे और मैं जानता था कि हिन्दुस्तान की जनता ने उन्हें उनकी देश सेवा के लिए महात्मा की उपाधि दी थी। उस समय भी मालवीय जी महाराज की कृपादृष्टि मुझ पर थी। कहीं भी कोई सेवक हो, वे उसे ढूँढ निकालते हैं और किसी न किसी तरह अपने पास खींच ही लाते हैं। यह उनका सदा का धन्धा है। “भिक्षां देहि” लोग मालवीय जी महाराज की बड़ी प्रशंसा करते हैं। आज भी आपने उनकी कुछ प्रशंसा सुनी हैं, वह सब तरह उसके लायक हैं। मैं जानता हूँ कि हिन्दू विश्वविद्यालय का कितना बड़ा विस्तार है। संसार में मालवीय जी से बढ़कर कोई भिक्षुक नहीं। जो काम उनके सामने आ जाता है, उसके लिए, अपने लिए नहीं, उनकी भिक्षा की झोली का मुँह हमेशा खुला रहता है, वे हमेशा मांगा ही करते हैं। और परमात्मा की भी उन पर बड़ी दया है कि जहाँ जाते हैं, उन्हें पैसे मिल ही जाते हैं । इसपर भी उनकी भूख कभी नहीं बुझती। उनका भिक्षापात्र सदा खाली रहता है। उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए एक करोड़ इकटठा करने की प्रतिज्ञा की थी। एक करोड़ की जगह डेढ़ करोड़ दस लाख रुपया इक्टठा हो गया, मगर उनका पेट नहीं भरा। अभी-अभी उन्होंने मुझसे कान में कहा है कि आज के हमारे सभापति महाराज साहेब दरभंगा ने उनको एक खासी बड़ी रकम दान में और दी है। तीर्थस्वरूप मालवीय जी मैं जानता हूँ कि मालवीय जी महाराज स्वयं किस तरह रहते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि उनके जीवन का कोई पहलू मुझसे छिपा नहीं। उनकी सादगी, उनकी सरलता, उनकी पवित्रता और उनकी मुहब्बत से मैं भलीभाँति परिचित हूँ। उनके इन गुणों में से आप जितना कुछ ले सकें, जरूर लें। विद्यार्थियों के लिए तो उनके जीवन की बहुतेरी बातें सीखने लायक हैं। मगर मुझे डर है कि उन्होंने जितना सीखना चाहिए, सीखा नहीं है। यह आपका और हमारा दुर्भाग्य है। इसमें कोई कुसूर नहीं। धूप में रह कर भी कोई सूरज का तेज न पा सके तो उसमें सूरज बेचारे का क्या दोष? वह तो अपनी तरफ से सबको गर्मी पहुँचाता रहता है, पर अगर कोई उसे लेना ही न चाहे, और ठण्ड में रहकर ठिठुरता फिरे तो सूरज भी उसके लिए क्या करे? मालवीय जी महाराज के इतने निकट रहकर भी अगर आप उनके जीवन से सादगी, त्याग, देशभक्ति, उदारता, और विश्वव्यापी प्रेम आदि सदगुणों का अपने जीवन में अनुकरण न कर सकें, तो कहिये, आपसे बढ़कर अभागा और कौन होगा? कैसी गुलामी अब मैं विद्यार्थियों और अध्यापकों से दो शब्द कहना चाहता हूँ: मैंने तो सर राधाकृष्णन से पहले ही कह दिया था कि मुझे क्यों बुलाते हैं? मैं वहाँ पहुँचकर क्या कहूँगा? जब बड़े-बड़े विद्वान मेरे सामने आ जाते हैं, तो मैं हार जाता हूँ। जब से हिन्दुस्तान आया हूँ, मेरा सारा समय कांग्रेस में और गरीबों, किसानों और मजदूरों वगैरा में बीता है। मैनें उन्हीं का काम किया है। उनके बीच मेरी जबान अपने आप खुल जाती है। मगर विद्वान के सामने कुछ कहते हुए मुझे बड़ी झिझक मालूम होती है। श्री राधाकृष्णन ने मुझे लिखा कि मैं अपना लिखा हुआ भाषण उन्हें भेज दूँ। पर मेरे पास उतना समय कहाँ था। मैने उन्हें जवाब दिया कि वक्त पर जैसी प्रेरणा मुझे मिल जायगी, उसी के अनुसार मैं कुछ कह दूँगा। मुझे प्रेरणा मिल गई है। मैं जो कुछ कहूँगा, मुमकिन है, वह आपको अच्छा न लगे। उसके लिए आप मुझे माफ कीजिएगा। यहाँ आकर जो कुछ मैंने देखा और देखकर मेरे मन में जो चीज पैदा हुई, वह शायद आपको चुभेगी। मेरा खयाल था कि कम से कम यहाँ तो सारी कारवाई अंग्रेजी में नहीं, बल्कि राष्ट्रभाषा में ही होगी । मैं यहाँ बैठा यही इन्तजार कर रहा था कि कोई न कोई तो आखिर हिन्दी या उर्दू में कुछ कहेगा। हिन्दी, उर्दू न सही, कम-से-कम मराठी या संस्कृत में ही कुछ कहता। लेकिन मेरी सब आशायें निष्फल हुईं। अंगेजों को हम गालिंयां देते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तान को गुलाम बना रखा है, लेकिन अंगेजी के हम खुद ही गुलाम बन गए हैं। अंग्रेजो ने हिन्दुस्तान को काफी पामाल किया है। प्रज्ञा इसके लिए मैंने उनकी कड़ी-से-कड़ी टीका भी की है, परन्तु अंग्रेजों की अपनी इस गुलामी के लिए मैं उनको जिम्मेदार नहीं समझता। खुद अंग्रेजी सीखने और अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए हम कितनी-कितनी मेहनत करते हैं? अगर कोई हमें कह देता है कि हम अंग्रेजों की तरह अंग्रेजी बोल लेते हैं, तो मारे ख़ुशी के फूले नहीं समाते। इससे बढ़कर दयनीय गुलामी और क्या हो सकती है? इसकी वजह से हमारे बच्चों पर कितना जुल्म होता है? अंग्रेजी के प्रति हमारे इस मोह के कारण देश की कितनी शक्ति और कितना श्रम बरबाद होता है? इसका पूरा हिसाब तो हमें तभी मिल सकता है, जब गणित का कोई विद्वान् इसमें दिलचस्पी ले। कोई दूसरी जगह होती है, तो शायद यह सब बरदास्त कर लिया जाता, मगर यह तो हिन्दू विश्वविद्यालय है। जो बातें इसकी तारीफ में अभी कही गई हैं, उनमें सहज ही एक आशा यह भी प्रकट की गई है। यहाँ के अध्यापक और विद्यार्थी इस देश की प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के जीते-जागते नमुने होंगे। मालवीय जी ने मुँह-मांगी तनख्वाहें देकर अच्छे-से-अच्छे अध्यापक यहाँ आप लोगों के लिए जुटा रखे हैं। अब उनका दोष तो कोई कैसे निकाल सकता है? दोष जमाने का है। आज हवा ही कुछ ऐसी बन गई है कि हमारे लिए उसके असर से बच निकलना मुश्किल हो गया है। लेकिन अब वह जमाना भी नहीं रहा, जब विद्यार्थी जो कुछ मिलता था, उसी में सन्तुष्ट रह लिया करते थे। अब तो वे बड़े-बडे़ तूफान भी खड़े कर लिया करते हैं। छोटी-छोटी बातों के लिए भूख हड़ताल तक कर देते हैं। अगर ईश्वर उन्हें बुद्धि दे, तो वे कह सकते हैं, हमें अपनी मातृभाषा में पढ़ाओ। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि यहाँ आन्ध्र के 250 विद्यार्थी हैं। क्यों न वे सर राधाकृष्णन के पास जायें और उनसे कहें कि यहाँ हमारे लिए एक आन्ध्र-विभाग खोल दीजिए और तेलुगू में हमारी सारी पढ़ाई का प्रबन्ध करा दीजिए? और अगर वे मेरी अक्ल से काम करें, तब तो उन्हें कहना चाहिए कि हम हिन्दुस्तानी हैं, हमें ऐसी जबान में पढ़ाइए, जो सारे हिन्दुस्तान में समझी जा सके। और ऐसी जबान तो हिन्दुसतानी ही हो सकती है। कहाँ जापान, कहाँ हम? जापान आज अमेरिका और इंग्लैण्ड से लोहा ले रहा है। लोग इसके लिए उसकी तारीफ करते हैं। मैं नहीं करता। फिर भी जापना की कुछ बातें सचमुच हमारे लिए अनुकरणीय हैं। जापान के लड़कों और लड़कियों ने युरोप वालों से जो कुछ पाया है, अपनी मातृभाषा जापानी के जरिये ही पाया है, अंग्रेजी के जरिये नहीं। जापानी लिपि बड़ी कठिन है, फिर भी जापानियों ने रोमन लिपि को कभी नहीं अपनाया। उनकी सारी तालीम जापानी लिपि और जापानी जबान के जरिये ही होती है। जो चुने हुए जापानी पष्चिमी देशों में खास किस्म की तालीम के लिए भेजे जाते है, वे भी जब आवश्यक ज्ञान पाकर लौटते हैं, तो अपना सारा ज्ञान अपने देशवासियों को जापानी भाषा के जरिये ही देते हैं। अगर वे ऐसा न करते और देश में आकर दूसरे देशों के जैसे स्कूल और कालेज अपने यहाँ भी बना लेते हैं, और अपनी भाषा को तिलांजलि देकर अंग्रेजी में सब कुछ पढ़ाने लगते तो उससे बढ़कर बेवकूफी और क्या होती? इस तरीके से जापान वाले नई भाषा तो सीखते, लेकिन नया ज्ञान न सीख पाते। हिन्दुस्तान में तो आज हमारी महत्त्वाकांक्षा ही यह रहती है कि हमें किसी तरह कोई सरकारी नौकरी मिल जाय, या हम वकील, बैरिस्टर, जज, वगैरह बन जायें। अंग्रेजी सीखने में हम बरसों बिता देते हैं, तो भी सर राधाकृष्णन या मालवीय जी महाराज के समान अंग्रेजी जानने वाले हमने कितने पैदा किये हैं? आखिर वह उक पराई भाषा ही न है? इतनी कोशिश करने पर भी हम उसे अच्छी तरह सीख नहीं पाते। मेरे पास सैकड़ो खत आते रहते हैं। इनमें कई एम0 ए0 पास लोगों के भी होते हैं, परन्तु चूँकि वे अपनी जबान में नहीं लिखते, इसलिए अंग्रेजी में अपने खयाल अच्छी तरह जाहिर नहीं कर पाते। चुनांचे यहाँ बैठे-बैठे मैंने जो कुछ देखा, उसे देखकर मैं तो हैरान रह गया। जो कार्रवाई अभी यहाँ हुई, जो कुछ कहा या पढ़ा गया, उसे जनता तो कुछ समझ ही नहीं सकी। फिर भी हमारी जनता में इतनी उदारता और धीरज है कि चुपचाप सभा में बैठी रहती है और खाक समझ में न आने पर भी यह सोचकर सन्तोष कर लेती है कि आखिर हमारे नेता ही न हैं? कुछ अच्छी ही बात कहते होंगे। लेकिन इससे उसे लाभ क्या? वह तो जैसी आई थी, वैसी ही खाली लौट जाती है। अगर आपको शक हो, तो मैं अभी हाथ उठाकर लोगों से पूछूँ कि यहाँ की कार्रवाई में वे कितना कुछ समझे हैं? आप देखियेगा कि वे सब कुछ नहीं, कुछ नहीं, कह उठेंगे। यह तो हुई आम जनता की बात। अब अगर आप यह सोचते हों कि विद्यार्थियों में से हर एक ने हर बात को समझा है, तो वह दूसरी बड़ी गलती है। आज से पच्चीस साल पहले जब मैं वहाँ आया था, तब भी मैंने यही सब बातें कहीं थीं। आज यहाँ आने पर जो हालात मैंने देखे, उसने उन्हीं चीजों को दोहराने के लिए मुझे मजबूर कर दिया। शारीरिक ह्नास दूसरी बात जो मेरे देखने में आई, उसकी तो मुझे जरा भी उम्मीद न थी। आज सुबह मैं मालवीय जी महाराज के दर्शनों को गया था। वसन्त पंचमी का अवसर था, इसलिए सब विद्यार्थी भी वहाँ उनके दर्शनों को आये थे। मैंने उस वक्त भी देखा कि विद्यार्थियों को जो तालीम मिलनी चाहिए, वह उन्हें नहीं मिलती । जिस सभ्यता, कह्मोशी और तरकीब के साथ उन्हें चलते आना चाहिए, उस तरह चलना उन्होंने सीखा ही नहीं था। यह कोई मुश्किल काम नहीं, कुछ ही समय में सीखा जा सकता है। सिपाही जब चलते हैं, तो सिर उठाये, सीना ताने, तीर की तरह सीधे चलते हैं, लेकिन विद्यार्थी तो उस वक्त आड़े-टेढ़े, आगे पीछे, जैसा जिसका दिल चाहता था, चलते थे। उनके इस ‘चलने’ को चलना कहना भी शायद मुनासिब न हो, मेरी समझ में तो इसका कारण भी यही है कि हमारे विद्यार्थियो पर अंग्रेजी जबान का बोझ इतना पड़ जाता है, कि उन्हें दूसरी तरफ सर उठाकर देखने की फुरसत नहीं मिलती। यही वजह है कि दरअसल उन्हें जो सीखना चाहिए, वे सीख नहीं पाते। बौद्धिक थकान एक और बात मैंने देखी। आज सुबह हम श्री शिवप्रसाद गुप्त के घर से लौट रहे थे। रास्ते में विश्वविद्यालय का विशाल प्रवेश द्वारा पड़ा। उस पर नजर गई तो देखा, नागरी लिपि में ‘हिन्दू विश्वविद्यालय इतने छोटे हरुफों में लिखा है कि ऐनक लगाने पर भी नहीं पढ़ पाते पर अंग्रेजी Banaras Hindu University ने तीन चौथाई से भी ज्यादा जगह घेर रखी थी। मैं हैरान हुआ कि यह क्या मामला है? इसमें मालवीय जी महाराज का कोई कसूर नही। यह तो किसी इन्जीनियर का काम होगा। लेकिन सवाल तो यह है कि अंग्रेजी की वहाँ जरूरत ही क्या थी? क्या हिन्दी या फारसी में कुछ नहीं लिखा जा सकता था? क्या मालवीय जी, और क्या सर राधाकृष्णन सभी हिन्दू-मुस्लिम एकता चाहते हैं। फारसी मुसलमानों की अपनी ख़ास लिपि माने जाने लगी है । उर्दू का देश में अपना ख़ास स्थान है । इसलिए अगर दरवाजे पर फारसी में, नागरी में या हिन्दुस्तान की दूसरी किसी लिपि में कुछ लिखा जाता, तो मैं उसे समझ सकता था। लेकिन अंग्रेजी में उसका वहाँ लिखा जाना भी हम पर जमे हुए अंग्रेजी जबान के साम्राज्य का एक सबूत है। किसी नई लिपि या जबान को सीखने से हम घबराते हैं, जब कि सच तो यह है कि हिन्दुस्तान की किसी जबान या लिपि को सीखना हमारे लिए बायें हाथ का खेल होना चाहिए। जिसे हिन्दी या हिन्दुस्तानी आती है, उसे मराठी, गुजराती, बंगाली वगैरा सीखने में तकलीफ ही क्या हो सकती है? कन्नड़, तमिल, तैलगू और मलयालम का भी मेरा तो यही तजुरबा है। इनमें भी संस्कृत से निकले हुए काफी शब्द भरे पड़े हैं। जब हममे अपनी मादरी जबान या मातृभाषा के लिए सच्ची मुहब्बत पैदा हो जायेगी तो हम इन तमाम भाषाओं को बड़ी आसानी से सीख सकेंगे। रही बात उर्दू की, सो वह भी आसानी के साथ सीखी जा सकती है। लेकिन बदकिस्मती से उर्दू से आलिम यानी विद्वान् इधर उसमें अरबी और फारसी के शब्द भर रहे हैं। नतीजा ठूँस-ठूँस कर भरने लगे हैं- उसी तरह, जिस तरह हिन्दी के विद्वान हिन्दी में संस्कृत शब्द। इसका यह होता है कि जब मुझ जैसे आदमी के सामने कई लखनवी तर्ज की उर्दू बोलने लगता है, तो सिवा बोलने वाले का मुँह ताकने के और कोई चारा नहीं रह जाता। अपनी विशेषता चाहिए एक बात और। पश्चिम के हर विश्वविद्यालय की अपनी एक न एक विशेषता होती है। केम्ब्रिज और आक्सफोर्ड को ही लीजिए। इन विश्वविद्यालयों को इस बात का नाज है कि इनके हर एक विद्यार्थी पर इनकी अपनी विशेषता की छाप इस तरह लगी रहती है कि वे फौरन पहचाने जा सकते हैं। हमारे देश के विश्वविद्यालयों की अपनी ऐसी कोई विशेषता होती ही नहीं। वे तो पश्चिमी विश्वविद्यालयों की एक निस्तेज और निष्प्राण नकल भर हैं। अगर हम उनको पश्चिमी सभ्यता का सिर्फ सोख्ता या स्याही सोख कहें, तो शायद बेजा न होगा। आपके इस विश्वविद्यालय के बारे में अकसर यह कहा जाता है कि यहाँ शिल्प-शिक्षा और यन्त्र-षिक्षा का इंजीनियरिेंग और टेक्नालाजी का देश भर में सबसे ज्यादा विकास हुआ है और इनकी शिक्षा का अच्छा प्रबन्ध है। लेकिन इसे मैं यहाँ की विशेषता मानने को तैयार नहीं। तो फिर इसकी विशेषता क्यो हो? मैं इसकी एक मिसाल आपके सामने रखना चाहता हूँ। अलीगढ़ के कितने छात्रों को आप अपनी ओर खींच सके है? दरअसल आपके दिल में चाह तो यह पैदा होनी चाहिए कि आप तमाम मुसलमान विद्यार्थियों को यहाँ बुलायेंगे और उन्हे अपनायेंगे। हिन्दुस्तान की पुरानी संस्कृति का सन्देश इसमें शक नहीं कि आपके विद्यालय को काफी धन मिल गया है, आगे भी मिला रहेगा, लेकिन मैंने जो कुछ कहा है, वह रुपये को खेल नहीं। अकेला रुपया सब काम नहीं कर सकता। हिन्दू विश्वविद्यालय से मैं विशेष आशा तो इस बात की रखूँगा कि यहाँ वाले इस देश में बसे हुए सभी लोगों को हिन्दुस्तानी समझें, और अपने मुसलमान भाइयों को अपनाने में किसी से पीछे न रहें। अगर वे आपके पास न आयें, तो आप उनके पास जाकर उन्हें अपनाइए। अगर इसमें हम नाकामयाब भी हुए तो क्या हुआ? लोकमान्य तिलक के हिसाब से हमारी सभ्यता दस हजार बरस पुरानी है। बाद के कई पुरातत्वशास्त्रियों ने इसे उससे भी परानी बताया है। इस सभ्यता में अहिंसा को परम धर्म माना गया है। चुनांचे इसका कम से कम एक नतीजा तो यह होना चाहिए कि हम किसी को अपाना दुश्मन न समझें। वेदों के समय से हमारी यह सभ्यता चली आ रही है। जिस तहर गंगा जी में अनेक नदियाँ आकर मिली हैं, उसी तरह इस देशी संस्कृत-गंगा में भी अनेक संस्कृतिरुपी सहयक नदियाँ आकर मिली हैं । यदि इन सबका कोई सन्देश या पैगाम हमारे लिए हो सकता है तो यही कि हम सारी दुनियाँ को अपनायें और किसी को अपना दुश्मन न समझें। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह हिन्दू विश्वविद्यालय को यह सब करने की शक्ति दे। यही इसकी विशेषता हो सकती है। सिर्फ अंग्रेजी सीखने से यह काम नहीं हो पायेगा। इसके लिए तो हमें अपने प्राचीन ग्रन्थों और धर्मशास्त्रों का श्रद्धापूर्वक यर्थाथ अध्ययन करना होगा, और यह अध्ययन हम मूल ग्रन्थों से सहारे ही कर सकते हैं। आखिरी बात अन्त में एक बात मुझे और कहनी है। आप लोग रहते तो महलों में हैं, क्योंकि मालवीय जी महाराज ने आपके लिए ये महलों जैसे छात्रालय वगैरा बनवा दिये हैं, पर इसका मतलब नहीं कि आप महलों में रहने के आदी बन जायें। आप मालवीय जी महाराज के घर जाइए और देखिए, वहाँ आपको इनमें से काई चीज न मिलेगी न ठाठ-बाट होगी, न साजो-सामान और न किसी तरह का कोई दिखावा। उनसे आप सादगी और गरीबी का पाठ सीखिए। आप यह कभी न भूलिए कि हिन्दुस्तान एक गरीब देश है और आप गरीब माँ-बाप की सन्तान हैं। उनकी मेहनत का पैसा यों ऐशो आराम में बरबाद करने का आपको क्या हक है? ईश्वर आपको चिरंजीवी करे और सदबुद्धि दे कि जिससे आप मालवीय जी महाराज की त्याग-शीलता, आध्यात्मिकता और सादगी से अपने जीवन को रंग सकें और आज जो कुछ मैंने आपसे कहा है, उस पर समझदारी के साथ अमल कर सकें।

Great Builder of Indian Nation Dada J.P. Vaswani Chairman, Vaswani Mission He was Free from Interest and Passions Great as a politician, he was greater in his love for Hindu culture and the wisdom of India’s Rishis. Free from the interests and passions that inevitably creep into the life of a man devoted wholly to politics, he utilized the great part of his energies in building a centre of education and learning, which has now grown into a world-renowned University and which is unparalleled in India for its technological departments. While politicians had always in view the next election, the thought of the next generation had ever been before him: while politicians had been working for the growth of their respective parties, the growth of the country had been foremost in his mind. Political giants like Sir Pherozeshah Mehta, Surendranath Banerjea, Gopal Krishna Gokhale, who in their own days influenced the destinies of the nation in no small measure, have passed away and today their work and names are gradually fading away from the memories of men, but the Hindu University will ever stand as a living reminder of the greatness of Pandit Madan Mohan Malaviyaji. Challanges Before the BHU Staff & Students The dream danced in his eyes that the University might become a centre out of which would go out influences which would thrill India from end to end, renovate and re-vitalise this great and gifted land and make her once again a nation of the strong and free….. In his heart was the faith that the problems and perplexities of modern life could yet be solved by the application of the teaching of the Rishis and sages of ancient India. Has the University realized, in some measure, the vision of its great founder? Has the University succeeded in resisting the onslought of the modern forces? Has it answered the challenge of western industrialism? Has the great institution of learning approached any nearer the one source of knowledge and life? Did Pandit Malaviyaji, in his life-time, see his hopes fulfilled, his dream realized, or has he passed on to the Great Beyond with his aspirations locked up in his heart? For an answer we must await the verdict of Time. Cow-Protection was Very Near to His Heart The cause of cow-protection was dear and near to him. When Vaswaniji took leave of him and left the room, I followed. And as I was passing out of the door of his room, he called me. ‘I am an old man’, he said to me; ‘and I may not meet you again. But before you leave, I have just one word to say to you. Tell Vaswaniji to take up the cause of cow-protection and see that the barbaric and inhuman system of cow-slaughter is stopped by non-violent methods’. He spoke so quietly, so convincingly, and the words are still ringing in my ears. I assured him that the cow was very sacred to Vaswaniji and the cause of cow-protection very near to his heart. And then to re-assure him, I described to him how only a few days before we set out for Calcutta, Vaswaniji was taking his usual evening stroll in the Hyderabad Cantonment area when from a distance I sighted a cow being pushed and pulled and dragged, evidently much against its will. I drew Vaswaniji’s attention to this and he asked me to go and find out what the matter was. I ran up to the spot, made enquiries, and was told that the cow would be slaughtered in few minutes’ time. I ran back and reported the matter to Vaswaniji, and this was more than he could bear. In haste, he himself proceeded to the spot and offered to purchase the cow at any price, if only to save his life. The butcher very shrewdly raised hitches. The cow simply must be slaughtered, he said, as it was meant for the military officials, Eventually he agreed to sell it for more than double its actual price and Vaswaniji paid for it on the spot. ‘The cow’, I told Malaviyaji, ‘is now happy and gay, grazing on the farm of a friend.’ As soon as I finished speaking to him, I saw that a look of joy lit up his countenance and in his eyes appeared the glow of a light which was almost otherworldly. I bowed down to him in lowly reverence and asked for his blessings. Once again, in benediction, he placed his soft, tender hand on the back of my head and muttered a sutra in Sanskrit. As he spoke, I felt that in his words was a breath which breathed out peace to all mankind. And, as I left him, I felt renewed, re-vitalized, as though I had breathed a purer air, and had drunk from a fountain of fresh waters. Great Builder of the Indian Nation Today the news travels to me over the radio of passing away of this great one. For a moment mine eyes are touched with tears, but for a brief moment only. For the message comes back to me, the message he gave me on that memorable evening, the message of Gita concerning the immortality of the soul. In a voice, tremulous with emotion, he uttered the beautiful lyrical sloka from the Gita: ‘Never the Spirit was born and the Spirit shall cease to be never! Birthless and deathless and changeless remaineth the Spirit forever. Death hath not touched it, dead though the house of it seems.’ Pandit Madan Mohan Malaviyaji is not dead: he has but passed on to join the Band of the Shining. Ones who, behind the veil, are building, stone by stone, the temple of India’s Freedom. Generations unborn will salute him as a great builder of the Indian nation, as an apostle of Indian ideals and pioneer who called India to the Great future that awaits her, Homage to him!

महामना मालवीय- कुछ संस्मरण वेंकटेश नारायण तिवारी भंगियों को भोजन कराया - कथा सुनाई 'वसंत पंचमी के आने से पहले ही महामना मालवीय जी ने प्रयाग की सेवा-समिति के मंत्रियों को यह आदेश दिया था कि प्रत्येक भंगी को एक धोती, एक सफ़ेद कुर्ता और एक साफा दिया जाए I वसंत पंचमी के दिन उनकी आज्ञा का पालन प्रयाग की सेवा-समिति ने किया, क्योंकि प्रयाग की सेवा समिति के सभापति, महामना मालवीय जी ने उन्हें यह आज्ञा दी थी I 'सब भंगियों को मालवीय जी के यहाँ- वह एक कुटिया में रहते थे- भोजन के लिए आमंत्रित किया I भंगियों की पंगत लग गयी और मालवीय जी के परिवार की देवियों ने बड़ी लगन और उत्साह से अपने कर-कमलों से उन्हें वे पदार्थ परोसे, जिनको उन्होंने खुद तैयार किया था I मालवीय जी भी इन भंगियों को भोजन कराने में तल्लीन थे I घूम-घूम कर जिस भंगी का पत्तल वह खाली देखते, उसे और लेने के लिए वह बाध्य करते थे I' 'भोजनोपरान्त, मालवीय जी ने उन आमंत्रित भंगियों को धर्म-कथा सुनायी I उस धर्म-कथा की कैसे चर्चा की जाए! मैं श्रोता की तरह भंगियों में बैठा था I लगभग दो घंटे तक यह धर्म-चर्चा होती रही I उनकी सारी वक्तृता में उन्हीं शब्दों की- देशज और तदभव शब्दों की- छटा थी, जिन्हें आज के हिन्दी लेखक अपनी रचनाओं में प्रयोग करने में शर्माते हैं I उनकी भाषा जितनी सरल थी उतना ही उसमें वाग्मिता का पुट था I यह चमत्कार सिर्फ मालवीय जी की वाणी में संभव हो सकता था I कितनी मीठी उनकी वाणी थी! भाषा कितनी सरल, पर रसमय थी! जिन्होंने उनके इस भाषण को नहीं सुना, वे वास्तव में जीवन के अदभुत चमत्कार को देखने से वंचित रह गए I' हरिजनों को दीक्षा यह कलकत्ते की बात है I ६ जनवरी, सन १९२९, को दीक्षा देने का कार्य प्रारम्भ हुआ I दीक्षा-स्थान पर पुलिस और स्वंय-सेवकों का प्रबंध था I किन्तु विरोधी हतोत्साहित नहीं हुए थे I मालवीय जी ने जब स्नान के लिए गंगा जी में प्रवेश किया, उसी समय एक हिन्दू गुंडे ने मालवीय जी पर छुरे से वार करने का असफल प्रयत्न किया I महाराज(मालवीय जी) बच गए और गुंडा पकड़ लिया गया I प्रातः नौ बजे से मध्याह् बारह बजे तक मालवीय जी बराबर तथाकथित अस्पृश्यों को दीक्षा देते रहे I १ अगस्त, सन १९३४, को एक सभा में भाषण करते हुए मालवीय जी ने कहा था- "सदाचार ऐसी वास्तु है कि इससे नीच कुल में उत्पन्न होकर भी मनुष्य ऊँचा सम्मान पा सकता है I 'चाण्डाल भी हमारे अंग ही हैं I क्या आप लोगों में से कोई चाहते हैं कि उन्हें पीने को पानी न मिले? (श्रोता- नहीं-नहीं) 'क्या आप चाहते हैं कि जिन सड़कों पर सब लोग चलते हैं, उन पर उन्हें चलने न दिया जाय? (श्रोता- कभी-नहीं) "क्या आप चाहते हैं कि जिन स्कूलों में ईसाई-मुसलमानों के लड़के पढ़ते हैं, उनमें वे न पढ़ने दिये जाएँ? (श्रोता- कभी-नहीं) "मेरी यही इच्छा है कि ऐसी जगहों में जहाँ रोक हो वह मिट सके I "हमें इन अछूतों को जल देना है, रहने को स्थान देना है और उन्हें शिक्षा देनी है I मैं चाहता हूँ कि इनके चार करोड़ घरों में मूर्तियां रखीं हों और भगवान का भजन हो, तभी मंगल होगा I" सन १९२५ में कांग्रेस के अधिवेशन के समय उसी पंडाल में हिन्दू-महासभा का जलसा हुआ I कांग्रेस की सभापति श्रीमती सरोजिनी नायडू थीं I हिन्दू-महासभा के सभापति थे श्री नरसिंह चिन्तामणि केलकर जो मालवीय जी के प्रधान हाथ थे और अछूतोद्धार पर बहुत जोर उन्होंनें दिया था I उसके मंच पर मालवीय जी ने एक 'हरिजन' के हाथ का जल ग्रहण किया I उनका यह कार्य असाधारण था क्योंकि खानपान के मामले में उनकी कटटरता भारतवर्ष भर में प्रसिद्द थी I यह बात किसी से छिपी नहीं है कि वाइसराय तक की पार्टियों में उन्होंने कभी चाय या जल तक नहीं पिया I हरिजन मंत्री के हृदयोद्गार श्रीयुत चौधरी गिरधारीलाल ने, जो उत्तर प्रदेश के एक मंत्री हैं, मालवीय जी को 'युग का महानतम मानव' कहते हुए एक लेख लिखा है I उसमें वह यह कहते हैं- "यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे काशी विश्वविद्द्यालय में लगातार चार वर्ष रहने और पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ I उस समय विद्द्यालय के जन्मदाता गोलोकवासी महामना पं० मदन मोहन मालवीय ही उसके कुलपति थे I प्रवेश-द्वार के कुछ ही आगे बढ़ने पर दाहिने हाथ वाली कोठी में वह रहा करते थे I मैंने जीवन का क्रम बना लिया था कि प्रातः काल उठकर (उनकी) कोठी की ओर जाना और इस युग के सबसे बड़े और सबसे महान मानव के दर्शन करके अपने जीवन को सफल बनाना और उनसे प्रेरणा लेना I वह भी घूमने जाया करते थे I घड़ी की सुई की चाल को प्रतिद्वंदिता में हराने की उनमें अपूर्व क्षमता थी I मैंने समय को भाँप लिया था और ठीक एक ही स्थान पर और एक ही समय मेरा और ऋषि-समान महामानव का आमना-सामना हो जाया करता था I मैं उनका चरण-स्पर्श कर अपने मानव जीवन को कृतकृत्य समझा करता था I मेरे जीवन में जो मोड़ मिला, वह उसी महामानव की कृपा के फल से I वह ऐसा युग था जब किसी हरिजन बालक का पढ़ना इतना आसान नहीं था (जैसे आज कल है) I विद्द्यालयों में बड़े-बड़े प्रतिबंध लगे हुए थे और उच्च शिक्षा प्राप्त करना तो प्रायः असंभव ही था I किन्तु महामना के काशी विश्वविद्द्यालय में इस छुआछूत के अभिशाप का प्रवेश नहीं था I उनके (मालवीय जी के ) दर्द भरे दिल में ऊँच-नीच का भेद-भाव जैसे कभी आया ही नहीं, और यदि उनका झुकाव भी हुआ तो हरिजनों ही की ओर I बस, उनको मालुम भर हो जाना चाहिए कि यह बालक हरिजन है और उनकी उदारता के कपाट उसके लिए खुल जाते थे I शिक्षा-शुल्क और छात्रावास-शुल्क तो माफ़ ही हो जाता था, उसके दूसरे खर्चे भी महामना अपने पास से पूरा कर देते थे I आज शिक्षित-हरिजन-समुदाय में काफी संस्था उन लोगों की है, जिन्हें मालवीय जी की उदारता के कारण ही सारी सहूलियतें प्राप्त हुईं I हरिजनों की दशा पर अश्रुधारा देहरादून की बात है I मसूरी जाते हुए सन १९३५ में महामना के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ I हरिजनों की दुर्दशा का जिक्र छिड़ गया I वह बताने लगे कि 'मानव नामधारी ये करोड़ों प्राणी कितनी दयनीय दशा से गुजर रहे हैं I इन्हें एक वक़्त का अन्न जुटाने के लिए असंख्य यंत्रणाओं का सामना करना पड़ता है, फिर भी भोजन नसीब नहीं होता I मैंने अपनी आँखों से देखा है उन सैंकड़ों हरिजन बालक और बालिकाओं को जो गाय के गोबर से अन्न के दाने बीनते है, ताकि उससे वे अपनी क्षुधा-निवारणा कर सकें I यह कहते-कहते उस करुणा सागर की आँखों से अजस्त्र अश्रुधारा बह निकली I उपस्थित जन-समुदाय निस्पन्द हो गया I कितनी दया और कितनी करुणा भरी थी उस दयासागर के ह्रदय में हरिजनों के प्रति I करुणा के सागर - कुत्ते की शुश्रूषा एक बार मदन मोहन मालवीय बिजली की तरह मेरे घर आ धमके I वे बहुत जल्दी में थे I बोले, "एक कुत्ते के कान के पास कान से ही मिला हुआ एक बड़ा घाव है I घाव में कीड़े पड़ गए हैं I उसकी दवा बतलाइये I" मैंने एक अंग्रेजी दवा बतायी और इस सम्बन्ध में सलाह के निमित्त डाक्टर अविनाश के यहाँ गया I उनसे सारा हाल कहा I अविनाश हँस पड़े I बोले, "आपकी तजबीज की हुई दवा ठीक है I" मदनमोहन मेरे यहाँ से होकर दौड़े हुए वापस कुत्ते के पास गए I उनके साथ में बहुत से स्कूली लड़के भी थे I कुत्ता मक्खियों के डर से टट्टर की आड़ में दुखी होकर बैठा था I मदनमोहन ने एक बांस में कपडा लपेट कर उसे दवा से तर किया और दूर से कुत्ते के घाव में दवा लगाना शुरू किया I कुत्ता भयंकर स्वर से गुर्राता और भौंकता था I वह दवा लगाने वाले को डरा कर भगा देना चाहता था I पर मदनमोहन भी अपनी धुन के पक्के थे I वे चुपचाप दवा लगाते जाते थे I दवा लगाने के बाद कुत्ते को आराम मिला और चिल्लाता हुआ कुत्ता थोड़ी देर में आराम से सोने लगा I ऐसा दु:खी कुत्ता पागलपन की अवस्था में रहता है I उस समय मदनमोहन की धुन में भी पागलपन का ही पुट था I अविनाश की हँसी का यह एक माकूल कारण था I अविनाश डाक्टर थे, इसलिए ऐसी कार्यवाही पर हँस सकते थे; पर उस दु:खी कुत्ते के दुःख को अनुभव करने और उसके दुःख को दूर करने की व्याकुलता से तड़पने के लिए एक ऐसे ह्रदय की जरुरत है जो मदनमोहन-जैसे कुछ थोड़े प्रतिभा-सम्पन्न महानुभावों को ही प्राप्त है महामना का आत्मत्याग सन १९११ की बात है I उन दिनों में गोखले जी के साथ भारत-सेवक-समिति के प्रधान कार्यालय में मैं रहता था I उनके अतिरिक्त, बाकी सदस्य अपने-अपने काम से बाहर चले गए थे I एक दिन शाम के वक़्त श्री गोपालकृष्ण गोखले और मैं एक बेंच पर बैठे थे I उस समय श्री गोपालकृष्ण गोखले ने अपनी तुलना मालवीय जी से की I उन्होंने कहा- 'मेरा आत्मत्याग क्या है? मैं तो जिस समय फर्ग्युसन कॉलेज में पढ़ाने लगा, तब मुझे माह के अंत में ८०) एकमुश्त मिलने लगे I इतनी बड़ी धन-राशि मैंने कभी नहीं देखी थी I अतएव उसे पाकर मैं तो मालामाल हो गया I' मालवीय जी के विषय में उन्होंने ने कहा कि- 'त्याग तो मालवीय जी का है I ३,०००) रु० माहवार की आमदनी उनकी वकालत से होती थी I मालवीय जी के सामने गेंद था, लेकिन उन्होंने ठोकर मार कर उसे आगे बढ़ाने की कभी लालसा नहीं की I जो आदमी वकालत जैसे पेशे को लात मार सकता है, उसका आत्म-त्याग वास्तव में आत्म-त्याग है I' अपने लिए कभी दान स्वीकार नहीं किया "पूज्यचरण मालवीय जी के ज्येष्ठ पुत्र रमाकांत मालवीय का स्वर्गवास हो चुका था I उनके बंगले पर (जो प्रयाग स्थित जॉर्ज टाउन में था) कुछ ऋण बाकी था I इस कारण मालवीय जी के पौत्र बहुत चिन्तित रहा करते थे I पौत्र के दुःख से महाराज (मालवीय जी) भी दुखित थे I कुल पंद्रह-बीस हजार रुपयों की बात थी I मुझे जब मालुम हुआ तब मैंने मालवीय जी के भक्त एक महाराजा साहब से इस बात की चर्चा की I महाराज साहब मालवीय जी से मिलने काशी पधारे और जब वह उनसे मिले तब पचास हजार रुपयों का एक चेक देते हुए वह मालवीय जी से बोले- 'महाराज, ये रूपये आपके व्यक्तिगत कार्यों के लिए हैं I इनका उपयोग व्यक्तिगत कार्यों के लिए जैसा आप चाहें वैसा करें I' 'मालवीय जी की आँखों में आँसू छलछला आए और उन्होंने महाराजा साहब को धन्यवाद देते हुए उस चेक को व्यक्तिगत कार्यों के लिए लेना अस्वीकार कर दिया I महाराजा साहब ने बहुत आग्रह किया, पर मालवीय जी ही नहीं माने I 'अन्त में महाराजा साहब ने मालवीय जी से कहा- 'महाराज, आप तो विद्द्वान शास्त्रज्ञ हैं I दिया हुआ दान कहीं वापस लिया जाता है? मैं ये चेक अब वापस कैसे ले सकता हूँ ?' 'मालवीय जी ने मुझे बुलाया और चेक मुझे देते हुए बोले- 'इसे सनातन धर्म महासभा के खाते में जमा कर दो I आधा सभा के लिए है और आधा धर्म-ग्रंथों का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित कराने के लिए है I" कभी अपने हठ से नहीं डिगे मदनमोहन में बचपन से ही एक जबर्दस्त हठ यह था कि जिस बात को वे उचित और सच समझते थे, उससे उनको कभी कोई डिगा नहीं सकता था I इस सम्बन्ध में बड़ों की झिड़कियों की भी परवाह न करके अपने मत पर कायम रहते थे I एक बार रायबहादुर लाला रामचरनदास जी और इनमें बहुत कड़ाई के साथ जवाब-सवाल हो गया I रायबहादुर साहब को क्रोध आ गया था और उन्होंने मदनमोहन को फटकार कर कहा, 'तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो!' मदनमोहन का उत्तर बहुत सादा था I उन्होंने कहा, 'मैं खूब जानता हूँ, कि आप बहुत बड़े आदमी हैं और मैं छोटा हूँ; मगर मेरी बात सही है और इस काबिल नहीं है कि वह काटी जाय I' मदनमोहन की दृढ़ता बानी रही, मगर रायबहादुर साहब में परिवर्तन हो गया I बाद में वे ही मदनमोहन को लड़कों की तरह प्यार करने लगे थे और मदनमोहन जिस काम के लिए भी उनको पकड़ लेते थे, वह रायबहादुर को करना ही पड़ता था I कभी-कभी मदनमोहन रायबहादुर साहब से इतना काम लेते थे कि वे झुंझला जाते थे और कहते थे कि 'भाई' मालवीय तो मुझको बहुत तंग करते हैं I हिन्दू-यूनिवर्सिटी की स्थापना के सम्बन्ध में मदनमोहन ने रायबहादुर लाला रामचरनदास से एक लाख रुपया लिया था I इस दान की कथा कम रोचक नहीं है I जनता के सेवक जिस समय पंडित पद्मकांत मालवीय जी बनारस हिन्दू स्कूल में पढ़ते थे, उस समय की एक घटना का उन्होंने जिक्र किया है I उससे मालवीय जी की सज्जनता और उदारता का हमे सहज ही बोध हो जाता है I श्री गोविंद मालवीय जी (मालवीय जी के चौथे पुत्र) मालवीय जी साथ रहते थे I मालवीय जी की तबियत काफ़ी ख़राब थी और डॉक्टरों ने उन्हें किसी से मिलने या बात करने की सख्त मन ही कर दी थी I श्री गोविंद मालवीय ने मकान के सबसे पिछले ऊपरी हिस्से के एक कमरे में उनके रहने का प्रबंध कर दिया था I एक दिन कुछ मद्रासी भाई मालवीय जी के दर्शनों की अभिलाषा से बंगले पर आए I श्री गोविंद मालवीय उन्हें मिलने से रोक रहे थे और वे लोग कहते थे कि 'बिना दर्शन किए हम जाएँगे नहीं I' दर्शनार्थी जोर-जोर से चिल्ला कर बातें करने लगे I आवाज़ बाबू जी के कानों तक पहुँच गयी I उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा कि 'मामला क्या है ?' मैंने साफ़-साफ़ बता दिया I उन्होंने कहा, 'बुलाओ गोविंद को I' मैं (उन्हें) लाया I आते ही श्री गोविंद मालवीय पर बाबू जी नाराज़ होने लगे, बोले, 'मुझसे मिलने वालों को रोकने का तुम्हे क्या अधिकार है ? यह बंगला जनता का है I मेरी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं I मैं जनता कि सेवा करता हूँ I इसलिए यहाँ (मैं) रहता हूँ I जनता को अधिकार है कि वह जब चाहे, तब अपने सेवक से सेवा ले सकती है I उन लोगों को बुला लाओ I श्री गोविंद मालवीय नाराज़ हो गए और मालवीय जी से तर्क वितर्क करने लगे I बाबू जी का धैर्य छूट गया I उन्होंने बिगड़ कर कहा, 'गोविंद, मैं तुमसे तर्क नहीं सुनना चाहता I यदि तुम्हें इन बातों से कष्ट होता है तो अच्छा है कि तुम अपने रहने का प्रबंध किसी दूसरी जगह कर लो I इस मकान पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है I यहाँ रह कर मैं तुम्हें अपने और जनता के बीच आने का अधिकार कदापि नहीं दे सकता I' श्री पद्मकांत मालवीय से मालवीय जी ने कहा कि 'तुम जाओ और उन लोगों को यहाँ बुला लाओ I बेचारे इतनी दूर से आते हैं I बार-बार आने का पैसा बेचारे गरीबों के पास कहाँ है! और गोविंद, वे चाहते क्या हैं, कुछ नहीं, केवल अपने सेवक का दर्शन; और तुम उन्हें रोक रहे हो I छि: छि: कैसी छोटी बात है I' भिक्षा का अन्न समाज सेवी ही ग्रहण कर सकता है दूसरी घटना का जो वर्णन श्री पद्मकांत मालवीय ने किया है, उससे मालवीय जी के विचार भिक्षा-वृत्ति के विषय में हमें मालूम होते है I उन्होंने कहा है- 'देखो, जानते हो मैंने तुम्हें अपना भोजन क्यों नहीं करने दिया था? तुम्हें यह मालुम है न कि मेरे भोजन की सामग्री शिवप्रसाद (देशभक्त स्वर्गीय बाबू शिवप्रसाद गुप्त) के यहाँ से आती है ? वह सीधा मेरे लिए दान में आता है I बाबू (हमारे परबाबा अर्थात मालवीय जी के पिता) कहा करते थे कि वही ब्राह्मण दान ले, जिसमे दान को पचाने की शक्ति हो I इसीलिए हमारे यहाँ दान नहीं लिया जाता I दान एक प्रकार की भीख ही तो है I भिक्षा का अन्न खाना कोई अच्छी बात नहीं I ऐसा अन्न खाने से मनुष्य में आलस्य आता है I 'आलस्याद अन्नदोषाच्च' I मैं थोड़ी-बहुत देश और समाज की जो सेवा कर देता हूँ, उसके बदले यह दान स्वीकार कर लेता हूँ I मज़बूरी, क्या करूँ ? उस जन्म में न जाने कौन सा पाप बन पड़ा था जो इस जीवन में दूसरों का आश्रित बनना पड़ा I मैं नहीं चाहता कि मेरे परिवार में अन्य कोई व्यक्ति दूसरों का आश्रित होकर भिक्षा का जीवन यापन करे I"

संस्मरण डॉ० राय कृष्णदास महामना का आदर्श वाक्य था- उत्साहो बलवान् राजन्| महामना जी कहा करते थे कि मैं कर्मठता का उपदेश गौरयों (छोटी चिड़ियों) से लेता हूँ जो सबेरे ही सबेरे हर्षोद्रेक से चहचहाती हुई अपने काम में निरत हो जाती हैं | वह त्रिकाल संध्योपासन नियमित रूप से नित्य करते थे | जब कार्यवश मोटर पर या ट्रेन में लेट होते तो सब कपड़ा लत्ता पहने आपोहिष्ठामयोभुव: - मंत्र से अपने को पवित्र करके वहीं संध्या कर लेते| यह बात उन्होंने सुनाई थी| उनका सिद्धान्त था कि जिस प्रकार मुस्लिम नमाज के पाबन्द हैं, उसी प्रकार हिन्दुओं को भी संध्या वंदनमें नियमित होना चाहिए मानस-मराल स्वo शम्भूनारायण जी चौबे रामचरितमानस के पूर्ण ज्ञाता और अनुसन्धानी तो थे ही, हृदय भी उन्होंने बहुत पवित्र पाया था जैसा रामानुरागी का होना चाहिये | प्राय: महामना के दर्शनार्थ आया करते और उनके सामने विनीत तथा स्पष्ट हृदय से अपनी शंकायें रखते; उनका समाधान प्राप्त करते | एक दिन उन्होंने पूछा कि ‘महाराज, आप जब संध्यावन्दन करते हैं तो मन पूर्णत: एकाग्र होता है?’ महामना जी का उत्तर था- ‘कभी होता है, कभी नहीं|’ ‘जब नहीं होता तो आप क्या सोचने लगते हैं?’ मानस-मराल जी ने जिज्ञासा की | ‘तब मैंविश्वविद्यालय की समुन्नति के उपाय सोचने लगता हूँ – ऐसा था उनका वात्सल्य, इस महानिर्माण पर|’ 1908 ई० के आस-पास की बात है | महामना जी रेल से कहीं जा रहे थे | उनका सहयात्री था एक जापानी | सूती कपड़ा बनाने वाली किसी जापानी मिल की ओर से भारत इसलिए आया था कि भारतीय स्त्रियों की पसन्द वाली तरह–तरह की जनानी धोतियों का संग्रह कर के अपने मिल ले जाय | वहाँ से उसी मेल का माल तैयार कर के भारत भेजा जाय | ऐसे–ऐसे उपायों से भारतीय बुनकरों का व्यवसाय नष्ट किया जा रहा था | स्वदेशी प्रचार की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने यह वृत्तान्त सुनाया था | लीडर-Anchorपांचवापुत्र अभी “लीडर”ने अपने दो वर्ष पूरे न किये थे कि अर्थाभाव के कारण उसे बन्द कर देने की बात सोची जाने लगी | महामना जी को जब यहस्थिति ज्ञात हुई तो उन्होंने दृढ़तापूर्वक निश्चय किया कि उसे जीवित रखना ही है| एतदर्थ धन एकत्र करने का काम अपने घर से ही आरम्भ किया | अपनी धर्मपत्नी से कहा –“यह न समझो कि तुम्हें केवल चार पुत्र हैं | तुम्हारा पांचवा पुत्र है – ‘लीडर|’आज वह मरणशैय्यागत है | उसे जीवित रखना ही है |” बस उनकी गद्गद् सहधर्मिणी (सौ० कुन्दन देवी) ने अपने सारे स्वर्णाभूषणमहामना जी को दे दिये, जिन्हें बेचकर महामना जी ने साढ़े तीन हजार रूपये “लीडर” की रक्षा में लगाया| ........तब और धन भी तदर्थ एकत्र किया | किसी कानूनी सलाह के लिए मेरे मामाजी महामना जी के यहाँ गये | उनको महामना जी बहुत मानते थे| जब सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, उनके विद्यार्थी रह चुके थे, मामा जी | महामना जी उस समय अपने आफिस में न थे | उनकेरिहायशीघर के बगल में ही उनका अभ्युदय प्रेस वाला मकान था, जिसके उपरी मंजिल में एक नन्हा सा कमरा था | महामना जी को जब एकान्त की आवश्यकता होती,वहाँ चले जाते | जब हम लोग पहुँचे, वे अपनी उसी निभृत कुटीर में थे | तो भी मामाजी के आने की सूचना उनको दी गयी और उन्होंने हमलोगों को तुरन्त बुला लिया | वहाँ उनके आसपास अनुत्तरित पत्रों के चार–पाँच पुलिन्देरक्खे थे | कहने लगे –“कार्य वयस्तता और दौड़ –धूपके कारण ये सब पत्र क्या जाने कब से अनुत्तरित पड़े हैं |” कहते हुए पत्रों को भी देख रहे थे | उनमें से एक को लेकर करम ठोकने लगे – “दादाभाई नौरोजी की चिट्ठी है, छः महीने से पड़ी है |” 1911 ई० में महामना जी विश्वविद्यालय के लिए बनारस में चन्दा एकत्र कर रहे थे | उन दिनों मिर्जापुर के बडहल राज्य की एकमात्र अधिकारिणी, रानी साहब काशीवास कर रही थीं | उनसे अच्छी सहायता मिलने की संभावना थी | संयोगवश मैं महामना जी के पास बैठा था | उन्होंने कहा –‘सुना है, तुम बहुत अच्छी हिन्दी लिखते हो | रानी साहब के नाम मेरी ओर से लिखो, मैं हस्ताक्षर कर दूँगा | किसी भी दाता को छोडूँगा नहीं|’ ‘हाँ, ब्राह्मण का पेट कभी नहीं भरता’ मेरी जबान से निकल गया | अरे, यह क्या कहते हो |सन्तोष ही ब्राह्मण का लक्षण है | जिसमें लोभ है वह ब्राह्मण कहाँ ! मुझमें तो चन्दा उगाहने का लोभ विश्वविद्यालय के निमित्त है | 1911 ई० में जब महामना जी विश्वविद्यालय के लिए धन-संग्रह का अभियान तेजी से चला रहे थे तो उन्होंने बनारस की एक सार्वजनिक सभा में जो भाषण दिया था उसका महत्वपूर्ण अंतिम अंश इस प्रकार था – “यदि अपने देश की उन्नति करना है और अपने देश को कला, कौशल, धन–धान्य में पूर्ण समृद्धिशाली बनाना है तो दिल खोलकर शक्ति के अनुसार विश्वविद्यालयकी सहायता अवश्य कीजिए|” चौबीस करोड़ हिन्दुओं में एक करोड़ रूपया जमा होना कोई बड़ी बात नहीं है | एक–एक आना देने से भी डेढ़ करोड़ रूपया सहज में एकत्र हो सकता है | केवल आपको चेतने की देर है |” यहाँ एक अनुकरण करने योग्य बात सुनाता हूँ, जिसे प्रस्ताविक मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रेमी एक मुसलमान नायब तहसीलदार ने बड़े उत्साह से कहा था-“जब तक हमारी मुस्लिम यूनिवर्सिटी नहीं खुल जाती, हम लोगों को चैन नहीं पड़ेगा | हमारे बड़े-बड़े लोग जैसेबेगम भोपाल और हिज हाइनेस आगा खाँ वगैरह सभी ने तय कर लिया है कि इस साल हम लोगों के रमजान के दो महीने माने जाएँ | याने हम लोग दो महीने रोजा मनायेंगे | इस तरह जो बचत होगी साथ ही एक–दो महीने की तनख्वाह या दूसरी आमदनी यूनिवर्सिटी के लिये देंगे | जो लोग एकमुश्त एक माह की आमदनी नहीं दे सकते, उनसे किश्त करके छः माह में लिया जायेगा |” “देखा आपने; समझा आपने? यह दिल से निकली बात है | मुसलमानों में इस समय जो जागृति है उसकी षोडशांश भी हमलोगों में नहीं है | इसी से कहता हूँ कि हिन्दुओं, चेतो |तुम्हारे पास धन है, धर्म है, शक्ति है, उत्साह है, ऐक्य है, सभी कुछ है, देर है केवल जागने और चेतने की |” 1911 ई० की बरसात में मैं एक काम से महामना जी की सेवा मेंउनके प्रयाग वाले घर में गया | काम की बात हो जाने पर मेरे स्वास्थ्य आदि के विषय में पूछने लगे और जब मैंने कहा कि बहुत ठीक नहीं रहता तो उन्होंने एक श्लोक सुना कर कहा कि इसके अनुसार चलो सब क्रम ठीक हो जायेगा – “ जितेन्द्रिय व्यायामी, लघु पथ्याशी नरो न रोगी स्यात् यदि मनसा वचसा वा द्रुह्यति नित्यं न भूतेभ्यः |” इसके उपरान्त और बातें होती रहीं |जब मैंने विदा मांगी तो उन्होंने पुछा कि दारागंज जाओगे न? वे जानते थे कि दारागंज में मेरी ननिहाल थी | इतना ही नहीं जब वे स्कूल में अध्यापन करते थे तो मेरे मामा बाबू लक्ष्मीनारायण उनके शिष्य थे, स्वभाव के बड़े क्रोधी | महामना जी प्रायः कहा करते – लक्ष्मीनारायन की आधी विपत्ति उनके स्वभाव के कारण है | अस्तु,मैंने निवेदन किया- जी हाँ दारागंज जा रहा हूँ | उन्होंने कहा कि मुझे भी लेते चलो, मुझे (महामहोपाध्याय) पं० आदित्यराम भट्टाचार्य के पास चलना है | उन दिनों हिन्दू विश्वविद्यालयकी योजना क्रमशः मूर्तरूप ले रही थी | महामना जी के मुख्य परामर्शदाता पंडित जी ही थे, उन्हीं की स्मृति में विश्वविद्यालयका निकटवर्ती गाँव आदित्यनगर बसाया गया | प० आदित्यराम जी बहुत बड़े अध्यापक ही नहीं शिक्षा–शास्त्री भी थे | भारत में आधुनिक शिक्षा का क्या रूप होना चाहिए इसके मर्म पर उन्होंने अच्छा चिन्तन किया था | काशी विश्वविद्यालयकी रूप रेखा में उनके विचारों का प्रयाप्त अंश है | उन्होंने विद्यार्थियों के लिए अनेक उपयोगी पाठ्य –पुस्तकें लिखी थी | उस समय कौन ऐसा विद्यार्थी था जिसने उनके ॠजु व्याकरण, गद्य – पद्यसंग्रह और संस्कृत शिक्षा न पढ़ी हो और उनसे लाभान्वित न हुआ हो | जब उन्होंने म्योर सेन्ट्रल कालेज से अवकाश ग्रहण किया था तो उनके सम्मानार्थ एक सभा हुई थी, उसमें जब मालवीय जी बोलने को उठे तो उनका गला भर आया और आँसू गिरने लगे | इससे उनके प्रति महामना जी की गहरी गुरू –भक्ति का अनुमान किया जा सकता है | विश्वविद्यालय का वास्तु-निवेश (ले आउट) मैंने सरस्वती जी के नाचते मयूर के रूप में किया है | मध्य में उसका शोभन शरीर है, केन्द्रीय कार्यालय और विश्वेश्वर का मंदिर, तब उत्तरोत्तर वर्धमान अर्धवृतोंमें महाविद्यालयों के भवन, खेलों के मैदान, छात्रावास और स्टाफ के आवास वाले बंगले | यह अर्धवृतों की अवली है, नृत्य-मयूर का कलित पिच्छ-कलाप|’महामना जी ने अपनी यह कलापूर्ण कल्पना, एक दिन मुझे सुनायी थी | विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग प्रारम्भ करने पर, उसका पाठ्यक्रम निर्धारित करने के हेतु महामना जी ने कई व्यक्तियों को नागरी प्रचारिणी सभा में एकत्र किया उनमे मैं भी था | चन्दबरदायीसे द्विवेदी-काल तक की प्रतिनिधि रचनायेंचुननी थीं | चयन सर्वसम्मति से हो चला किन्तु चलती गाड़ी में बिहारी सतसई का रोड़ा अटक गया | कई विद्वानों का विरोध था | महामना जी चुपचाप दोनों पक्ष के तर्क सुन रहे थे, ध्यानपूर्वक | बहस तूल पकड़ रही थी, मुझसे न रहा गया | महामना जी से निवेदन किया कि “सतसैया के दोहरे” कैसे छोड़े जा सकते हैं | तब उन्होंने सुनाया-मैंने अपनी युवावस्था में बिहारी के तीन सौ निष्पंक दोहे चुने थे;नायिका ने केवल स्वकीया को ही लिया था | उसी प्रकार का निर्दोष संकलन अपने पाठ्यक्रम में भी निश्चय रहना चाहिए | कोई इसका विरोधी न था | महामना जी विश्वविद्यालय के लिए खोज-खोज कर एक से एक विद्वान प्राध्यापक बुलाये थे | उनमें एक डॉ० गणेशप्रसाद जी गणित के अन्तराष्ट्रीय ख्याति के विद्वान् थे | इसी प्रकार वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक डॉ० बीरबल साहनी; वह भी विश्वविख्यात थे | गणितज्ञ होने के कारण डॉ० गणेशप्रसाद की एक चूड़ी ढीली थी और वह लोगों से झगड़ उठते थे | एक दिन वह डॉ० साहनी से उलझ पड़े जिन्होंने उन्हें ‘डैम स्काउंड्रल’ कह दिया | इसकी लिखित शिकायत डॉ० प्रसाद ने महामना जी से की | उन्होंने डॉ० साहनी से लिखित कैफियत तलब की | डॉ० साहनी ने यह लिखित कैफियत दी-“यस, आइ कॉल्ड हिम डी०-एस-सी०|” डॉ० प्रसाद डी० एस सी० थे | डॉ० साहनी के इस विलक्षण उत्तर से महामना जी इतने प्रसन्न हुये कि मामला फाइल करा दिया | मार्ले-मिन्टो रिफार्म के बाद, बड़े लाट की जो काउन्सिल बनी उसके सदस्य महामना जी और गोखले जी थे | सरकार की ओर से कोई प्रस्ताव उपस्थित किया गया जिसका महामना जी ने विरोध किया, गोखले ने समर्थन | प्रस्ताव सरकार के पक्ष में स्वीकृत हो गया | कुछ दिनों बाद गोखले जी ने महामना जी से कहा- उस समय आप सही थे; मैं गलती पर था | “सरकारी वर्ग ने आपके जठर द्वारा पहुँच कर आपको मुट्ठी में कर लिया था ,” महामना जी का गूढ़ उत्तर था | उन दिनों परिस्थिति यह थी कि फिरंगियों ने नरम दल वाले नेताओं की कमजोरी ताड़ ली थी | ये नेता फिरंगियों से बराबरी वाला सामाजिक दर्जा पाने पर फूले न समाते, समझने लगते कि हमने (हमारे देश ने) अब समान पद पा लिया | बड़े-बड़े अफसर, स्वयं बड़े लाट तक उन्हें खाने पर बुलाते और वे उनके शिकार हो जाते, क्या गोखले,क्या सरतेजबहादुर, क्या सर सी० वाइ० चिन्तामणि...... सभी का एक ही हाल था | बकौल अकबर इलाहाबादी- गम तो लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ, कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ | इस बार भी वही हुआ था | वाइसराय ने गोखले को खाने पर बुलाकर अपने शीशे में उतार लिया था | जब वह अपनी भूल समझे, महामना जी से रोना रोये | बनारस के एक तेज-मिजाज रईस का, यहाँ के कलक्टर से किसी बात पर झगडा हो गया | उन्होंने उसकी शिकायत उत्तर प्रदेश के गवर्नर को लिख भेजी और उनसे मिलने का समय मांगा | ऐसे शिकायती पत्र कलक्टर के द्वारा ही जाते हैं | कलक्टर को बाध्य होकर उसे भेजना पड़ता है | इस मामले में भी वही हुआ और गवर्नर ने उनसे मिलने का समय निश्चित किया | तब वह महामना जी के पास उपस्थित हुए और उनसे पुछा कि गवर्नर से मैं क्या-क्या बांते करूँ | कहने कि आवश्यकता नहीं कि महामना जी को सारा मामला विदित था | महामना जी ने कहा कि तुम इतने समझदार हो कि तुम्हें बात-चीत की सीख देना आवश्यक नहीं | मुझे केवल इतना परामर्श देना है कि गवर्नर से उर्दू में बात करना, अंग्रेजी में नहीं | यदि उर्दू में बात करोगे तो तुम बीस पड़ोगे वह उन्नीस पड़ेंगे, अंग्रेजी बातचीत में वह बीस पड़ेंगे तुम उन्नीस पड़ जाओगे| महामना जी यात्रा में मुहूर्त एवं दिशाशूल आदि का विचार नहीं करते | कही जाना होता तो तैयार होकर नारायण उच्चारण करके प्रस्थित हो जाते | सन् 1924 कीबात है | वर्तमान युग में हिन्दू–मुस्लिम एकता की जन्म भूमि दिल्ली में साम्प्रदायिक उपद्रव कीअग्नि प्रज्वलित हुई देखकर महात्मा गाँधी और देश के अन्य नेता उसे बुझाने के लिए यहाँ एकत्रित हुए | उस समय मालवीय जी महाराज भी आए और बिड़ला मिल कि सब्जी मंडी वाली कोठी में ठहरे | सन् 1924 में दिल्ली के हिन्दू–मुस्लिम झगडे का केन्द्र सदर बाजार ही था | वह बाजार तीन–तीन हिस्सों में बटा हुआ है | जहाँ बड़े–बड़े मुसलमान सौदागरों कीदुकानें थीं | उसे आगे पहाड़ी धीरज की बस्ती है जिसमें जाट, गुर्जर, अहीर, माली आदि जातियों के लोंगो की अधिकताथी | पश्चिमी किनारे पर हिन्दूराव का बाड़ा है, जो मुस्लिम प्रधान था | अब भी कसाबघर की समीपता के कारण वहाँ कसाइयों की आबादी बहुत अधिक है | आजादी की इस परिस्थिति के कारण शहर में थोडा सा भी साम्प्रदायिक विक्षोम होने पर सदर बाजार में घोर युद्ध की भेरी बजने लगती थी, सन् 1924 में भी ऐसा ही हुआ था | एक दिन संध्या के समय सदर बाजार पहाड़ी धीरज की एक चौपाल में इलाके के प्रमुख हिन्दुओं की एक पंचायत बुलाई गई थी | उसमें मालवीय जी भी पधारे थे | शान्ति स्थापना के सम्बन्ध में विचार करते–करते बहुत देर हो गई | रात के लगभग नौ बज गए | मुझे मालूम था की पण्डित जी साढ़े-नौ बजे की गाड़ी से बाहर जाने वाले हैं | मैंने उन्हें याद दिलाया कि समय हो रहा है, अब बात–चित समाप्त कीजिए, परन्तुपण्डित जी की तसल्ली अभी नहीं हुई थी | सेक्रेटरी को आज्ञा थी कि वह रिजर्व की हुई सीट पर बिस्तर बिछा छोड़े | इस कारण कुछ अटपटी बात होते हुए भी मुझे फिर याद दिलाना पड़ा कि गाडी का समय हो रहा है चलिए, इस समय सवा नौबज चुके हैं |पण्डित जी ने हाँथ के इशारे से मुझे रोकते हुए बातचीत जारी रखी | जब साढ़े-नौ बज गए तब फिर एक बार घड़ी सामने रख कर पण्डित जी को याद दिलाना पड़ा; इसका कुछ असर हुआ और पण्डित जी बातचीत का सिलसिला समाप्त करके खड़े हो गए | मोटर में बैठकरपण्डित जी ने मुझे इन शब्दों में आश्वासन दिया | आपने कहा कि-यह समझना गलत है कि केवल हम ही लेट होते हैं, क्योंकि ट्रेनें भी प्रायः लेट होती हैं | आपने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि ट्रेन मनुष्य से भी अधिक लेट होती है | यही कारण है कि देर होने के कारण मेरी गाड़ीशायद ही कभी छूटी हो | यदि कभी छूट भी गई तो मेरा काम कभी नहीं रूका | इस कथन की पुष्टि में पण्डित जी ने अपनी एक अनुभूत घटना सुनाई जो इतिहास का अंग होने के योग्य है, इसलिए उसे मैं यहाँ दोहराता हूँ – वह घटना तब हुई थी, जब भारत के वायसराय लार्ड चेल्म्सफोर्ड थे | पण्डित जी को एक अत्यन्त आवश्यक कार्य से ऐसी जगह जाना पड़ा, जहाँ इलाहाबाद से रेल द्वारा तीन-चार घंटों में पहुँचा जा सकता था | उसी दिन रात के समय पण्डित जी को इलाहाबाद वापस पहुँचनाअत्यन्त आवश्यक था| शायद वह किसी सार्वजनिक सभा में सभापतित्व करने वाले थे | उस जगह का कार्य समाप्त करके इलाहाबाद वापस जाने के लिए जब पण्डित जी स्टेशन पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि जिस गाड़ी से इलाहाबाद जाना चाहिए था, वह निकल चुकी थी | पण्डित जी के सुदीर्घ जीवन में यह घटना अपवाद ही समझनी चाहिए, क्योंकि स्टेशन पर देर से पहुँचने पर भी गाड़ी उन्हें मिल ही जाती थी | उस दिन मानों अनहोनी हो गई | वह लेट हो गए, गाड़ी लेट नहीं हुई | परन्तु पण्डित जी आशा का सूत्र छोड़ने वाले नहीं थे | उन्होंने स्टेशन मास्टर से दर्याफ्त किया कि क्या और कोई गाड़ी, फिर चाहे वह मालगाड़ी ही हो, इलाहाबाद के लिए मिल सकती है या नहीं | स्टेशन मास्टर ने उत्तर दिया कि हाँ, मालगाड़ी आने वाली थी, परन्तु वह दूसरे स्टेशन पर रूक गई है,क्योंकि वाइसराय की स्पेशल वहाँ से गुजरने वाली है | इससे भी निराश न होकर पण्डित जी ने पूछा कि क्या वाइसराय की स्पेशल यहाँ नहीं ठहर सकती | स्टेशन मास्टर ने बतलाया कि स्पेशल ट्रेन यहाँ नहीं ठहरेगी और यदि अकस्मात् लाइन क्लीयर देने में ही कोई भूल न हो जाए तोउसे किसी प्रकार ठहराया भी नहीं जा सकता | इस पर पण्डित जी ने उसे सुझाया कि क्या यह सम्भव नहीं कि लाइन क्लीयर देने में चूक कर दी जाए, जिससे ट्रेन यहाँ ठहर जाए | जब स्टेशनमास्टर ने यह आशंका प्रकट की कि ऐसा करने से लाइन क्लीयर देने वालों पर आपत्ति आ सकती है, तो पण्डित जी ने उसे आश्वासन दिया कि मैं ऐसा नहीं होने दूँगा | बात तय हो गई | लाइन क्लीयर देने वाले आदमी ने अपना हाथ इतनी दूर रखा कि ट्रेन को लाइन क्लीयर न मिल सका | गाड़ी स्टेशन पर रूक गई | पण्डित जी प्लेटफ़ॉर्म पर ही खड़े थे | झट उस डिब्बे के सामने जा पहुँचे, जिसमे वाइसराय बैठा हुआ था | वाइसराय ने पण्डित जी को देखकर बाहर मुँह निकालते हुए पुछा, ‘हैलो पण्डित, आप यहाँ कहाँ ?’ पण्डित जी उत्तर दिया कि ‘मैं यहाँ इलाहाबाद वापस जाने के लिए खड़ा था | आपकी स्पेशल ट्रेन के कारण गाड़ियाँ रूक गईं,जिससे मैं लटकता रह गया |’ वाइसराय ने सज्जनता को निभाते हुए कहा, “आइए,मेरी गाड़ी में आजाइए | मैं आप को इलाहाबाद पहुँचा दूँगा |” पण्डित जी बगैर तकल्लुफ के वाइसराय के डब्बे में बैठ गए | साथ ही बातचीत के सिलसिले में गाड़ी रोकने की पूरी कहानी सूना कर बिचारे सिगनलर की सफाई भी कर दी | इस तरह स्टेशन पर देर में पहुँचने पर भी पण्डित जी इलाहाबाद समय पर पहुँच गए |ऐसी घटनाओं ने पण्डित जी के आत्मविश्वास को बहुत अधिक बढ़ा दिया था | उन्हें यह अटल विश्वास सा हो गया था कि शीघ्र या विलम्ब में कार्य अवश्य सिद्ध होगा | यह घटना पण्डित जी ने हमको सदर से दिल्ली स्टेशन की और जाते हुए रास्ते मेंसुनाई| स्टेशन पर जा कर देखा कि गाड़ी सचमुच 10-11 मिनट लेट थी, मानों पण्डित जी की प्रतीक्षा में | इसी प्रकार की एक और घटना इलाहाबाद स्टेशन की है | पण्डित जी बांकीपुर के कांग्रेस अधिवेशन में जा रहे थे | उससे कुछ दिन पहले ही दिल्ली में लार्ज हार्डिंग पर बम गिरने की घटना हुई थी | उस दिन सायंकाल के समय प्रयाग में बम फेंकने वाले की निन्दा करने के लिए विराट् सार्वजनिक सभा काआयोजन किया गया था | सर सुन्दरलाल उसके सभापति थे | मालवीय जी उसी दिन दिल्ली से प्रयाग पहुँचे थे | सभा में मुख्य भाषण उन्हीं का हुआ | मैं भी दिल्ली से पण्डित जी के साथ ही प्रयाग गया था और ठहरा भी उन्हीं के पास था | सभा में जाते समय पण्डित जी यह आदेश दे गए थे कि उनका सामान समय से पहले स्टेशन पर पहुँचा दिया जाए और बिस्तर बिछा रखा जाए | पण्डित जी के प्राइवेट सेक्रेटरी के साथ मैं सभा से जल्दी उठ गया और हम दोनों सामान लेकर स्टेशन पर जल्दी पहुँच गए | आज्ञानुसार सब कुछ कर दिया गया | नौकर को सर्वेन्ट की कोठरी में बिठाकर हम दोनों प्लेटफ़ॉर्म पर पण्डित जी की प्रतीक्षा करने लगे | गाड़ी के छूटने का समय हो गया गार्ड ने हरी झण्डी दिखाई, फिर सीटी बजाई और गाड़ी हिलने लगी | तब हम लोगों को सामान की चिन्ता हुई, सेक्रेटरी साहब ने डब्बे में घुसकर पण्डित जी का बिस्तर लपेटा और बाहर फेंक दिया | नौकर भी नीचे उतर आया | सारा सामान प्लेटफोर्म पर उतार कर सेक्रेटरी महोदय भी कूदकर ट्रेन से उतर आए | उस समय गाड़ी के लगभग आधे डब्बे प्लेटफोर्म से बाहर जा चुके थे | गाड़ी अकस्मात् रूक गई | हम लोग देखने लगे कि गाड़ी रूकने का क्या कारण हुआ ? देखते क्या हैं कि आगे–आगे मालवीय जी और उनके पीछे–पीछे डॉ० भगवानदास जी प्लेटफोर्म पर बने हुए पुल पर से गाड़ी की ओर भागे आ रहे हैं | पाठक विश्वास रखे कि भागे शब्द का प्रयोग मैंने अतिरंजना में नहीं किया | दोनों महानुभाव वस्तुतः भागे आ रहे थे | दोनों के दाएँ हाथ गाड़ी को रोकने के लिए उठे हुए थे | वहाँ सभी लोग मालवीय जी को पहचानते थे | उन्हें आते देखकर स्टेशन मास्टर ने गाड़ी को लाल झण्डी दिखला दी | गाड़ी खडी हो गई | सामान फिर से डब्बे में लगा दिया गया और पण्डितजी के पीछे–पीछे मैं भी गाड़ी पर सवार हो गया| महात्मा मुंशीराम (पीछे, स्वामी श्रद्धानन्द जी) के पुत्र सम्पादक-प्रवर स्व० इन्द्रविद्यावाचस्पति ने, नवम्बर 1956 ई० के आजकल में महामना जी के कुछ संस्मरण लिखे हैं | ये दोनों उनके हैं | महामना जी ने पूरा उद्योग किया कि जिन ब्राह्मणों का खान–पान और रहन-सहन एक सा है उनमें ब्याह-शादी होने लगे |अपनी पौत्री का विवाह एक गौड़ ब्राह्मण से करके उन्होंने यह पथ प्रदर्शन भी कर दिया | फिर उन्होंने ब्राह्मणों की कई उपजातियों के लोगों को एकत्र करके अनुरोध किया कि आप लोग भी इस सिद्धान्त को कार्यान्वित करें | किन्तु कोई सहमत न हुआ तो उन्होंने सखेद कहा कि अभी तो आप हमारी बात नहीं मानते लेकिन समय आपसे इस सिद्धान्त को मनवा लेगा | उस समय पण्डितों की मनोवृति इतनी संकीर्ण थी कि वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग में ही जो चारों वर्णों को रामायण पाठ में समान अधिकार दिया गया है उसकी चौथी पंक्ति को उन लोगों ने इस प्रकार बदल लिया – श्रृण्वश्च शुद्रोऽपि महत्वमीयात् | अर्थात् शूद्रों को केवल सुनने का अधिकार है | महामना जी इससे दुखी थे | शिव जी के पंचाक्षर मंत्र की दीक्षा वह सवर्ण और अछूत सभी हिन्दुओं को दशास्वमेध घाट पर एक भाव से निरन्तर दिया करते | निम्नोद्दतपत्र महामना जी ने स्व० जमनालाल जी बजाज को 1926 ई० में लिखा था | इस पर किसी विवृत्ति की आवश्यकता नहीं – श्री: || प्रिय जमनालाल जी, आपने अपने भगवद्भक्त पूर्वजों के स्थापित किये भगवान् लक्ष्मीनारायण के मन्दिर में ब्राह्मण से लेकर चांडालपर्यंत सब श्रद्धालु भाइयों को जगत्पिता की पावन मूर्ति का दर्शन करने की स्वतंत्रता दी और जो कूएँबनवाये उन पर सब जाति के भाइयों को स्वच्छ बर्तन से पानी भरने का अधिकार दिया, यह सुनकर मुझको बहुत संतोष हुआ | आपके ये दोनों काम सर्वथा शास्त्र के अनुकूल हैं और घट-घट वासी विश्वात्मा इससे प्रसन्न होगा | परमात्मा आपकी धर्म की भावना,देश भक्ति और निष्काम लोक-सेवा के भाव को दिन-दिन अधिक दृढ करें और आपके द्वारा देश का और लोक का दिन-दिन अधिक उपकार हो | विश्वविद्यालय, काशी आपका अ.श्रावण शुक्ला 19, मदनमोहन मालवीय सं० 1985 एक बार पूज्य बापू के आमंत्रण पत्र पर महामना जी सेवाग्राम गये और वहाँ एक सप्ताह रह कर लौटे, रामनारायण मिश्र ने उनसे वहाँ का हाल पूछा | महामनाजी ने कहा- पुराणों में तपोवन के जो वर्णन पढ़ा करता था, वहाँ आखों देख आया | नागरी प्रचारिणी सभा में महामना जी का एक भाषण था, निश्चित समय के एक घंटे बाद वे वहाँ पहुँचे | भीड़ उनके लिए आकुल थी | उनके पहुँचते ही पंo रामनारायण मिश्र ने,जो सभा के प्रमुख कर्मी थे साथ ही महामना जी के भक्त भी, उलाहना दिया, विलम्ब के लिए | महामना जी ने नितान्त तटस्थ भाव से उतर दिया-रामनारायण, ‘टेक मी एज आइ याम’ रामनारायण, मैं जैसा भी हूँ, उसी रूप में मुझे ग्रहण करो | एक महानुभाव जिनको मैं अपना छोटा भाई मानता और उनसेअद्वय भाव रखता, बड़े निकृष्ट प्राणी थे |आरम्भ में मैं इस तथ्य को बिल्कुल भाँप न सका... उन्होंने अनेक अन्य दुराचारों के साथ-साथ एक आर्थिक गोलमाल भी किया था | यद्दपि मैं उस गोलमाल से बिल्कुल अलग था फिर भी उनके संसर्ग के कारण मुझ पर भी आपत्ति आ गई और जेल जाने के लक्षण प्रतीत होने लगे | मैं महामना जी की शरण में आया और अपनी विपत्ति उन्हें सुना कर रक्षा का उपाय बताने कि प्रार्थना की | उन्होंने मुझे श्रीमद्भागवत के आठवें स्कन्ध वाले गजेन्द्रमोक्ष का उपदेश दिया और कहा कि पूर्ण भक्ति पूर्वक आर्त होकर इसका प्रतिदिन पाठ करते रहो; तुम पर कोई आंच नहीं आवेगी | इसी प्रसंग में उन्होंने यह भी बताया कि एक बार उत्तर प्रदेश सरकार ने यह निर्णय किया कि हाईकोर्ट इलाहाबाद से उठकर लखनऊ चला जाय | मैंने त्रिवेणी तट पर तीन दिन तक इस स्तोत्र का अखंड पाठ किया | हाईकोर्ट को स्थानान्तरित करने की आज्ञा रद कर दी गई | उस भँवर से उबरने पर मैं उनके दर्शनार्थ आया | उस समय कहीं जाने के लिए वे मोटर पर सवार हो रहे थे | मुझसे वात्सल्य पूर्ण प्रश्न किया-सब ठीक है न ? मैं इतना गद्गद् हो गया था कि रुद्ध कंठ से उनका चरण-स्पर्श मात्र कर सका | 1933की गर्मियों का बात है | काशी मेंद्विवेदी अभिनन्दन उत्सव समाप्त हो चुका था | आचार्य द्विवेदी जी अपने गाँव लौट रहे थे | हिन्दी प्रेमियों की एक भारी भीड़ उन्हें छोड़ने स्टेशन गई थी, किन्तु ट्रेन में देर थी I आचार्यवर ने उस भीड़ को साग्रह वापस कर दिया | वे वेटिंग रूम में बैठ गए | केवल उनके कतिपय निकटवर्ती व्यक्ति रह गए थे | तभी महामना जी भी वेटिंग रूम में पधारे | उन्हें भी वही गाड़ी पकडनी थी | दोनों महानुभावों में वार्तालाप होने लगा | आचार्य द्विवेदीजी जितने ही निराशावादी, महामना जी उतने ही आशावादी | दिवेदी जी महाराज अपने गिरते स्वास्थ्य की चर्चा उनसे करने लगे | महामना जी उन्हें बार-बार समझाते जाते थे कि यह सब आपकी मनोदशा के कारण है | किन्तु दोनों ही महारथी अपने अपने पक्ष पर दृढ़ रहे और कुछ देर बाद अन्य चर्चा होने लगी | कविवर सियारामशरण गुप्त भी वहाँ उपस्थित थे | आचार्यवर को पहुँचाने आए थे | उन्होंने अवसर पाकर महामना जी के सामने एक सादा कागज उनका हस्ताक्षर प्राप्त करने के लिए,उपस्थित किया | सियाराम जी के एक भतीजे हस्ताक्षर संग्रह करते थे | उन्हीं के लिए उन्होंने वहकागज़ महामना जी के सामने रखा था | उन्होंने सहर्ष उस पर हस्ताक्षर कर दिया | तब सियाराम जी ने प्रार्थना की कुछ लिख भी दीजिए, महामना जी ने उत्तर दिया-बस | सियाराम जी ने सस्मित निवेदन किया आप के हस्ताक्षर के ऊपर बहुत-सा अंश सादा है, यदि मैं स्वार्थ साधन के लिए उस पर कुछ लिख दूँ तो ? सियाराम जी को यह युक्तिपूर्ण उक्ति महामना जी को बहुत जँची और उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक यह प्रासंगिक सूक्ति अपने हस्ताक्षर के उपर लिख दी- बालादपि सुभाषितं ग्राह्यम् | उस समयकी एक बात और याद आ गई | बापू का पूना वाला अनशन चल रहा था | महामना जी बहुत ही चिन्तित थे | मेरे यह पूछने पर कि क्या होगा, कहने लगे –“मैं तो समझता हूँ कि गाँधी जी ने सोच लिया है कि यहाँ तो कुछ हो–हवा नहीं रहा है;अब यहाँ से चलो |”इस वाक्य में उनके ह्रदय की पीर भरी थी | मक्खीचूस से 25 शैय्याओ का वार्ड बनवाया एक बार महामना जी का दर्शन करने बम्बई के एक बड़े धनाढ्य सेठआये | उनसे महामना जी ने कहा कि विश्वविद्यालय अस्पताल में बहुत थोड़ी रोगी शय्याएँ हैं आप बीस-पच्चीस शय्याओं के लिए आर्थिक सहायता दीजिए | किन्तु सूखे सोंठ सेठिया ने अपनी असमर्थता व्यक्त की | कुछ दिनों बाद महामना जी कार्यवश बम्बई गये | वहाँ सुना कि सेठिया अस्पताल में पड़े हैं | महामना जी के संग ज्योतिषाचार्य रामव्यास जी भी थे | व्यास जी से उन्होंने कहा कि चलो उन्हें देख आवें | व्यास जी ने निवेदन किया कि उस मक्खीचूस के यहाँ क्या चलियेगा | महाराज ने उत्तर दिया चलो तो-और अस्पताल पहुँचे | सेठियाबीमारी का कष्ट झेल रहे थे, महामना जी ने उन्हें प्रेम पूर्वक देखा और ढाढस बँधाया | जब वे बिदा होने लगे तो सेठिया ने स्वेच्छया उनसे साग्रह प्रार्थना की कि मेरी ओर से अस्पताल में पच्चीस शय्याओं का वार्ड बनवा दीजिए | गायब दान की रकम कमाई से पूरी की महामना जी को शिमला में किसी नरेश वा धन-कुबेर ने विश्वविद्यालय के लिए एक बड़ी रकम दी | नोटों का वह बंडल लेकर महामना जी जब अपने निवास स्थान पहुँचे, बैंक का समय बीत चुकाथा | उन्होंने बंडल अपनी डेस्क के दराज में रख दिया | वे दराज का ताला कभी बन्द न करते | दूसरे दिन रकम बैंक भेजने के लिए उन्होंने दराज खींचा | पाया, बंडल गायब है | एक स्वजन ने उसे उड़ा लिया था | उन्होंने कोई पूछताछ न की | तब तक उन्होंने प्रैक्टिस एकदम छोड़ न दी थी; कभी कदा मुकदमा ले लेते थे | इलाहाबाद लौटने पर उन्होंने एक मामला ले लिया और उनकी फीस से दान वाली रकम भर दी | महामना जी के निकट सम्बन्धी स्व० व्रजमोहन जी व्यास की चर्चा ऊपर हो चुकी है | एक बार वह महामना जी के पास बैठे थे; कई अन्य संबंधी भी थे | किसी घरेलू गुत्थी पर, जिसके कारण महामना जी बहुत आहत थे, विचार हो रहा था | प्रसंग वश महामना जी ने, एक लंबी सांस लेकर, व्यास जी से कहा- व्यास जी, बहुत कुछ झेल चूका हूँ | अब कुछ व्यापता नहीं | इस पर व्यास जी ने, जिन्हें संस्कृत और उर्दू के पांच सौ से अधिक सुभाषित याद थे, महामना जी को ग़ालिब का यह शेर सुनाया – रंज के खूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज | मुश्किलें हम पर पड़ीं इतनी आसां हो गयीं || (खूगर-अभ्यस्त) सुनकर आप बोले-फिर कहिए, व्यास जी | और, जब व्यास जी ने पुनः यह उक्ति सुनायी तो उनकी आँखों से टपटप आँसू टपकने लगे | आचार्य सीताराम जी चतुर्वेदी महामना जी के विशेष कृपा पात्र थे, एवं बहुधा उनके साथ-साथ रहते थे | उन दिनों का एक संस्मरण आचार्य महोदय से सुनिए – मैं महामना मालवीय जी महाराज के साथ उज्जैन गया था | वहाँ सभा में अन्य लोगों के साथ मुझे भी माला पहना दी गई थी और मैंने भी अन्य लोगों की देखा-देखी उतारकर रख दी थी किन्तु मालवीय जी महाराज माला पहने रहे | सभा समाप्त होने पर मालवीय जी महाराज ने मुझसे पूछा- “तुमने माला क्यों उतार दी?” मैं समझ नहीं पाया और मैंने कह दिया –“सब लोग उतार रहे थे, मैंने भी उतार दी |” तब उन्होंने कहा-“देखो, माला उतारने से माला पहनाने वाले का भी अपमान होता है और माला का भी |” इस प्रसंग में उन्होंने कविवर बिस्मिल इलाहाबादी के गुरू नूह नारवी का यह शेर सुनाया— हारों में गुंथे, जकड़े भी गए, गुलशन भी छुटा, सीना भी छिदा | पहुँचे मगर उनकी गरदन तक, यह खुश इकबाली फूलों की || माला उतारने से फूलों की खुश-इकबाली(भाग्यशालित्व) भी हम नष्ट कर डालते हैं | तब से आज तक मैं कभी माला नहीं उतारता हूँ, यद्दपि माला उतारकर रखने वालों के बीच मैं नक्कू अवश्य बना रहता हूँ, पर मुझे उसकी हिचक नहीं है | गाड़ी पर कौन किसको विदा करें ? बीकानेर के महाराज गंगासिंह की महामना जी पर बहुत श्रद्धा थी |एक बार वे लोग शिमला से एक ही दिन नीचे लौटे| कालका रेलवे स्टेशन पर उनकी भेट हो गयी और वार्तालाप होने लगा | महामना जी को बनारस आने के लिए डाक गाड़ी पर सवार होना था;महाराज ने उनसे कहा कि चलिए आपको सवार करा आऊँ | वे जब मेल वाले प्लेटफार्म पर पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि गाड़ी छूटने में भी देर है | महामना जी ने उनसे कहा-तो चलिए आपको बिठा आऊँ | उन लोगों की बातचीत में इतना आनन्द आ रहा था कि बिछुड़ना न चाहते थे | जब महामना जी बीकानेर के स्पेशल तक पहुँचे तो महाराज ने कहा – यह कैसे हो सकता है कि आप यहाँ तक कष्ट करें और मैं आपको पहुँचाने न चलूँ | दोनों जन पुन: प्रत्यावर्तित हुये | यह सिलसिला तीन बार चला | तब महाराज ने महामना जी से आग्रह किया-देखिए मेरी स्पेशल तो मेरे आज्ञाधीन है | आपकी गाड़ी तो समय से छूट जायेगी | अतः मैं हार नहीं सकता | अब आप कष्ट न कीजिए; मेरी बिनती मानकर सवार हो जाइये | अन्ततः महाराज उनको बैठाकर गाड़ी के गति पकड़ने पर उनको प्रणाम करके, अपनी स्पेशल कीओर लौटे | महामना जी पाक विद्या विशारद थे | प्रवास में वे स्वयं पाकी रहते और स्वभाव से पर्फेक्शनिस्ट होने के कारण, साथ ही इस कारण भी कि उनका परिवार बहुत अच्छा भोजन बनाता, वे रसोई एक कला के रूप में बनाते | जब वे बंबई जाते तो सेठ नरोत्तम मुरार जी ठाकरशी के अतिथि होते | बंबई के उद्योग पतियों में उन दिनों नरोत्तम भाई देश प्रेम और उदारता में अग्रणी थे | जब महामना जी आप भोजन बनाते तो नरोत्तम भाई की श्रीमती जी वहीं बैठी रहती | वे अभी जीवित हैं | बताती हैं कि महामना जी फुलका ऐसा सेंकते कि वह फूलकर डब्बा हो जाता किन्तु उस पर तनिक भी चित्ती न पड़ती | तब वे उनसे बड़ी आत्मीयता से कहते- “बऊ, तुमको फुलका खाना होगा |” महामना जी का आग्रह वह कैसे टालतीं | बताती हैं,वैसे फूलके जीवन भर में कभी नहीं खाये | उत्तर प्रदेश के एक उच्च शिक्षाधिकारी का नाम था, नैपाल सिंह | एक बार वह महामना जी से मिलने आये | आपने उनका नाम पूछा; उन्होंने उक्त नाम बताया | आपने कहा नैपाल क्या?तुम्हारा नाम है –नेहपाल सिंह | तब से वह अपने नाम का यही रूप बर्तने लगे |बनारस में एक सुयोग्य अध्यापक थे| पंजाबी सारस्वत ब्राह्मण होने के कारण उनका नाम था, निक्का मिश्र; उन्होंने हिन्दी क्षिप्र-लेखन पद्धति निर्मित की जो वैज्ञानिक,परिपूर्ण साथ ही सरल भी है | जब महामना जी ने उनका नाम सुना तो उसे निष्कामेश्वर मिश्र कर दिया, जिसे मिश्र जी ने सादर स्वीकार कर लिया | इसी प्रकार,हिन्दी के अपने ढंग वाले एक ही आलोचक और साहित्यकार स्व० शान्तिप्रिय द्विवेदी का नामकरण भी महामना जी का ही किया है, उनके सौम्य एवं विनम्र स्वभाव के कारण | उनका पूर्व-नाम था मुच्छन दुबे | नर्सनेअपनी पूरी कमाई विश्वविद्यालय को अर्पित की विश्वविद्यालय के चिकित्सा संकाय में एक क्षत्राणी नर्स थीं; सिताबो देई | वह निःसन्तान थीं; अपना समस्त अर्जन उन्होंने विश्वविद्यालय को इस निमित्त अर्पित कर दिया कि उससे एक आवास बना दिया जाये, जिसके किराये की आय योग्य क्षत्रिय विद्यार्थी को छात्रवृति रूप में दी जाये | महामना जी ने यह दान सवात्सल्य स्वीकार करते हुए, उनसे कहा- “तुम सीता देवी हो; सिताबो देई नहीं |” तुम्हारे दान से निर्मित मकान का नाम होगा सीता-निवास | महामना जी का नियम था कि वे निरन्तर बोर्डिंग हाउसों का निरीक्षण किया करते | एक दिन एक बोर्डिंग में उन्हें एक ऐसा विद्यार्थी दिखाई दिया जो अपना अपव्यय करता था | रंग पीला, गाल चुचके,आँखें धँसी | महामना जी ने उसे अपने पास बुलाकर ममत्व एवं आदेश पूर्वक कहा- “यह कुटेव छोड़ दो |” बापूकेलिए५०बी . एच .यू.भीन्यौछावरकरदेता जब 1942 ई० वाला आन्दोलन आरम्भ हुआ तो विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थी 12 अगस्त को महामना जी से यह पूछने आये कि उसमें भाग लें वा न लें, क्योंकि भाग लेने में इस बात का डर था कि सरकार यूनिवर्सिटी को जब्त कर लेगी | उस दल में महामहिम जैराम दास दौलतराम के पुत्र, अर्जुन दौलत राम भी थे | उन्होंने मुझे बताया कि उस समय महामना जी अपने आवास वाले लान पर बैठे थे | विद्यार्थी मंडली की बात सुनकर उन्होंने यह ओज-पूर्ण उत्तर दिया—“मैंने एक यूनिवर्सिटी इतना समय लगा कर बनायी है | यह क्या यदि ऐसी पचास युनिवर्सिटी बनायी होती तो मैं उनको भी बापू जी के लिए दे देता |” ........और, उनकी आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे | 1942 ई० वाले आन्दोलन में जब सरकार की शनिदृष्टि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पर पड़ी और यहाँ भारी धर-पकड़ के साथ-साथ इंजीनियरिंग कालेज के बड़े कीमती-कीमती उपकरण, जिनसे बंदूक आदि बनाने की आशंका थी, उसको सेना उठा कर ले जाने लगी,लोगों ने महामना जी का ध्यान उधर दिलाया| वह तनक भी विचलित नहीं हुये, सुतरां सत्व समाविष्ट होकर मात्र इतना कहा--- ‘मिथिलायां प्रदीप्तायां न में दहति किच्चन’ पौराणिक आख्यान यों है कि महर्षि बादरायण जब अपने पुत्र शुकदेव जी को सारा तत्व ज्ञान दे चुके तब उनसे कहा कि अभी कुछ शेष हैं; राजर्षि जनक के पास जाकर अपना अध्यात्म ज्ञान परिपक्व करो | तदनुसार सुकदेव जी मिथिला गये और राजर्षि के द्वारपाल द्वारा प्रवेश की आज्ञा पाकर अपना कमण्डलु द्वारपाल को ही सौंपते हुए जनक जी के पास गये | समादर और समुचित आसन पाकर बैठ गये और अपने पिता की आज्ञा उनसे कहते हुये उपदेश कीप्रार्थना की | उसी समय मिथिला नगरी में प्रचण्ड आग लग गई जो राज प्रासाद तक आ पहुँची | शुकदेव जी तेज़ी से उठकर अपना कमण्डलुबचाने के लिए द्वार की ओर दौड़े | जब वे कमण्डलु सहित महाराज के सामने आये तो अग्नि एकाएक शान्त हो गई और राजर्षि जनक ने उनसे कहा कि मुझे जो उपदेश देना था दे चुका | देखो तुममें इतनी आसक्ति बनी है कि तुम एक कमण्डलु के लिए भाग गये और मैं इस भावना के साथ यहाँ स्थित रहा कि “मिथिलायां प्रदिप्तायां न में दहति किंचन”| अब तुम परिपक्व हो गये | अदब - दूसरोंकीसुविद्याकाध्यान सी० वाइ० चिन्तामणि को सिगरेट पीने की आदत थी | एक बार वह महामना जी के साथ रेलयात्रा कर रहे थे; अदब के कारण उनके सामने सिगरेट न पीते, बाथरूम में चले जाते | महामना जी लख गये और थोड़ी-थोड़ी देर बाद स्वयं बाथरूम में जाने लगे | जब कभी महामना जी पाते कि कोई व्यक्ति झूठ बोल रहा है, तो लठमार यह न कह देते कि तुम्हारी बात गलत है | सुतराम तेजस्विता पूर्वक कहते- “मैं तो आपको बहुत सच्चा आदमी समझता था और अब भी समझता हूँ, फिर भला कैसे कहूँ कि आपकी बात सही नहीं है |” बस उसकी कलई खुल जाती | महामना जी की आदत थी कि जब उन्हें कोई व्याख्यान देना होता उसके पहले उनका जो विश्रान्ति समय होता उसमें वे कुछ न कुछ पढ़ते अवश्य | इस पठन से उस व्याख्यान का कोई सम्बन्ध न होता | जो चीज सामने आ जाती उसी को पढ़ते | किन्तु ऐसा सतत संयोग होता कि जिस भी पुस्तक को वे पढ़ते यह उनकी बताई बात है- उनमें उन्हें कोई न कोई ऐसा मार्के का शब्द, वाक्य या विचार मिल जाता जो उनके व्याख्यान के लिए एक उत्कृष्ट सामग्री होती | उसका वे उपयोग करते और उनका व्याख्यान खिल उठता | महामना जी से किसी ने कहा कि आपको लोग सदा घेरे रहते और बातों में ही सारा समय बीत जाता है, काम करने कीतो छुट्टी मिलती ही नहीं | .......मेरे सारे काम बातों में ही हो जाते हैं .....उनका निश्चित उत्तर था | कसरत करने की बात चली | महामना जी सीख दे रहे थे कि सबको प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए | एक व्यक्ति ने कहा कि मुझे काम के मारे अवकाश ही नहीं मिलता | महामना जी ने कहा- मुझे भी दम मारने की छुट्टी नहीं मिलती | फिर भी, मैं नित्य व्यायाम कर लेता हूँ | अंग्रेजी में एक पुस्तक है- द लेजी मैन्स एक्सरसाइज | उसमें सो कर उठते ही बिस्तर में पड़े-पड़े कसरत कर लेने की विधि दी है | तदनुसार मैं शय्या छोड़ने के पहले ही व्यायाम कर लेता हूँ | और उसी समय उन महाशय को शय्या व्यायाम कर दिखाने लगे | महामना जी अपने स्टैनो वा प्राइवेट सेक्रेटरी को कोई डिक्टेशन देते तो पूरा हो जाने पर उसे सुनते और कुछ न कुछ परिवर्तन करते | तब वह टाइप होने जाता; कभी-कभी टंकण आरम्भ होने से पहले ही ड्राफ्ट मंगाकर पुनरपि परिवर्तन करते | इतना ही नहीं; जब वह टाइप होकर हस्ताक्षर के लिए उनके सामने रक्खा जाता तो उसे पुनः संशोधित करते | यदि किंचित संशोधन होता तो हस्ताक्षर कर देते | यदि अधिक,तो वह पुनः टाइप किया जाता | कहीं तब वह हस्ताक्षरित होता |ऐसे परफेक्शनिस्ट थे, वे | प्रयाग का विशाल माघ मेला देखकर किसी विदेशी पर्यटक ने महामना जी से जिज्ञासा की कि इतना भारी जन-समूह कौन एकत्र करता है ? महामना जी के पास ही पंचांग रक्खा था | उन्होंने उसे उठा कर उस पर्यटक के सामने रखते हुए, उत्तर दिया-“यह क्षीण कलेवर पंजिका|” तब ब्योरे में जाकर उसे समझाया कि इसमें वे समय दिये हैं जिनमे त्रिवेणी स्नान करने से पुन्य होता है| बस राष्ट्र स्वयं अपने को संयोजित करके इस मेले का रूप धारण कर लेता है | कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस समाधान द्वारा उन्होंने यह भी ध्वनित कर दिया कि भारतीय कैसे संघठन शक्ति-संपन्न हैं | मुझेमुक्तिनहीचाहिए महामना जी ने आदेश दे रक्खा था कि जब उनका अवसान काल आये तो वे काशी में न ले जाये, क्योंकि काश्यां मरणान्मुक्ति: | ‘मुझे मुक्ति नहीं चाहिए |’ मुझे तो पुनः जन्म लेकर विश्वविद्यालय की सेवा करनी है | एक बार महामना जी को चिकित्सकों ने एकमत परामर्श दिया कि आपको पूरे विश्राम कीआवश्यकता है| जब तक हम लोग कहें न, तब तक काम बिल्कुल न कीजिए | परंतू वे कहाँ सुनने लगे | तब भाई शिवप्रसाद गुप्त उन्हें हठ पूर्वक अपने घर, सेवा-उपवन ले गये और स्वयं चौकसी से उनकी पहरेदारी करने लगे |किन्तु कर्मठ महामना जी को बिना काम किये चैन कहाँ? वे हवा खाने के नाम पर, मोटर से बाहर चले जाते और सेवा उपवन के फाटक के ठीक बगल में एक बहुत बड़ा वृक्ष है जो चबूतरे आवेष्ठित है, वहीं बैठकर विश्वविद्यालय के कर्मियों के मसले निबटाते | भाई शिवप्रसाद को इसकी सूराग लग गयी | बस, उन्होंने यह नियम बना लिया कि वह भी महामना जी के संग घूमने जाने लगे | तब वे कर्मी और स्वयं महामना जी भी लाचार हो गये | भाई शिवप्रसाद ने उन कर्मियों को फटकारा भी| और महामना जी को कैद से तभी छोड़ा जब चिकित्सकों ने, बिना किसी ननु नच के, उन्हें काम करने की छूट दे दी | महामना जी का अन्तिम क्षण बिल्कुल निकट आ गया था और वे मूर्च्छित पड़े थे; उनके निकट गीता पाठ हो रहा था| गीता के 18वें अध्याय में भगवान् का अन्तिम उपदेश यों है— सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणंव्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || (18.66) गीता के सभी वैष्णव भाष्यकारों के अनुसार यह भगवान् का परम उपदेश है | जब यह श्लोक पढ़ा गया तब एक पाठकर्ता ने त्वा के बदले त्वाम् कह दिया | (संस्कृत में तुमको के अर्थ में त्वा और त्वाम् दोनों ही सर्वनाम आते हैं, किन्तु गीता में त्वा ही प्रयुक्त हुआ है त्वाम् नहीं) उन्होंने उस मूर्च्छितावस्था में ही हूँउँउँ कह कर अशुद्धि का वारण किया | 1. स्वनामधन्य, देश-रत्न स्व० शिवप्रसाद गुप्त अब हमें “आज” दैनिक, ज्ञानमण्डल प्रकाशन और काशी विद्यापीठ के जन्मदाता एवं भारत मातामंदिर के निर्माता रूप में ही याद हैं | परन्तु उनका व्यक्तित्व कितना अतुल्य और असामान्य था, इसे हमने बिसार दिया है | कोट्याधीश होते हुये भी वह इतने निरभिमान और निर्मद थे कि उन्होंने अपने को एक सामान्य जन के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखा | उदार वह इतने थे कि सैकड़ों व्यक्तियों (जिनमें वरिष्ठ और इतर राजनीतिक कर्मी, समाजसेवी, साहित्यिक, ऐसे लोग-स्त्री वा पुरुष-जिनके दिन बिगड़ गये थे, रोगी,वृद्ध और अपाहिज आदि) की और संस्थाओं की मुक्तहस्त सहायता निरन्तर किया करते और वह भी इस अनासक्ति पूर्वक कि, बाइबिल के शब्दों में, दाहिने हाथ का दिया, बायां हाथ नहीं जानता था| किसी को दौड़ना न पड़ता | घर बैठे नियत दिन सहायता पहुँच जाती | निर्भीक वह ऐसे थे कि कभी किसी से नहीं चपे| बड़े से बड़े की किसी कि बात पर उनकी सहमति न होती तो दृढ़तापूर्वक व्यक्त कर देते | एक बार विश्ववन्द्धबापू की किसी बात से असहमत होकर उनको लिख भेजा था-“बापू मैं आपके चरणों की पूजा कर सकता हूँ; मष्तिष्क की नहीं |” देश पर अपने को न्योछावर कर दिया था उन्होंने | यद्दपि स्वयंपक्के आर्य समांजी थे, फिर भी धार्मिक उदारता इतनी थी कि कुल-गत वल्लभ-संप्रदाय वालेठाकुर जी की सेवा पर पूरा खंर्च-बर्च करते रहे | किसी अन्य धर्म का भी कभी विरोध नहीं किया | आरम्भ में उनका संबंधक्रान्तिकारियों से था | इसी चक्कर में एक बार अमेरिका से लौटते हुये,सिंगापुर में गिरफ्तार कर लिये गये थे; गोली से उड़ा देने की नौबत आ गयी थी | किन्तु बाद में पक्के गाँधीवादी कांग्रेसी हो गये थे, सदा के लिए | फिर भी अन्य राजनीतिक दल वालों से उनका कोई असद्भाव न था | देश को स्वतंत्र देखने के लिए वह तड़पते रहे | अक्सर गुनगुनाया करते- मेरे दिल के फफोले फूँटेंगे कब? राजनीति के साथ-साथ हिन्दी पर भी उनका अगाध प्रेम था | उनके सारे काम काज हिन्दी में होते; लेखन शक्ति भी थी, उनमे | अंग्रेजी के लिए कहा करते- “जब तक यह गर्दनिया देकर निकाली न जाएगी, निकलेगी नहीं |” कविवर ‘अकबर” इलाहाबादी ने महामना जी की प्रशस्ति में एकशेर कहा है- “हजार शेख ने दाढ़ी बढाई सन की-सी | मगर वो बात कहाँ मालवी मदन की-सी ||” कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘सनकी’(झक्की) का भी वाचक है | निदेशक भारत कला भवन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अंग्रेजी हटाने के साथ-साथ अंग्रेजी कैलेण्डर के बहिष्कार के निमित्त उन्होंने विक्रम संवत् और मास (जो अंग्रेजी कैलेण्डर की भाँति नियमित है) का प्रचलन किया जो आज भी काशी विद्यापीठ,नागरी प्रचारिणी सभा, अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मलेन, “आज” और ज्ञान मंडल में चलता है | पुस्तक संग्रह का उन्हें बेहद शौक था I लाखों रूपये की एक-से-एक अलभ्य मुद्रित और हस्तलिखित ग्रन्थ उन्होंने एकत्र किए थे | महामना जी पर उनकी परम श्रद्धाथी,विद्यार्थी जीवन से ही | बी० ए० कीपढाई के लिए वह इलाहाबाद चले गये थे| वहीं उनके संपर्क में आए | जिस प्रकार महामना जी के पुत्र उनको “बाबू” कहते उसी प्रकार भाई शिवप्रसाद भी | केवल जबानी नहीं; उन्हें वस्तुतः पिता मानते | महामना जी के एक गुण की वह बहुत बड़ाई किया करते | कहते कि आगे बढ़ना तो सब नेता जानते हैं, किन्तु कहाँ पीछे हटना चाहिए, जो युद्ध का यह एक आवश्यक अंग है | यह मात्र महामना जी जानते हैं| जब विश्वविद्यालय के लिए कलकत्ता में चन्दा आरम्भ हुआ तो उनकी वहाँ वाली गद्दी (जिसके सबसे बड़े भागीदार वही थे) ने एक लाख का चन्दा देकर धन-संग्रह के अभियान का श्री गणेश किया | यही नहीं चन्दा उगाहने के दौरान वह महामना जी के संग रहे | कुछ लोग इस बात की शिकायत किया करते कि ऐसे कुलीन होकर भी वह कुलियों की तरह जमीन पर टाट, कबंलबिछाकर सोते हैं | परन्तु रईसीका अहंकार उनमें छू तक नहीं गया था | हाँ,अतर और स्वादु भोजन का शौक उन्हें अवश्य था | स्वयं उत्कृष्ट पाककर्त्ता भी थे | वे विशुद्ध खादी धारी थे और स्वयं कातते भी महीन से महीन | उनको क्रोध बहुत कम आता, किन्तु जब आता तो शिव से रूद्र हो जाते | मजा यह था कि जिस पर क्रोध करते,उस पर न उतारते | उतारते अपनी चीजों पर | प्रलयंकर ताण्डव करते हुए, उनको तोड़-ताड़ फाड़-फ़ूड,फेंक-फांक प्रकृतिस्थ होकर, वहीं के वहींभोलानाथ हो जाते |

मैं धन्य होकर लौटा : एक संस्मरण पंडित मौलीचन्द्र शर्मा पूज्य मालवीय जी और पूज्य पिता जी दीनदयाल शर्मा का आपसी सम्बन्थ बहुत घनिष्ठ था। दोनोएक दूसरे की भाई कहा करते थे। मालवीय जी कुछ मास बड़े थे, अत: पिता जी उन्हें ज्येष्ठभ्राता करके ही मानते रहे। इस घनिष्ठता का मुझे बडा लाभ मिला। मालवीय जी के बहुतनिकट रहते और उनके जीवन तथाप्रवचनों और दैनिक वार्तालापों को देखने सुनने और उनसेसीखने के अनगिनत अवसर मिले। अब सोचता हूँ तो अनुभव होता है कि उन सम्पर्कों सेजो कुछ पाया है, वह अमूल्य है और उस देन के लिये आज मेरा मस्तक उस पुण्यश्लोकमहात्मा के प्रति एक पितृत्व के नाते ही नहीं, एक गुरु के नाते भी आभार से झुक जाता है।वे अवसर धन्य थे। अनेक सुभाषित श्रीमद्भागवत तथा अन्य पुराणों के उनके मुँह से समय-समय पर नि:सृत होते रहते थे। उनका संग्रह यदि किया गया होता तो वह आज एक राष्ट्रीय निधि होती, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं। उन सम्बन्ध की अनेकों स्मृतियाँ स्मृति-पटल पर अंकित हैं, उनमें से एक यहॉ देता हूँ- मैं अठारहवें वर्ष में था। पिता जी द्वारा स्थापित दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में पढ़ता था;बहीं बोर्डिग में रहता था। उन दिनों कॉलेज कश्मीरी द्वार के भीतर उस विशाल भवन में थाजो गदर से पहले सरधना वाले नवाब का महल था । उसी के साथ लगी हुई रायबहादुर सुल्तानसिंह की कोठी थी। प्राय: वहीँ महामना मालवीय जी आकर ठहरा करते थे। जाडों के दिनथे, बाबू (हम उन्हें इसी अभिधा से पुकारते थे) वहाँ आये हुए थे । प्रात: आठ बजे के लगभगजल्दी समझ कर मैं उनके पास आया। बाहर के कमरे में 'लीडर' के सम्पादक श्री सीं0 वाई०चिन्तामणि बैठे हुए मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। एक दो और भी थे जिन्हें मैं पहचानतानही था। इतने में मालवीय जीं का निजी सेवक बाहर आया। उससे पता चला कि वे पूजा मेंहैं। मुझे जानता ही था। मैने कहा और उसने मालवीय जी को अन्दर जाकर समाचार दियातो उन्होंने मुझे बुला लिया। मुझे बडा आनन्द हुआ कि इतने बड़े-बडे आदमियों को बिठायेरखकर उन्होंने मुझें भीतर बुला लिया। अन्दर गया तो देखा कि वे आसन पर जमे श्वेत लोई ओढे पूजा कर रहे हैं। सामनेचौकी पर श्रीमद्भागवत खुली हुई थी, पाठ चल रहा था। यह उनका नित्य नियम था। मैनेउनके चरण छुए बिना ही दूर से झुककर प्रणाम किया, इसलिये कि मैं बिना स्नान किये गयाथा। पूजा मे बैठे हुए उनका स्पर्श कैसे कर सकता था? अस्तु, मैं बैठ गया। एक क्षण बाद उन्होंने पुस्तक से आँखे उठाकर चश्मा चढाये हुए मेरो ओर देखा । एकक्षण देखते रहे और कछ खिन्न से होकर पूछा, "शुन्य मस्तक क्यो हो" मैं कुछ घबरा गया परन्तु अपने बचाव के लिये कहा कि "अभी स्नान संध्या जो नहीं किया है।" वे अधिक खिन्नहोकर परन्तु बडे स्नेह से बोले, "अच्छा तो अभी तक स्नान संध्या भी नही किया है! औरतुम ब्राह्मण के बालक हो और ब्राह्मणा भी श्रोत्रिय वंशावतंस व्याख्यानवाचस्पति पंडितदीनदयालु शर्मा के पुत्र ।" जैसे घडो पानी पड़ गया,मुझे कही छिपने को जगह होती तो छिपजाता |जी चाहता था कि मुँह तो छिपा ही लूँ पर क्या करत्ता? मुँह से कुछ भी कहना सम्भवन हुआ। नीचे मुँह किये, दुबका-सा बैठा रहा। कुछ क्षण मेरी इस आत्मग्लानि वे देखते रहे।मेरे लिये वे क्षण युग के समान बीते होंगे। फिर अकस्मात् बडे कोमल और मृदुभाव से वेबोले, "बेटा, देखता हूँ तुम्हें अपनी भूल का अनुभव और उस पर मन में पक्षात्ताप हो रहाहै। पक्षात्ताप ही प्रायश्चित है, यदि उसके साथ फिर वैसी भूल न करने का संकल्प भी हो।इससे मन पवित्र हो ज़।ता है।" मुझे सहारा मिला। बोला, "मै भी यही सोच रहा हूँ। वे फिर बोले, "तुम्हें लाज आ रही है, मैं प्रसन्न हूँ। अब ऊपर देखो।" मैने वैसा हीकिया। उन्होंने पूछा कि मेरे पास वाल्मीकि रामायणा है कि नहीं?मेरे पास नहीं थी । तब उन्होंनेनौकर को बुलाकर मुझे एक पुस्तक मँगाकर दी, जिसका नाम था "सनातनधर्म-संग्रह |" इसमेंवेदों, पुराणों, रामायण, महाभारत्त तथा स्मृतियों आदि से अनेक सुन्दर उध्दरण संगृहीत थे।उनमें एक सन्दर्भ वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड का था। उसमें वर्णन था कि श्रीराम जबऋषि वशिष्ठ के आश्रम में विद्याध्ययन के लिये गये तो वहाँ उनकी दिनचर्या क्या थी। उन्होंनेवह स्थल निकाल कर खुली पोथी मुझे दी और कहा,इसे पढो । मैने उसका पाठ उन्हें सुनाकरकिया। दिन रात के चौबीसों घण्टों की चर्या उसमें विस्तार से दी थी। मालवीय जी ने पूछा,इतना संस्कृत तो तुम समझते होगे।" मैंने 'हॉ' कहा तो वे प्रसन्न हुए और बोले, "वचनदो कि एक मास तक नित्यप्रात: इसका पाठ संध्या के साथ किया करोगे ।" मैने सम्मति प्रकटकी तो बोले, "ऐसे नहीं, आओ मेरे चरण-स्पर्श करके कहो।" मैं गद्गद हो गया। उन्होंनेसिर पर हाथ धर कर आशीर्वाद दिया तो ऐसा लगा मानो अपना ब्राह्मणत्व उन्होंने मुझे वरदानमें दिया हो। मैं धन्य होकर लौटा। उस दिन से एक मास नही, प्राय: छ: मास तक वह पाठ नित्य होता रहा-ब्राह्म मुहूर्तसंध्या के बाद| पौष माघ में भी तारों की छाँव में मै खुले में स्नान कर संध्या के लिये बैठजाता। नित्य अपने जीवन कौ उसमें वर्णित चर्या से मिलाता। नित्य अपनी कमियां सामने आतीं,ग्लानि होतो, उन्हें त्याग पूरी ब्रह्मचर्य की चर्या निर्वाह करने की प्रेरणा होती। धीरे-धीरे बढिया नये बने कोट-पतलून, टाई-कालर उतर गये । खादी की धोती और कुर्तेने उनका स्थान ले लिया। फिर प्राय: एक वर्ष मैं ब्रह्मचारी के समान नंगे पॉव, नंगे सिर, बिनाजूती के और बिना छतरी लिए केवल धोती कुर्ते में ही कॉलेज में तथा घर-बाजार में जातारहा। कुछ दिन साथी और प्रोफेसर सभी हँसे, परन्तु पीछे सभी आदर करने लगे। आज याद करता हूँ तो लगता है कि उस दिन यदि मालवीय जी का वह उपदेश औरआशीष न मिला होता तो जीवन को शायद वह दिशा, संयम की वह दीक्षा और अपनीपरम्पराओ में वह निष्ठा न मिलती जो इस जीवन की सबसे बडी कमाई है।

पुण्यश्लोक महामना मालवीय जी जिनकी अब कान कहानी सुन्यौ करौ | आचार्य सीताराम चतुर्वेदी मुझे निरन्तर २४ वर्षो तक महामना मालवीय जी का सात्रिध्य तथा उनकी निःसीम कृपा प्राप्त करते रहने का सौभाग्य मिला है | यधपि मुझे महात्मा गाँधी के साबरमती आश्रम और कविवर रविंद्रनाथ ठाकुर के शान्तिनिकेतन में रहने का भी मधुर सुयोग प्राप्त हुआ किन्तु महामना मालवीय जी के अत्यंत निष्कपट, निष्कलूष और अछिद्र औदार्पूर्ण जीवन से मैं सबसे अधिक प्रभावित हुआ और क्यों ? सन १९३५ में जब मैं महामना मालवीय जी का जीवन चरित्र लिख रहा था, उन दिनों सौभाग्य से मालवीय जी महाराज के अनुज श्री श्यामसुंदर जी और उन कि बड़ी बहन यशोदा देवी जीवित थी जिससे मालवीय जी के बालजीवन और तरूणजीवन कि बहुत सी घटनाये ज्ञात हो पाई | बहुत सी घटनाये स्वंय मालवीय जी ने बताई, बहुत सी उनके मित्रो ने बताई, और बहुतो का मैं स्वंय साक्षी रहा | इनमे से कुछ घटनाये ऐसी भी थी जिन्हें महामना मालवीय जी ने छापने कि अनुमति नहीं दी थी | उनमे से एक –दो घटनाये अब प्रकट कर देने में कोई दोष नहीं है | एक लाख गायत्री मंत्र का जाप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सारे भारत में आन्दोलन व्याप्त हो गया था, किन्तु मालवीय जी का संस्कार तो यह था कि दैवी सहायता के बिना यह संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने त्रिवेणी तट पर बड़े हनुमान जी के मंदिर में एक लाख गायत्री मन्त्र का पुरस्चरण किया | जब उनके पिता जी ने कहा कि वकालत के साथ हिन्दू विश्वविद्यालय का काम नहीं चल सकता तो उन्होंने तत्काल अपनी चमकती वकालत को लात मार दी. विश्वविद्यालय के लिए सबसे पहला ५१ रूपये का दान उनके पिताजी ने ही दिया. नगवा कि भूमि में जब आर्ट्स कॉलेज का भवन बना तो उनके सभा भवन कि छत में बड़ा विशाल सरस्वती जी का रंगीन चित्र बनवाया गया. चित्र बन जाने पर मूर्ति के अंग—प्रत्यंग बहुत बड़े होने के कारण बड़े अभद्र लगने लगे. यह देख कर यह चित्र मिटवा दिया गया. जिनके बनवाने में लगभग ६० हजार रूपये लगे थे. उन दिनों हिन्दू विश्वविद्यालय समिति कि अध्यक्ष डॉक्टर एनी बेसेंट थी. काशी के ही एक विशिस्ट नागरिक ने इस बात पर मालवीय जी पर अविश्वाश प्रस्ताव उपस्थित कर दिया. प्रस्ताव किये जाते ही डॉक्टर एनी बेसेंट ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में कहा – भारत के जिस सपूत ने विश्वविद्यालय के लिए एक करोड़ ३२ लाख रूपये एकत्र किये है और जिसकी निष्ठा तथा जिसके प्रयास पर हमें गर्व होना चाहिए उस पर हम अविश्वास का प्रस्ताव लावे इससे बड़ी कृतघ्नता और क्या हो सकती है. अतः मैं अविश्वास प्रस्ताव कि अनुज्ञा न देते हुए विश्वास का प्रस्ताव प्रस्तुत करती हूँ. और वह विश्वास का प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ. छात्रों को हर संभव सहायता जिन दिनों पंडित लज्जाशंकर झा जी कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ट्रेनिंग कॉलेज के प्राचार्य थे उन दिनों वे प्रथम और द्वितीय श्रेणी के छात्रो को ही भर्ती करते थे. संयोग से श्री जुगल किशोर बिडला ने एक तृतीय श्रेणी के स्नातक को मनोनीत कर भेजा. झा जी ने उसे भर्ती नहीं किया इसपर मालवीय जी ने उनसे कहा कि जब हम तृतीय श्रेणी में किसी छात्र को उत्रिण घोषित करते है तब हम उन्हें भर्ती होने से कैसे वंचित कर सकते है? और कभी कभी प्रथम श्रेणी के अपेक्षा तृतीय श्रेणी वाले स्नातक अच्छे अध्यापक सिद्ध होते है. वह छात्र भर्ती कर लिया गया. मुरादाबाद का एक संपन्न घराने का छात्र घर से प्राप्त धन का दुरूपयोग करता रहा | उसने कभी शुल्क नहीं दिया |जब परीक्षा में सम्मिलित होने से उसे रोक दिया गया तब वह मालवीय जी कि चरण में पहुंचा कि मै दीन हूँ शुल्क नहीं दे सकता |उस छात्र को भली भांति जानने वाला एक अध्यापक ने मालवीय जी महाराज से कहा कि यह छात्र निर्धन नहीं है |इस पर मालवीय जी ने कहा –यह निर्धन भले ही न हो किन्तु शुल्क नहीं दे सकता |इसके माता –पिता ने हमारे विस्वास पर इसे यहाँ भेजा |हमारा धर्म था कि हम इसकी गतिविधि पर प्रारंभ से ध्यान देते और शुल्क देने कि प्रेरणा करते; किन्तु हमने यह नहीं किया | नैतिक दृष्टि से अब हम इसे परीक्षा के वंचित नहीं कर सकते ,हम इसके पिता को कौन सा मुह दिखायेंगे |मालवीय जी ने उसे शुल्क- मुफ्त करके उसे परीक्षा में बैठने की आज्ञा दे दी| ऐसे एक दो नहीं ,असंख्य उदाहरण विधमान है | सम्बन्धी की नियुक्ति पाप मालवीय जी महाराज ने अपने जीवन काल में अपने किसी सम्बन्धी को हिन्दू विश्वविद्याल य में कोई नौकरी नहीं दी | एक बार पंडित रमाकांत जी के एक अत्यंत सुयोग्य सम्बन्धी का चयन विश्वविद्याल के एक सम्मानित पद पर हो गया |उस समय सर राधा कृष्णन कुल पति थे |मालवीय जी ने तत्काल पत्र लिख कर उस नियुक्ति का विरोध किया कि मेरे सम्बन्धी कि नियुक्ति नहीं हो सकती |सर राधा कृष्णन ने आकर पूछा कि क्या आपका सम्बन्धी होना पाप है ?इस पर बड़ी दृढ़ता से मालवीय जी ने कहा –हाँ ,हिन्दू विश्वविद्याल में नौकरी ढूढने के लिए मेरा सम्बन्धी होना अवश्य पाप है |आज जिस युग में लोग अपनी स्थापित की हुई संस्थाओ में केवल अपने संबंधियों को ही कि ताक में रहते है ,वे क्या मालवीय जी से कोई शिक्षा नहीं ले सकते ? महामना मालवीय जी से बहुत लोगो ने कहा कि आप प्रयाग के होकर काशी में क्यों विश्वविद्याल स्थापित करना चाहते है इस पर उन्हों ने स्पष्ट उत्तर दिया था कि काशी विधा का केंद्र है ,वही विश्वविद्याल स्थापित होना चाहिए | आज कल सभाओ में अतिथियों को जो मालाये पहने जाती है उन्हें वे तत्काल उतारकर रख देते है |मालवीय जी इसे बहुत बुरा समझते थे |एक बार उज्जैन कि एक सभा में मेरे इस व्यहवार पर उन्होंने मुझे समझाया था कि पहनाई हुई माला उतारकर रखने से माला पहनने वाले का और माला का ,दोनों का अपमान होता है उन्हों ने इस प्रसंग में प्रयाग के उर्दू कवि बिस्मिल के के गुरु नूह नारवी का एक शेर सुनाया – हारो में गुथे ,जकडे भी गए ,गुलशन भी छूटा सीना भी छिदा पहुंचे मगर उसकी गर्दन तक, यह खुश –इख्लाकी फूलो की अदभुत धैर्य - सहनशीलता मालवीय जी महाराज का धैर्ये अदभुत था |उनकी कोई कितनी भी समय क्यों न नष्ट करे, वे किसी को ना नहीं करते थे |गाँधी जी का अभ्यास था कि वे जिनको जितना समय देते थे, उससे अधिक यदि कोई बैठा रहा जाता तो वे स्वंग अपने मुह पर कपडा दाल कर बैठ जाते थे झक मारकर आगंतुक को चला जाना पड़ता | पर मालवीय जी को अत्यंत धर्यपूर्वक, स्थिर होकर वक्ता को बोलते रहने देते थे, न टोकते थे,न जाने को कहते थे|एक बार इटावे के एक सज्जन मालवीय जी के पास एक सोरठे कि मिमासा करने आ पहुंचे – संकर चाप जहाज, सागर रघुवर बाहुबल बूढ़े सकल समाज, चढ़े जो प्रथमहि मोहबस मालवीय जी महाराज ने उन्हें भलीभांति समझा भी दिया भीर भी वे दिन में साढ़े तीन बजे तक और रात में आठ बजे से लेकर ढेड बजे तक तर्क देते रहे | मालवीय जी का धर्य तो वंचित नहीं हुआ, पर मेरा धर्य विचलित हो गया | मैं उस सज्जन को किसी प्रकार फुसलाकर बाहर ले आया और उन्हें बड़े आड़े हाथ लिया कि इस वृदावास्था में आप उन्हें यह कष्ट दे रहे है इतना समझा देने पर भी समझ नहीं रहे थे | यह कह कर मैंने उन्हें गाड़ी में बिठा कर स्टेशन पहुंचा दिया और इटावे का टिकट लेकर उन्हें सवेरे कि गाड़ी में चढ़ा दिया |वे भुनभुनाये भी बहुत और उन्होंने एक बड़ी लम्बी चिट्ठी मालवीय जी को लिखी कि आपके लम्बे से काले गण ने मेरा बड़ा अपमान किया, आदि. मालवीय जी ने मुझसे कहा की उनके साथ ऐसा वयवहार नहीं करना चाहिए था, उन्हें क्षमा–पत्र लिखो | उन्होंने स्वंग बोल कर मुझसे तो छमा पत्र लिखवाया ही, साथ ही अपने ओर से भी एक क्षमा–पत्र लिख दिया | ऐसे महान उदार, दिव्य, महापुरुष थे महामना मालवीय जी महाराज| यह जानकार संतोष हुआ कि प्रज्ञा का विशेषांक निकल रहा है| मैं भी उसमे कुछ योग दे सका इसका मुझे गर्व भी है, संतोष भी|

कुलगुरू मालवीय जी:शैक्षणिक आदर्श डॉ० राजबली पाण्डेय महामना मालवीय जी आधुनिक भारत के निर्माताओं में प्रमुख थे किन्तु उनकी राष्ट्रीयता राजनीति तक सीमित नहीं थी | वे राष्ट्र और राज्य को जीवन के उच्चतम मूल्यों की प्राप्ति का माध्यम मानते थे और उनका यह भी विश्वास था कि उन मूल्यों की उपलब्धि के बिना राष्ट्र अथवा राज्य शीलवान् और स्थायी नहीं हो सकता |यह आस्था और विश्वास उनको भारतीय परम्परा से मिला था | अथर्ववेद के बारहवें मण्डल के पृथिवीसूक्त के निम्नलिखित मंत्र से वे अनुप्राणित थे- ““सत्यं” बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथिवी धारयन्ति”|” (भूमिसूक्त 1.1) अर्थात्, महान् सत्य, कठोर नैतिक आचरण, शुभ कार्य करने का दृढ़ संकल्प, तपस्या, वैदिक स्वाध्याय अथवा ब्रह्मज्ञान और सर्वलोकहित के लिये समर्पित जीवन पृथ्वी को धारण करते हैं | इन वेदविहित चिरन्तन साधनों के द्वारा ही वे राष्ट्र का कार्य करना चाहते थे | राजनीतिक कार्य उनके लिए व्यवसाय नहीं था | किसी भी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा पद, मान,प्रतिष्ठा आदि के लिये वे राजनीति का उपयोग नहीं करना चाहते थे | इसीलिये राजनीति उनके पूरे जीवन को आच्छादित नहीं कर सकती थी | राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण और मौलिक जीवन के क्षेत्रों में वे अपने समय और शक्ति का उपयोग करते थे | ज्यों ही उन्हें अनुभव हुआ कि राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थ और अहंकार का माध्यम बनने जा रही है त्योंही वे राजनीति से उदासीन और तटस्थ होते गये | उन्होंने अपने कार्य के मौलिक क्षेत्रों को पहले से सींचा था, जहाँ वे सुखपूर्वक अपने जीवन की साधना कर सकते थे | धर्म, समाज, संस्कृति और शिक्षा को वे जीवन का आधार मानते थे | वे समझते थे कि इनके उत्थान के बिना राष्ट्र का उत्थान असम्भव और अर्थहीन है | इन क्षेत्रों में उनकी अमूल्य देने हैं | किन्तु इन सभी में वे शिक्षा को अधिक मौलिक मानते थे | निम्नाकितपंक्तियों में उनकी शिक्षासम्बन्धी भावनाओं और विचारों का ही संक्षिप्त दिग्दर्शन किया गया है | आधुनिक भारत में शिक्षा का श्रीगणेश और प्रसार एक विशेष परिस्थिति में हुआ | इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन भारत में ज्ञान, विद्या, कला, शिक्षा आदि का पर्याप्त विकास हुआ था | भारत का यह सांस्कृतिक ॠक्थ बहुमुखी और समृद्ध हैं | इसके साथ गर्वपूर्वक अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में खड़ा हुआ जा सकता है | प्राचीन भारत में विद्या के माध्यम भी विशेष प्रकार के थे | गुरूकुल, आश्रम, मठ, मन्दिर और शालाएँ संस्थात्मक माध्यम थे | चरक, परिव्राजक, व्यास, कथा-वाचक आदि जंगम माध्यम थे| · प्राध्यापक, कशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं प्राच्यविद्| भारत के ऊपर इस्लाम के आक्रमण के पूर्व तक ये माध्यम न्यूनाधिक मात्रा में अपने कार्य करते रहे | इस्लामी आक्रमण से भारतीय विद्या और कला को बड़ा आघात पहुँचा | उनका अपना विकास रुक गया | विध्वंस के बाद जितना उनका अंश बच रहा, केवल उनके संरक्षण का ही प्रयत्न होता रहा | मुगल साम्राज्य के ह्लासोन्मुख होने पर भारत के कुछ भागों में पुनरूत्थान कीप्रवृत्तियाँ दिखायी पड़ीं | परन्तु इसके पहले कि भारतीय जीवन स्वतंत्र होता, भारत के ऊपर योरोपीय आक्रमण प्रारम्भ हो गये और उन्नीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में प्रायः सम्पूर्ण भारत पर अंग्रेजी सत्ता स्थापित हो गयी | अंग्रेज भारत के राजनीतिक विजय से ही संतुष्ट नहीं थे | व्यापार और आर्थिक लोभ तो उनको यहाँ खींच ही लाया था | उनके शस्त्र के साथ उनका शासन स्थापित हुआ | शासन के साथ उनकी भाषा, धर्म, संस्कृति, आचार-विचार, वेश भूषा, खान-पान और सम्पूर्ण जीवन-पद्धति आयी | अंग्रेजों में राजनीतिक अभिमान के साथ उनमें सांस्कृतिक अभिमान भी था | भारत के ऊपर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिये सांस्कृतिक विजय भी आवश्यक थी | किसी जाति अथवा राष्ट्र को पूर्णतः पराजित करने के लिये उसके व्यक्तित्व और वैशिष्टय नष्ट करना सबसे सफल माध्यम होता है | इतिहास में विजेता जातियों ने प्रायः इसी नीति का प्रयोग किया है | अंग्रेजों ने भी भारत में इसी नीति का प्रयोग प्रारम्भ किया | इसी नीति के कार्यान्वन का सफल साधन शिक्षा थी | भारत में शिक्षा के सम्बन्ध में अंग्रेजों की तात्कालिक और प्रथम आवश्यकता प्रशासकीय और दूसरी तथा स्थायीसांस्कृतिक थी | आधुनिक इतिहास में अंग्रेजी सत्ता का प्रसार एक चमत्कार है | इस चमत्कार की कला अंग्रेजों ने विकसित की थी | एक मुट्ठी भर अंग्रेज विशाल भारतीय साम्राज्य पर स्वतः शासन कर नहीं सकते थे | इस काम में उनको भारतीयों की सहायता की आवश्यकता थी | भारतीय विजय के समय में उनको सेना का अनुभव था | उन्होंने भारतीय सिपाहियों के द्वारा भारत की विजय की थी | अब वे भारतीय कर्मचारियों के द्वारा भारत का शासन चलाना चाहते थे | उन्होंने देखा था कि विदेशी आक्रमणों से दमित होने के कारण जातीय स्वाभिमान और चेतना लुप्त होने से इस देश में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है जो अपनी जीविका और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये अपने को बेचने के लिये तैयार रहते हैं | ऐसे व्यक्तियों का अंग्रेजी शासन के लिये उपयोग करना चाहते थे | ऐसे व्यक्ति तभी पूरे उपयोगी हो सकते थे जब वे अपनी जातीय परम्परा और संस्कृति से पूर्णतः विच्छिन्न और नयीशासन व्यवस्था में निहित स्वार्थवाले हों | शिक्षा-क्रम और जीवन-पद्धति बदलने से ही ऐसा होना सम्भव था | लार्ड विलियम बेण्टिक के शासनकाल में भारत में शिक्षाप्रसार के सम्बन्ध में जो विचार हुए हैं उनमे कहा गया कि इस शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना था जो रूप-रंग में तो भारतीय हों,किन्तु आचार-विचार, वेश-भूषा, आस्था-विश्वास में अंग्रेज हों, इस शिक्षा की विशेषतायें थीं| इसका माध्यम-भाषा और पाठ्य-क्रम था | इंग्लैण्ड के शिक्षा-शास्त्रियों में माध्यम को लेकर कुछ मतभेद था | परन्तु लार्ड मैकाले ने यह तर्क देकर सबको शान्त कर दिया—‘अंग्रेजी माध्यम वह शस्त्र है जो अंग्रेजों के राजनीतिक साम्राज्य ने नष्ट हो जाने पर भी भारत के ऊपर उनके बौद्धिक और सांस्कृतिक साम्राज्य की रक्षा करता रहेगा’| लार्ड मैकाले की यह भविष्यवाणी कितनी सत्य थी इसके लिये प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं | रोमन साम्राज्य का उदाहरण अंग्रेजों के सामने था | रोमन साम्राज्य नष्ट होने पर भी रोमन लिपि, लातिनी और यूनानी से प्रभावित भाषा, ईसाई धर्म, रोमन चर्च, रोम-यूनान से प्रभावित संस्कृति का साम्राज्य आज भी बना हुआ है | जब रोमन लार्ड इंगलैंड छोड़कर भाग रहे थे तो स्वयं इंग्लैण्ड-निवासियों ने उनसे प्रार्थना की थी कि वे उनको अनाथ छोड़कर वापस न जायँ | भारत की यह विशेषता रही है कि उसने कभी विदेशी आक्रमण और प्रभाव के सामने पूर्णतः आत्म-समर्पण नहीं किया | भारत में अंग्रेजी सत्ता के फ़ैलने के साथ ही उसके विरूद्ध प्रति-क्रिया प्रारम्भ हो गयी | उन्नीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में जो सुधारवादी आन्दोलन चले उसमेंराष्ट्रीय चेतना और पुनरुत्थान की भावना थी | 1857 में तो सशस्त्र विद्रोह हुआ | विद्रोह-दमन के पश्चात् भी राष्ट्रवादी आन्दोलन जारी रहे | इन राष्ट्रवादी आन्दोलनों की एक विशेषता थी | ये भारत को केवल राजनीतिक दासता से ही मुक्त नहीं करना चाहते थे, वे भारत को बौद्धिक और सांस्कृतिक गुलामी से भी मुक्त देखना चाहते थे | राष्ट्रीय महासभा (काँग्रेस) में भाग लेने वालों में ऐसे लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या थी| महामना मालवीय जी उनमें अग्रणी थे | व्रह्म-समाज, आर्य-समाज,देवसमाज,रामकृष्ण–विवेकानन्द मिशन सभी इसी दिशा में प्रयत्न कररहे थे | काँग्रेस के अधिवेशनों के साथ अन्य भी राष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थाओं के अधिवेशन होते थे|राष्ट्रीय दृष्टि से जो जाग्रत थे वे अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी शिक्षा के कुप्रभाव को स्पष्ट देख रहे थे; जो उनसे अभिभूत थे उनका तो मार्ग ही भिन्न था | भारत की कई प्रबुद्ध आत्माओं ने भारतीय जीवन-दर्शन का प्रचार सा आरम्भ किया | विवेकानन्द, रविन्द्र, अरविन्द, तिलक आदि ने भारतीयआत्मा के जागरण में महत्वपूर्ण भाग लिया | तिलक ने तो लोक-संग्रह का जीवन दर्शन ही गीता–रहस्य के रूप में प्रस्तुत किया | थियौसौफीयद्दपि विश्व –कल्याण चेतना से प्रेरित थी, परन्तु भारत में राष्ट्रीय चेतना और आत्म –सम्मान जाग्रत करने में इसका कम हाथ नहीं था| इसके द्वारा संचालित भारतीय ब्रह्मविद्या, तत्व –सभा, काशी में सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज आदि भारतीय राष्ट्रीयता के ही उन्नायक थे | गुरूकुल, ऋषिकुल, विद्यापीठ आदि इसी दिशा में प्रयोग और प्रयत्न थे| अंग्रेजों ने यद्दपि प्रशासकीय आवश्यकता और साम्राज्यवादी विजयिनी प्रवृतियों से प्रभावित होकर भारत में शिक्षा का संगठन किया था, कुछ उच्च शक्तियाँ सारे मानव इतिहास को प्रभावित कर रही थीं | व्यक्ति –स्वातंत्र्य, विचार –स्वातंत्र्य,मानववाद,उदारतावाद आदि के आंदोलन जातीय स्वार्थों और दुराग्रहों को शिथिल करने लग गए थे | विलियंम बेण्टिक के समय में तो छोटे–छोटे स्कूलों और कॉलेजों कीस्थापना हुई | 1858 में ब्रिटिश साम्राज्य की उद्घोषणा के पश्चात् भारत में तीन प्रेसीड़ेंसी विश्वविद्यालयों कलकत्ता, मद्रास और बम्बई की स्थापना हुई | इनके ऊपर इंग्लैण्ड के शिक्षासम्बन्धी आदर्शों का प्रभाव पड़ने लगा | परन्तु भारत मेंइंग्लैण्ड के उदारतावादी शैक्षणिक आदर्शों और साम्राज्यवादी स्वार्थों में काफी संघर्ष चलता रहा | भारत में अंग्रेज शिक्षाशास्त्री और कर्मचारी बराबर इस बात का प्रत्यन करते रहे कि शिक्षा द्वारा यहाँ राष्ट्रीय जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान न हो | वे तो फ्रान्स की राजनीतिक क्रान्ति, लोकतांत्रिक सुधार और ओद्योगिकक्रान्ति के प्रभाव को भी शिक्षा – नियन्त्रण के माध्यम से रोकते रहे | जब कि संसार के अन्य देश इन प्रभावों को स्वतन्त्र रूप से अपनी भाषा के माध्यम से ग्रहण कर रहे थे, भारत को नियंत्रण द्वारा इनसे वंचित रखा जा रहा था | 1861 और 1905 के बीच भारत में शिक्षा–सम्बन्धी कई अधिनियम बने, किन्तु इनका उद्देश्य शिक्षा और ज्ञान का प्रसार नहीं, किन्तु इनका स्वतंत्र प्रभावों के विरूद्ध, संकोचन और नियंत्रण था | लार्ड कर्जन के समय में जो “यूनिवर्सिटीज एक्ट” बना उसके स्वरुप, उद्देश्य और उसके विरूद्ध प्रतिक्रिया से सभी प्रबुद्ध लोग परिचित हैं | अंग्रेजों द्वारा प्रचलित किन्तु नियंत्रित शिक्षण–पद्धति के उद्देश्यों और प्रभावों को देखते हुए जो लोग राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से जागरूक थे वे राजनीतिक दासता के साथ बौद्धिक और सांस्कृतिक दासता से भी देश को मुक्त करना चाहते थे | इसलिये अंग्रेजों के प्रशासकीय नियंत्रण से पृथक् और स्वतंत्र होकर शिक्षा के क्षेत्र में नये प्रयोग प्रारम्भ किये गये | जैसा कि ऊपर लिखा गया है, गुरूकुल, ऋषिकुल, शान्ति-निकेतन आदि इसी दिशा में प्रयत्न थे | महामना मालवीय जी भी पाश्चात्य जीवन –पद्धति पर आधारित और सरकार द्वारा नियंत्रित शिक्षण–पद्धति के दोषों से पूर्णतः परिचित थे, उसके कुप्रभावों को तीव्रता से अनुभव करते थे | वे समझते थे कि भारतीय नवयुकों को केवल जीविका के लोभ और राष्ट्रीय दृष्टि से नैतिक पतन से बचाने के लिये स्वतंत्र रूप से संचालित राष्ट्रीय शिक्षा की आवश्यकता है | वे गुरूकुलों, ऋषि-कुलों, शान्ति-निकेतन आदि का आदर करते थे | परन्तु वे यह भी समझते थे कि इनसे देश की वर्तमान समस्या का समाधान नहीं हो सकता | इतिहास चक्र को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता | अतीत के जीवन्त-मूल्यों और जीवन–पद्धति के मौलिक सिद्धान्तों का वर्तमान में परिवहन और आत्मसात् होना संभव हो सकता है किन्तु वर्तमान को उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ से हटाकर अतीत के स्थानान्तरण नहीं किया जा सकता | जीवन्त अतीत और स्वस्थ वर्तमान, प्राच्य और पाश्चात्य, आध्यात्म तथा उसके अविरूद्ध भौतिक तत्वों का समन्वय सम्भव और वांछनीय है | इस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन के सन्दर्भ में महामना की कल्पना में एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय कीउद्भावना हुई | यही राष्ट्रीयविश्वविद्यालय बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (काशी विश्वविद्यालय) के रूप में स्थापित हुआ| हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना केवल नई विद्या –संस्था की स्थापना मात्र नहीं थी | यह बौद्धिक और सांस्कृतिक मुक्ति का राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था | हिन्दू विश्वविद्यालय की भावना और योजना का प्रचार काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और सौराष्ट्र से लेकर आसाम तक हुआ | इसके द्वारा देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय भावना एक बार पुनः जाग्रत हो उठी | देश के सभी वर्गों – किसान, वणिक्,सामान्य प्रजा, श्रीमन्त तथा राजा-महाराजा ने उन्मुक्त कण्ठ और उन्मुक्त हस्त से इस योजना का स्वागत किया | यद्दपि भारत की नौकर-शाही प्रारम्भ से ही इस योजना को शंका और द्वेष की दृष्टि से देखती रही, इंग्लैण्ड के उदारदल ने और उस समय के वाइसराय स्वयंलार्ड हार्डिज ने इसका स्वागत किया | जब 1916 में हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो इसका अखिल भारतीय और सर्वदलीय स्वरुप स्पष्ट दिखायी पड़ा | स्थापना-समारोह में देश के प्रसिद्ध नेता, शिक्षा-शास्त्री, राजा-महाराजा, श्रीमन्त और सभी वर्गों की अपार जनता उपस्थित थी | इसमें लार्ड हार्डिज और महात्मा गाँधी (तब केवल श्री गाँधी) दोनों वर्तमान थे | यह स्वतन्त्र राष्ट्रीय शिक्षा का महान् पर्व था; ऐसा लगा कि एक बार पुनः काशी में देश की भारती जाग उठी| महामना मालवीय जी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति थे, यद्दपि वे प्रथम कुलपति नहीं थे | वे संविधान के अन्तर्गत स्वतः नियुक्त अंथवांकिसी सरकारी पदाधिकारी द्वारा मनोनीत नहीं थे | वे विश्वविद्यालय की भावना और योजना के प्रवर्तक थे | अतः सबके आदर और श्रद्धा से कुलपति पद पर प्रतिष्ठित हुए | विश्वविद्यालय की उनकी एक कल्पना थी | उसको वे साकार देखना चाहते थे | विश्वविद्यालय के सभी अंगों के निर्माण और व्यवस्था में उनका एक आदर्श और उद्देश्य था | मालवीय जी महामना होने के कारण छोटे पैमाने पर कोई चीज सोचते ही नहीं थे | विश्वविद्यालय की उनकी विराट् कल्पना थी | वे चाहते थे कि विश्व में जितना भी ज्ञान संभव हो उसका अन्वेषण,सृजन,परिवर्धन और वितरण विश्वविद्यालय में हो और इस ज्ञान के द्वारा भारतीय चरित्र और बुद्धि का विकास हो | किन्तु सबसे पहले उनके सामने एक मौलिक प्रश्न था | विद्या अथवा शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिये ? यहाँ पर वे औपनिषदिक आदर्श से प्रेरित थे | उपनिषदों में विद्या उद्देश्य स्पष्ट लिखा हुआ है –‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विद्या वह है जो मुक्ति के लिये हो) और मुक्ति वह है जो मानव को सभी प्रकार के बन्धनों –आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक से छुटकारा दिलाये | उनके विचार में विद्या मुक्ति अथवा स्वतंत्रता के लिये ही है | विद्या मुक्ति का माध्यम है | इस विद्या की पद्धति भी स्वतंत्र होनी चाहिये | और उसका अनुसरण होना चाहिये स्वतंत्र अध्यापकों और छात्रों द्वारा | जो स्वतः स्वतंत्र नहीं है वह दूसरों को मुक्ति का मार्ग नहीं बतला सकता मुक्त ही दूसरों को मुक्त कर सकता है ---मूक्तश्चान्यान् विमोचयेत् | इस आदर्श को ध्यान में रखकर महामना ने प्रारम्भ से ही मानव व्यक्तित्व और चरित्र के विकास के लिये स्वतंत्र वातावरण का निर्माण किया |विश्वविद्यालय के वातावरण में रहनेवालों के चेहरे पर उन्मुक्ता अंकित दिखायी पड़ती थी| जब जब देश की मुक्ति का आन्दोलन चला, विश्वविद्यालय के सभी द्वार उन्मुक्त हो जाते थे | विश्वविद्यालय के अध्यापकों और छात्रों ने राष्ट्रीय आन्दोलनों में बराबर भाग लिया | इसके लिये वे कभी दण्डित अथवा निष्कासित नहीं हुए | महामना प्रायः ऐसे अवसरों पर कहा करते थे कि विश्वविद्यालय और राष्ट्र का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है | देश और राष्ट्र की मुक्ति के लिये एक नहीं, अनेक विश्वविद्यालयों का बलिदान किया जा सकता है | अतः विश्वविद्यालय सर्वतोभावेन स्वतंत्रता के माध्यम से, स्वतंत्रता के लिये स्थापित था | दूसरा मौलिक प्रश्न महामना के सामने था विद्या के स्वरुप और विषय का | आजकल विद्या सामान्य रूप से सभी प्रकार के ज्ञान के लिए प्रयुक्त होती है | परन्तु भारतीय परम्परा में ज्ञान के दो प्रकार थे- विद्या और अविद्या | विद्या आध्यात्मिक ज्ञान को कहते थे और अविद्या भौतिक अथवा पार्थिव ज्ञान को | दोनों ही प्रकार के ज्ञान मानव जीवन की पूर्णता और मुक्ति के लिए आवश्यक थे | उपनिषदों में कहा गया है – विद्याच्च अविद्याञ्चयस्तद्वेदोभयं सह | अविद्या मृत्युं तीत्वांविद्ययाऽमृतश्नुते || (ईशावास्योपनिषद्) (जो विद्या और अविद्या के साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (भौतिक ज्ञान) के द्वारा मृत्युलोक (संसार) को पार कर विद्या (अध्यात्मिक ज्ञान) के द्वारा अमृतत्व को प्राप्त करता है)| यह भी कहा गया है कि जो केवल भौतिक ज्ञान का अर्जन और अध्यात्मिक ज्ञान का संचय करता है और भौतिक ज्ञान कि उपेक्षा करता है, वह उससे भी गहरे अधंकार में विलीन हो जाता है | आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान का परस्पर विरोध संसार के लिए घातक है, इस बात को महामना भली-भाँति अनुभव करते थे | मध्ययुगीन भारत स्वयं इसका उदहारण था | झूठी आध्यात्मिकता और जीवन के पार्थिव पक्ष की उपेक्षा से दरिद्र भ्रष्टाचारी जीवन का ही निर्माण हो सकता है | महामना त्याग की मूर्ति थे परन्तु देश की दरिद्रता को अभिशाप समझते थे | वे आध्यात्मिक ज्ञान के साथ आधुनिक विज्ञान की सहायता से देश को समृद्ध बनाना चाहते थे | इसलिए विश्वविद्यालय में पाठ्य–विषयों के सम्बन्ध में उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि जहाँ एक ओर धर्म, दर्शन तथा सामाजिक शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन हो, वहाँ दूसरी ओर वाणिज्य, शुद्ध विज्ञान, यंत्र–विज्ञान तथा औद्योगिक विज्ञान आदि पार्थिव और भौतिक शास्त्रों का भी उच्चतम ज्ञान प्राप्त हो | ज्ञान के इन दोनों पक्षों के समन्वय तथा संवर्धन के वे बहुत बड़े समर्थक थे | महामना के सामने तीसरा महत्वपूर्ण प्रश्न था विश्वविद्यालय के स्थान, स्वरुप और आवास का | विश्वविद्यालय का अखिल भारतीय होना उनके विचार में आवश्यक था | अंग्रेजी सरकार ने कोई अखिल भारतीय विश्वविद्यालय नहीं स्थापित किया था जो भारत का भावनात्मक एक्य स्थापित करता | अंग्रेजी साम्राज्य का एक्य सैन्यबल, दास्य और शासन यंत्र पर आधारित था | उसके सामने राष्ट्रीयता का कोई प्रश्न था भी नहीं | महामना राष्ट्रीय एकता के लिए एक सर्वदेशीय विश्वविद्यालय का महत्व समझते थे| अब प्रश्न यह था कि इस दृष्टि से भारत में कौन सा स्थान सर्वदेशीय होगा | इसका उत्तर था काशी, जो युग-युग से भारतीय ज्ञान और संस्कृति का केन्द्र थी | काशी पृथ्वी पर ‘प्रकाश’ अथवा ज्ञान का प्रतीक, अविमुक्त क्षेत्र और आनन्द कानन मानी जाती थी | जिसके बारे में भारतीय सन्तों ने कहा था: ‘जन्म मुक्ति महि जानि ज्ञान खानि अघ हानि कर| जहँ बस शम्भू भवानी सो काशी सेइस कस न |’ डॉ० एनी बेसेंट ने ‘सेन्ट्रल हिन्दू कालेज’ के लिए वाराणसी को चुना था | महामना को स्थान चुनने में कोई कठिनाई नहीं हुई | उनका जन्मस्थान तीर्थराज प्रयाग था, जिसका कि महत्त्व कोई कम नहीं था | परन्तू परम्परा से ‘सर्वविद्या की राजधानी’ काशी को उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए चुना | आज के युग में विश्वविद्यालय न तो पारिवारिक गुरूकुल का और न वन में स्थित आश्रम का रूप ग्रहण कर सकता है | उसका स्थान तो घर और वन के बीच कहीं भी हो सकता था | इसलिए महामना ने निश्चय किया कि काशी नगरी से अनतिदूर गंगा के किनारे, अर्द्ध एकांत किन्तु स्वच्छ वातावरण में विश्वविद्यालय की स्थापना की जाय | सेन्ट्रल हिन्दू कालेज विश्वविद्यालय को मिल चुका था, परन्तु वह नगर के कोलाहल में था | भगवान् विश्वनाथ की तरह काशीनरेश का वरद हस्त महामना को प्राप्त था | गंगा के किनारे काशी नरेश ने विश्वविद्यालय के लिए भूमि प्रदान की और 1916 में विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ | उसी वर्ष भीषण बाढ़ आ जाने के कारण विश्वविद्यालय को गंगा के किनारे से थोडा हटना पड़ा | परन्तु बहुत दूर नहीं | विश्वविद्यालय के भवनों के निर्माण में भी महामना की भारतीय आत्मा और ह्रदय की विशालता का परिचय मिलता है | भारतीय कला के लिए उनके मन में प्रगाढ प्रेम था | भवन उनके लिए केवल लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई का नाम नहीं था | वह एक भावना, शिक्षा और सौंदर्य का प्रतीक था| इसलिए भवन-निर्माण में आधुनिक सामग्रियों और तकनीक का उपयोग करते हुए भी भारतीय स्थापत्य के सिद्धान्तों, अलंकरणोंऔर प्रतीकों का प्रचुर उपयोग किया गया | महामना के समय में जितने महाविद्यालयों, छात्रावासों और अध्यापकों के आवास के लिए भवन बने उनमें भारतीय स्थापत्य के कला तथ्य, भावना-पक्ष का ध्यान रखा गया | यदि हिन्दू विश्वविद्यालय के भावनात्मक ह्रास का मूर्त इतिहास कोई देखना चाहे तो वह महामना के परवर्ती भवनों में दिखायी पड़ेगा | भारतीय स्थापत्य कला के प्रेमी हैवेल के उंपलभ्भों से प्रभावित होकर अंग्रेज शासकों ने नई दिल्ली के निर्माण में भारतीय कला के प्रतीकों और अलंकरणों को अपनाया था | परन्तु आज का भारतीय बाहरी प्रभाव से अभिभूत है | जिस प्रकार अमरीकी भारत के भविष्य पर चढ़ता जा रहा है वैसे ही अमरीकी स्थापत्य भारतीय कला के ऊपर | भवन-निर्माण की दृष्टि से भी हिन्दू विश्वविद्यालय की कल्पना विराट थी | हिन्दू विश्वविद्यालय तपोवन नहीं था अपितु विद्या का विशाल देवालय था | मालवीय जी की राष्ट्रीय भावना और उनका आत्म-सम्मान छप्पर और फूस से संतुष्ट होने वाला नहीं था | उनकी भावना और कल्पना समृद्ध कलात्मक थीं| इस दृष्टि से मालवीय जी सात्विक राग के सुन्दरतम उदाहरण थे | हिन्दू विश्वविद्यालय का संविधान और संगठन जो महामना ने अपनाया वह भी अपना वैशिष्ट्य रखता था |वह अन्य विश्वविद्यालयों का अनुकरण नहीं था | उस समय अंग्रेजी साम्राज्य भारत में अपनी शक्ति की चरम सीमा पर था | देश का राजनीतिक तथा शैक्षणिक जीवन पूर्णतः नियंत्रित था | परन्तु ऐसी विषम परिस्थिति में भी उस समय लोकतांत्रिक सिद्धान्तों के आधार पर हिन्दू विश्वविद्यालय का संविधान पूर्ण लोकतांत्रिक था | इसमें शैक्षिणिक और व्याक्तिगत स्वातंत्र्य का पूर्ण ध्यान रखा गया था| अपनी आन्तरिक व्यवस्था में यह पूर्णतः स्वायत्त तथा सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त था | इसकी सर्वोच्च अधिकारणी संस्था कोर्ट थी | इसमें देश के सभी विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व था, सरकारी प्रतिनिधियों की संख्या नगण्य थी | कोर्ट ही विश्वविद्यालय के प्रमुख अधिकारियों तथा कार्यकारणी परिषद् का निर्वाचन करती थी | चांसलर, प्रो० चांसलकर, वाइस–वांसलर, प्रो० वाइस-चांसलर, ट्रेजरर सभी कोर्ट द्वारा चुने जाते थे | विश्वविद्यालय की नीति और कार्यक्रम भी कोर्ट द्वारा ही निर्धारित होते थे | संविधान कि दूसरी विशेषता यह थी कि इसमें प्रशासकीय और शैक्षणिक अंग में पार्थक्य था | शैक्षणिक अंग पूर्णतः स्वायत्त थी | सीनेट और सिंडिकेट शैक्षणिक कार्यो में स्वतंत्र थी, कार्यकारिणी परिषद् की मुखापेक्षी नहीं | कार्यकारिणी का मुख्य काम था साधनों की व्यवस्था करना और कर्मचारियों की नियुक्ति| जिस प्रकार लोक-स्वातंत्र्य के लिये प्रशासन और न्याय का पार्थक्य आवश्यक माना जाता है वैसे ही विश्वविद्यालय में भी व्यवस्था और शिक्षणका पार्थक्य विचार और शास्त्र के विकास के लिये आवश्यक समझा गया था | इसी प्रकार सत्ता और ज्ञान के पार्थक्य तथा अधिकार के विकेन्द्रीकरण द्वारा विश्वविद्यालय का कार्य मालवीय जी के समय में बिना अनावश्यक हस्तक्षेप और संघर्ष के चलता था | ऐसे संविधान के अन्तर्गत महामना जी कुलपति चुने जाते थे | हिन्दू विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर कुलपति कहलाते थे, उपकुलपति नहीं | ‘उपकुलपति’ उपपति के समान लगता है जो विश्वविद्यालय के उच्चतम अधिकारी के अनुरूप नहीं था | उपकुलपति शब्द तभी से अधिक प्रचलित हुआ है जब से राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री चांसलर होने लगे हैं | मालवीय जी निर्वाचित कुलपति होने में गर्व का अनुभव करते थे, प्रशासन से मनोनीत अथवा नियुक्त होना उनके स्वाभिमान और लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध था | कोर्ट का विश्वासपात्र और श्रद्धेय होने के लिए यह आवश्यक भी था | वास्तव में मालवीय जी केवल कुलपति ही नहीं कुलगुरू भी थे; केवल व्यवस्थापक नहीं उपदेष्टा भी थे | महामना की कुलपति अथवा कुलगुरु की एक अपनी कल्पना भी थी | उनके सिद्धान्त के अनुसार हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलपति भारतीय संस्कृति का मर्मज्ञ तथा आचार-विचार,वेश-भूषा, खान–पान, आदि में भारतीय होना चाहिये और जनता में उसे भारतीय दिखायी भी पड़ना चाहिये | साथ ही साथ उसे राष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय तत्त्वों का उन्नायक होना चाहिये |उनका यह भी विचार था कि विश्वविद्यालय का कुलपति सम्मानित तथा अवैतनिक होना चाहिये | वे समझते थे कि वैतनिक अथवा किसी भी प्रकार के आर्थिक स्वार्थवाले व्यक्ति का वह प्रभाव अध्यापकों,छात्रों और जनता पर नहीं पड़ सकता जो एक शिक्षण संस्था के कुलगुरु की ओर से पड़ना चाहिये | भारतीय निष्ठा का यह एक मौलिक सिद्धान्त है जिसको मालवीय जी दृढता से पकडे हुए थे | वे जानते थे कि उच्चतम वेतन पानेवाला व्यक्ति आतंक तो थोड़े समय के लिये जमा सकता है, किन्तु स्थायी प्रभाव नहीं डाल सकता | काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति में और भी कई गुण होने चाहिये जो मालवीय जी में थे| उन गुणों का उल्लेख मालवीय जी स्वयं तो नहीं करते थे किन्तु दूसरों ने उनके सम्बन्ध में किया है | सन् 1938 में मालवीय जी की इच्छा से कोर्ट के अधिवेशन में कुलपति पद के लिये डॉ0 शान्तिस्वरूप भटनागर ने सर राधाकृष्णन् के नाम का प्रस्ताव करते हुए कहा “हिन्दू विश्वविद्यालय के वाईस-चांसलर में तीन गुण मुख्यतः आवश्यक हैं | प्रथमतः उसे हिन्दी का प्रौढ़ वक्ता होना चाहिये,क्योंकि आधुनिक युग में भारतीय हृदय तथा जन-साधारण को स्पर्श करने के लिये यह एकमात्र अखिल भारतीय माध्यम है | दुसरे उसे अंग्रेजी का भी सफल वक्ता होना चाहिये, क्योंकि आधुनिक ज्ञान और अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहार का यह मुख्य माध्यम है | तीसरे, उसे सफल भिक्षुक होना चाहिये जिससे वह भारतीय जनता से भीख माँगकर विश्वविद्यालय के लिये साधन एकत्र कर सके |” समय बदल चुका है किन्तु उपर्युक्त कथा का सत्य नहीं बदला है | वास्तव में हिन्दी एक प्रादेशिक अथवा भारत के बड़े भूभाग कीभाषा मात्र नहीं है | जो हिन्दी के बारे में इतना ही जानते हैं वे हिन्दी को नहीं जानते | वह भारतीय अभिव्यक्ति की बहुत बड़ी शक्ति है | इस रहस्य को इस युग में पुर्णतः दो ही व्यक्तियों ने जाना|महामना मालवीय जी और महात्मा गाँधी | अंग्रेजी अथवा अन्य किसी भी विदेशी माध्यम के द्वारा भारतीय हृदय पर भावात्मक अथवा नैतिक प्रभाव नहीं पड़ सकता | भारत के लिये अंग्रेजी वाहनमात्र है, जनता पर उसका भावात्मक प्रभाव कभी पड़ ही नही सकता | किसी अच्छी अंग्रेजी बोलनेवाले की कोई प्रशंसा कर सकता है किन्तु उसके प्रति श्रद्धा नहीं | भारतवर्ष में प्राचीन काल में शिक्षा और भिक्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध था | आचार्य और विद्यार्थी दोनों समाज से भिक्षार्जित साधन पर जीते थे, अतः उनकी सभी वृत्तियाँ समाजनिष्ठ और लोकप्रवण होती थीं | आज के युग में घर-घर भिक्षा माँगना तो सम्भव नहीं, किन्तु समाज के सभी वर्गों से साधन एकत्र कर विश्वविद्यालय चलाना सम्भव है | महामना ने यही किया | राजा महाराजाओं से लेकर दरिद्र भिखारी तक से उन्होंने भिक्षा माँगी | वे जानते थे कि केवल सरकार अथवा दो चार श्रीमन्तों पर अवलम्बित होने से विश्वविद्यालय का व्यक्तित्त्व और शैक्षणिक स्वातंत्र्य नष्ट हो जायेगा | वे प्रशासन से पूर्ण सहायता लेने के पक्षपाती नहीं थे | उनकी यह आशंका सत्य निकली | कुलगुरु मालवीय जी अध्यापकों और छात्रों के लिये क्या थे, इस बात को वे ही लोग जानते हैं जो उनके समय में विश्वविद्यालय में अध्यापक अथवा छात्र थे | वे विश्वविद्यालय के उच्चतम अधिकारीमात्र नहीं थे, उनके लियेविश्वविद्यालय अपना कुल अथवा परिवार था, जिसकी चिन्ता निरन्तर उनके मानस में बनी रहती थी | वे कुल के पिता, आचार्य और गुरु थे | विश्वविद्यालय के प्रति उनमें सहज भावात्मक अनुराग था | उनके विशाल ह्रदय में अध्यापकों के प्रति आदर का भाव था | उनको वे अधिक वेतन नहीं दे सकते थे,परन्तु उसके बदले में उन्होंने प्रचुर सम्मान दे रखा था | उनके समय में अध्यापकों के केवल दो ही वर्ग थे प्रोफेसर और सहायक प्रोफेसर | वास्तव में एक ही वर्ग प्रोफेसर, रीडर और लेक्चरर का पद वे अध्यापक के अनुरूप नहीं समझते थे | विश्वविद्यालय के सभी क्षेत्रों में उनको उचित स्थान और अधिकार मिला था | मालवीय जी इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि विश्वविद्यालय के आधार अध्यापक हैं, वाइस चांसलर अथवा रजिस्ट्रार का कार्यलय नहीं | इसलिये उनके समय में अध्यापक-गरीबी से रहकर भी सम्मान और गर्व का अनुभव करते थे | छात्रों के लिये मालवीय जी के ह्रदय में अपार करुणा और हित-कामना थी | विश्वविद्यालय का द्वार तो सभी वर्ग के छात्रों के लिये खुला हुआ था, परन्तु दीन विद्यार्थियों पर तो उनकी बिशेष कृपा थी| वास्तव में मालवीय जी का ह्रदय माता का ह्रदय था | वे ‘वन्दौं सीताराम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न’ के उपासक थे | उन दिनों सरकारी नौकरों के लड़के अथवा सम्पन्न वर्ग के महत्वकांक्षी छात्र प्रायः उन विश्वविद्यालयों में जाते थे जहाँ की पढाई से सरकारी नौकरी आसानी से मिल सकती थी | परन्तु सामान्य और गरीब घरों के अधिक विद्यार्थी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही पहुँचते थे | गरीबी के कारण हिन्दू विश्वविद्यालय से कोई वापस नहीं जाता था | जुलाई के महीने में छात्र किसी भी छात्रावास में अपना सामान डाल देते थे, किसी प्रकार अपना नाम लिखा लेते थे | दो-दो वर्ष तक भी फीस के बकाये में भी नाम नहीं कटता था | यदि परीक्षा के समय तक भी फीस न दे पाते तो वे अन्त में मालवीय जी तक पहुँचते थे | वस्तुतः गरीब छात्रों की पूरी अथवा आधीफीस को वे ऐसे अवसरों पर माफ़ ही कर देते थे | इसके अतिरिक्त मालवीय जी के पास कई सहायतार्थ कोष थे जिनसे छात्रों को पुस्तकों, भरण पोषणादि के लिए भी धन मिलता रहता था | ऐसे कई छात्र जो कभी कठिन रोगों से आक्रान्त हो जाते थे उनकी चिकित्सा की विशेष व्यवस्था मालवीय जी करा देते थे | उन तक छात्रों का पहुँचना सुलभ था | इसलिये बहुत से छात्र उनके व्यक्तिगत सम्पर्क में आ जाते थे | कोई भी छात्र उनके निकट सम्पर्क में जाकर वात्सल्य का ही अनुभव करता था | विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने छात्रों के शिक्षण और ज्ञानवर्धन की व्यवस्था तो की ही थी, किन्तु उनका उद्देश्य केवल कार्यक्षम नागरिक अथवा सेवा आयोग के लिये उपयुक्त कर्मचारी उत्पन्न करना नहीं था | वे क्षमता और जानकारी से अधिक महत्व भावात्मक विकास और चरित्र-गठन को देते थे| इसलियेविश्वविद्यालय में ऐसे वातावरण का उन्होंने संयोजन किया था जहाँ से समुन्नत, स्वाभिमानी और लोकसेवी मनुष्य निकल सकें | छात्र संघ, पार्ल्यामेंट, साहित्यिक समितियाँ, व्याख्यान मालाएँ, कथा-वार्ता, पर्व-उत्सव आदि मनुष्य-निर्माण के माध्यम थे | इनमें मालवीय जी स्वत: रस और भाग लेते थे | विद्यार्थी इस आयोजनों में उनके दर्शन और भाषण के लिये लालायित रहा करते थे | सरकारी नौकरियों के लिये तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढना अयोग्यता माना जाता था | यहाँ के छात्र सरकार के लियेसंदिग्ध और खतरनाक समझे जाते थे |परन्तु विश्वविद्यालय से निकले हुए छात्र, अध्यापक, साहित्यकार, वकील, इंजीनियर और समाज-सेवियों के रूप में देश में चारों ओर छा गये थे| मालवीय जी की प्रेरणा और प्रभाव उनके जीवन का बहुत बड़ा सम्बल और प्रेरणा का श्रोत था| छात्रों में विनय और अनुशासन की मालवीय जी की एक विशिष्ट कल्पना थी|विद्यार्थियों में शिष्यत्व का भाव ही विनय अथवा अनुशासन का आधार है| यह अधिकारियों और अध्यापकों की सहानुभूति, वात्सल्य और हितकामना से उत्पन्न होता है| विनय प्रभावात्मक और अन्तर्निहित होता है| नियंत्रण, शक्ति और प्रहार से यह पैदा नहीं किया जा सकता| इसीलिये शैक्षणिक विधान और वातावरण सैनिक और प्रशासकीय वातावरण से भिन्न होता है| मालवीय जी केविश्वविद्यालय के प्रांगण में रहना ही छात्रों में विनय और अनुशासन के लिये पर्याप्त था| उनका स्नेह, वात्सल्य और सर्वभूत हित-कामना स्वतः लोगों पर प्रभाव डालती थी| उनके पास जाने मात्र से एक विशेष प्रकार का ह्रदय-परिवर्तन हो जाता था| सभा समितियों में उनके जाने-मात्र से शान्ति और व्यवस्था उत्पन्न हो जाती थी| कोई भी अपराधी व्यक्ति उनके सम्मुख जाकर लज्जित और परिवर्तित हो जाता था| छात्रों के संघटनों को वे प्रोत्साहन देते थे| किसी नैतिक उद्धेश्य के लिये उनके आन्दोलनों को वे वैध मानते थे | सार्वजनिक अथवा राजनीतिक कार्यक्रम तथा आन्दोलनों में भाग लेने के लिये कोई छात्र कभी दण्डित नहीं हुआ| मालवीय जी के सामने विश्वविद्यालय, देश और लोक में कोई भेद नहीं था | इसलिये वेशैक्षणिक एकांगीणता में विश्वास नहीं करते थे| वे समग्र और संतुलित जीवन के निर्माता थे| महामना मालवीय जी कुलगुरु के अनेक और विविध पहलू हैं, जिन सबका एक छोटे से लेख में वर्णन नहीं हो सकता| उनका ह्रदय विश्व के समान विशाल और दृष्टि समष्टिगत थी| वे चाहते थे कि विश्वविद्यालय में शिक्षण और ज्ञानार्ज़न से बढकर मनुष्य में ह्रदय की विशालता और चरित्र का निर्माण हो| विश्वविद्यालय उनके लिये लोक-संवेदना और लोकहित का माध्यम था| वे विश्वविद्यालय को यांत्रिक संघठन, कारखाना या फौजी छावनी नहीं बनाना चाहते थे | उनका स्वप्न पृथ्वी पर उतरा किन्तु पूरा नहीं हुआ| जिस प्रकार महात्मा गाँधी के जीवन-दर्शन का देश में विघटन हुआ उसी प्रकार मालवीय जी के जीवनादर्शों का | संतोष इतना ही है कि उनके जीवन-काल में उनके आदर्शों का दु:खान्तअन्त नहीं हुआ| वे अपने भाषणों में प्रायः कहते थे कि वे अविमुक्त धाम, मोक्षदायिनी काशी में रहकर भी मोक्ष नहीं चाहते थे; वे भारत और विश्वविद्यालय की सेवा करने के लिये पुन: जन्म लेना चाहते थे- न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नाऽपुनर्भवम् | कामये दु:ख़तप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् || इसीलिये पंचक्रोशी के भीतर न जाकर विश्वविद्यालय के अपने आवास में उन्होंने शरीर-त्याग किया| मेरा विश्वास है कि विश्वविद्यालय के ऊपर अभी भी उनकी आत्मा का संचरण होता होगा| विद्या के भारतीय आदर्शों की प्रतिष्ठा और राष्ट्र की वास्तविक और पूर्ण मुक्ति के लिये वे फिर जन्म लेंगे|

A Few Recollections and Reflections V.V.Narlikar My memories of the Banaras Hindu University (1932-1960) are so many, so rich and so happy that they make the University to me ‘मधुर मनोहर अतीव सुन्दर’. I remember my first trip when I got down at the Banaras Cantonment station on the 15th or 16th August, 1932 soon after midnight. I was received at the station by a few post-graduate students of Mathematics and taken by taxi to the house of Dr. S.S. Joshi. The very next evening I gave a talk on “The Expanding Universe” in the New Physics Lecture Theatre. Acharya A.B. Dhruva, Pro-Vice Chancellor, was in the chair. The hall was packed and my lecture was well received. The next day Pt. Malaviyaji who had met me at Cambridge in 1931 saw my reprints and the testimonial about the quality of my work that Professor Sir A.S. Eddington had given me for use in India. After two days Malaviyaji invited Dr. S.S. Joshi and me to see him in the evening. In the meanwhile I was shown the University. I met Dr. S.C. De, the Head of the Department of Mathematics and my old friend, Dr. S.D. Chowla, who was a Professor of Mathematics then in the Central Hindu College. I had no intention then of joining the University. I was an Issac Newton Student at Cambridge, two years had yet to run out of the Studentship and I had a ticket for the return passage to London in September. At 7.30 p.m., as we walked briskly to Panditji’s quarters, Dr. Joshi and I could see the beauty of the campus in moonlight, the hostels, the playgrounds and the college buildings beyond. It was sufficient to set my mind thinking about the sanctity of Banaras and the holy Ganga, of the great teachers, saints and scholars that had visited or stayed at Banaras. With these thoughts uppermost in my mind we arrived at the destination where we saw the shining, smiling face of the venerable panditji at the centre, in the front room, as we crossed the gate. I need not go into details. We talked and discussed many matters for about an hour. No one else was present. In the course of an hour I had a signed a contract agreeing to serve the University for ten years. The terms offered were generous and exceeded the expectations of my friends and well-wishers like Sir R.P. Paranjpye. Thus I entered the service of the University on August 20, 1932. After all the admissions were over Panditji used to give in the first term, every year an address to the entire staff and students of the University. Within a few days of my joining the University I had the opportunity of hearing this address in August 1932. It was in the hall which became known later as the Shivaji Hall. The hall was packed. It was a hot afternoon. The address commenced at 3 p.m. and ended by 5.30 p.m. Panditji was at the height of his powers. “Always aim high in your studies, in your athletic and sports activities, in your social and cultural activities.” This was the gist and to make the point effective, Panditji gave in his support a number of illustrations and cited effective quotations in Sanskrit and English. He spoke in simple Hindi. Early in the course of the address I was overwhelmed with embarrassment when he made me stand up and introduced me to the audience with some good words about me. The address seemed to be specially meant for me. I was expected to rise higher and higher n my profession by confining myself to teaching and research. It was probably in this address, or soon afterwards in another address, he summed up his exhortation with the verse: सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाथ विद्द्या I देशभक्त्या आत्मत्यागेन सम्मानार्ह: सदा भव II To me, at the age of about 24 and in an impressionable state of mind, this was a tremendous experience. Panditji used to remain present at the popular lectures on science arranged by Dr. S.S. Joshi or some other professor. If there was any disturbance in the crowd made by noisy students it was immediatly, quelled by a characteristic gesture. Panditji struck the palm of his left hand with two fingers of the right hand. The effect was immediate. It was indicative of the high regard in which Panditji was held by the students at the time. Attending a Student ill of Cholera: At 7.30 p.m., we started back, Pt. Ram Narayanji gave Panditji an urgent message just received from the University Hospital. On the way back we got down at the Hospital. Dr. P.N. Mishra was called. He came running and reported the condition of the university student who was seriously ill of cholera. As Panditji proceeded to the special ward where the student was, I insisted on accompanying him. He rebuked me and prevented me. Within ten minutes he was back. He had cheered up the patient and assured him that everything possible was being done for his early recovery. He saw to it that Dr. Mishra had everything that he wanted at his disposal. I was so overwhelmed by Panditji’s concern for students that one of the things that I did later was to visit regularly the students’ ward and later the general wards also. I was for many years a member of the Executive Council and I am glad that I could be of some effective service to the students in the hospital from time to time. Panditji was thus a constant source of inspiration to those who had the good fortune of being associated with him.

Great Privilege to BHU Dr. Rajnath Ex-Head Dept. of Geology The name and the fame of Revered Malaviyaji as national leader of India had spread far and wide and we used to hear it even in our school going age. Every student in those days, used to regard it a matter of great privilege if his parents decided to send him to the Banaras Hindu University this University was regarded as Cambridge and Oxford of India naturally when my guardians decided to send me to Banaras I was over-joyed at this selection of theirs. During my college days when I was a student of this University and during the period of my service in this University, I had innumerable opportunities of observing the great personality from very close quarters. His versatile personality was like a diamond having so many facets and each time one observed a new facet of his personality shed brilliance from that facet. Remark on Donation from other Countries His national pride was beyond imagination. After my return from England, in one of the meetings which he had called to find ways and means of collecting funds for the Hindu University as the University in those days used to have immense financial difficulties. The then Government gave only a small fraction of the total expenditure of this University and the rest used to be collected by Revered Malaviyaji himself. One of the members present in that meeting proposed to get donations from Ford Foundation and other charitable institutions of U.S.A. and of other countries. Most of us who were present thought that this was a very fine proposal which will remove the financial difficulties of the University without much efforts. Within a very short time we were all surprised that inspite of the great financial difficulties, Revered Malaviyaji atonce remarked “Will you then have the pride of calling this University as your University?” While advocating Swadeshi to students, he used to say that he adopted Swadeshi when he was much younger than many of the persons present there and thus they were having better understanding at the age than what we had when he started using Swadeshi. Death of Son and Fast unto Death of Gandhiji His nationalism too was beyond conception. After the death of his elder son, Ramakanjee, some Professors and the Heads of the Departments called on him on the third day to express our condolences. One by one our strength increased to more than 20 or 25 when we were taken to his room (outer glazed Varandah of Malaviya Bhawan). We waited for more than an hour and none of us could open our mouth to express our feeling of condolences as Malaviayji had surcharged the atmosphere with anxiety regarding the future of India if something untowards happened to the life of Mahatma Gandhi who had then undertaken a fast unto death in Agha Khan Palace and Malaviayji was having trunkcalls to various persons in Calcutta, Bombay, Delhi, etc. for Malaviyaji the anxiety of the future of India was much greater than the great grief which had fallen on him in his old age. In politics Malaviyaji always avoided extremes. The result was that he never had a group of his own, but persons in different groups used to always run to him for advice. He was always very practical. Once he came to deliver a speech to the crowd of the students and began in English. A good number of students in the crowd started clamourning for Hindi-Hindi. Malaviyaji atonce switched on his speech in a very fluent Sanskrit which a majority of the people in the crowd could not follow. Then the voice came we are unable to follow. Atonce Malaviyaji switched on to English and told the students to let him speak in a language which everyone will follow and he then continued his speech in English which was interrupted in the beginning. Reply to Dr. Hume’s lecture His conception of religion and philosophy was supreme. When that famous scholar of Sanskrit and Hindu religion, I mean, Dr. Hume, who I understand has translated Upanishads etc., came to the University and delivered a lecture on Hinduism. He happened to begin his lecture with his Idol worship etc. At the end of his lecture, Malaviyaji asked Prof. A.B. Dhruva, Principal of C.H.C., and Pro-Vice-Chancellor of the University, a great scholar of Sanskrit and Philosophy, to reply to Dr. Hume’s lecture. Principal Dhruva could not say anything in reply to his lecture. Then Malaviyaji himself stood up and expounded the ideas of Hindu religion that idol worship etc. were meant for the beginner who could not understand or conceive the real conception of Hindu philosophy. Malaviyaji contributed by saying that according to this idea, God is a “Jyoti” (Eternal Flame) and spark of which resided in every living being and by living an ideal life everybody could raise himself or herself to be not only nearer the God but get merged into the Eternal Flame. At the end of the lecture of Malaviyaji, the old man, Dr. Hume stood up and said “Several decades of my intense study of Hinduism have been a waste and it is only today that I have learnt the true significance of Hindu Philosophy at the feet of Malaviyaji.

And Thus a Revolutionary was Admitted Satyavrata Ghose A Revolutionary It was when life was all fresh and youthful that I sought admission to the Benares Hindu University (it was spelt that way). There was nothing very unusual about it. But my case was different. I had a political past, suspected of association with the revolutionary movement. Just after I passed the matriculation examination from Barisal, (under the Calcutta University then) I was one day arrested while on my way to Carrom competition. But there was no specific charge. The same evening I was sent by steamer to Jessore jail (in Bangladesh now) to be detained under the Bengal Criminal law Amendment Act, nicknamed the ‘lawless law’ under which the police could detain a person for an indefinite period. As I was keen to take up the Science course the Detention Camp was not suitable. My elder brother, Prof. Devaprasad Ghosh, moved the Government of Bengal and got me released under an order of exterment from Bengal. I went to Indore, far off from Bengal, the hot-bed of the revolutionary movement. It was a ‘native state’. The Maharaja was known as the Holkar. My brother-in-law, Dr. P. Basu, was the Principal of the Holkar College. He was a strict disciplinarian. The Government thought it safe to keep me there. At Indore, I kept myself scrupulously away from politics, even the milder politics of the Praja Mandal. I did not even know if there was anything similar to the revolutionary movement I left behind. But this ill-star of externment did not leave me long in peace. The local police suspected me of complicity in the Dhar Dacoity Case. Dhar was another small state near Indore. But they did not formally ‘extern’ me in view of high position Dr. Basu enjoyed. They only saw that I left Indore at the earliest. Much activity went on behind my back, between my brother and brother-in-law. One day, received a telegram from Calcutta; join me at Varanasi. I started on the unforgettable date, 1-2-34, Dada was at the station to receive me. We went to a relative’s residence and discussed the problem of admission. I was told that all the colleges were known to my brother, and he knew many, had declined his request for my entry into their institution all in view of my political past. The only was the Hindu University. Its Vice-Chancellor, Pt. Madan Mohan Malaviya, was a great nationalist leader and very well-known to my brother. Both were leaders of Hindu Maha Sabha. Disappointed at our first venture, we returned home. Next morning we both brothers paid a courtesy call to Dr. Bhagwandas at his spacious bungalow. My bother knew him well. The veteran, a landlord-cum-saint (known as Mahatma to many) heard the whole story of my ‘encounter’ with Pandit Malaviya. My brother had to return the same evening. Dr. Bhagwandas took me to Pandit Malaviya in his Buggi. He heard the arguments of the ‘father of the University’. Raising his voice, the learned doctor demanded that I should be admitted, government grant or no government grant. He was held in such a high esteem that the venerable Vice-Chancellor admitted to the University. But there was a condition that I shall have no place in the hostel and the police spy, Inderpal Singh, pursuing day and night, would not enter the campus. He could wait for me at the university gate. The ‘deal’ was done and I became a student of the highly prestigious Hindu University. Panditji also felt happy at the face saving formula. Inside his heart he had all sympathy for me. Accordingly, I shifted to a small rented room, quite close to where I was temporarily staying. The monthly rent was Rs. 2/-. The area was surrounded by a low boundary wall with a small gate. The constable on 24 hours duty used to sit just outside the wall near the gate, all the time dosing while sitting. It was an interesting sight for others, particularly the children of the neighbourhood. Indrapal would faithfully follow me by his cycle. When we reached the University gate, he used to sit in a corner. I attended my class. While returning both came to my Gouriganj, (Bhelupura) residence. The constable, as usual, was outside the wall. In the afternoon I would go to the ‘Ganga Ghat’ and stroll about. I was still to make friends. Indrapal, at some distance, was always with me like a shadow, an unfailing companion. It was almost a sight for passersby. One day I suggested that he could well remain sitting near my house and that I would faithfully report on return what all I did or did not do during my evening stroll. But he loyal to his employer would not leave me alone for a moment. A mischievous idea came to my mind. I walked from Ghat to Ghat till I reached Manikarnika Ghat. It was a steep one. Indrapal, like a shadow, was a little distance behind me. I ran up to the top and stopped there. The spy with a bulky body, had to also follow me. He had been panting for breath. Just as he reached the top, I started running down the stairs. He, to save his job also ran after me. I repeated the process three times. He was almost on the point of collapse and yielded to my initial suggestion to stay back near my little home. I was scrupulously honest in reporting to him about the movements. There was nothing political. A truce was made. He saved his job as well as his life. I was free from the constant shadowing by a police constable. My political past and my activities within the University helped me enjoy a soft corner in Malaviayji’s heart. I had once exploited it. In need of some pecuniary relief, I thought of an ingenious ploy and applied for a free studentship. I wrote out an application and appeared before Panditji in a pitiable condition. My friends, and I had many by that time, suggested that I should wear a dirty Khadi Dhoti while meeting the Vice-Chancellor. I had only one such Dhoti, always kept in my box Dhobi-washed. It was not dirty. I hit upon the plan and took it out, crumpled it on the dirt and the dust outside, and appeared as a poor and pitiable political sufferer. It worked and the Vice-Chancellor granted my request immediately. But this act of ‘mischief’ before a really noble soul made my conscience prick for years. I had an occasion to confess my guilt before Malaviyaji on 11-8-1939 when I met him at the Birla House in Calcutta for a testimonial. After the work was done and I found that he was in a very affectionate mood, I made bold to tell him all about the ‘dirty-dhoti trick’. He hugged me warmly. Pandas of Vishwanath Temple Now to two more incidents of interest about my days described here. We were the students of the University. I had a dual personality. I stayed in the city and studied at the University. The city was holy home of Lord Vishwa Nath. Shivratri was the most important festival when lakhs of people visited the temple. There were the ‘Pandas’ the custodians of God, who used to openly molest the women devotees, mostly illiterate. After an ablution in the holy waters of the Ganga they rushed to the temples in wet clothes. The ‘Pandas’ taking advantage of the enormous crowd of superstitious ladies openly molested them. The ladies for fear of God and also of the society, would not protest. This happened year after year. As a resident of the city, I knew more about it. Once we decided to teach ‘Holimen’ a lesson of life and beat them on a Shivratri day and in their own ‘den’, the Vishvanath lane. There were two impediments on our way. Revered Pandit Malaviya was highly religious and a respected person. We had to have his blessings. A few of us at the University approached him with the idea which appeared to many as preposterous. He listened to us patiently. He, also, had been hearing about the incidents over the years. As a great moralist, he used to be shocked but he did not know that there could be any remedy. When we suggested ours, he almost readily responded in the affirmative. But his consideration of the practical side of the problem, our safety and the attitude of the police, made him hesitant. We assured him that we knew how to defend ourselves and also knew how to neutralize the police. The S.P., one Mr. Tom, used to play tennis with me. As someone important in police eyes, I was different from the common man to him. I told him about the plan and requested him only to instruct the Dashashawamedh Ghat police station just to turn their eyes when there would be turmoil in the Vishvanath lane just opposite. It all happened within the twinkling of an eye. We posted ourselves with hockey stick in hand, at a little distance from one another and scattered throughout the lane. The ‘Pandas’ loitering about in search of their, ‘Prey.’ Their big bamboo lathis were kept on the ground in a corner. The moment the hand of one came on the breast of a half wet devout belle, our sticks not only fell on the person but on the other ‘Pandas’ within few seconds and we came out of the surging crowd all safe. The ‘Pandas’ took some time to collect their big lathis which they could not wield in a thickly crowded lane. It was an incident worth remembering even after sixty years and worth narrating today. Shantibai Episode But the most memorable was the ‘Shantibai episode’. She was well known nautch girl and was the heart throb of many, young and old, who used to visit her residence in the top-notch Dal Mandi lane in the red-light area. One fine morning we all heard that she had married one Bhatt, an outstandingly attractive young man studying at the University Engineering College in the B.Sc. Final Class. To add to the excitement it was further learnt that Pandit Malaviya, a puritan to the core, had expelled Bhatt from the University. Many rumours were current in the city throughout the day. Next morning educated citizen of the holy city had a printed pamphlet in his hand. It was Shantibai’s appeal to the Vice-Chancellor to rescind the other. Her logic was simple and convincing to a common man. She was, admittedly, a ‘fallen woman’, not acceptable to the society. Bhatt, by his bold action gave her a chance to be socially rehabilitated. By the order of rustication Panditji threw him out to the streets. Shanti, as a consequence, lost her opportunity to gain an entry into society. She mentioned many names of persons in various vacations who enjoyed a respectable status in the society, who regularly visited her. But they were readily accepted. This, to Shantibai was a sheer hypocrisy and double standard which a magnanimous person like Pandit Malaviya should never encourage. A copy reached the hands of the high-priest of our University. He was shocked and pondered over the whole matter. A small committee was constituted of three senior professors and three senior students to report, particularly about some of the professors whose names were mentioned in the leaflet. The committee could not make much headway because none of the other residents of the red-light area agreed to disclose anything about the matter. At long last, someone suggested that the Committee might approach one ‘Mataji’, a retired member of the fallen women fraternity, then working with Arya Samaj. When she escorted them, the task was made easy and it was shocking to the members when they learnt about the doings of their own colleagues. Probably the order was rescinded. I wonder where Shantibai and her benefactor, once my friend, could now be. My four years stay at the University came to an end in 1938. Two factors coincided to get me out of the place which was a haven for me full of rich and varied experiences. My academic career ended with M.A. Final and my order of externment was withdrawn as an outcome of the government policy of amnesty to the detenus. The Hindu University days are remembered with a nostalgia, unforgettable and enjoyable, every moment of a four year tenure.

वह अपनत्व जिसे हम भूल नहीं सकते कुँवर सुरेश सिंह बचपन में अपने गाँव में जो वस्तु मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती थी वह था मेरे पितामह (स्वर्गीय राजा रामपाल सिंह) के समय का प्रेस जहाँ हिन्दी का सर्वप्रथम दैनिक पत्र ‘हिन्दो-स्थान’” छपता था| बाबा साहब के स्वर्गवास के बाद से प्रेस बन्द पड़ा था क्योंकि रियासत कोर्ट ऑफ वार्डस के अधीन थी लेकिन कभी-कभी कोई उसे ठेके पर ले लेता था और प्रेस में फिर कुछ दिनों के लिये चहल पहल हो जाती थी| मुझे थोड़ा भी अवकाश मिलता तो सीधा प्रेस जा पहुँचता और वहाँ के पुराने कंपोजीटरों के बीच बैठकर उनसे बाबा साहब (राजा रामपाल सिंह) तथा पूज्य मालवीय जी के किस्से सुना करता| पूज्य मालवीय जी प्रेस के बगल वाले कच्चे मकान में किस तरह सादगी से रहते थे, बाबा साहब उनका कितना आदर करते थे, वे केवल उन्हीं के सामने शराब नहीं पीते थे और फिर एक दिन किस प्रकार शराब के नशे में चूर रहने पर मालवीय जी से उनका साक्षात्कार हुआ जिससे दुसरे ही दिन मालवीय जी यहाँ से चले गये| इसी तरह के न जाने कितने किस्से मैं सुनता और कल्पना करता कि कभी बड़े होने पर पूज्य मालवीय जी के अवश्य दर्शन करूँगा| हम तीन भाई थे| सबसे बड़े राजा अवधेश सिंह, मँझले कुँवर बृजेश सिंह उसके बाद मैं| हम लोग शुरू ही से कालविन स्कूल भेज दिये गये और बचपन ही से हम लोगों को एक फौजी अंग्रेज गारजियन की देख रेख में कर दिया गया था क्योंकि कोर्ट ऑफ़ वार्डस के अधिकारियों को हम लोगों के देशप्रेम की खबर लग चुकी थी| उसी बीच पूज्य मालवीय जी लखनऊ पधारे| हम लोग उनके दर्शनों के लिये आतुर हो उठे लेकिन अंग्रेज गारजियन बहुत सख्त था| बड़े भाई साहब ने उससे बिना पूछे ही हम दोनों भाइयों का साथ लिया और अमीनुद्दोला पार्क जा पहुँचे जहाँ पूज्य मालवीय जी का व्याख्यान हो रहा था| सभा के समाप्त होने पर जब हम लोगों ने अपना परिचय देकर उनके चरण छुए तो मालवीय जी कालाकांकर का नाम सुनते ही भाव-विभोर और गद्गद हो उठे| उन्होंने बड़े प्यार से हमलोगों के सर पर हाँथ फेर कर कहाँ- ‘”भगवान् करे तुम लोग भी अपने बाबा की तरह निर्भीक बनो’|” यही उनका प्रथम आशीर्वाद था| इसके बाद हम लोग अक्सर उनसे मिलते रहे और वे भी जब कभी लखनऊ पधारते तो हम लोगों को जरुर अपने पास बुला भेजते| एक बार हम लोग नैनीताल में थे तो पूज्य मालवीय जी भी नैनीताल आये| एक दिन वे हमारी कोठी पर आये तो अंग्रेज गारजियन ने हमारे मँझले भाई साहब की बड़ी शिकायत की| भाई साहब ने कुछ ही दिनों पहले खद्दर पहनना शुरू कर दिया था जिससे साहब बहादुर बहुत चिढ़ते थे| खद्दर से ज्यादा चिढ़ उन्हें भाई साहब के उस मोटे सोंटे से थी जिसे भाई साहब उनके साथ घुमने जाते समय अपने हाथ में लिये रहते थे| साहब की जिद थी कि वे उस सोंटे का त्याग कर दें लेकिन भाई साहब उसे त्यागना नहीं चाहते थे| साहब ने मालवीय जी से इसकी शिकायत की| साहब की शिकायत सुनकर हम लोग सोचने लगे कि पता नहीं मालवीय जी क्या करेंगे ? साहब की बात रखेंगे कि भाई साहब की| मालवीय जी जब चलने के लिए डांडी पर बैठे और हम लोग उनका पैर छूने गये तो उन्होंने भाई साहब के हाथ से सोंटा लेकर कहा, ‘बड़ी सुन्दर लाठी है भाई तुम्हारी, हम जैसे बुड्ढों को यहाँ ऐसी लाठी के बिना चढ़ाई पर बड़ा कष्ट होता है| मैं इसे लिये लेता हूँ| लो तुम हमारी छड़ी अपने पास रखो’| यह कहकर उन्होंने बड़े कौशल से साहब का भी मान रख दिया और मँझले भाई साहब भी प्रसाद स्वरुप छड़ी पाकर प्रसन्न हो गये| किसी का जी दु:खाना वे जैसे जानते ही नहीं थे| इसी तरह की एक घटना अपने सम्बन्ध की सुना दूँ| जब मैं काशी विश्वविद्यालय में पढ़ता था तो मालवीय जी ने यह घोषणा की कि वे दशाश्वमेध घाट पर हरिजन तथा अन्य सभी भाईयों को मन्त्र देंगे| चूँकि मेरा ऐसी बातों पर विश्वास नहीं था और वहाँ जाकर उनसे दीक्षा न लेना उनका अपमान करना होता, यही सोच कर मैंने वहाँ जाना ठीक नहीं समझा| लेकिन मेरे मास्टर शाहब श्री सुन्दरम् जी मुझे फोटो लेने के लिये यह कहकर वहाँ लिवा ले गये कि हम लोग फोटो लेकर पहले ही वापस आ जायेंगे| जब मैं वहाँ पहुँचा तो सुन्दरम् साहब ने सबके सामने घोषित कर दिया कि पहले वे, गोविन्द जी तथा सुरेश जी मन्त्र लेंगे| मैं बुरी तरह फँस गया| मंत्र लेता हूँ तो अपने को धोखा देता हूँ और नहीं लेता हूँ तो इतने दर्शकों के सम्मुख पूज्य मालवीय जी का अपमान होता है| अन्त में मैंने मन्त्र न लेने का ही फैसला किया और हाथ जोड़कर कहा- "बाबु जी, आप जानते ही हैं कि मेरा इस पर विश्वास नहीं है, मैं आपको और अपने को धोखा देना नहीं चाहता| आशा है आप क्षमा करेंगे"|” सब लोग स्तब्ध हो गये| मालवीय जी ने बड़े स्नेह से कहा --"”अपने बाबा के मार्ग पर चलकर भला तुम कैसे इस पर विश्वास करोगे, मनुष्य को वही संकल्प लेना चाहिये जिसे वह निभा सके| तुम्हारे सत्य भाषण से मैं बहुत प्रसन्न हूँ"| ”और मैंने देखा कि उस दिन से मैं उनका कोप-भाजन नहीं वरन् उनका और स्नेह-भाजन बन गया और उनकी निगाह में और ऊँचा उठ गया, ऐसा विशाल हृदय था उनका| शिक्षा-काल में मुझे लगभग दो वर्षों तक काशी विश्वविद्यालय में रहना पड़ा, जहाँ मैं भी उनके घर का एक प्राणी-सा हो गया था| उन दो वर्षों की न जाने कितनी घटनाएँ आज भी आँखों के सामने हैं और उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार तो जीवन भर एक पवित्र धरोहर के समान हृदय में सुरक्षित रहेगा| काशी में नित्य ही कोई बड़ा आदमी उनसे मिलने आता| कभी जब मैं भी वहाँ उपस्थित रहता तो वे मेरी ओर संकेत करके कहते- "इन्हें आप जानते हो ? ये कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह के पौत्र हैं, राजा रामपाल सिंह का एहसान मैं कभी नहीं भुल सकता, वैसा बहादुर आदमी अब कोई नजर नहीं आता|” काशी में मेरा अधिक समय बीमार में ही बिता, जिससे मेरी उपस्थिति पढ़ाई के दर्जे में कम हो गयी| मैंने मालवीय जी से इसके बारे में कहा तो उन्होंने अनजाना-सा बनकर पूँछा- “"तो हाजिरी कम होने से क्या होगा?"” मैंने कहा, "”बाबू जी, इम्तहान में न बैठ पाऊँगा और एक साल फिर उसी दरजे में रहना होगा"|” मालवीय जी ने कहा- ”"एक बात बताओ, पढ़ना अच्छी चीज है या बुरी?"” मैंने कहा- "”अच्छी"|” "तो फिर पढ़ने से घबराते क्यों हो"” उन्होंने मुस्कुरा कर कहा- ”"विद्यार्थियों को दरजे का ख्याल किये बिना सच्चे मन से पढ़ना चाहिये, ये दरजे तो ऐसे ही बना दिये गये हैं"|” मुझे कुछ उदास देखकर उन्होंने बड़े स्नेह से कहा- ”"मेरा विश्वाश मानो, पढ़ाई स्कूल और कॉलेजों में नहीं होती, जिसे पढ़ना होता है वह यहाँ से निकल कर पढ़ता है| तुम्हारे बाबा कहाँ कॉलेज में पढ़े थे लेकिन वैसा विद्वान् मैंने बहुत कम देखा है| विद्या के लिये तपस्या करनी पड़ती है, जीवन भर पढ़ने का सौभाग्य तो विरले को ही मिलता है"|” मैं उनके इन अमृतोपम शब्दों से प्रसन्नचित घर लौट आया| उसके कुछ ही दिनों बाद पूज्य बापू ने नमक सत्याग्रह आन्दोलन की घोषणा कर दी| मैंने उनसे अपनी डांडी यात्रा की टोली में मुझे भी सम्मिलित करने की प्रार्थना की तो उन्होंने लिखा कि मैं अपना जत्था बनाकर पैदल रायबरेली जाऊँ। मैंने जब वह पत्र मालवीय जी को दिखाया वे पहले तो गम्भीर हो उठे लेकिन फिर बड़े स्नेह-सिंचित शब्दों में कहा- "आज्ञा तो तुम्हें गाँधी जी से मिल ही चुकी है, हाईकोर्ट के फैसले के बाद लोअर कोर्ट के फैसले की क्या जरूरत है? तुम देश के सच्चे सेवक बनो यही मेरा आशीर्वाद है"। कॉलेज छोड़कर मैं अपना जत्था लेकर रायबरेली गया, लेकिन नमक कानून भंग करने पर भी हम लोग नहीं पकड़े गये। मैंने उसी समय सुना कि मालवीय जी पेशावर गोलीकाण्ड की जाँच के लिये रावलपिंडी जा रहे हैं, जहाँ से वे पेशावर जायेंगे और वहाँ उनकी गिरफ्तारी अवश्य होगी। इससे पहले मालवीय जी कभी जेल नहीं गये थे। वे पहली बार सक्रिय आन्दोलन में भाग लें और मैं उनके साथ न रहूँ यह मुझे अच्छा न लगा। मैं अकेले ही यहाँ से रावलपिंडी के लिये रवाना हो गया। मालवीय जी ने रावलपिंडी में मुझे अकस्मात् देखकर कहा- "अरे तुम यहाँ कैसे"? "आपकी सेवा करने के लिये आया हूँ"”- मैंने उत्तर दिया। “"घर पूछकर आये हो या ऐसे ही भाग आये हो"? उन्होंने स्नेह से मुस्कुरा कर पूछा। ‘“आपके निकट रहने के लिये भी क्या किसी से पूछने की आवश्यकता है?" मैंने उत्तर दिया, मालवीय जी स्नेह-पूर्ण दृष्टि से मेरी ओर देखने लगे। हम लोग थोड़े दिनों तक रावलपिंडी में रहे, जहाँ का बंधा हुआ कार्यक्रम था। दिनभर हमलोग पेशावर गोलीकाण्ड के लोगों की दरखास्तें लिखा करते और मालवीय जी लोगों से बातें और परामर्श करते, शाम को उनकी कहीं न कहीं मीटिंग होती जिसमें हजारों लोग जमा हो जाते | दोपहर को जब खाना तैयार हो जाता तो मालवीय जी ऊपर आते। वे आलमारी पर रखी हुई चाँदी की छोटी थाली, कटोरी और गिलास को अपने हाथ से धो-माँज कर चौके में बैठ जाते और बगल में एक कम्बल बिछाकर मेरे साथ श्री वेंकटेशनारायण जी तिवारी बैठते, श्री गोविन्द जी हम लोगों को खाना परोसते, खाने के बाद मालवीय जी अपने बर्तन स्वयं माँज कर आलमारी पर रख देते और नीचे जाकर कुछ देर आराम करते। रात को हम चारों आदमी मैदान में तख्त पर बातचीत करते-करते सो जाते। ऐसा सादा जीवन तो मैंने किसी भी नेता का नहीं देखा। करीब दो सप्ताह बाद जब हम चारों आदमी पेशावर के लिये रवाना हुए तो स्टेशन पर तिल रखने की जगह नहीं थी। पेशावर में करफ्यू लगा था और सारा पंजाब जोश से भरा था। जैसे ही हम लोगों की ट्रेन ने अटक का पुल पार किया कि हम चारों आदमी गिरफ्तार कर लिये गये और अगले रटेशन कैम्बलपुर में उतार लिये गये। शाम तक मशीनगनों और फौजी दस्तों के बीच रखकर हम लोगों को फिर पंजाब की सरहद में छोड़ दिया गया। कैम्बलपुर में मालवीय जी को अपने से ज्यादा मेरी फिक्र सातने लगी। उन्होंने कहा, "तुम अकेले घर से इतनी दूर आकर गिरफ्तार हो गये, यह ठीक नहीं हुआ, लोग मुझे क्या कहेंगे?" मैंने कहा- "लोग यही कहेंगे कि कैसा भाग्यशाली लड़का था, जिसे देशसेवा के साथ ही साथ आपकी सेवा का भी सौभाग्य प्राप्त हो गया।" लेकिन उनकी चिन्ता तब तक दूर न हुई जब तक हम लोग फिर रावलपिंडी वापस न आ गये, मुझे अनेक नेताओं के साथ रहने का अवसर प्राप्त हुआ है लेकिन जैसा अपनत्व का भाव पूज्य मालवीय जी के हृदय में था वैसा मैंने और किसी के हृदय में नहीं पाया। रावलपिंडी में किसी दिन जब किसी सभा का आयोजन न रहता तो हम लोग मोटर पर घूमने चले जाते| एक दिन हम लोग कार से "मरी" जा रहे थे तो मालवीय जी ने सूरदास के कुछ पद गाकर सुनाये। उनका वह कोमल स्वर और उनकी वह सुरीली आवाज आज भी मेरे कानों में गूँज रही है, उन्हें संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान है यह तो मैं जानता था लेकिन वे खुद भी इतना अच्छा गा लेते हैं इसका पता मुझे उसी दिन चला। उसके बाद वे सूरसागर के एक अच्छे और संशोधित संस्करण के अभाव पर दु:ख प्रकट करने लगे। फिर थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, ‘अब तो तुम जेल चल ही रहे हो। सूरदास जी के सुन्दर पदों का एक अच्छा संकलन कर डालो। जेल में ऐसे कामों के लिये अच्छा अवसर मिलता है।" मैंने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और जेल में उस संकलन को पूरा करके उनकी सेवा में प्रस्तुत कर दिया। रावलपिण्डी से मैं उनसे आज्ञा लेकर घर वापस आया क्योंकि उनके जेल जाने में अभी देर थी और साथियों के बन्द हो जाने से मेरा जी बाहर नहीं लग रहा था। मैं वहाँ से लखनऊ आकर फौरन ही गिरफ्तार हो गया। मेरे जेल जाने पर मेरे बड़े भाई राजा अवधेश सिंह भी जेल-यात्रा की तैयारी करने लगे। मैंने यह देखकर कि उनके जेल जाने पर रियासत जब्त हो जायगी, सारा समाचार मालवीय जी तक पहुँचा दिया और भाई साहब से मैंने प्रार्थना की कि वे जेल जाने से पूर्व मालवीय जी से आज्ञा ले लें। भाई साहब जब मालवीय जी से दिल्ली-जेल में मिले तो उन्होंने उनसे कहा, ‘आपका यह निर्णय सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। इस समय देश के प्रत्येक व्यक्ति का यही कर्तव्य है। अब यदि आप मुझे अपने वंश का हितैषी समझते हैं, तो इतना मेरे ऊपर छोड़ दीजिये कि आपके जेल जाने का समय मैं निर्धारित करूँ।" भाई साहब निरुत्तर होकर लौट आये और इस प्रकार मालवीय जी ने राज्य पर आने वाले भावी संकट को निकट नहीं आने दिया। आज उनका भौतिक शरीर अवश्य पन्चतत्त्व में मिल गया है लेकिन उनकी कीर्ति अजर अमर है। कभी-कभी जब उनकी देवतुल्य मूर्ति आँखों के सामने आ जाती है तो यह सोचकर हृदय आनन्द से भर उठता है कि उनका चरण-सेवक होने के नाते मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ।

The Students of Malaviyaji can Never Speak a Lie Prof. A.D. Bohra I recall an incident which took place sometime in the late 30s which would go to pin-point the responsibility which the students of Malaviyaji have to shoulder in their life. Four of us were returning from BHU for summer vacation and, as usual, we had excess luggage on account of the books that we were carrying not so much to read during the vacation as to impress upon our parents. As bad luck would have it, during the journey from Phulera to Jodhpur, were intercepted by the Ticket Collector who found that we had excess luggage and therefore, had to pay a penalty. Since there was no way to verify the weight, we asked him to check it at Jodhpur station which was only a few hours away. During the intervening period, as can be expected from mischievous students, we managed to pass on the excess luggage to some co-passengers whom we know very intimately. On arrival at Jodhpur he found that we had no excess luggage. By then he had already issued a challan. As a consequences therefore, we had to appear before the Controller of operations, an Englishman, in his office the next day. When he did so, the Ticket Collector accused us, as we had supposed to do, of having disposed of the excess luggage. We denied the allegation. The officer very well knew that we were speaking a lie and decided to inflict a very happy penalty on us which none of us could forget in our life. What he did was to ask us where we came from. When we said we were from BHU, he suddenly enquired whether we were students of the great personality Pandit Madan Mohan Malaviya. On our nodding our heads, he immediately came out with his verdict that the students of Malaviyaji can never speak a ‘Lie’ and that it was a mistake on the part of the Ticket Collector to have charged us with the offence. When the officer asked us to go , we had no option but to hang our heads in shame and leave his office. Although his questions were very simple and so was his verdict, yet we, as students of Malaviyaji, felt ashamed of our conduct. This was a punishment much bigger than what if we had been fined with any amount. All the students of Malaviyaji carry a heavy responsibility of acting in a manner which would please him while in the heavens.

RSS Programme Opposed Shri Vithal Chaudhari Socialist Trade Union Leader Once, I think it was in 1937 a very piquant situation had arisen, and anything would have happened but for the timely intervention of Panditji and Acharya Dhruvji. As B.H.U. was a National University, guided and headed by the best and selfless personality like Mahamana, free political activities of all hues used to be its natural features. There were national resolutionaries (stamped as terrorists by alien Govt.) Arya-samajists, Communists, Socialists, Congress and various regional groups in the campus. Among them was also a strong group of Rashtriya Swayamsewak Sangh (RSS) which used to have its drill, discipline and teachings about Hinduism in the University’s amphitheatre, every evening. In that year the RSS had decided to give a grand felicitation welcome to Dr. Hedgewar, their Sarasanghchalak. Accordingly, a big 2-day programme was announced by them processions, slogans, drills, lectures; band etc. culminating in a big rally at the theatre. Socialist youth league was opposed to this. We prepared an 8-page pamphlet signed by nine leading post-graduate and engineering students and distributed them in every room of all hostels. We had requested the students to oppose the RSS demonstration as we explained that RSS was out and out a communal organization, it preached antiunity philosophy in the most provocative and Gobblesian manner. We pointed out the RSS welcomed even Hitler and his fascism and that it conceived Indian Nation to be built on these lines. It was therefore, antinational activity and to allow such demonstration may degenerate into any untoward situation. We appealed to students to join the opposition with black flags and lodge protest. Panditji and Shri Anand Shankar Dhruv, called us and tried to persuade us to give up our opposition in the name allowing a democratic right to everybody. We argued in the name of nationalism and unity; and pointed out that Indian National Congress had condemned fascism and hence we should not give any concession in the name of freedom. After arguments, and it was the longest in my life with any national leader of his stature, Panditji patted me on the back for my perhaps over enthusiasm and laughingly resolved the crisis by telling them (RSS) to abandon processions, and only to hold their rally at amphi-theatre. We agreed with it as a compromise. After all it was Panditji’s advice: he warned our enthusiastic delegation to keep cool throughout the RSS programme and avoid any provocation. I would like to mention one very touching experience. For students of today it will be hardly possible to come across such loving and blissful personality as Panditji. In the months of December-January, a season of extreme chill in Northern India, he, this old guardian used to visit boys in their rooms early morning before 7 a.m. and prevail upon them to leave their warm beds and prepare for exercise and morning studies. The students obeyed with great respect towards this rishitulya Guru. Panditji was more than mother to all, wherever and whenever he appeared. I have never seen such warmly and indisputably revered individual in my whole life; nor do I hope to see any in future. Nation is built by men like him, and so are students regenerated under them. That is why my memories go back to those days with same kind of excitement and feel that I remain struck there. I pay my deep homage to Panditji with all the ties of love and respect for him.

विश्वविद्यालय के लिए कैसे धन एकत्र किया डॉ कृष्णदत्त द्धिवेदी, बिरला जी से अधिकारी के रूप में दान लिया राजा बलदेवदासजी बिरला ने एक बार घोषणा की कि वे गंगा में किसी अधिकारी व्यक्ति को दान करेंगे I इस प्रकार दान लेना बड़ा ही गर्हित समझा जाता है I अतः कोई अधिकारी व्यक्ति दान लेने के लिए तैयार नहीं हो रहा था I मालवीय जी को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने बिरलाजी को लिखा कि मैं इस प्रकार का दान लेने के लिए तैयार हूँ I इस बात पर काशी के विद्द्त-समाज में इनकी बड़ी कटु आलोचना कि गयी, किन्तु यही अपनी बात पर दृढ़ रहे और इन्होनें निश्चित तिथि पर उक्त दान लिया I बिरलाजी ने भी मालवीय जी जैसे अधिकारी व्यक्ति के दान लेने कि सूचना मिलने पर दान की राशि काफी बढ़ा दी I उक्त दान के समय काफी भीड़ एकत्रित हो गयी और मालवीय जी के प्रति बड़ी काना-फूसी हुई I मालवीय जी ने उक्त दान लेने के साथ तुरन्त उस दान की धनराशि में अपने पास से कुछ रुपये मिलाकर, वहीँ उक्त दान काशी हिन्दू विश्वविद्द्यालय को दे दिया I इस पर उपस्थित आलोचकों के साथ ही भीड़ ने 'साधू-साधू' के नारे के साथ 'महामना जिन्दाबाद' के नारे से उनका स्वागत किया I नवाब की जूती दुपट्टे में ली इसी प्रकार की एक और घटना भी महत्वपूर्ण है I महामना एक नवाब के यहाँ विश्वविद्द्यालय के लिए चन्दा लेने गये थे I नवाब ने चन्दा देने से इंकार करते हुए कहा कि 'मैं चन्दा नहीं दे सकता I' मालवीय जी ने दो लाख चन्दा देने का प्रस्ताव रखा था, जो घटते-घटते दस रुपये तक पहुँच गया था I नवाब ने इतना देने से भी इंकार कर दिया I जाते-जाते मालवीय जी ने अन्तिम निवेदन करते हुए कहा कि 'मैं कहीं से वापिस नहीं हुआ हूँ I आपसे अनुरोध है कि कुछ तो दे दीजिए I' ऐसा कहते हुए उन्होंने अपना श्वेत दुपट्टा पसार दिया I नवाब ने झट अपने पैर का जूता उतारा और दुपट्टे में डाल दिया I मालवीय जी इस अशोभनीय घटना से जरा भी विचलित नहीं हुए और उस जूते को यत्नपूर्वक काशी लाये I काशी पहुँचकर उन्होंने समाचार-पत्रों में विज्ञापन निकाला कि 'अमुक नवाब ने विश्वविद्द्यालय के लिए मालवीय जी को अपना जूता दान दिया है, जिसको अमुक तिथि पर नीलाम किया जायगा I' इस समाचार को पढ़कर उक्त नवाब बहुत लज्जित हुआ और उनसे स्वंय आकर क्षमा माँगी और अपना जूता खासी रकम देकर वापस लिया I शव पर फेके जा रहे पैसे लुटे एक बार मालवीय जी निजाम हैदराबाद के यहाँ काशी हिन्दू विश्वविद्द्यालय के लिए चन्दा लेने गये थे I निजाम ने उन्हें चन्दा देने से साफ इंकार करते हुए कहा कि 'मैं हिन्दू विश्वविद्द्यालय के लिए चन्दा कदापि नहीं दे सकता I' मालवीय जी लौट रहे थे कि मार्ग में किसी धनाढ्य व्यक्ति का शव जा रहा था I मुट्ठी भर-भर के रुपये शव पर फेंके जा रहे थे I मालवीय जी भी वे रुपये लूटने लगे I राष्ट्रीय स्तर का नेता होने के कारण कुछ लोगों ने उन्हें पहचान लिया और कहा- 'महाराज आप महान पुरुष हैं I आपकी ख्याति सारे देश में फैली हुई है I आप यह क्या कर रहे हैं?' मालवीय जी ने कहा कि काशी जाकर मैं क्या उत्तर दूँगा कि हैदराबाद से खाली आया हूँ? मेरा संकल्प है कि मैं कहीं से खाली नहीं लौटूंगा I अतः ये रुपये विश्वविद्द्यालय के लिए हैदराबाद के नाम से जमा किये जायँगे I' यह सूचना निजाम के यहाँ पहुँची तो वे बहुत लज्जित हुए और मालवीय जी को बुलाकर विश्वविद्द्यालय के लिए पर्याप्त दान दिया I दिवालिया सेठ की साख कैसे बनी एक बार बहुत से सेठ को व्यापार में घाटा लगा I बाजार से उसकी साख जाती रही I दिवालिया होने की स्थिति पैदा हो गयी I वह महामना मालवीय जी के पास अपनी दयनीय स्थिति के सम्बन्ध में परामर्श हेतु आया I मालवीय जी ने कहा- 'आप पांच लाख रुपये का चेक हिन्दू विश्वविद्द्यालय के नाम दे दीजिए I आपकी स्थिति सुधरने पर वह चेक विश्वविद्द्यालय के खाते में जमा किया जायगा I इस दान की सूचना समाचार पत्रों में भेज दी जायगी कि अमुक सेठ ने पांच लाख रुपये का दान हिन्दू विश्वविद्द्यालय को दिया है I इससे आपकी साख जम जायगी और आप अपनी आर्थिक स्थिति सँभाल सकेंगे I सेठ आश्चर्यचकित होकर मालवीय जी को देखने लगा I मालवीय जी ने कहा- 'आप मुझसे परामर्श लेने आये हैं, फिर मेरी बात क्यों नहीं मानते ?' उस सेठ ने चेकबुक निकालकर पाँच लाख का चेक काटकर मालवीय जी को दे दिया इस समाचार के प्रकाशन से उस सेठ की साख इतनी जम गयी कि दिवाला निकलते निकलते बच गया I वह अपनी स्थिति सँभाल कर व्यापार में पुनः सफल हो गया I गांव के स्त्रियों ने अपने आभूषण दिए मालवीय जी के भाषण में ऐसी शक्ति थी कि एक दिन मालवीय जी पटना की एक सार्वजनिक सभा में बोल रहे थे I देहात की भीड़ अलग थी, इसलिए मालवीय ई देहाती भाषा में बोल रहे थे I इनका भाषण इतना प्रभावशाली था कि देहात ककी स्त्रियाँ प्रभावित होकर अपने चाँदी के जेवर छल्ले आदि मंच पर फेंकने लगीं I मालवीय जी ने बड़े प्रेम से उन्हें बटोरा और कहा कि ये आभूषण मेरे लिए लाखों रुपये के दान से अधिक मूल्यवान हैं I कोई सज्जन इन चीजों की कीमत चुकाना चाहेंगे ? इस पर एक धनी व्यक्ति ने दस हजार रुपये देकर उन आभूषणों को खरीद लिया I मालवीय जी में विलक्षण वाक्पटुता थी I

महामना मालवीय : उस दिन का वह चित्र ! डॉ वृंदावन लाल वर्मा रायबरेली जिसके एक ताल्लुकदार ने श्री गणेश शंकर विध्यार्थी के उपर ताजीरात हिन्द की दफा 500 के अंतर्गत रायबरेली के मैजिस्ट्रेट के न्यायलय में मुकदमा चलाया | ‘प्रताप’ में एक संवाददाता ने उक्त ताल्लुकेदार के विरूद्ध कुछ आरोप लगाये थे | ताल्लुकेदार ने नोटिस दिया | विधार्थी जी के एक वकील मित्र ने,जो उन दिनों सत्याग्रह आन्दोलन में भाग ले रहे थे, नोटिस का उत्तर दिए कि संवाद सही है लड़ लेंगे मुकदमा! उसने दावा दायर कर दिया | विद्यार्थी जी, श्री मैथिलीशरण गुप्त और मैं घनिष्ट मित्र थे | मुक़दमे की सलाह और पैरवी में सहायता करने के लिए मैं तैयार हो गया परन्तु पैरवी करने के लिए कोई बहुत चतुर अनुभवी वकील चाहिए था | तब मुझे वकालत आरम्भ किये छ: या सात वर्ष ही हुए थे | हम सब पंडित मोतीलाल नेहरू के पास पहुचे | उनसे बात चित की | उन्होंने कहा- मैंने तो वकालत छोड़ दी है | इलाहाबाद के फौजदारी मुकद्दमो की सबसे अच्छी पैरवी करने वाले श्री हरिमोहन राय हैं | जिरह भी कमाल कि करते है, उन्हें वकील कर लो |’ थोड़ी सी और बाते करके हम लोग ‘आनंद भवन’ लौट आये | प्रवास स्थान पर निर्णय करने कि चर्चा हुई | अंत में निश्चित किया कि काशी चल कर महामना मालवीय जी कि भी सलाह ले ली जाय | दुसरे ही दिन हम सब मालवीय जी के दर्शन करने के लिए काशी यात्रा के लिए चल पड़े | जैसे ही समय मिला हम सब उनके पास जा पहुंचे | वह तब हिन्दू विश्वविध्यालय के एक भवन में रहते थे, पलंग पर लेटे,अस्वस्थ | निर्बल हो गए थे | हम सब ने उनके चरण छुए और आशीष पाई | मैंने उनकी दर्शन पहले भी किये थे और झाँसी के ही एक बार उनका भाषण सुना था | ऐसा सुरीला कंठ शायद ही किसी व्याख्याता का रहा हो | अर्डले नौर्टन नाम का एक बड़ा प्रसिद्ध वैरिस्टर कलकत्ता में वकालत किया करता था | मालवीय जी से आयु में बहुत जेठा था | उसने मालवीय जी की सुरीली वाग्मिता और निर्भीक प्रकृति कि कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले ‘स्टेट्समैंन’ दैनिक में बड़ी प्रशंसा की थी | उस दिन याद आया कि उन विख्यात नेता, त्यागी, तपस्वी महामना से आज कुछ बाते करने का सौभाग्य प्राप्त होगा | बात चित हुई मैंने मामले का ब्योरा देकर निवेदन किया-‘इलाहाबाद के श्री हरिमोहन राय वकील से पैरवी करवाने की सम्मति मिली है, आपका क्या आदेश है ?’ उन्होंने लेटे-लेटे ही उत्तर दिया-‘बिलकुल उपयुक्त है श्री राय |उन्ही को वकील रखो, तुम कुछ लिख रहे हो आजकल ?’ मुझे आश्चर्य हुआ | यह महापुरूष क्या मुझ सरीखे कोAnchor भी अपनी स्मृति में रखते हैं ! ‘कभी-कभी छोटी मोटी कहानियाँ ही लिख पाता हूँ, पेट पालने के लिए वकालत करनी पड़ती है’-मैंने उत्तर दिया | ‘सो तो ठीक है, परन्तु अपने हिंदी पर विशेष ध्यान दिए रहना | वकालत तो बहुत लोग करते हैं | लिखते कितने हैं ?’ उन्होंने कहा | मैं चुप रहा | मालवीय जी कुछ क्षण सोचकर बोले – ‘लिखने में बहुत सफलता प्राप्त करोगे, परन्तु मैं इस समय इस विषय पर अधिक नहीं कहूँगा | मुकद्दमे की बात करनी हैं | पहली बात यह है कि वादी के नोटिस का उत्तर ठीक नहीं दिया गया | बेतुका रहा |’ नविन जी ने तुरंत प्रश्न किया-‘तो क्या उत्तर देना चाहिए था, महाराज ?’ ‘उत्तर यह देना चाहिए था कि यदि ‘प्रताप’ में संवाद गलत छपा है तो प्रतिवाद भेज दीजिये, हम प्रकाशित कर देंगे’, -- मालवीय जी न बतलाया | मैंने समर्थन किया | नविन जी बहुत भावुक थे ही | तुरंत बोले-‘हम लोग महात्मा गाँधी के सत्याग्रह मार्ग के यात्री है ऐसा उत्तर कैसे देते ?’ विद्यार्थी जी सिर नीचा किये रहे | मालवीय जी उठ बैठे और बहुत हलकी तमक के साथ उन्होंने कहा – ‘गाँधी जी मुझे अपने बड़े भाई कि तरह मानते हैं | मैं उन्हें और उनके सत्याग्रह मार्ग को अधिक अच्छे प्रकार से जानता हूँ | सत्याग्रह का अर्थ इस तरह कि भूल करना नहीं है |’ मुक़दमे के सम्बन्ध में थोड़ी देर बात चित हुई और फिर हम सब उनके चरण स्पर्श करके लौट आये | उस दिन का ओह चित्र आज भी मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ है |

महामना मालवीय जी के कुछ संस्मरण प्रोo त्रिलोचन पंत पूज्य मालवीय जी का दर्शन मैंने पहले पहल 1923 में हाथरस में किया था | मैं वहाँ के बांगला हाईस्कूल में नवीं कक्षा का छात्र था | मालवीय जी का स्कूल में भाषण हुआ था | ऊपर से निचे तक उनके शुभ्र उज्जवल वेश को मैंदेर तक देखता रहा | मृदु मुसकान-युक्त उनका कान्तिमान् मुख आज भी मेरी आखों के सामने है | वे लगभग आधा घण्टा बोले थे | भारत के गौरव मय अतीत और उसके कुछ महान् और आदर्श व्यक्तियों की उन्होंने चर्चा की थी | छात्रों से कहा था कि वे देश के भावी कर्णधार हैं | उनकी कार्य क्षमता, निष्ठा, लगन और सेवा पर देश का निर्माण निर्भर है | पराधीन देश के अभ्युदय में वे अनेक प्रकार से सहायक हो सकते हैं और अपने उज्जवल चरित्र से देश का मस्तक ऊँचा कर सकते हैं| बाधाओं, विपत्तियों, कठिनाइयों और असफलताओं से उन्हें हतोत्साह नहीं होना चाहिये | प्रतिकूल परिस्थितियों से लोहा लेने में ही मानव-जीवन की सार्थकता है | उन्होंने कहा कि हिन्दू विश्वविद्यालय की योजना का आरम्भ में अनेक व्यक्तियों ने उपहास किया था | उनके मित्रों ने उसे अव्यावहारिक बताया था और कहा कि एक करोड़ रुपया एकत्र होना असम्भव है पर वे अपने संकल्प को पुरे करने में लगे रहे | उन्हें सफलता मिली | उनकी कल्पना साकार हुई | काशी की इस शिक्षा–संस्था का द्वार सबके लिये मुक्त है | यहाँ जो भी आये, निराश न होगा | मंत्रमुग्ध की भाँति सभी ने उनका भाषण सुना था| वह भाषण कई दिनों तक मुझे याद रहा था | परिस्थितियों से हार न मानने की उनकी बात ने मुझे निश्चित रूप से मुझे प्रभावित किया | मेरे माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी | किसी अन्य सम्बन्धी का सहारा नही था | आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय थी | आगे अध्ययन करने की कोई सम्भावना नहीं थी पर उस दिन के मालवीय जी के भाषण ने मेरे मन में यह भावना अवश्य उत्पन्न कर दी कि मुझे आगे भी अध्ययन करना है और मेरी यह भावना उत्तरोत्तर बलवती होती गयी | जुलाई 1926 में मैं हिन्दू विश्वविद्यालय में ही पहुँच गया और बीo एo की कक्षा में प्रविष्ट हुआ | सन् 1930 में इतिहास में एम० ए० की परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ | इन चार वर्षों में अनेक बार मालवीय जी के दर्शन किये; धर्म, समाज, शिक्षा, राजनीति आदि अनेक विषयों पर उनके भाषण सुने पर इस अवधि में केवल एक बार उनके निकट सम्पर्क में आया और उस क्षणिक सम्पर्क को जीवन रहते मैं कभी भूल नहीं सकता | सन् 1929 की घटना है | विरला छात्रावास के ‘अ’ कक्ष के एक कमरे में रहता था | संध्या का समय था | मालवीय जी घूमते हुए उधर आ निकले | मैं कमरे के बाहर ही खड़ा था | उन्होंने मुझसे कहा कि दुर्बल क्यों दीखते हो ? क्या भोजन की ठीक व्यवस्था नहीं है या तुमको कोई और चिन्ता रहती है ? संक्षेप में मैंने अपनी बात कही पर उस थोड़ी-सी बात से ही वे सब कुछसमझ गये और मुझसे कहाकि चिन्ता से तो कुछ हाथ आयेगा नहीं | मन और शरीर को कष्ट होगा | चिन्ता को दूर भगा दो | अपने शरीर और अध्ययन का ध्यान रखो | इतना कहकर वे आगे बढ़ गये | दूसरे दिन गणित के प्राध्यापक और ‘ब’ कक्ष के संरक्षक श्री शुकदेव पाण्डे जी ने मुझे बुलाया और कहा कि कल रात मालवीय जी ने तुम्हारे बारे में मुझसे कहा था | मैं कलेक्शन कमिटी का कुछ काम तुम्हें दे रहा हूँ | आज ही से आरम्भ कर दो | इससे तुम्हारी आर्थिक कठिनाई दूर होगी | विश्वविद्यालय में मेरे सामने कई बार कठिन परिस्थितियाँ आयी थीं | पहले वर्ष में तो मैंने एक बार पढ़ाई छोड़कर चले जाने का भी विचार किया था पर मैं कभी भी अपनी क्षुद्र समस्या को लेकर मालवीय जी के पास नहीं गया था | मैं जानता था कि अनेक विद्यार्थी अपनी कठिनाइयाँ उनको बताते हैं और वे उनकी सहायता करते हैं पर उस दिन मैंने प्रत्यक्ष ही जाना कि वे कितने सहृदय हैं | मैंने उस दिन भी उनसे कोई याचना नहीं की थी पर उन्होंने मेरे अभाव को समझा और उसके निवारण में सहायक हुए | पाण्डे जी ने मेरी और भी सहायता की पर यदि मालवीय जी ने उनसे न कहा होता तो वे मेरी स्थिति न जान पाते | विश्वविद्यालय में कितने ही विद्यार्थी, जिन्होंने भिन्नभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण कार्य किये हैं और अब भी कर रहे हैं, मालवीय जी के ॠणी हैं | पैसों से, पुस्तकों से, स्नेहपूर्ण शब्दों से उन्होंने अपने विद्यार्थियों को उपकृत किया | निर्धनता के कारण कोई भी ऊँची शिक्षा से वंचित रहे, यह बात उनको अखरती थी | वे कहा करते थे कि इनमें न जाने कितने भावी साहित्यिक, कलाकार और वैज्ञानिक हैं | इनकी प्रतिभा को प्रकाश में आने का अवसर मिलना ही चाहिये | केवल विद्यार्थियों की ही नहीं, वे सभी की सहायता करते थे | सेवा और सहायता के उद्देश्य से उन्होंने सन् 1914 में प्रयाग में जिस सेवा-समिति की स्थापना की थी उसका आदर्श ही उनके जीवन का आदर्श था | राजा शिवि के, जिन्होंने अपना माँस देकर शरण में आये हुए कबूतर का प्राण बचाया था, इस कथन में वह आदर्श व्यक्त है | न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नाSपुनर्भवम| कामये दु:खतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्|| मैं राज्य की कामना नहीं करता | मुझे स्वर्ग और मोक्ष नहीं चाहिये | दुःख से पीड़ित प्राणियों के कष्ट दूर करने में सहायक हो सकूँ यही मेरी कामना है | को नु यस्मादुपायोSत्र येनाहं दु:खितात्मनाम्| अन्त:प्रविश्य भूतानां भवेयं दु:खभाक् सदा || च्यवन ऋषि का जिन्होंने जल में तपस्या करते हुए, वहाँकी मछलियों के प्राण बचाने के लिये अपना प्राण अर्पण कर दिया था, यह कथन उनके ध्यान में सदा ही रहता था | वह कौन-सा उपाय है जिसके द्वारा मैं दु:खी जनों के अंत:करण में प्रवेश कर उनके दु:ख से दु:खी होऊँ | इस श्लोक के निचे एक बार उन्होंने लिखा था कि हजारों वर्ष पूर्व एक प्राचीन ऋषि ने यह प्रार्थना की थी, यही आज मेरी प्रार्थना है | दुसरों के दु:ख का अनुभव कर ही मनुष्य उनके दु:ख को दूर करने में प्रवृत्त हो सकता है | मालवीय जी जीवन भर इन्हीं आदर्शों से अनुप्राणित रहे | उनका जीवन दुसरों के कष्टों को दूर करने के प्रयत्नों से भरा था | व्यक्ति, समाज, धर्म और देश सभी के कार्यों में उनकी यही प्रवृत्ति रही | 16 मार्च सन्1932 को मैं अनायास ही मालवीय जी की सेवा में पहुँच गया | एक दिन पूर्व मुझे मुरादाबाद में उनके कनिष्ठ पुत्र स्वo गोविन्द मालवीय जी का यह तार मिला था कि पिता जी ने तुम्हें बुलाया है, तुरन्त चले आओ| मैं उसी दिन उज्जैन से अस्थायी अध्यापन कार्य से मुक्त हो कर लौटा था और कुछ समय तक घुमने फिरने की इच्छा थी पर मैं दूसरे दिन ही मालवीय जी के समक्ष उपस्थित हुआ और उसी क्षण से ही मैं उनकी सेवा में संलग्न हो गया | उसी समय उन्होंने गोविन्द जी से कहा था कि अभी तो यह अकेले हैं | इन्हें मकान भी जल्दी नहीं मिलेगा | ये यहीं रहेंगे | इनके खान-पान का ठीक प्रबन्ध करना | दूध रोज मिलना चाहिये | इन्हें कोई कष्ट ना हो | मैं सोचने लगा कि अभी तो मैंने काम आरम्भ भी नहीं किया है और मालवीय जी को मेरी सुविधा की इतनी चिन्ता हो गयी है | पहले ही दिन उन्होंने मेरे प्रति जो आत्मीयता व्यक्त की, वह उनके जीवन के अन्तिम दिन तक बनी रही | लगभग 14 वर्षों तक मुझे उनकी सेवा का अवसर मिला | उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा और पाया | मैंने बार-बार अनुभव किया कि वे सबके आत्मीय हैं |उनकी सेवा और सहायता का क्षेत्र असीम है | इस सम्बन्ध में अपनी जानकारी की कुछ घटनाओं का उल्लेख अप्रासंगिक न होगा | सन् 1932 या सन् 1933 में मालवीय जी पुना गये थे | एक सज्जन ने एक रुग्ण बालक रघुनाथ भाऊ साहब को उसके घर पर ही जाकर देखने का उनसे आग्रह किया | बालक को घोर शारीरिक और मानसिक कष्ट था | उसके आधिक काल तक जीवित रहने की आशा नहीं थी किन्तु उसकी यह भावना थी कि मालवीय जी के दर्शन से उनको शान्ति मिलेगी | उसने स्वयं ही उनके दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी| मालवीय जी उसके घर गये, उसको सान्त्वना दी और धीरज के साथ कष्ट सहन करते हुए अपने आपको भगवान् को अर्पण करने का उसको उपदेश दिया | भागवत–कथित गजेन्द्रमोक्ष भी स्तुति द्वारा भगवान् का ध्यान करने को भी उनसे कहा बालक ने मालवीय जी के उपदेश का पालन किया और जितने दिन वह जीवित रहा, उसने अपनी पीड़ा में कमी का अनुभव किया | कष्ट सहन करने में उसे पहले जैसी कठिनाई प्रतीत नहीं हुई | उसकी माता ने मालवीय जी को एक पत्र में लिखा था कि मेरा पुत्र मृत्यु से पूर्व अपना यह सन्देश आपके लिये छोड़ गया है | “परम आदरणीय पण्डित जी ! आपके उपदेश और गजेन्द्रमोक्ष स्तोत्र के निरंतर पाठ करने का मेरे मन पर इतना अच्छा प्रभाव हुआ है कि मुझे अब न तो मृत्यु का भय है और न शरीर छोड़ने का दु:ख | मुझे शक्ति के स्त्रोत आत्मा की प्राप्ति हो गयी है और मैं अब प्रसन्न हूँ| मुझे इस संसार की असारता का ज्ञान हो गया है और अब मैं चुपचाप शान्ति के साथ इस शरीर का त्याग कर ब्रह्म में समा जाने में समर्थ हूँ | आपके उपदेश की कृपा से मैं अपने जीवन के लक्ष्य तक पहुँच सका हूँ”| पत्र में माता ने यह भी लिखा था कि आपका परम शिष्य अन्तिम क्षण तक गजेन्द्रमोक्ष–स्तुति का पाठ करता रहा और परम शान्ति और संतोष के साथ उसने प्राण-विसर्जन किया | एक दु:खी और व्यथित बाल को मालवीय जी सुख और संतोष पहुँचा सके यह महान् पुण्य का ही कार्य है | दुसरों की सहायता की एक और घटना का भी मैंद्रष्टा हूँ |सन् तो याद नहीं है पर रात्रि के 11 बजे थे | मालवीय जी के मकान पर संगीत का आयोजन हुआ था | सभी जा चुके थे और मालवीय जी भी विश्राम के लिये जा रहे थे | उसी समय दक्षिण भारत के कुछ छात्र, जो विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, उनके समक्ष पहुँचे और कहा कि एक बालक का प्राण संकट में है | दो दिन से वह आपके अस्पताल में है | उसका मल–त्याग करना बंद हो गया है, डॉक्टरों की सम्मति में उसकी अंतड़ियों में गाँठ पड़ गयी है और कल उसका आपरेशन करने का उन्होंने निश्चय किया है | आपरेशन सफल होगा यह वे निश्चित रूप से नहीं कह सकते | बालक एडमीशन परीक्षा देने आया है | हमारे साथ ठहरा है |उसके बचाने का आप कुछ उपाय कीजिये | मालवीय जी ने उनकोआश्वस्त किया और तुरन्त डॉक्टरों को बुलाया और पूछा कि आपरेशन के अतिरिक्त क्या और कोई उपाय बालक को रोग-मुक्त करने का नहीं है? उन्होंने कहा कि आयुर्वेद और ऐलोपैथी दोनों ही औषधियों का वे प्रयोग कर चुके हैं | कोई प्रभाव रोगी पर नहीं हुआ है | कल आपरेशन करना ही होगा | बचने की आशा पाँच प्रतिशत ही है | मालवीय जी ने उसी समय अपने एक सम्बन्धी होमियोपैथी के डॉक्टर श्री दिवस्पति भट्ट को नगर से लाने के लिये मोटर भेजी | वे आये और अस्पताल में रोगी को देखा | उन्होंने 24घण्टों तक आपरेशन न करने का अनुरोध किया और यह आशा व्यक्त की कि उनकी औषधि से लाभ होगा | मैंने ही उनकी दवा लाकर रोगी को दी और पहली खुराक स्वयं ही खिलायी | दुसरे दिन सुभ 10 बजे रोगी ने मल-त्याग किया और शाम तक सभी उसकी ओर से निश्चिन्त हो गये और यह भी अस्पताल में चला गया | अर्द्धरात्रि के उस पहर में मालवीय जी उन विद्यार्थियों से दुसरे दिन आने के लिये कह सकते थे पर उन्होंने परिस्थिति की गुरुता को समझा और रोगी को तुरन्त सहायता पहुँचाई | सुबह तक उसकी हालत और भी ख़राब हो सकती थी | सन् 1934 की जनवरी के अन्तिम सप्ताह में बिहार में भयंकर भूकम्प हुआ | कई नगर ध्वस्त हुए और प्रान्तवासियों की अपार हानि हुई| भीषण दुर्घटना का समाचार पाते ही मालवीय जी नेदेश से सहायता की अपील की और स्थान-स्थान से प्राप्त धन राशी बाबू राजेन्द्रप्रसाद जी को भेजी | कुछ समय बाद स्वयं भी कई स्थानों पर गये और व्यथित व्यक्तियों को सान्त्वना दी | भूकम्प-पीड़ित व्यक्तियों की चिन्ता में वे अपना धर्म-कर्म भी भूल गये | 30 जनवरी को चन्द्रग्रहण हुआ था | सनातनधर्मी ग्रहण–काल में जप और पाठ करते हैं | मालवीय जी जप करेंगे, इस विचार से उनके सेवक मूड़ी ने चौकी, माला और पुस्तक यथास्थान रख दी थी और स्वयं गंगास्नान करने चला गया था पर मालवीय जी के सामने भूकम्प का प्रलयंकर दृश्य था, कुछ समय पूर्व ही बाबू राजेन्द्रप्रसाद जी से फोन पर बात कर चुके थे | मुझसे कहा कि लिखो- देशवासियों से अपील की कि नित्य ही बिहार में भूकम्प-पीड़ितों के लिये द्रव्य संग्रह करो | अगले रविवार को बिहार दिवस मनाओ| गउओं–पशुओं की रक्षा करो | जो सहायता अब तक दी गयी है वह संतोषप्रद है पर अधिकाधिक प्रयत्न होना चाहिये.... पूरा लिखा कर पढ़ने को कहा | एक बार, दो बार, पाँच-छ: बार सुना | नींद आने लगी | मैंने कहा आप जप कर लीजिये | चन्द्रमा का मोक्ष हुआ ही चाहता है | मालवीय जी के मन में भूकम्प व्याप्त था | जप न कर सके पर अपील पूरी लिखा दी और अगले दिन वह समाचारपत्रों में प्रकाशित हो गयी| उस दिन ही टाउनहाल में एक सभा हुई| श्रीप्रकाश जी और संपूर्णानन्द जी ने मुँगेर और मुजफ्फरपुर आदि की दुर्दशा का हाल सुनाया | मालवीय जी ने भी सहायतार्थ अपील की | लौटते हुए ग्रहण की चर्चा चलाने पर उन्होंने कहा था ‘मेरे जीवन में ऐसा कदाचित् ही हुआ है कि मैंने ग्रहण के अवसर पर जप और पाठ न किया हो पर कल तो भूकम्प की ही चिन्ता रही और जप-पाठ न कर सकने का मुझे कोई दु:ख नहीं है |’ ताo 5 सितम्बर 1935 को पशुबलि-प्रथा के विरोध में जयपुर राज्य के पण्डित रामचन्द्र शर्मा वीर ने कलकत्ता में आमरण अनशन किया था और यह आन्दोलनदेशव्यापी हो गया था | स्थान-स्थान से सहायता और समर्थन के संदेशवीर जी को मिले थे पर कलकत्ता के कालीमन्दिर के प्रबन्धकों पर कोई प्रभाव नहींपड़ा था | अनशन के 28वें दिन वीर जी की दशा चिन्ताजनक हो गयी थी | वजन 30 पौंड घट गया था | वीर जी के पिता, भक्त, सेवक सभी चिन्तित थे | वीर जी के प्राणों की आहुति किसी को भी अभीष्ट न थी | कुछ व्यक्ति मालवीय जी के पास पहुँचे और उनसे वीर जी के प्राण बचाने का अनुरोध किया | अनशन के 30वें दिन 4 अक्टूबर को सुबह 8 बजे मालवीय जी वीर जी के स्थान पर पहुँचे और मृतप्राय, अत्यन्त दुर्बल, अर्द्धनिद्रित वीर जी को जगाकर गंगाजल से स्वयं उनका मुख धोया और उन्हें ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ सुनाया | मालवीय जी कालीघाट मन्दिर गये और सेवाभक्तों से बात की | पचास वर्ष पूर्व मालवीय जी इसमन्दिर गये थे | वहाँ पर होनेवाली पशुबलि देखकर उन्होंने जीवन भर वहाँ न जाने की प्रतिज्ञा की थी पर वीर जी की जीवन-रक्षा के लिये उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी | वह उस दिन रात्रि को फिर वीर जी से मिले थे और दो घण्टे तक उनसे बात करते रहे थे, मार्ग में कालीमन्दिर के सेवाभक्तों से दुबारा बात कर लगभग 12 बजे अपने निवासस्थान बिरला पार्क लौटे थे | वीर जी का अनशन चलता रहा | स्वo रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी अनशन त्यागने के लिये वीर जी को लिखा | 6 अक्टूबर को कलकत्ता में माहेश्वरी भवन में एक विराट सभा हुई | मालवीय जी ही उस सभा के अध्यक्ष थे | कुछ नवयुवकों ने कालीघाट-मन्दिर में पशुबलि का खूंटा उखाड़ने का निश्चय किया था | इससे हिंसा फैल सकती थी | मालवीय जी ने रोष में कोई हिंसात्मक कार्रवाई न करने की अपील की और यह आशा व्यक्त की कि वे वीर जी का अनशन स्थगित करा देंगे | सभा के बाद रात के 8 बजे मालवीय जी वीर जी के पास तीसरी बार गये | उन्होंने एक वर्ष तक अनशन स्थगित रखने का उनसे अनुरोध किया और कलकत्ता के कई प्रतिष्ठित पुरुषों का प्रार्थना–पत्र उनको दिया और कहा कि इसको आप पढ़ लीजिये | आपको विश्वास हो जायगा कि आप उपवास स्थगित करके धर्म की अधिक सेवा कर रहे हैं | अपनी व्यवस्था भी उन्होंने वीर जी को दी | व्यवस्था में उन्होंने लिखा था ‘नैतिक और धार्मिक सभी दृष्टियों से ‘वीर’ के उपवास का स्थगित किया जाना वस्तु स्थिति की दृष्टि से पूर्णत: उचित है, यह मेरा निश्चित मत है |’ वीर जी ने मालवीय जी की बात मानी और उनके हाथ से लेकर मौसंबी का रसपान किया | दुसरे दिन भी मालवीय जी वीर जी के पास गये और तीन घण्टे उन्हें समझाते रहे | मालवीय जी के प्रयत्न से वीर जी की प्राण रक्षा हुई | स्वस्थ होने के बाद पशु बलि के विरोध में देश भर में वीर ने आन्दोलन किया | उन्हें सफलता भी मिली | कालीघाट की मन्दिर में पशुवध बन्द नहीं हुआ था | जून में वीर जी कलकत्ता आये और वहाँ इस हिंसक प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार करते रहे | उनके भाषणों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | 30 अगस्त से उन्होंने फिर आमरण अनशन कर दिया | 40 दिन तक यह अनशन चलता रहा, बीच में उनका मस्तिष्क भी विकृत हो गया था | मालवीय जी उनके लिये इस बार भी चिन्तित रहे पर रुग्णावस्था के कारण कलकत्ता नहींजा सकते थे | उन्होंने पंo हीरावल्ल्भ शास्त्री को उनके पास भेजा था और उन्हेंलिखा था कि जब मैं आपसे पिछले वर्ष मिला था तब आपने मुझको गुरुभाव से सम्मानित किया था | उस बात को स्मरण करके ही मैंअत्यन्त प्रेम से आपको उपदेश करता हूँ कि आप अनशन-व्रत को समाप्त कर दें | भागवत-कथित ध्रुव की कथा सुनने का भी उनसे अनुरोध किया था और कथासुनानेके उद्देश्य से भी शास्त्री जी को भी उनके पास भेजा था | अनशन के 40वें दिन रात्रि के प्रथम प्रहर में मालवीय जी का पत्र वीर जी को सुनाया गया था | कलकत्ता के कई गण्यमान्य व्यक्ति भी अनशन समाप्त करने की प्रार्थना लेकर वहाँ उपस्थित थे | वीर जी के मन में यदि कुछ हिचकिचाहट रही होगी तो मालवीय जी के पत्र से उन्हें बल मिला होगा | सबका आग्रह देखकर उन्होंने नीबू का रस लेकर 9 बजे अनशन भंग किया था | सन् 42 की क्रान्ति के दिनों में जब सरकार की कठोर और उग्र दमन-नीति के कारण नेता और पथ-प्रदर्शक कारागारोंमें बन्द कर दिये गये थे और देशवासी नौकरशाही की नग्न पाशविकता से त्रस्त थे,उस समय स्वयं घूम फिर सकने में असमर्थ होते हुए भी मालवीय जी ने अर्थसंग्रह कर पड़ोसी जिलों के कितने ही परिवारों को सहायता पहुँचाई थी | मानपुर के भूदेव जी को उन्होंने कई बार इसी उद्देश्य से बलिया भेजा था | सन्42 में बलिया जाना और वहाँ से सकुशल लौट आना चमत्कार ही माना जाता था, उन दिनों मालवीय जी निराश व्यक्तियों की आशा और निराश्रितों के आश्रय थे | वे चाहते थे कि वे स्वयं पीड़ित व्यक्तियों के बीच में पहुँच कर उनकी सहायता करें किन्तु 82 वर्ष की अवस्था में उनके दुर्बल शरीर ने उन्हें असमर्थ कर दिया था | फिर भी घर बैठे ही उन्होंने पर्याप्त सहायता भिजवाई थी | मैंने कुछ घटनाओं का ही यहाँ उल्लेख किया है | उनका जीवन ऐसी कितनी ही घटनाओं का भण्डार है | उनका संग्रह किया जाय तो एक अच्छी खासी पुस्तक तैयार हो जायगी | मालवीय जी के पास से कदाचित् ही कोई निराश लौटता था | ऐसे ही व्यक्तियों के लिये कहा गया है- धन्य: स एको भुवि मानवानां स उत्तम: पुरुष: स धन्य:| यस्यार्थिनो वा शरणागता वा नाशाभिभन्गाद्विमुखा: प्रयान्ति || संसार में मनुष्यों में वही पुरुष उत्तम है, वही धन्य है जिसके द्वार से अर्थी और शरणागत विमुख नहीं लौटता है | मालवीय जी ने देश और समाज के अभ्युदय के लिये जीवन भर अनेक कार्य किये पर सेवा और सहायता के कार्य ही उनके सर्वश्रेष्ठ कार्य माने जायेंगे | सेवा के सम्बन्ध में उन्होंने जो विचार व्यक्त किये हैं, वे जानने, मनन करने और व्यवहार में आने योग्य हैं |उनका उल्लेख कर देना उचित प्रतीत होता है |उन्होंने लिखा था- ‘अपनी इच्छा से—बिना किसी प्रकार के बन्धन व स्वार्थ के दीन–दु:खी प्राणी की सेवा करना इससे परे क्या यज्ञ है, क्या तप है, क्या दान है,क्या सुख है | असहाय प्यासे को पानी, भूखे को अन्न,शीत से सताये हुए को वस्त्र देना, जले हुए के घाव पर मलहम लगाना, डूबते को बचा लेना, जिसके घर में आग लगी हो उसके घर भी आग बुझाना, उसके प्राणियों को आग से बचा लेना, रोगी को औषधि देकर रोग की पीड़ा से छुटा देना, अन्धों को सहारा देना, अनाथबच्चों और विधवाओं के माता, पिता, भाई बनना, मेलों में निराश बिछुड़े हुए को मिलाकर उन्हें नया प्राण देना, जो अनजान अकिंचन प्राणी विदेशों में अकेल छूट गये हैं उनको सहायता दे कर उनके घर पहुँचाना, ठग–लुटेरों और अन्यायियों से सताये जाने वालों का रक्षक होना, समाज की बिना वेतन की पुलिस बनना, शुद्ध और निष्काम सेवा करना इससे पवित्र क्या मार्ग हो सकता है, इससे अधिक क्या सुख और सौभाग्य का विषय हो सकता है | मुझे शब्द नहीं मिलते कि मैं सेवा–धर्म की महिमा और उससे उत्पन्नआनन्द का वर्णन करूँ | इसके सिवाय इस महिमा और आन्नद का पूरा ज्ञान शब्दों के द्वारा कराने की मेरी सामर्थ्य नहीं है | मेरे विचार में यह प्रत्येक प्राणी को अपने अनुभव ही से प्राप्त हो सकता है |’ सेवा कार्य के लियेही उन्होंने पंo मूलचन्द मालवीय और पंoहृदयनाथ कुंजरू के सहयोग से प्रयाग में सेवा समिति की स्थापना की थी | समिति ने शीघ्र ही अखिल भारतीय रूप धारण कर लिया था और अपने जीवन काल से देश के भिन्न-भिन्न भागों में समिति सेवा के पवित्र और महत्त्वपूर्ण कार्य में संलग्न है | मालवीय जी का जीवन त्याग, तपस्या और साधना का जीवन था | ‘स्व’ की उन्होंने कभी चिन्ता न की, परहित, समाजहित और देशहित के कार्यों में उन्होंने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया | उनके विचार और कार्य सदा ही जन-मानस को शुभ कार्यों की प्रेरणा देते रहेंगे |

आरती की आरती डॉo शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ देखते-देखते काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की हीरक जयंती का भी पर्व आ गया| आज से 10 वर्ष पूर्व उसकी स्वर्ण जयंती में भी सम्मिलित होने का सौभाग्य मुझे सुलभ हुआ था, पर इस क्रम में आज से 35 वर्ष पूर्व की रजत जयंती की स्मृति आनायास ही उमड़ आई| प्रातः स्मरणीय पo मदन मोहन मालवीय का वह अंतिम संकल्प था| वह विश्वविद्यालय के लिए ही नहीं राष्ट्र के लिए भी युगांतर की बेला थी| कारण, बसंत पंचमी फरवरी 1942 में उनका आयोजन हुआ था और ठीक 6 महीने बाद अगस्त 1942 में गाँधी जी का ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन छिड़ गया था। महात्माजी की महामना से वह अंतिम भेंटथी। जब मैंने जुलाई सन् 1937 में एम.ए.हिन्दी में प्रवेश लिया था तब तोमहामना ही हमारे उपकुलपति थे|उनका वह सौम्य वेष,लगभग 5फीट5 इंच की कसी हुई शरीर यष्टि,गौर वर्ण, प्रदीप्त मुखमण्डल,श्वेत अंगरखा, श्वेत अंतरवासक,श्वेत उत्तरीय,श्वेत पगड़ी,मस्तक पर चंदन का श्वेत टीका और वाहन के रूप में श्वेत मोटरगाड़ी भी। मैंने अपने जीवनमें ऐसा भव्य मनमोहक व्यक्तित्व नहीं देखा। भाषा के समय गंगोत्री के झरने सी तरल-सरलवाणी नैसर्गिक आशीष सी दूधिया मुस्कान| दिल भी उन्होंने शहंशाहों का पाया था। संतरणके लिए तरणताल बनाने की सूझी तो आधी मील लंबी पक्की नहर ही बनवा दी,विश्वविद्यालय परिसर के चारों ओर परकोटा और गोपुर के लिए भी लाखों की योजना। प्रवेशद्वार भी पुरुरवा के प्रासाद के तोरण की याद दिलाने वाला, जिस पर प्रात: संध्या शहनाईऔर नगाड़े का स्वर मधु गुंजित हो सके।उत्सवों और पर्वों पर उसका आयोजन भी होताथा। संध्या समय प्राय: वे परिसर की एक परिक्रमा करते थे। कभी-कभी नहर के पास कारसे उतर कर टहलने लगते,वहाँ विश्वनाथ मंदिर बनाने की उनकी कल्पना थी,जो अब साकारभी हो गई है। उस समय कोई प्रोफेसर या विद्यार्थी मिल जाता तो उससे नहर में नहाने काआग्रह करते। अध्यापक विद्यार्थी दोनों उनके आदेश का पालन कर धन्य होते। कभी-भी ऐसालगा ही नहीं कि वे हमारे कुलपति हैं,सदा यही भावना होती थी कि परिवार का पिता अपनेप्रगाढ़ वात्सल्य से हमें उपकृत कर रहा है। कण्व, गौतम और सांदीपनि की परम्परा याद होआती। उनका वह क्षीरसागरी उल्लास देखकर बार-बार अंतर्मन बुदबुदा उठता था कि जब तकतुम जीवित हो तब तक हम विद्यार्थी अनाथ नहीं हैं। हिन्दी विभाग में भी उस वर्ष हिन्दी केअध्वर्यु बाबू श्यामसुन्दर दास ने अवकाश प्राप्त ही किया था और स्वनामधन्य पंo रामचन्द्रशुक्ल अध्यक्ष के पद पर आसीन हुए थे। उस समय के विश्वविद्यालय का वातावरण हीनिराला था। जिस ओर भी दृष्टि जाती, तपःपूत चरणचिन्हों के उभार दिखाई पड़ते। कलामहाविद्यालय के प्राचार्य रंगास्वामीआयंगर, अंग्रेजी विभाग के अध्यापक डॉo नाग,राजनीतिविभाग के डॉo गुरूमुख निहाल सिंहऔर डॉo पुनताम्बेकर, प्राचीन इतिहास एवं संस्कृत विभाग में डॉoअल्तेकर,दर्शन विभाग में डॉ0 अधिकारी,डॉo मित्रा और डॉ0अत्रे, हिन्दीविभाग में भी आचार्य शुक्ल के अतिरिक्त आचार्य केशवप्रसाद मिश्र,डॉo पीताम्बरदत्त बडथ्वाल आदि। महिला महाविद्यालय में मानद प्राध्यापक के रूप में अयोध्या सिंह उपाध्याय‘हरिऔध’और सबसे अधिक ऋषितुल्य ‘डे’बाबा। अभियांत्रिकी महाविद्यालय के प्राचार्य केरूप में उस समय फिलपाट नामक अंग्रेज सज्जन थे। इसी प्रकार संस्कृत महाविद्यालय औरविज्ञान महाविद्यालयों में राष्ट्र के चोटी के विद्वान् समासीन थे जिसका समयाभाव से उल्लेखकर पाना इस समय संभव नहीं प्रतीत होता। विश्वविद्यालय की रजत जयंती के पूर्व महामना ने देश-विदेश के प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री डॉo सर्वेपल्ली राधाकृष्णन् को अपना उत्तराधिकारी बनाया था। महामना की आंतरिक कामनाथी कि यह रजत जयंत्युत्सव अपने ढंग का अनुपमेय हो। इसीलिए उनके व्यक्तिगत आग्रहस्वरूप देश-विदेश के विश्रुत विद्वान्, कुलपति,राजे-महाराजे और ऐश्वर्यशाली व्यक्तित्व एकमंच पर लाए जा सके। उनका प्रभविष्णु व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा सामासिक था कि यह पर्वभारत की अनेकता का ज्योतिर्मय बिम्ब बन गया। एक ओर बड़े-बड़े धर्माचार्यों के प्रवचन,दूसरी ओर सर सी. वी. रमण का स्लाइड के साथ भाषण,तीसरी ओर पं0 ओंकारनाथ ठाकुरके निर्देशनमें कामायनी का संगीत रूपक और चौथी ओर महाराज कुमार विजयानगरम केसंयोजन में क्रिकेट के सर्वोच्च खिलाड़ियों का क्रीड़ा प्रदर्शन| ऐसा वैविध्य और उन्मेष तोफिर इस प्रांगण में देखने को नहीं मिला। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि महामना ने इस महोत्सव के मुख्य अतिथि के रूपमें महात्मा गाँधी को आमंत्रित किया था। महात्माजी के कारण उस समय की कांग्रेस कीमहासमिति के सदस्य पं0 जवाहर लाल नेहरू,सरोजिनी नायडू, वल्लभभाई पटेल, मौलानाअबुल कलाम आजाद,आचार्य कृपलानी,डॉ0 जाकिर हुसैन आदि महारथियों के दलविश्वविद्यालय के प्रांगण में जिस ओर भी निकल जाते थे कौतूहल का समा बँध जाता था।महामना की वंदना के लिए जिस प्रकार राजे महाराजे,सेठ साहूकार,राजनीतिज्ञ, शिक्षाशास्त्री उमड़ पड़े थे। उनके राजर्षि वेष का प्रभामण्डल कुछ ऐसा प्रभासित हो उठा कि बार-बार राजर्षिजनक के प्रति सीता-माता की उक्ति सर्वांश में सार्थक-सी प्रतीत हो उठती थी। पितु बैभव बिलास मैं दीठा। नृप मणि मुकुट मिलित पदपीठा।। इस महोत्सव का विस्तृत वर्णन तो समय की अपेक्षा रखता है। इस समय केवल एकछोटी-सी घटना का उल्लेख कर मैं अपनी मातृ संस्था के मुकुट में जड़े हीरक की आरतीउतारने का उपक्रम मात्र कर रहा हूँ। महामना के परमप्रिय पौत्र स्वo श्रीधर मालवीय कासहपाठी होने के कारण मेरा मंदिर में प्रवेशसहज हो गया था और यदा-कदा अपनी टूटी-फूटी रचनाओं द्वारा उनके मनोरंजन का सुयोग भी सुलभहो जाता था। उस समय की हमारीमित्रमण्डली में इतिहास के नवोन्मेषी युवा विद्वान् डॉoभगवतशरण उपाध्याय,राजबलीपाण्डेय,नेपाल के भूतपूर्व प्रधानमंत्री बी. पी. कोइराला,कम्युनिस्ट पार्टी के उत्सर्गशील नेतारुस्तम सैटिन,भागलपुर विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति देवेन्द्र प्रसाद सिंह, समाजवादीपार्टी के गुरुदेवशरण,राजस्थान के भूतपूर्व गृह-सचिव विष्णुदत्त शर्मा आदि थे। अखिलभारतीय कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष श्री बरुआ भी इसी मित्रमण्डली के सदस्य थे पर वे मुझसेएक दो वर्ष सीनियर थे। एक दिन अनायास ही महामना ने मुझे बुलवाकर कहा कि रजतजयंती के अवसर पर एक समवेतगान लिखकर लाओ। वैसे विश्वविद्यालय के कुलगीत केरूप में स्व0 शांतिस्वरूप भटनागर का “मधुर मनोहर अतीव सुन्दर ये सर्वविद्या की राजधानी”तो लोकप्रिय था ही पर मुझे तो महर्षि मालवीय के आदेश का पालन कर स्वयं को धन्य करनाथा। मैंने एक तुकबंदी तैयार ही कर डाली कुछ ऐसा संयोग हुआ कि बसंतपंचमी के दिनजब महात्माजी प्रात: 8 बजे के लगभग महामना से मिलने गए तो उन्होंने मुझे बुलवा भेजा।पहुँचते ही स्व0त्रिलोचन पंत जो महामना के मुख्य सचिव थे,सीधे मुझे उसी कक्ष में लेगए जिसमें आजकल उनके बंगले के मुख्य द्वार की दाईं ओर महामना का चित्र रखा हुआ है। मैंने भावावेश में दोनों महापुरुषों के चरणों में मस्तक रख दिया। महामना ने मेरा कोई परिचय दिये बिना ही महात्माजी को उक्त समवेत गान सुनाने का आदेश दिया। मैं तोआत्मविभोर हो दोनों महापुरुषों को इतने निकट देखकर मंत्रमुग्ध सा खड़ा था,अतएव घबड़ाई हुई आवाज में जल्दी-जल्दी कविता पढ़ने लगा- हमारा विश्वविद्यालय,हमारा विश्वविद्यालय हमारे ध्यान का मंदिर हमारे ज्ञान का मंदिर बसा गंगा किनारे विश्व के सम्मान का मंदिर उठी बज बीन विणापाणि के नव-ताल-स्वर-लय मय | हमारा विश्वविद्यालय,हमारा विश्वविद्यालय महात्माजी ने अर्ध निमीलित नयनों से सिर हिलाया। जैसे ही मैंने दूसरा छंदपढ़ा किमहामना ने कहा कि इस छंद को निकाल दो। यह ठीक नहीं है। मैं हतप्रभ हो गया पर इसीक्षण बापू ने बड़े विनोदी भाव से कह दिया कि “यह नहीं निकल सकता,यह नहीं निकल सकता”। ऐसा नहीं था कि दोनों में से किसी ने मुझे श्रेष्ठ कवि बनने का आशीर्वाद दे दियाहो पर मैं अपने भाग्य पर स्वयं ईर्ष्या कर रहा था कि विश्व के दो महानतम महापुरुषोंकोकविता सुनाने का यह सुयोग सुलभ होना मेरे कितने बड़े पुण्य का परिचायक है। जिस छंदपर दोनों में थोड़ी सी बतकही हुईं, वह था- हुआ युग धर्म का बंदा फिरा दर दर किया चंदा खड़ा होकर दिया उसने पुन: भारत का नालंदा। हमारे विश्वकर्मा की,हमारे मालवी की जय हमारा विश्वविद्यालय,हमारा विश्वविद्यालय। इसके बाद जल्दी-जल्दी सारी कविता पूरी कर मैंने पुन: दोनों के चरण स्पर्श किए।मालवीय जी ने वात्सल्यस्निग्ध नैनों से मुझे जाने का संकेत किया और मैं खोया-खोया-सा बाहर निकल गया। बाद में जब कुछ प्रकृतिस्थ हुआ तो ख्याल आया कि उस छंद में महामनाकी प्रशंसा आ गई थी,अतएव उतना अंश निकलवा देना चाहते थे। आजकल हमारे शीर्षस्थनेतागण अपने अभिनंदन में बड़े आग्रह से स्वागत गीत लिखाते हैं अथवा सुनकर पुलकितहो उठते हैं। यह कविता रजत जयंती उत्सव की स्मारिका के अंतिम पृष्ठ पर मुद्रित है जिसकासंपादन अभियांत्रिकी महाविद्यालय के युवक व्याख्याता गोविन्दवल्लभ पंत ने किया था। बादमें तोदो महर्षियों के बीच की यह क्षणिक नोंक-झोंक विद्वानों की चर्चा का विषयबन गई। इस महोत्सव में वाइसराय के प्रतिनिधि और विदेशी विद्वानों के उपस्थित रहने पर भी महात्माजीने अपना दीक्षांत भाषण हिन्दी में दिया था। प्रारम्भ में कुछ आवाजें अंग्रेजी की आई पर युगदेवता की दीपशिखा सी आस्था उन झंकोरों के बीच अचंचल बनी रही। इसके पूर्व भीजब एक बार महामना के जन्म दिवस मैंने लिखा था- हे राजर्षि महर्षि दीन माता के भव्य पुजारी। तोहमारे आराध्य देव ने काफी देर तक मुझे राजर्षि और महर्षि का अंतर समझाते हुए स्नेहसिक्तझिड़की से कृतार्थ किया था। मैं रजत जयंती के इस सतत प्रज्वलित स्मृति दीप से हीरक जयंतीके ज्योतिर्मय कलश की आरती उतारता हूँ। इत्यलम्|

महामना मालवीयजी के जीवन के कुछ संस्मरण प्रोफ एस एस गैरोला इलाहाबाद में हिन्दू बोर्डिंग हाउस मालवीय जी का प्रथम बड़ा कार्य इलाहाबाद में २०० कमरों का “हिन्दू बोर्डिंग हाउस”(छात्रवास) था | इस कार्य में सर सुन्दर लाल ने बड़ी सहायता की | मालवीय जी की वाणी में बहुत आकर्षण था | श्री एस. दास एक स्कूल में अध्यापक थे | वे लिखते है कि एक दिन मालवीयजी उनके पास आये और कहा कि आप २०००/- हिन्दू बोर्डिंग हाउस के लिए दीजिये ताकि एक कमरा आपके नाम से बन सके | श्री एस. दास लिखते हैं कि मैंने तुरन्त २०००/- का चेक लिख दिया | पीछे सोचा कि क्या एक अध्यापक का इतना सामर्थ्य है कि वह २०००/- दान एक साथ दे सके | अत: उन्होंने उस अध्यापक से यह दान किश्तों में लिया| दया और त्याग की मूर्ति मालवीय जी में दया और सेवा भाव भी बहुत था | श्री शिवराम पाण्डे लिखते हैं कि एक बार सड़क के किनारे एक कुत्ता बहुत चिल्ला रहा था उसके कान में चोट लगी थी और अब उसमें कीड़े पड़ गये थे | मालवीय जी ने जब यह देखा तो वे पांडे जी के पास आये और पुछा कि कान में क्या दवाई लगाई जाय ताकि उसकी पीड़ा दूर हो जाये | दवाई लाकर एक लंबी लकडी से कुत्ते के कान में दवाई लगाई | कुत्ता जोर से भूंका और फिर सड़क के किनारे सो गया | मालवीयजी में अतीव त्याग भावना थी | १९०५ में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन बनारस में हुआ | श्री गोखले इस अधिवेशन के अध्यक्ष थे | कांग्रेस अधिवेशन बंबई हाईकोर्ट के जस्टिस सर नारायण चन्दावरकर अधिवेशन में आने वाले थे ! उनके ठहरने की उचित व्यवस्था नहीं हो सकी थी| जब मालवीय जी के सामने ये प्रश्न आया तो उन्होंने अपने खेमे से सामान बाहर निकाल कर एक पेड़ के नीचे चादर का परदा डालकर रख दिया और अपना खेमा श्री चन्दावरकर को दे दिया | औद्योगिक विकास की वह ऐतिहासिक रिपोर्ट मालवीयजी औद्योगिक विकास आयोग के सदस्य थे | उन्होंने १९१७ में आयोग की रिपोर्ट में अपनी असहमति व्यक्त की और अपने रिपोर्ट में लिखा कि औद्योगिक उन्नति के बिना भारत कोई उन्नति नहीं कर सकता है | फलस्वरूप मालवीयजी ने “बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी“ में भारत का सर्वप्रथम इंजीनियरिंग कालेज खोला | इस कालेज के कुछ स्नातक नये इंजीनियरिंग कालेजों के प्रिंसीपल हुए और अधिकतर रेलवे और बिजली संस्थानों में नियुक्त हुए और उन्होंने सफलता के साथ अपना कर्तव्य निभाया | स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज इंजीनियर इंग्लैंड चले गये और सोचा कि भारतीय इंजीनियर काम नहीं संभाल सकेंगे | परन्तु बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के स्नातक और अन्य इंजीनियरों ने बड़ी कुशलता से संभाला और नई नई शाखाएं खोली | तब लोगों को मालवीयजी की दूरदर्शिता का ज्ञान हुआ | अंग्रेजी कविताओं का ज्ञान १९१९ में जब चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे मालवीयजी ने रौलेट एक्ट पर बहुत प्रभावी भाषण दिया | जलियांवाला बाग में जनरल डायर ने अत्यंत भयंकर नरसंहार किया | सर जेम्स टोमसन उस समय दिल्ली के चीफ़ कमिशनर थे | वह बहुत समर्थ वक्ता माने जाते थे | उन्होंने रौलेट एक्ट, जिसमें पुलिस को अधिकार दिया जाना था, के पक्ष में ‘मिलटन’ का लिखा एक छन्द सुनाया | मालवीयजी ने उसी कवि की उसी कविता से एक दूसरा छन्द सुनाकर सर जेम्स को पराजित किया | सर्वधर्म समभाव कुछ लोगों का कटाक्ष था की मालवीयजी हिन्दुओं के पक्षपाती और मुसलमानों के द्रोही थे | यह सरासर भ्रामक है | मालवीयजी हिन्दुओं की उन्नति चाहते थे पर किसी दूसरे धर्मावलम्बी की अवनति नहीं चाहते थे | १९३२ में सर मिर्जा इस्माइल जो मैसूर के दीवान थे लिखते है: “My meeting with Malviyaji proved quite an experience. Some people have shown him anti-Muslim. A conversation with him showed how untrue was this description of such a personality. Pandit Malviyaji was Indian first and last. महामना मालवीयजी को बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी के लिए नवाब रामपुर और निज़ाम हैदराबाद ने एक एक लाख रुपये अनुदान दिये | ये दोनों मुसलमान शासक थे | जी.के. नरिमन लिखते हैंकि १५०० शताब्दी से पारसी हिन्दुस्तान में रह रहे हैं पर हिन्दू व्यापारियों से कोई मतभेद नहीं रहा | दोनों समुंदायों में बहुत उत्तम मेल रहा है | हिन्दू विश्वविद्यालय में पारसी विद्यार्थियों को कभी यह आभास नहीं हुआ कि किसी ने उनसे भेदभाव किया | मालवीयजी ने राजपूताना होस्टल में एक बड़ा हाल सिख गुरुद्वारा को दिया, जिसमें समय समय पर सिखों के भजन-कीर्तन और पूजा पाठ होते रहे | ये उदाहरण बतलाते है कि मालवीयजी दूसरों के धर्म का आदर करते थे | कचहरियों में हिन्दी लिपि मालवीयजी चाहते थे कि नागरी लिपि में हिन्दी भाषा की उन्नति हो | संयुक्त प्रान्त में पहिले अदालत तथा सरकारी विभाग में कोई नागरी लिपि में आवेदन पत्र नहीं दे सकता था | मालवीयजी के प्रयास से नागरी लिपि का प्रयोग अदालतों और सरकारी विभागों में स्वीकार हो गया | सर एम. विश्वेशरैय्या लिखते है कि मालवीयजी ऐसे व्यक्ति थे जो अपने लिए धन और आराम की इच्छा नहीं करते थे| यद्धपि दोनों उनको आसानी से मिल सकते थे | उनको गरीब और दुखी की सहायता भाती थी | वह सब युवकोंको सैनिक शिक्षा के पक्षपाती थे, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे देश की रक्षा कर सकें | महात्मा गांधी के ‘बड़े भाई’ महात्मा गांधीजी मालवीयजी का बहुत आदर करते थे, यद्धपि कुछ मामलों में उनमे मतभेद था | महात्मा गांधी जी मालवीयजी को अपना बड़ा भाई मानते थे | मालवीयजी में अदभुत सहनशीलता थी | श्री वेंकटेश नारायण तिवारी लिखते हैं कि एक समय वह मालवीय जी के पास बैठे थे | उस समय काशी के एक बड़े विद्वान मालवीयजी के पास आये | वे अत्यन्त क्रोधित थे | कुछ समय पहले मालवीयजी ने उन पंडित से अनुरोध किया था कि वह अपने क्रोधपर काबू करें | एक दिन पंडित जी ने मालवीय से कहा “महाराज” अब मैंने अपने क्रोध पर काबू कर लिया है |आप मुझे सौ गालियां दीजिए, मुझे क्रोध नही आयेगा | मालवीयजी ने कहा “पंडित जी आपने बहुत अच्छा किया कि अपने क्रोध पर काबू कर लिया , पर आपकी परीक्षा लेने के लिए मैं अपनी वाणीका दुरूपयोग क्यों करूं ? जब किंग ने आधे वेतन पर काम करना स्वीकार किया १९३२ में मालवीयजी जेल में थे | वहां उनके स्वास्थ्य में काफी गिरावट हो गई | भारत में अंग्रेजी सरकार ने मालवीयजी को त्यागपत्र देने को कहा | उस समय भारत सरकार बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को ३ लाख रुपया सहायता देती थी | वह सहायता सरकार ने बन्द कर दी | उस अवसर पर विश्वविद्यालय के सब अध्यापकों ने अंग्रेज़ प्रिंसिपल किंग सहित लिखित निवेदन मालवीयजी को दिया कि वे आधे वेतन या जो कुछ मालवीयजी निश्चित करें, उसी पर सेवा करने को राज़ी है | छात्रों को आशीर्वचन मालवीयजी ने २१ जनवरी १९२० को विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह के अवसर पर छात्रों को शिक्षा दी : “Speak truth , think truth, fear only to do that is ill and ignoble . Stand up for right. Love to serve your fellowmen Love motherland. Do good whenever you get a chance to do it. Continue your studies throughout your life. Be just and fear none. ” छात्रवासों में गीता प्रवचन १९३२ के सितम्बर मास में मेरी प्रार्थना पर एक रविवार को राजपुताना होस्टल के बडे हॉल में मालवीयजी ने सामूहिक रूप से गीता का पाठ आरंभ किया | सब विद्यार्थियों ने गीता के कुछ श्लोक गाये | दुसरे रविवार को आचार्य ध्रुवजी ने प्रवचन दिया | कुछ समय के बाद गीता प्रवचन कालेज के हॉल में होने लगा | मालवीयजी के स्वर्गवास के बाद प्रवचन मालवीय भवन में होने लगा | जिस मकान में मालवीयजी रहते थे उस मकान को विश्वविद्यालय ने ‘मालवीय भवन’ बना दिया | इस भवन में बडे विद्धानों के, महात्माओं के धार्मिक प्रवचन होते हैं | महामहोपाध्याय पं. गिरधर शास्त्री, महामुनि करपात्री जी आदि के सारगर्भित प्रवचन हुए | केवल धार्मिक प्रवचन ही होते थे | हरिजन नेताओं का सृजन सन् १९३३ के जनवरी मास में शिवाजी हाल में मालवीयजी ने हरिजनों को शिक्षा देना आरंभ किया | ‘राम राम’ लिख सभी उपस्थित हरिजनों को और अन्य लोगों को राम नाम गाने को कहा | यहां यह बताना आवश्यक है कि श्री जगजीवन राम, श्री अग्निहोत्री, श्री गिरिधारी लाल, जो बाद में केन्द्र तथा प्रान्तों में मंत्री हुए, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थी (स्नातक) थे | १९४२ के देश छोड़ो आन्दोलन में जब महात्मा गांधी जी और कांग्रेस कमेटी के सब सदस्य जेल में थे तब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया | सर राधाकृष्णन ने मालवीयजी ( जो उन दिनों बहुत अस्वस्थ थे ) से प्रार्थना की आप चलकर विद्यार्थियों को आदेश दें कि वे पढ़ाई करें और उपद्रवों का मार्ग छोड़ दें | कुलपति की आशा के विपरीत मालवीयजी ने आर्ट्स कॉलेज में ठसाठस भरे विद्यार्थियों से कहा कि मुझे अत्यंत दुःख है कि महात्मा गांधी जी कारावास में हैं | मैं विद्यार्थियों से अनुरोध करता हुं कि वे ऐसा कोई कार्य न करें जिससे भारत माता की स्वच्छ चादर में काला दाग पड़े | फलस्वरूप सरकार ने विश्वविद्यालय बन्द कर दिया और वहां मिलिटरी तैनात कर दी | सर राधाकृष्णन के प्रयास से तीन महीने बाद विश्वविद्यालय फिर खुला |

महामना - मेरे पूज्य पितामह - मेरे आदर्श गिरिधर मालवीय मुझे अपने जीवन के प्रारम्भिक वर्ष पूज्य दादाजी के पास रह कर बिताने का सौभाग्य प्राप्त रहा है. बचपन के वे दिन मै अपने जीवन की अमूल्य निधि मानता हूँ. बचपन में ही उनकी जो अमित छवि मेरे मन पर पड़ी, और उसके बाद भी जो कुछ उनके बारे में अपने पूज्य पिता पंडित गोविन्द मालवीयजी तथा माता ऊषा मालवीयजी से सुन कर जाना तो धीरे धीरे समझ में आने लगा कि भगवान श्री रामचन्द्रजी के ही समान महामना मालवीयजी ने भी जीवन पर्यंत पुरुषोचित समस्त मर्यादाओं का पालन करते हुए अपना जीवन यापन किया. ऐसे में मेरी दृष्टि में महामना मालवीयजी को कलियुग के मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जानना किसी भी प्रकार से गलत न होगा. इस बात का मर्म समझने के संदर्भ में यदि मै यह बतलाऊँ कि हमारे परिवार के इष्ट देव “श्री राधाकृष्णजी” हैं– जिनकी मूर्तियां साथ में लेकर हमारे पूर्वज कुछ शताब्दी पूर्व मालवा से यहाँ आए थे –तथा जो श्रीराधाकृष्णजी आज भी प्रयाग में हमारे पैतृक मकान, जहाँ महामना का जन्म हुआ था, वहाँ आज भी विराजमान हैं तथा जिनके नाम अपनी वसीयत द्वारा महामना ने उस पैतृक भवन का आधा भाग “श्री ठाकुरजी” को देकर उनकी राग–भोग–सेवा निरंतर होते रहने का निर्देश दे रखा है, विद्यार्थियों को अपने संदेश के अंत में महामना ने जो सीख दी है उसमें कहा है:- घट घट व्यापक राम जप रे, मत कर बैर, झूठ मत भाखै, मत पर धन हर, मत मद चाखै, जिव मत मार,जुआ मत खेलै, मत पर तिय लख, यही तेरो तप रे. तथा अपने इस रिकॉर्डेड वक्तव्य के अंत में उन्होंने विद्यार्थियों से कहा है कि “यदि तुम इतने भाव को ध्यान में रखोगे” तो तुम्हारा कल्याण होगा. इस तरह श्री राम का नित्य स्मरण करने का निर्देश ही यह स्पष्ट करता है कि विद्यार्थियों के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम का ही अनुसरण करना ही उन्हें अभीष्ट था जिसका पालन वह स्वतः भी करते थे. इसके पीछे श्री कृष्ण का उन्होंने विद्यार्थियों के समक्ष आदर्श क्यों नहीं प्रस्तुत किया यह समझना भी कठिन नहीं है क्योंकी श्री कृष्ण के गूढ़ चरित्र को समझने के लिए विद्यार्थियों तथा साधारण मनुष्यों में जो वैचारिक परिपक्वता अपेक्षित है उनका पूर्ण विकास तब तक उनमे नही हुआ रहता है तथा वे श्रीकृष्ण के चरित्र की महत्ता को समझ नहीं पाते हैं. महामना के संस्मरण के प्रश्न पर जब मै विचार करता हूँ तो मुझे यह लगता है कि मेरे निजी अनुभव तो महामना से संबंधित अधिक नहीं हैं किन्तु उनके कुछ ऐसे प्रसंग अवश्य हैं जिनके बारे में मुझे अपने पूज्य माता-पिता से प्रामाणिक जानकारी मिली है. उनसब में से कुछ को इस लेख में, दो एक अपने संस्मरणों के साथ, समेटने का प्रयास करता हूँ. बचपन की मेरी याददाश्त को कुरेदता हूँ तो सब से प्रमुख जो बात मन में आती है वह यह की पूज्य दादाजी (जिन्हें हम सब “बाबूजी“ कहते थे) प्रेम, कोमलता पवित्रता की प्रति –मूर्ति थे. सुबह ही वह नित्य कर्म से निवृत्त हो कर संध्या–पूजन कर, बिलकुल साफ़-सुथरे शुभ्र वस्त्र पहन कर तैयार हो जाते थे. बच्चों में घर में मै व मेरी पांच बड़ी बहने उनके पास रहते थे. हमारा शेष परिवार प्रयाग में हमारी दादीजी के पास रहता था. उनको सभी लोग जाकर कर प्रणाम करते थे और मुझे जो याद है वह “चिरंजीवी-भव, यशस्वी भव” कह कर आशीर्वाद देते थे. उनके पास जाना ही हमें बहुत अच्छा लगता था. सबको वह प्रेम से बैठाते थे, उनका कुशल क्षेम पूछते थे और किसी का यदि कोई काम होता तो उसके विषय में निर्देश देते थे. हम लोग अपने अपने स्कूलों में जाने के पहले उनका आशीर्वाद प्राप्त करते थे. शाम को जब वह घर पर होते तो “गायनाचार्यजी” उनके घर के बाह्य बरामदे में उनको भजन सुनाते थे जिसे वहाँ उपस्थित सबलोग सुना करते थे. उनके दिन के भोजन के समय तो हमलोग विद्यालयों में होते थे लेकिन रात्रि के भोजन में वे अधिकतर “मोहनभोग” (गौ के दूध में भुना हुआ आटा मिलाकर बनाया पतला हलुआ) लेना पसन्द करते थे, जो मेरी माताजी उनके लिए बनाती थीं. अक्सर वह मुझे उस “मोहन भोग ” को ले जाकर उन्हें देने कहती थीं–जो करना मुझे बहुत ही अच्छा लगता था. “अच्छा बच्चा तुम ले आए हो“ कहकर वे उसे बड़े प्रेम से पी लिया करते थे. हम बच्चों से उन्हें “सिंहासन हिल उठे राज वंशो ने भृकुटी तानी थी, बूढे भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी, चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी, बुन्देलों हरबोलों के मुह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” की पूरी कविता सुनना उनको बहुत अच्छा लगता था. मेरे अपने जीवन में जो एक बहुत ही रोचक क्षण मेरा उनके साथ बीता, उसे बताता हूँ. मेरी दूसरी सबसे बडी बहन सुधाजीजी का विवाह गर्मियों में होना था. सब तैयारियाँ विधिवत चल रही थीं. हमारे घर में बालक के यज्ञोपवीत के लिए भी मंडप बनता है तथा विवाह जैसी भव्यता के साथ ही हमारे घर में बालक का यज्ञोपवीत भी होता है. उस समय मै आठ वर्ष का पूरा हो चुका था. विवाह के बिल्कुल पहले ही महामना ने मेरे पिताजी जी को बुलाया तथा कहा कि मेरा जनेऊ भी मेरी बहन के विवाह के समय ही जो मंडप बना है या बनना है उसी में कर दिया जाए. मेरे पिताजी ने एक बार उनसे कहा भी कि “अभी हो बहुत छोटा है और विधिवत ब्राह्मण बटु के लिए जिस प्रकार नियम से नित्य संध्या-पूजन करना चाहिए वह संभवत: नहीं कर पाएगा”—लेकिन दादाजी ने कहा कि “यह आठ वर्ष का हो चुका है तथा ब्राह्मण बटु का यज्ञोपवीत आठ वर्ष के हो जाने पर ही होना चाहिए अत: इसका जनेऊ उसी समय विवाह के लिए बने मंडप में किया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि इसलिये भी मेरा जनेऊ तत्काल किया जाए क्योंकि वह स्वत: मुझे “गायत्री मंत्र” गुरु के रूप में देना चाहते थे. तदनुसार मेरा जनेऊ किया गया. मुंडन करके कौपीन धारण करके जब मेरा यज्ञोपवीत हो गया तो मुझसे कहा गया कि गुरु मंत्र लेने मुझे अपने बाबा के पास जाना है तथा जो मंत्र वह धीरे धीरे मेरे कान में कहेंगे उसे मुझे उनके साथ पांच बार दुहराना है. उस समय तक बाबा काफी कमजोर हो गए थे तथा उनकी आवाज भी बहुत धीमी हो गई थी. तब तक मुझे गायत्री मंत्र आता भी नहीं था, तथा उसे रट कर याद करने का समय भी नही बचा था. अत: जब पूज्य बाबा मेरे कान में धीरे धीरे करीब करीब फुसफुसाते हुए गायत्री मंत्र कहते थे तब जितना मेरी समझ में आता था उतना मै दुहरा देता था. पाँच बार कान में मंत्र देने के बाद बाबा ने मुझसे कहा “चिरंजीवी भव”.ये वाक्य मेरा बचपन से खूब अच्छी तरह सुना हुआ था अत: मैने भी “चिरंजीवी भव” कह दिया. यह सुनते ही सब लोग खूब हँसे –लेकिन बाबा ने गद्गद हो कर कहा कि “नव बटु मुझे आशीर्वाद दे रहा है” आज जब मै इस मूर्खता का स्मरण करता हूँ” तो मुझे स्वत: अपने पर हँसी आती है. सभी के लिए एक नियम अब महामना के जीवन के कुछ प्रसंगों का उल्लेख़ करता हूँ, जो बहुत कम जाने जाते हैं. महामना मालवीयजी काशी हिन्दूविश्वविद्यालय की स्थापना के लिए प्रयाग से काशी आ गए थे. उनका पूरा परिवार प्रयाग में ही रहता रहा. प्रयाग मे मेरे पिता पूज्य पंडित गोविन्द मालवीय, जो उनके सबसे छोटे पुत्र थे, ने दसवीं कक्षा स्कूल से पूरी कर के प्रयाग विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया था. महामना ने उन्हें काशी आकर काशी हिन्दूविश्वविद्यालय में आगे की पढाई करने को कहा – सो पिताजी काशी जाकर छात्रावास में रह कर पढाई करने लगे. महामना का यह नियम था कि वे छात्रावास जाकर विद्यार्थियों से उनके कुशल क्षेम व पढ़ाई आदि के बारे में पूछा करते थे. जब वे छात्रावास जाते तो पहले से ही छात्रावास के वार्डेन को सूचित कर दिया करते थे. जिस छात्रावास में मेरे पिताजी थे उसके वार्डेन गणितके प्रख्यात विद्वान डॉ गणेश प्रसादजी थे. जब महामना छात्रावास पहुँचे तो डॉo गणेश प्रसादजी साथ हो लिए. महामना का आना सुन कर सब विद्यार्थीअपने अपने कमरों के दरवाजों पर बरामदे में खड़े हो गए. महामना हर कमरे मे रहने वाले विद्यार्थियों से उनका कुशल –क्षेम पूछते आगे बढ़ रहे थे. हॉस्टल के कोने वाले कमरे में मेरे पिताजी थे सो वे भी कमरे के बाहर आकर खड़े हो गए. जब महामना मेरे पिताजी के कमरे पर आए तो उन्होंने पिताजी से पूछा कि उनके कमरे में और कौन विद्यार्थी है क्योंकि पिताजी अकेले ही कमरे से बाहर आए थे.जबकि बाकी हर कमरे से दो दो विद्यार्थी बाहर आकर उनसे मिले थे. पिताजी ने महामना को बताया कि वे उस ”कार्नर रूम” में अकेले ही रहते थे. इस बात पर महामना ने डॉo गणेश प्रसादजी से कहा कि “कॅार्नर रूम” तो अन्य कमरों से बडा होता है फिर भी उन्होंने मेरे पिताजी को अकेले ही उस कमरे मे क्यों रखा जब कि अन्य कमरों में २ विद्यार्थी हैं तो एक और विद्यार्थी को उस कमरे में क्यों नहीं रखा. यह सुनकर डॉo गणेश प्रसाद जी ने नाटकीय अंदाज में कहा “मिस्टर वाइस चांसलर, इट इज माइ प्रेरोगेटिव टू अलौट रूम्स ऑफ माइ हॉस्टल टू एनी स्ट्यूडेन्ट ऐस आइ विश, एन्ड आइस्ट्रौंगली प्रोटेस्ट फॉर इन्टरफियरिंग इन माई डिस्क्रीशन.” जिस पर महामना ने भी नाटकीय अंदाज़ में कहा “आई ऐमएक्सट्रीमली सॉरी मिस्टर वार्डेन, एन्ड आइसिन्सियरली अपौलोजाइस. और महामना घूम कर चार पाँच कदम पीछे जाकर वापस पुन: डाक्टर गणेश प्रसादजीसे बोले “जी आप यहाँ के वार्डेन साहब हैं,मेरा नाम मदन मोहन मालवीय है. मेरा बेटा गोविन्द मालवीय आपके हॉस्टल में रह करयहाँ पढाई कर रहा है, लेकिन मेरी इच्छा है कि अब वह यहाँ पढाई न कर के इलाहाबाद जाकर पढाई करे. इस लिए आपसे निवेदन है कि आप उसकी इस हॉस्टल से छुट्टी कर दें.” इस पर डॉo गणेश प्रसाद ने कहा की यह आप क्या कह रहे हैं तो महामना ने उत्तर दिया कि देखिए मै आपके किसी अधिकार के विरुद्ध कुछ भी नही कर रहा हूँ– यह तो एक पिता का अधिकार है कि वह यह निर्णय करे की उसका बेटा कहाँ पढाई करे–सो मै अपने उसी अधिकार से आपसे यह निवेदन कर रहा हूँ. लाचार हो डॉo गणेश प्रसादजी बोले- “महाराज, आपसे कोई नही जीत सकता, बताइए क्या करना है,तब महामना ने कहा मेहरबानी करके इस कमरे में एक विद्यार्थी और रख दीजिए. अस्तु. बिना बिजली के रहे छात्रों को कष्ट ना हो एक अन्य प्रसंग- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग कालेज बनने के बाद वहाँ विश्वविद्यालय की अपनी बिजली आ गयी थी. क्योंकि बिजली का उत्पादन कम था अत: बिजली केवल हॉस्टल में विद्यार्थियों को दी जाती थी. किंग साहब ने जो इंजीनियरिंग कालेज के प्रिंसिपल थे कई बार चाहा कि महामना के निवास पर भी बिजली लगा दी जाए जिससे महामना को विश्वविद्यालय का काज निपटाने में सुविधा हो,किन्तु हर बार महामना यह कहकर बिजली नहीं लगवाने देते थे कि अभी ही जो बिजली विद्यार्थियों को मिल रही है उसकी रोशनी बहुत कम है और यदि उनके यहाँ बिजली लग गई तो लोड बढने से विद्यार्थियों की बिजली और भी धीमी हो जाएगी. इसके अतिरिक्त अध्यापकों को पहले बिजली मिलनी चाहिए क्योंकि उन्हे स्वत: पढाई करनी होती है तथा विद्यार्थियों को पढाना पड़ता है. इस तरह प्रोफेसर किंग साहब चाहते हुए भी महामना के घर पर बिजली नही लगवा पा रहे थे. एक बार महामना विश्वविद्यालय में ही पधार रहे किन्ही अति विशिष्ट मेहमान को लिवा लाने के लिए स्वत: काशी से तीन दिन के लिए बाहर गए. प्रिंसिपल किंग साहब ने सब अधिकारियों के साथ मिलकर यह निर्णय कराया वह अति विशिष्ट महोदय महामना के साथही महामना के निवास में ही ठहरेंगे. इस निर्णय के बाद उन्होंने तत्काल महामना के घर में बिजली लगवा दी और महामना के वापस आने पर कह दिया कि बिजली उनके लिए नही बल्कि विश्वविद्यालय के अति विशिष्ट मेहमान के लिए लगाई गई है. इस प्रकार जाकर महामना के घर में बिजली लगी. एक अन्य प्रसंग के साथ इस लेख को विराम देता हूँ. महामना ने मेरे पिता जी पंडित गोविन्द मालवीय को एमo एo,एलएल बीo की पढाई पूरी करने के बाद अपना निजी सचिव बना लिया था तथा शुरू में २५० रुपए प्रति माह वह उन्हे अपने कमाए हुए पैसों से देते थे. १९३५ तक उनकी तनख्वाह बढा कर ३५० रुपए प्रति माह हो गयी थी. तब तक मुझसे बड़ी मेरी ५ बहने पैदा हो चुकी थीं. ऐसे में एक दिन पिताजी ने दादाजी के पास जा कर कहा कि यदि उन्हें निजी सचिव के कार्य के छुट्टी मिल सके तो वे कुछ व्यापार आदि कर के थोडा पैसा कमा लें जिससे लड्कियों की पढाई लिखाई व ब्याह शादी की व्यवस्था हो सकेगी जिसपर महामना ने उन्हे अपने सचिव के पद से मुक्ति दी. उसके बाद पिताजी ने अपने कारोबार से अच्छा पैसा कमाया जब वर्ष १९३६ में, महामना ने स्वास्थ्य के आधार पर कुलपति पद डॉo सर्वपल्ली राधाकृष्णन को सौंपने का निश्चय किया तथा डॉo राधाकृष्णन ने ६ महीने बाद कुलपति बनकर आना स्वीकार किया तो महामना ने यह जान कर, कि मेरे पिताजी तब तक एक घर बनवाने की स्थिती में हो चुके हैं, उनसे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बाहर एक घर बनवाने कहा जिसका भूतल ६ महीने में बनकर तैय्यार हो गया. डॉo राधाकृष्णन को कुलपति पद सौपने के बाद उन्होने वहीं पर सबको बतलाया कि क्योंकी अब वह विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त हो गए हैं, अत: अब वे विश्वविद्यालय के बाहर ही, जो उनके पुत्र ने घर बनवा लिया है, उसमे जाकर रहेंगे. यह सुनते ही पूरे ऐम्पीथियेटर के पंडाल से “नो नो नो नो” की आवाज आने लगी,जिस पर महामना ने स्पष्ट किया कि यह विश्वविद्यालय उनका निजी नहीं है बल्कि देश के दान में दिये पैसों से बना है अत: यह आवश्यक है कि जिस दिन जो भी व्यक्ति विश्वविद्यालय से अवकाश ग्रहण करे, उसी दिन से वह विश्वविद्यालय का भवन छोड़ कर अन्य निवास में रहने की व्यवस्था करे, अत: उनका विश्वविद्यालयका भवन छोड़ने का निर्णय उचित है तथा उनकी बात का तथा निर्णय का सम्मान होना ही चाहिए. जब उनकी इस बात को भी, विशेष कर विद्यार्थी गणों ने नही माना और वे सब जाकर रास्ते में लेट गए कि हम आपको नहीं जाने देंगे, तो डॉo राधाकृष्णन साहब ने वहीं ऐलान किया किविश्वविद्यालय में एक पद “रेक्टर” का खाली पडा हुआ है, जो अभी तक नहीं भरा गया है, तथा महामना को तत्कालीन प्रभाव से विश्वविद्यालय का “लाइफ लौंग” रेक्टर नियुक्त करके जिस भवन में वे अभी तक रह रहे थे उसका नाम “रेक्टर्स लॉज” कर दिया गया है, अत: महामना को विश्वविद्यालय से अवकाश नहीं दिया गया है और उन्हें वही “रेक्टर्स लॉज” में ही रहना होगा कहकर उनको विश्वविद्यालय में ही रोक लिया. इस प्रकार महामना को विश्वविद्यालय से बाहर नहीं जाने दिया गया. उपरोक्त तथ्य यह दिखलाते हैं कि महामना की सोच कितनी ऊँची थी. आज कोई एक छोटा सा भी संस्थान बना कर उसमें अपनी तथा अपने परिवार वालों के लिए विशेष सुविधाएँ जुटाने में लगा रहता है, किन्तु महामना ने आरंभ से ही निस्पृह भाव से विश्वविद्यालय बनवाकर उसे देश को समर्पित कर दिया. उन्हे अकारण ही “महामना”नही कहा गया है.

पूज्य मालवीय जी महाराज के सान्निध्य में डॉo भुवनेश्वरनाथ मिश्र ‘माधव’ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आने का एकमात्र और प्रबलतम आकर्षण था पूज्य मालवीय जी महाराज का सान्निध्य | पूज्य मालवीय जी जब काशी में होते एकादशी, पूर्णिमा, जन्माष्टमी, रामनवमी तथा अन्य ऐसे महत्त्वपूर्ण पर्वों पर विश्वविद्यालय के विशाल हाल में महाभारत या श्रीमद्भागवत की कथा बाँचते | कथा क्या बाँचते अपना हृदय उँड़ेलते | उस समय उनका वेश-रेशमी धोती, रेशमी चादर- बड़ा ही भव्य लगता | यों उनका रंग भी तपाये हुए सोने का सा था | उन्होंने शायद ही कभी रंगीन वस्त्र धारण किया हो | यहाँ तक कि उनके लिये कुलपति का ‘गाउन’ भी श्वेत रेशम का था जिस पर सुनहरा बार्डर लगा था | मालवीय जी महाराज का जैसा दिव्य निर्मल चरित्र वैसा ही उनका श्वेत दिव्य पहनावा | सिर पर श्वेत पगड़ी, गले में तहाया हुए श्वेत दुपट्टा जो दोनों ओर घुटनों को छुता, श्वेत अंगरखा, श्वेत धोती या चौड़ी मुहरी का पजामा, पैरो में सफेद मोजे और सफेद कैनवश के जूते, ललाट पर श्वेत मलयागिरि चन्दन और चेहरे पर दिव्य प्रसन्नता की ज्योति | छात्र-जीवन में कई बार उनके चरण प्रान्त में बैठकर भागवत और महाभारत की कथाएँ सुनने का देव-दुर्लभ सौभाग्य मिला, सचमुच देव दुर्लभ सौभाग्य ! किसी विश्वविद्यालय का कुलपति अपने छात्रों और अध्यापकोंकोभागवत और महाभारत सूनाता हो यह प्राचीन काल में भले ही संभव हो परन्तु अब कहाँ मिलेगा ? इन कथाओं में भी द्रौपदी का प्रसंग, गजेन्द्र-मोक्ष का प्रसंग मालवीय जी को विशेष प्रिय थे | द्रौपदी की कथा सुनाते समय जब वे स्वयं अपने को द्रौपदी की परिस्थिति में अनुभव कर साश्रु श्लोक-पाठ करते तो हजारों हजार छात्रों, अध्यापकों की आखों से आँसुओं की गंगा जमुना उमड़ आती-उनसे सुने हुए वे श्लोक आज भी प्राणों के निभृत में गूँज रहे हैं- गोविन्द! द्वारिकावासिन्! कृष्ण! गोपीजनप्रिय! कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव! हे नाथ! हे रमानाथ! ब्रजनाथार्तिनाशन! कौरवार्णवमग्रां मामुद्धरस्व जनार्दन! कृष्ण! कृष्ण! महायोगिन्! विश्वात्मन्! विश्वभावन! प्रपन्नांपाहि गोविन्द! कुरुमध्येऽवसीदतीम्! इन श्लोकों का जब महामना साश्रु पाठ करने लगते तो लगता कि स्वयं द्रौपदी ही असहायावस्था में भगवान् श्रीकृष्ण को पुकार रही है और भागवान् श्रीकृष्ण उसकी आर्त एवं आतुर पुकार पर प्रकट हो गये हैं! उस समय मालवीय जी के गालों पर आसुओं की धारा का अजस्त्र प्रवाह देकर श्रोताओं का हृदय भी उमड़ आता और एक ऐसा वातावरण बन जाता जिसमेंसर्वत्र- अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा तत: किम् | नान्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा तत: किम् || आराधितो यदि हरिस्तपसा तत: किम् | नराधि यदि हरिस्तपसा तत: किम् || मंगलमय दिव्य अनुभूति छा जाती | उन कथाओं का रस, उनकी ज्योति, उनकी छाप आज भी ज्यों की त्यों प्राणों के प्राण में बनी हुई है- वह अमर है, अमिट है क्यों शाश्वत है | मालवीय जी महाराज के सान्निध्य में बिताये हुए जीवन के पूरे बीस बाइस वर्ष कितने अनमोल थे! मालवीय जी महाराज के यहाँ गरीब छात्रों की बराबर भीड़ लगी रहती थी | वे सच्चे अर्थ में ‘कुलपति’ थे- आज के से वेतनभोगी दण्डाधिकारी ‘वाइस-चैंसलर नहीं | ‘कुलपति’ शब्द अपने इतिहास में मात्र मालवीय जी महाराज पर ही ‘फिट’ बैठा | अभावग्रस्त छात्रों को महामना नाना प्रकार से सहायता पहुँचाते-पैसे से, वस्त्रों से, पुस्तकों से, जाड़े में कम्बलों से और सबसे अधिक अपने प्यार भरे प्रोत्साहनों से | वे प्राय: कहते, तुम आर्य-सन्तान हो, आर्य की तरह चलो, आर्य की तरह रहो | ‘आर्य’ शब्द मालवीय जी को बड़ा ही प्रिय था | इस एक शब्द में उनके लिए भारतीय जीवन, भारतीय साधना, भारतीय संस्कृति का तेज जगमगा रहा है | महावीर जी अपने बंगले के जिस कमरे में रहते थे उसमें एक पलंग, एक बहुत बड़ी चौड़ीचौकी जिस पर उसकी पुस्तकें रहती, कोने में पूजा का पंचपात्र, चंदनादि | कमरे में दो बड़े-बड़े चित्र थे, एक उनके पूजनीय पिता जी श्री चतुर्वेदी बज्रनाथ जी मालवीय का और दूसरा उनकी पूजनीया माता श्री मुनादेवी जी का | पिता जी ब्रजनाथ जी मालवीय स्वयं भागवत के बहुत प्रसिद्ध कथावाचक थे, माता जी धर्मप्राणा थीं | इसका पुण्य प्रभाव पूज्य मालवीय जी महाराज के चरित्र पर पड़ना ही था और पड़ा भी अजस्त्र भाव से | मालवीय जी के यहाँ आने वालों का प्राय: तांता लगा रहता | देश के बड़े से बड़े नेता के दर्शन पूज्य मालवीय जी के कारण हम लोगों को बैठे बिठाये विश्वविद्यालय में ही हो जाया करते | भाई परमानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द,डॉo मुंजे, सर सप्रू, सर चिन्तामणि, श्री केलकर, गोस्वामी गणेशदत्त, श्री अणे, लाला लाजपत राय मालवीय जी के अन्तरंग सखा एवं सुहृद् थे | डॉo बेसेण्ट, डॉo भगवानदास, सर जगदीशचन्द्र बोस, श्री सीo वेंकटरमण, श्री प्रफुल्लचन्द्र राय आदि उनके उपासकों में थे | पूज्य मालवीय जी की त्याग-भावना से प्रेरित होकर ही देश के एक से एक चूड़ान्त विद्वान् काशी विश्वविद्यालय में नाममात्र का वेतन लेकर आ गये- प्राय: प्रत्येक विभाग का अध्यक्ष तो ऐसा महामनीषी मूर्धन्य विद्वान् था ही जिसकी कीर्ति ना केवल भारतवर्ष में अपितु समस्त शिक्षित जगत्में देदीप्यमान थी | उस समय के हिन्दू के विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों की सूची मात्र पढ़ने से अतीत का गौरव झलक उठता है और सबके सिरमौर थे हमारे प्राचार्य आनन्दशंकर बापू भाई ध्रुव जो विद्या के समुद्र और ज्ञान के सूर्य ही थे, ऐसा प्रकाण्ड विद्वान् अब कहाँ मिलेगा ? एमo एo के बाद सन् 30 की आँधी में मैंबह गया सूखे पत्ते ही तरह | लगभग तीन वर्ष की आवारागर्दी के बाद सोचने की फुर्सत मिली की अब किया क्या जाय कि पूज्य मालवीय जी महाराज का मेरे घर के पते पर तार मिला कि “शीघ्र मिलो”| हजारों हजार छात्रों के मध्य मुझे स्मरण किया गया इस भाग्य पर कौन नहीं इतरायेगा? सुतरां मैंकाशी, महाराज जी के चरण-प्राप्त में पहुँचा | पहुँचते ही आदेश हुआ कि “महाशिवरात्रि पर ‘सनातनधर्म’ निकाल देना है और तुम उसके सम्पादक हुए” मैं अवाक् था, किंकर्त्तव्य विमूढ़| उन्होंने कहा, “छपाई कागज आदि की व्यवस्था ज्ञानमण्डल में कर दी है, तुम निश्चित रूप से अभी से कार्य आरम्भ कर दो, मैं मसूरी जा रहा हूँऔर शायद तीन चार महीने बाद लौटूँ|” मैंने बड़ी नम्रता से निवेदन किया, “बाबू जी ( इसी नाम से हम सभी छात्र और अध्यापक पूज्य मालवीय जी महाराज को संबोधित किया करते थे! ) अधिक अच्छा होता सम्पादक के लिये आप या तो पंo लक्ष्मणनारायण जी गर्दे या पंo अम्बिकाप्रसाद जी बाजपेयी या पंo गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी को आमन्त्रित करते, नहीं तो पंo केदारनाथ शर्मा सारस्वत तो यहाँ है ही | मैं एक सहायक सम्पादक अच्छा हो सकता हूँ, ‘सनातनधर्म’ का सम्पादक बनने की योग्यता, विद्वत्ता, शक्ति मुझमे नहीं है,” परन्तु उन्होंने साफ ‘ना’ कह दिया और कह दिया कि “मैं कहता हूँ तुम कर सकते हो और बढ़िया कर सकते हो|” माँ अन्नपूर्णा, बाबा विश्वनाथ तथा संकटमोचन में जाकर प्रार्थनापूर्वक मैंने ‘सनातनधर्म’ का सम्पादन-भार स्वीकार कर लिया और दो तीन महीनों के अन्दर ही यह साप्ताहिक स्वालंबी ही नहीं ‘कमाऊ’ भी बन गया | पूज्य मालवीय जी महाराज के नाम के कारण बात की बात में सारे देश में इसके ग्राहक बने-धूम मच गई– पंजाब, सीमाप्रान्त, कोहाट, नौशेरा, मालाकन्द, ऐबटाबाद, रावलपिंडी में अधिक | यह सब पूज्य मालवीय जी महाराज के नाम का चमत्कार तो था ही साथ ही गोस्वामी गणेशदत्त जी ने पंजाब और सीमाप्रान्त में सनातनधर्म सभाओं का जाल-सा बिछा दिया था | ‘सनातनधर्म’ उन सभी सभाओं में जाने लगा | ‘सनातनधर्म, के लेखक भी सधे हुए, चुने हुए व्यक्ति थे- मo मo पंo प्रमथनाथ तर्कभूषण, मo मo पंo गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, आचार्य महावीरप्रसाद जी द्विवेदी, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पंo अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, लाला भगवानदीन, डाo भिखनलाल आत्रेय, डाo अचलबिहारी सेठ, डाoबड़थ्वाल आदि आदि | सम्पादक मण्डल में मेरे अतिरिक्त डाo राजबली पाण्डेय, श्री सीताराम चतुर्वेदी श्री गयाप्रसाद जोशी, श्री हीरावल्ल्भशास्त्री थे | व्यवस्थापक थे श्री गणेशदत्त आचार्य पत्र खूब चला | स्वयं मालवीय जी महाराज उसमें सम्पादकीय स्तम्भ के अन्तर्गत समय-समय पर लिखते | गोस्वामी गणेशदत्त जी उत्तर काशी से अपना प्रेरणा-पूर्ण उद्बोधन मन्त्र भेजते रहते | प्रथम पृष्ठ आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जी के लिये सुरक्षित था | वे प्राय: श्रीमद्भागवत का एक श्लोक लेकर उसकी भक्तिपूर्ण व्याख्या करते- बड़ी ही सुन्दर और सरस शैली में | मo मo पंo गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, मo मo पंo प्रमथनाथ तर्कभूषण, आचार्य धु्व और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी भी लगभग प्रत्येक अंक में लिखते, केवल प्रथम कोटि के लेखकों के लिए ही ‘सनातनधर्म’ का मार्ग उन्मुक्त था | यों मालवीय जी चाहते थे कि भारतवर्ष में जितने ग्राम हैं कम से कम उतने अंक ‘सनातनधर्म’ के अवश्य छपे | मालवीय जी कोई छोटी बात सिच ही नहीं सकते थे | ‘महामना’ उन पर अक्षरश: घटता था | मालवीय जी के जीवन में कभी किसी प्रकार की लघुता आयी ही नहीं | हिन्दू जाति, हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू धर्म के स्तम्भ होते हुए भी वे कभी साम्प्रदायिक नहीं थे | कांग्रेस के वे प्रथम श्रेणी में प्रथम पंक्ति के उत्कृष्टतम नेता थे और देश के लिये जेल की यातनाएँ सहीं, नाना प्रकार के कष्ट झेले, चार चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष हुए, उसकी कार्यकारिणी में रहे और जब जब कांग्रेस संकटों में फँस गयी मालवीय जी ने उसे उबारने का सफल प्रयत्न किया | राष्ट्र की आवश्यकता पर उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सहरत्र छात्र-छात्राओं तथा अध्यापकों को देशसेवा के लिये स्वेच्छया और सहर्ष भेज दिया और विश्वविद्यालय में ताला लग गया | विश्वविद्यालय के पुरातन छात्र मिलते तो वे उनसे तीन प्रश्न करते- (1) संध्या करते हो ? (2) दूध कितना पीते हो ? (3) कितनी संतान है ? बात बात में तीन महावाक्य उनके मुख से निकला करते थे- (1) निर्बल के बलराम | (2) बीती ताहि बिसारी दे, आगे की सुध लेय | (3) हारिये न हिम्मत, बिसारिये न राम नाम | सोते जागते निरन्तर ‘जनहित’ ही उनका लक्ष्य रहा | सनातनधर्म की रक्षा, हिन्दी प्रेम, आदर्श शिक्षा प्रणाली, गो भक्ति, देश की मुक्ति और उन्नति यही उनके अन्तस्तल के परम प्रिय विषय थे | मालवीय जी का मस्तिष्क राजनीतिक का था और इस विषय में उनके आदर्श थे श्रीकृष्ण-महाभारत के श्री कृष्ण | परन्तु मालवीय जी का हृदय था एक रससिक्त कवि का, रस पिपासु भक्त का और कभी-कभी सर्वथा एकान्त में स्वरचित कविताएँ सुनाते तो लगता रसखान और घनानन्द इनके सामने तुच्छ हैं| उनसे सुनी हुइ एक ‘सोहनी’ अभी भी प्राणों में गूँज रही है- नींद तोहे बेचोंगो, जो कोउ गाहक होय | आयरे ललना फिरि गये अंगना, मैं पापिनि रही सोय| जो कोउ गाहक होय ! उस महान् आत्मा के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके चरणों में नतमस्तक हैं- यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबंधनात्| विमुच्यते नमस्तस्मै मालवीयै नमो नम: ||

Muslim Interest in Railway Services should not be ignored S.N.Verma In his letter to Mahamana dated 12 March 1930 writes; You have done a great harm to the Hindu cause by saying in the Assembly that the minority interest should not be ignored; your remarks are not based on facts and figures. You have overlooked the fact of the pancity of Hindus in all the Railway workshops, could you not draw the attention of the Railway Member to this point. Hindu Element, no doubt, predominates in the offices but a corresponding preponderance of Mohmedans Element in prevalent in the Railway Workshops. Hither to the Clerical appointments were distributed in equal number but in the case of recruitment for Workshops this is not being done and Hindus are not admitted. The case stands thus the Mohmedans have two benefits i.e. they are being given an equal share in the Service and have the sole monopoly of the Railway Workshops. As a result of the discussion in the Assembly the Agent N.W. Ry LAHORE has issued a circular that no appointments should, in future, be given to the Hindus. Are you able to turn the table now? Certainly not. Will you please call upon the Railway Member to place on table a statement, showing the numerical strength of Hindus and Muslims in all the Railway Workshops? The Hindus come to zero figure. Shri. S.N.Verma, A socialist worker