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ॐ श्री हरिः
जगत् में सबसे उत्तम और जानने योग्य कौन है?
ईश्वर

इस संसार में सबसे पुराने ग्रन्थ वेद हैं। यूरोप के विद्वान् भी इस बात को मानते हैं कि ऋग्वेद कम-से-कम चार सहस्त्र वर्ष पुराना है, और उससे पुराना कोई ग्रन्थ नहीं। ऋग्वेद पुकार कर कहता है कि सृष्टि के पहले यह जगत् अन्धकारमय था। उस तम के बीच में और उससे परे केवल एक ज्ञानस्वरूप स्वयम्भू भगवान् विराजमान थे, और उन्होंने उस अन्धकार में अपने को आप प्रकट किया, और अपने तप से, अर्थात् अपनी ज्ञानमयी शक्ति के संचालन से, सृष्टि को रचा। लिखा है-

स एव तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्ति कश्चन।
संसृज्य विश्वं भुवनं गोप्तान्ते संचुकोच स:।।
विश्वतश्चक्षुरेवायमुतायं विश्वतोमुख: ।
तथैव विश्वतोबाहुर्विश्रत: पादसंयुत:।।
द्यावाभूमी च जनयन् देव एको महेश्वर: ।
स एव सर्वदेवानां प्रभवश्चोद्भवस्तथा।। (७।१।६।१४-१६)
अचक्षुरपि य: पश्यत्यकर्णोऽपि शृणोति य:।
सर्वं वेत्ति न वेत्तास्य तमाहु: पुरुषं परम्।। (७।१।६।२३)

उस समय एक रुद्र ही थे, दूसरा कोई न था। उन जगत् के रक्षक ने ही संसार की रचना करके अन्त में उसका संहार कर दिया। उनके चारों ओर भुजाएँ हैं तथा चारों ओर चरण हैं। पृथिवी और आकाश को उत्पन्न करने वाले एक महेश्वर देव ही हैं, वे ही सब देवताओं के कारण और उत्पत्ति के स्थान हैं। जो बिना आँख-कान के ही देखते और सुनते हैं, जो सबको जानते हैं पर जिन्हें कोई नहीं जानता, वे परमपुरुष कहे जाते हैं। भागवत में लिखा है-

एक: स आत्मा पुरुष: पुराण: सत्य: स्वयं ज्योतिरनन्त आद्य:।
नित्योऽक्षरोऽजस्त्रसुखो निरंजन: पूर्णोऽद्वयो मुक्त उपाधितोऽमृत:।। (१०।१४।२३)

वह एक ही आत्मा पुराण पुरुष, सत्य, स्वयंप्रकाशस्वरुप, अनन्त, सबका आदि कारण, नित्य, अविनाशी, निरन्तर सुखी, माया से निर्लिप्त, अखण्ड, अद्वितीय, उपाधि से रहित तथा अमर है। सब वेद, स्मृति, पुराण के इसी तत्त्व को गोस्वामी तुलसीदासजी ने थोड़े अक्षरों में यों कह दिया है-

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनंदरासी।।
आदि अन्त कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
आननरहित सकल रस भोगी। बिनु वानी वकता बड़ जोगी।।
आतन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान-बिनु बास असेषा।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहीं बरनी।।

किन्तु यह विश्वास कैसे हो कि ऐसा कोई परमात्मा है? जो वेद कहते हैं कि यह परमात्मा है, वही यह भी कहते हैं कि उसको हम आँखों से नहीं देख सकते।

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्|
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमान:।।

‘ईश्वर को कोई आँखों से नहीं देख सकता, किन्तु हममें से हर एक मन को पवित्र कर विमल बुद्धि से ईश्वर को देख सकता है।’ इसलिये जो लोग ईश्वर को मन की आँखों (बुद्धि) से देखना चाहते हैं, उनको उचित है कि वे अपने शरीर और मन को पवित्र कर और बुद्धि को विमल कर ईश्वर की खोज करें।

हम देखते क्या हैँ?

हमारे सामने जन्म से लेकर शरीर छूटने के समय तक बड़े-बड़े चित्र-विचित्र दृश्य दिखाई देते हैं, जो हमारे मन में इस बात को जानने की बड़ी उत्कण्ठा उत्पन्न करते हैं कि वे कैसे उपजते हैं और कैसे विलीन होते हैं? हम प्रतिदिन देखते हैं कि प्रातःकाल पौ-फट होते ही सहस्त्र किरणों से विभूषित सूर्यमण्डल पूर्व दिशा में प्रकट होता है और प्रकाश-मार्ग से विचरता, सारे जगत् को प्रकाश, गर्मी और जीवन पहुँचाता, सायंकाल पश्चिम दिशा में पहुँच कर नेत्रपथ से परे हो जाता है। राणितशास्त्र के जानने वालों ने गणना कर यह निश्चय किया है कि यह सूर्य पृथ्वी से नौ करोड़ अट्ठाईस लाख तीस सहस्त्र मील की दूरी पर है। यह कितने आश्चर्य की बात है कि यह इतनी दूरी से इस पृथिवी के सब प्राणियों को प्रकाश, गर्मी और जीवन पहुँचाता है! ऋतु-ऋतु में अपनी सहस्त्र किरणों से जल को खींचकर सूर्य आकाश में ले जाता है और वहाँ से मेघ का रूप बनाकर फिर जल को पृथिवी पर बरसा देता है और उसके द्वारा सब घास, पत्ती, वृक्ष, अनेक प्रकार के अन्न और धान और समस्त जीवधारियों को प्राण और जीवन देता है। गणितशास्त्र बतलाता है कि जैसा यह एक सूर्य है ऐसे असंख्य और हैं और इससे बहुत बड़े-बड़े भी हैं जो सूर्य से भी अधिक दूर होने के कारण हमको छोटे-छोटे तारों के समान दिखाई देते हैं। सूर्य के अस्त होने पर प्रतिदिन हमको आकाश में अनगिनत तारे-नक्षत्र-ग्रह चमकते दिखाई देते हैं। सारे जगत् को

सो प्रकाश तुम साजे सदा, जीव कर्म करि बन्धन बँधा।
सर्वव्यापी तुम सब ठाहर, तुमहिं दूर जानत नर नाहर||
तुम सबके प्रभु अन्तर्यामी, जीव बिसर रह्यो तुमको स्वामी||

यह परमात्मा जीव रूप में प्रत्येक जीवधारी के हदय के बीच में विराजमान है- ईश्वर-अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशी।। स्वयं भगवान् ने गीता में कहा है- ईश्वर: सर्वभूतानां ह्नद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। (१८।६१) हे अर्जुन! ईश्वर सब जीवों के हृदय में रहते हैं।

इस विषय में याज्ञवल्क्य मुनि ने सब वेदों का तत्त्व यों वर्णन किया है-

एक सौ चवालीस सहस्त्र हित और अहित नाम की नाडियाँ प्रत्येक मनुष्य के हृदय में दौड़ी हुई हैं। उसके बीच में चन्द्रमा के समान प्रकाश वाला एक मण्डल है, उसके बीच में अचल दीप के समान आत्मा विराजमान है, उसी को जानना चाहिए। उसी का ज्ञान होने से मनुष्य आवागमन से मुक्त होता है। यह आत्मा मनुष्य से लेकर पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-विटप, समस्त छोटे-बड़े जीवधारियों में समान रूप से विराजमान है। वेदव्यासजी कहते हैं-

ज्योतिरात्मनि नान्यत्र समं तत्सर्वजन्तुषु।
स्वयं च शक्यते द्रष्टु सुसमाहितचेतसा।

ब्रह्म की ज्योति अपने भीतर ही है, वह सब जीवधारियों मे एकसम है, मनुष्य मन को अच्छी तरह शान्त और स्थिर कर उसी से उसको देख सकता है। गीता में स्वयं भगवान् का वचन है-

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं य: पश्यति स पश्यति।। (१३१२७)

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमस: परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्टितम्।। (१३११७)

वही पण्डित है, जो विनाश होते हुए मनुष्यों के बीच में विनाश न होते हुए सब जीव-धारियों में बैठे हुए परमेश्वर को देखता है।

सब ज्योतियों की वह ज्योति, समस्त अन्धकार के परे चमकत्ता हुआ, ज्ञानस्वरूप, जानने के योग्य, जो ज्ञान से पहचाना जाता है, ऐसा वह परमात्मा सबका सुहृद्, सब प्राणियों के हृदय में बैठा है।

ऐसे घट-घट-व्यापक उस एक परमात्मा की मनुष्यमात्र को विमल भक्ति के साथ उपासना करनी चाहिए और यह ध्यानकर कि वह प्राणीमात्र में व्याप्त है, प्राणीमात्र से प्रीति करनी चाहिए। सब जीवधारियों को प्रेम की दृष्टि से देखना चाहिए। जैसा कि भक्तशिरोमणि प्रह्लादजी ने कहा है-

ततो हरौ भगवति भक्तिं कुरुत दानवा:।
आत्मौपम्येन सर्वत्र सर्वभूतात्मनी श्वरे।।
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रिय: शुद्रा व्रजौकस:।
खगा मृगा: पापजीवा: सन्ति ह्यच्युततां गता:।।
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंस: स्वार्थपर: स्मृत:।
एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत्सर्वत्र तदीक्षणम्। (श्रीमद्भा .७।७।५३--५५)

अतएव हे दानवों! सबको अपने ही समान सुख-दुःख होता है, ऐसी बुद्धि धारण करके सब प्राणियों के आत्मा और ईश्वर भगवान् श्रीहरि की भक्ति करो। दैत्य, यक्ष, राक्षस, स्त्रियाँ, शूद्र, ब्रजवासी गोपाल, पशु, पक्षी और अन्य पातकी जीव भी भगवान् अच्युत की भक्ति से निस्सन्देह मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं। गोविन्द भगवान् के प्रति एकान्त-भक्ति करना और चराचर समस्त प्राणियों में भगवान् है, ऐसी भावना करना ही इस लोक में सबसे उत्तम स्वार्थ है।

सनातनधर्म का मूल
भगवान्वासुदेवो हि सर्वभूतेष्ववस्थित:।
एतज्ज्ञानं हि सर्वस्य मूलं धर्मस्य शाश्वतम्।।

यह ज्ञान कि भगवान् वासुदेव सब प्राणियों के हृदय में स्थित है, सम्पूर्ण सनातनधर्म का सदा से चला आता हुआ और सदा रहने वाला मूल है। इसी ज्ञान को भगवान् ने अपने श्रीमुख से गीता में कहा है- समोऽहं सर्वभूतेषु ( ९।२९) मैं सब प्राणीमात्र में एक समान हूँ। तथा यह कि-

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:।। (गीता ५।१८)

विद्या और विनय से युक्त ब्रह्मण में, गौ-बैल में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में पण्डित लोग समदर्शी होते हैं, अर्थात् सुख-दु:ख के विषय में उनको समान भाव से देखते हैं। तथा यह भी कि-

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःख स योगी परमो मत:।। (गोता ६।३२)

जो पुरुष सबके सुख-दु:ख के विषय में अपनी उपमा से समान दृष्टि से देखता है उसी को सबसे बड़ा योगी समझना चाहिए। इसीलिए महर्षि वेदव्यासजी ने कहा है -

श्रुयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्त्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकुलानि परेषां न समाचरेत्।। (विष्णुधर्मोत्तर. ३।२५५।४४)
न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मन:।
एष सामासिको धर्म: कामादन्य: प्रवर्त्तते।। (महा.अनु.११३।८)

सुनो धर्म का सर्वस्व और सुनकर इसके अनुसार आचरण करो। जो अपने को प्रतिकूल जान पड़े, जिस बात से अपने को पीड़ा पहुँचे, उसको दूसरों के प्रति न करो। दूसरे के प्रति हमको वह काम नहीं करना चाहिए जिसको यदि दूसरा हमारे प्रति करे तो हमको बुरा मालूम हो या दु:ख हो। संक्षेप में यही धर्म है, इसके अतिरिक्त दूसरे सब धर्म किसी बात को कामना से किए जाते हैं।

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रधातयेत्।
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत्।। (महा.शां.५९।२२)

जो चाहता है कि मैं जीऊँ, वह कैसे दूसरे का प्राण हरने का मन करे? जो-जो बात मनुष्य अपने लिये चाहता है उसको चाहिए कि वही-वही बात औरों के लिये भी सोचे।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, धर्म जिनका सब समय में पालन करना सब प्राणियों के लिये विहित है और जिनके उल्लंघन करने से आदमी नीचे गिरता है, इन्हीं सिद्धान्तों पर स्थित हैं। इन्हीं सिद्धान्तों पर वेदों में गृहस्थों के लिये पंचमहायज्ञ का विधान किया गया है कि जो भूल से भी किसी निर्दोष जीव की हिंसा हो जाय तो हम उसका प्रायश्चित करें। जो हिंसक जीव हैं, जो हमारा या किसी दूसरे निर्दोष प्राणी का प्राणघात करना चाहते हैं, या उनका धन हरना या घर्मं बिगाड़ना चाहते हैं, जो हमपर या हमारे देश पर, हमारे गाँव पर आक्रमण करते हैं,- ऐसे लोग आततायी कहे जाते हैं। अपने या अपने किसी भाई या बहिन के प्राण, धन, धर्म, मान की रक्षा के लिये ऐसे आततायी पुरुषों या जीवों का, आवश्यकता के अनुसार आत्मरक्षा के सिद्धान्त पर वध करना धर्म है। निरपराधी अहिंसक जीवों की हिंसा करना अधर्म है।

इसी सिद्धान्त पर वेद के समय से हिन्दू लोग सारी सृष्टि के निर्दोष जीवों के साथ सहानुभूति करते आए हैं। गौ को हिन्दू लोकमाता कहते हैं। क्योंकि वह मनुष्य-जाति को दूध पिलाती है और सब प्रकार से उनका उपकार करती है। इसलिये उसकी रक्षा करना तो मनुष्यमात्र का विशेष कर्त्तव्य है, किन्तु किसी भी निर्दोष या निरपराध प्राणी को मारना, किसी का धन या प्राण हरना, किसी के साथ अत्याचार करना, किसी को झूठ से ठगना, ऊपर लिखे धर्म के परम सिद्धान्त के अनुसार अकार्य, अर्थात् न करने की बातें हैं। और अपने समान सुख-दु:ख का अनुभव करने वाले जीवधारियों को सेवा करना, उनका उपकार, यह त्रिकाल में सार्वलौकिक सत्य घर्म हैं।

इसी मूल सिद्धान्त के अनुसार वेदधर्म के मानने वालों को उपदेश दिया जाता है कि न केवल मनुष्यों को, किन्तु पशु-पक्षियों तथा समस्त जीवों को बलिवैश्वदेव के द्वारा नित्य कुछ आहार पहुँचाना अपना धर्म समझें। यह बात नीचे लिखे श्लोकों से स्पष्ट है।

बलिवेश्वदेव के श्लोक
ततोऽन्यदन्नमादाय भूमिभागे शुचौ पुन:।
दद्यादशेषभूतेभ्य: स्वेच्छया तत्समाहिता:।।
देवा मनुष्या: पशवो वयांसि सिद्धा: सयक्षोरगभूतसघ्ना:।
प्रेता: पिशाचास्तरव: समस्ता ये चान्नपिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।।
पिपीलिका: कीटपतन्गकाद्या: बुभूक्षिता: कर्मनिबन्धबद्धा:।
प्रयान्तु ते तृप्तिमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।।
भूतानि सर्वाणि तथान्नमेतदहं च विष्णुर्न ततोऽन्यदस्ति।
तस्मादहं भुतनिकायभुतमन्नं प्रयच्छामि भवाय तेषाम्।
चतुर्दशो भूतगणो य एष तत्र स्थिता येऽखिलभूतसघ्ना:।
तृप्तयर्थमन्नं हि मया विसृष्टं तेषामिदं ते मुदिता भवन्तु।।
इत्युच्चार्या नरो दद्यादन्नं श्रद्धासमन्वितम्।
भुवि एभूतोपकाराय गृही सर्वाश्रयो यत:।। (विष्णु.३।११।५०-५२, ५४-५६)

और-और यज्ञों को करने के बाद मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार दूसरा अन्न ले, पृथ्वी के पवित्र भाग में रखे, फिर सावधानता पूर्वक समस्त जीवों के लिए बलि दे, और यों कहे- ‘देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, सिद्ध, यक्ष, सर्प, नाग, अन्य भूत-समूह, प्रेत, पिशाच तथा सम्पूर्ण वृक्ष एवं चींटी, कीड़े और पतंगे आदि जीव जो कर्मबन्धन में बँधे हुए भूखे तड़प रहे हों, और मुझसे अन्न चाहते हों, उनके लिये यह अन्न मैंने रख छोड़ा है, इससे उनकी तृप्ति हो और वे सुखी हों। सब जीव, यह अन्न, और मैं, सब विष्णु ही है, उनसे अन्य कुछ भी नहीं है, इस कारण मैं जीवों के शरीरभूत इस अन्न को उन प्राणियों की रक्षा के लिये देता हूँ। यह जो चौदह प्रकार का भूतों का समुदाय है, इसमें जो सम्पूर्ण जीवसमूह स्थित हैं, उनकी तृप्ति के लिये मैंने यह अन्न दिया है। वे प्रसन्न हों।’ मनुष्य यों कहकर प्राणियों के उपकारार्थ पृथ्वी पर श्रद्धापूर्वक अन्न दे, क्योंकि गृहस्थ सबका आधार होता है।

इसी धर्म के अनुसार सनातनधर्मी नित्य तर्पण करने के समय न केवल अपने पितरों का तर्पण करते हैं, किन्तु समस्त ब्रह्माण्ड के जीवधारियों का। यह नीचे लिखे श्लोकों से विदित है, यथा-

देवा: सुरास्तथा यज्ञा नागा गन्धर्वराक्षसा:
पिशाचा: गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:।।
जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तव:।
प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:।।
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिता:।
तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया।

अपनी किरणों से सुख देनेवाला चन्द्रमा अपनी शीतल चाँदनी से रात्रि को ज्योतिष्मती करता हुआ आकाश में सूर्य के समान पूर्व दिशा से पश्चिम दिशा को जाता है। प्रतिदिन रात्रि के आते ही दसों दिशाओं को प्रकाश करती हुई नक्षत्र-तारा-ग्रहों की ज्योति ऐसी शोभा धारण करती है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ये सब तारा-ग्रह सूत में बँधे हुए मार्गों में चलते हुए आकाश में घूमते दिखाई देते हैं। यह प्रत्यक्ष है कि गर्मी की ऋतु में यदि सूर्य तीव्र रूप से नहीं तपता तो वर्षाकाल में वर्षा अच्छी नहीं होती। यह भी प्रत्यक्ष है कि यदि वर्षा न हो तो जगत् में प्राणीमात्र के भोजन के लिये अन्न और फल न हों। इससे हमको स्पष्ट दिखाई देता है कि अनेक प्रकार के अन्न और फल द्वारा सारे जगत् के प्राणियों के भोजन का प्रबन्ध मरीचिमाली सूर्य के द्वारा हो रहा है। क्या यह प्रबन्ध किसी विवेकवती शक्ति का रचा हुआ है जिसको स्थावर-जंगम सब प्राणियों को जन्म देना और पालना अभीष्ट है, अथवा यह केवल जड़ पदार्थो के अचानक संयोगमात्र का परिणाम है? क्या यह परम आश्चर्यमय गोलकमण्डल अपने आप जड़ पदार्थों के एक दूसरे के खींचने के नियम मात्र से उत्पन्न हुआ है और अपने-आप आकाश में वर्ष-से-वर्ष, सदी-से-सदी, युग-से-युग घूम रहा है, अथवा इसके रचने और नियम से चलाने में किसी चैतन्य शक्ति का हाथ है? बुद्धि कहती है कि ‘है’ वेद भी कहते हैं कि 'है' । वे कहते हैं कि सूर्य और चन्द्रमा को, आकाश और पृथ्वी को परमात्मा ने रचा।

सुर्य्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
दिवन्च पृथ्वीन्चान्तरिक्षमथो स्व:।।(ऋग्वेद ८1८।४८।३)

प्राणियों की रचना

इसी प्रकार हम देखते हैं कि प्राणात्मक जगत् की रचना इस बात की घोषणा करती है कि इस जगत् का रचने वाला एक ईश्वर है। यह चैतन्य जगत् अत्यन्त आश्चर्य से भरा हुआ है। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, सिंह, हाथी, घोडे, गौ आदि; अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी; पसीने और मैल से पैदा होनेवाले कीड़े, पृथिवी को फोड़कर उगने वाले वृक्ष; इन सबकी उत्पत्ति, रचना और इनका जीवन परम आश्चर्यमय है। नर और नारी का समागम होता है। उस समागम में नर का एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु चैतन्य अंश गर्भ में प्रवेश कर नारी के एक अत्यन्त सूक्ष्म सचेत अंश से मिल जाता है। इसको हम जीव कहते हैं। वेद कहते हैं कि-

बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च।
भागो जीव: स विज्ञेय: स चान्त्याय कल्पते।। (श्वेता.५।९)

एक बाल के आगे के भाग के खड़े-खड़े सौ भाग कीजिए और उन सौ में से एक के फिर सौ खड़े-खड़े टुकड़े कीजिए तो आपको ध्यान में आवेगा कि उतना सूक्ष्म जीव है। यह जीव गर्भ में प्रवेश करने के समय से शरीर रूप से बढ़ता है। विज्ञान के जानने वाले विद्वानों ने अणुवीक्षण यंत्र से देख कर यह बताया है कि मनुष्य के वीर्य के एक बिन्दु में लाखों जीवाणु होते हैं और उनमें से एक ही गर्भ में प्रवेश पाकर टिकता और वृद्धि पाता है। नारी के शरीर में ऐसा प्रबन्ध किया गया है कि यह जीव गर्भ में प्रवेश पाने के समय से एक नली के द्वारा आहार पावे, इसकी वृद्धि के साथ-साथ नारी के गर्भ में एक जल से भरा थैला बनता जाता है जो गर्भ को चोट से बचाता है। इस सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, अणु-से-अणु, बाल के आगे के भाग के दस हजारवें भाग के समान सूक्ष्म वस्तु में यह शक्ति कहाँ से आती है कि जिससे यह धीरे-धीरे अपनी माता और अपने पिता के समान रूप, रंग और सब अवयवों को धारण कर लेता है? कौन-सी शक्ति है, जो गर्भ में इसका पालन करती और इसको बढ़ाती है? वह क्या अद्भुत रचना है, जिससे बच्चे के उत्पन्न होने के थोड़े समय पुर्व ही माता के स्तनों में दूध आ जाता है? कोन-सी शक्ति है जो सब असंख्य प्राणवन्तों को, सब पशु-पक्षियों को, सब कीट-पतंगों को, सब पेड़-पल्लवों को पालती है और उनको समय से चारा और पानी पहुँचाती है? कौन-सी शक्ति है जिससे चीटियाँ दिन में भी और रात में भी सीधी भीत पर चढ़ती चली जाती हैं? कौन-सी शक्ति है जिससे छोटे-से-छोटे और बड़े-से-बड़े पक्षी अनन्त आकाश में दूर-से-दूर तक बिना किसी आधार के उड़ा करते हैं?

नरों और नारियों की, मनुष्यों की, गौओं की, सिंहों की, हाथियों की, पक्षियों की, कीडों की सृष्टि कैसे होती है? मनुष्यों से मनुष्य, सिंहों से सिंह, घोडों से घोडे, गौओं से गौ, मयूरों से मयूर, हंसों से हंस, तोतों से तोते, कबूतरों से कबूतर, अपने अपने माता-पिता के रंग-रूप अवयव लिए हुए कैसे उत्पन्न होते हैं? छोटे-से-छोटे बीजों से किसी अचिन्त्य शक्ति से बढ़ाए हुए बडे और छोटे असंख्य वृक्ष उगते हैं तथा प्रतिवर्ष और बहुत वर्षों तक पत्ती, फल, फूल, रस, तैल, छाल और लकड़ी से जीवधारियों को सुख पहुँचाते, सैकडों, सहस्त्रों स्वादु, रसीले फलों से उनको तृप्त और पुष्ट करते, बहुत वर्षों तक श्वास लेते, पानी पीते, पृथिवी से और प्रकाश से आहार खींचते प्रकाश के नीचे झूमते-लहराते रहते हैं?

इस आश्चर्यमयी शक्ति की खोज में हमारा ध्यान मनुष्य के रचे हुए एक घर की ओर जाता है। हमारे सामने एक घर बना हुआ है। इसमें भीतर जाने के लिये एक बड़ा द्वार है। इसमें अनेक स्थानों में पवन और प्रकाश के लिये खिड़कियों तथा झरोखे हैं। भीतर बड़े-बड़े खम्भे और दालान हैं। धुप और पानी रोकने के लिये छतें और छज्जे बने हुए हैं। दालान-दालान में, कोठरी-कोठरी में, भिन्न-भिन्न प्रकार से मनुष्य को सुख पहुँचाने का प्रबन्ध किया गया है। घर के भीतर से पानी बाहर निकालने के लिये नालियाँ बनी हुई हैं। ऐसे विचार से घर बनाया गया है कि रहने वालों को सब ऋतु में सुख देवे। इस घर को देख कर हम कहते हैं कि इसको रचने वाला कोई चतुर पुरुष था, जिसने रहने वालों के सुख के लिये जो-जो प्रबन्ध आवश्यक था, उसको विचार कर घर रचा। हमने रचने वालों को देखा भी नहीं, तो भी हमको निश्चय होता है कि घर का रचने वाला कोई था, या है, और वह ज्ञानवान्, विचारवान् पुरुष है।

अब हम अपने शरीर की ओर देखते हैं। हमारे शरीर में भोजन करने के लिये मुँह बना है। भोजन चबाने के लिये दाँत हैं। भोजन को पेट मे पहुँचाने के लिये गले में नाली बनी है। उसी के पास पवन के मार्ग के लिये एक दूसरी नाली बनी हुई है। भोजन को रखने के लिये उदर में स्थान बना है। भोजन पचकर रुधिर का रूप धारण करता है, वह हृदय में जाकर इकट्ठा होता है और वहाँ से सिर से पैर तक सब नसों में पहुँचकर मनुष्य के सम्पूर्ण अंगों को शक्ति, सुख और शोभा पहुँचाता है। भोजन का जो अंश शरीर के लिये आवश्यक नहीं है, उसके मल होकर बाहर जाने के लिये मार्ग बना है। दूध, पानी या अन्य रस का जो अंश शरीर को पोसने के लिये आवश्यक नहीं है, उसके निकलने के लिये दूसरी नाली बनी हुई है। देखने के लिये हमारी दो आँखें, सुनने के लिये दो कान, सुँघने को नासिका के दो रन्ध्र, और चलने-फिरने के लिये हाथ-पैर बने हैं। सन्तान की उत्पत्ति के लिये जनन-इन्द्रियाँ हैं। हम पूछते हैं- क्या यह परम आश्चर्यमय रचना केवल जड़ पदार्थो के संयोग से हुई है या इसके जन्म देने और वृद्धि में, हमारे घर के रचयिता के समान, किन्तु उससे अनन्तगुण अधिक किसी ज्ञानवान्, विवेकावन, शक्तिमान् आत्मा का प्रभाव है?

मन और वाणी की अद्भुत शक्तियाँ

इसी विचार में डूबते और उतराते हुए हम अपने मन की ओर ध्यान देते हैं तो हम देखते हैं कि हमारा मन भी एक आश्चर्यमय वास्तु है। इसकी- हमारे मन को विचारशक्ति, कल्पनाशक्ति, गणनाशक्ति, रचनाशक्ति, स्मृति, धी, मेधा सब हमको चकित करती हैं। इन शक्तियों से मनुष्य ने क्या-क्या ग्रन्थ लिखे हैं कैसे-कैसे काव्य रचे हैं, क्या-क्या विज्ञान निकाले हैं, क्या-क्या आविष्कार किए हैं और कर रहे हैं। यह थोड़ा आश्चर्य नहीं उत्पन्न करता। हमारी बोलने और गाने की शक्ति भी हमको आश्चर्य में डुबा देती है। हम देखते हैं कि यह प्रयोजनवती रचना सृष्टि में सर्वत्र दिखाई पड़ती है और यह रचना ऐसी है कि जिसके अन्त तथा है आदि का पता नहीं चलता। इस रचना में एक-एक जाति के शरीरियों के अवयव ऐसे नियम से बैठाए गए हैं कि सारी सृष्टि शोभा से पूर्ण है। हम देखते हैं कि सृष्टि के आदि से सारे जगत् में एक कोई अद्भुतशक्ति काम कर रही है जो सदा से चली आई है, सर्वत्र व्याप्त है और अविनाशी है।

हमारी बुद्धि विवश होकर इस बात को स्वीकार करती है कि ऐसी ज्ञानात्मिका रचना का कोई आदि, सनातन, अज, अविनाशी, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप, जगत्-व्यापक अनन्त-शक्ति-सम्पन्न रचयिता है। उसी एक अनिर्वचनीय शक्ति को हम ईश्वर, परमेश्वर, परब्रह्म, नारायण, भगवान्, वासुदेव, शिव, राम, कृष्ण, विष्णु, जिहोवा, गौड, खुदा, अल्लाह आदि सहस्त्रों नामों से पुकारते हैं।

वह परमात्मा एक ही है वेद कहते हैं-

एक ही परमात्मा है, कोई उसका दूसरा नाम नहीं। एक ही को विप्र लोग बहुत-से नामों से वर्णन करते हैं। है एक ही, किन्तु उसकी बहुत प्रकार से कल्पना करते हैं।

विष्णुसहस्त्रनाम और शिवसहस्त्रनाम इस बात के प्रसिद्ध उदाहरण है। युधिष्ठिर ने पितामह भीष्म से पूछा कि 'बताइये, लोक में वह कौन एक देवता है? कौन सब प्राणियों का सबसे बड़ा एक शरण है? वह कौन है जिसकी स्तुति करने, तथा जिसको पूजने से मनुष्य का कल्याण होता है?’ इसके उत्तर में पितामह ने कहा-

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।
स्तुवन्नामसहस्त्रेण पुरुष: सततोत्थित:।।
अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नीत्यं सर्वदु:खातिगो भवेता।।
परमं यो महत्तेज: परमं यो महत्तप:।
परमं यो महद्ब्रह्म परम य: परायणम्।
पवित्राणां पवित्रं यो मन्गलानां च मन्गलम्।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्यय: पिता।। (महा.अनु.१४९।४-७)

अर्थात् ‘मनुष्य प्रतिदिन उठकर सारे जगत् के स्वामी, देवताओं के देवता, अनन्त पुरुषोत्तम की सहस्त्र नामों से स्तुति करे। सारे लोक के महेश्वर, लोक के अध्यक्ष (अर्थात् शासन करनेवाले), सर्वलोक में व्यापक विष्णु की, जो न कभी जन्मे हैं, न जिनका कभी मरण होगा, नित्य स्तुति करता हुआ मनुष्य सब दु:खों से मुक्त हो जाता है। जो सबसे बड़े तेज हैं, जो सबसे बड़े तप हैं, सबसे बड़े ब्रह्म हैं और जो सब प्राणियों के सबसे बड़े शरण है। जो पवित्रों में सबसे पवित्र, सब मन्गल बातों के मंगल, देवताओं के देवता और सब प्राणीमात्र के अविनाशी पिता हैं?

इससे स्पष्ट है कि बिष्णुसहस्त्रनाम और शिवसहस्त्रनाम तथा और स्तोत्र सब एक ही परमात्मा की स्तुति करते हैं। और मनुष्यमात्र को उचित है कि नित्य सायंप्रात: उस परमात्मा का ध्यान करे और उसकी स्तुति करे।

परमात्मा की तीन संज्ञाएँ

ह्मा, विष्णु, महेश ये उसी एक परमपिता की तीन संज्ञाएँ, अर्थात् नाम हैं। विष्णुपुराण में लिखा है-

सृष्टिस्थित्यन्तकरणी ब्रह्मविष्णुशिवभिधाम्। स संज्ञां याति भगवानेक एव जनार्दन:।।

वे एक ही जनार्दन भगवान् सृष्टि, पालन और संहार करने वाले ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव नाम की तीन संज्ञा प्राप्त करते हैं। यही बात बृहन्नारदीय पुराण में भी लिखी है-

नारायणोऽक्षरोऽनन्त: सर्वव्यापी निरंजन:।
तेनेदमखिलं व्याप्तं जगत्स्थावरजंगमम्।।
तमादिदेवमजरं केचिदाहु: शिवाभिधम्।
केचिद्विष्णु सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदुच्यते।।

भगवान् नारायण अविनाशी, अनन्त, सर्वत्र व्यापक, तथा माया से अलिप्त हैं, यह स्थावर-जंगमरूप सारा संसार उनसे व्याप्त है। उन जरा रहित आदि देवता को कोई शिव, कोई सदा सत्यस्वरूप विष्णु और कोई ब्रह्मा कहते हैं। इसी प्रकार शिवपुराण में स्वयं महेश्वर का वचन है-

त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्माविष्णुहराख्यया।
सर्गरक्षालयगुणै: निष्कलोऽयं सदा हरे।।
अहं भवानयं चैव रुद्रोऽयं यो भविष्यति।
एकं रूपं न भेदोऽस्ति भेदे च बन्धनं भवेत्।। (२।१।९।२८,३८)

हे विष्णो! सृष्टि, पालन तथा संहार इन तीन गुणों के कारण मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामक तीन भेद से युक्त हूँ। हे हरे! वास्तव में मेरा स्वरूप सदा भेदहीन है। मैं, आप, यह (ब्रह्मा) तथा रुद्र और आगे जो कोई भी होंगे, इन सबका एक ही रूप है, उनमें कोई भेद नहीं है, भेद मानने से बन्धन होता है। भागवत में भी स्वयं भगवान् का वचन हैं-

अहं ब्रह्मा च सर्वश्च जगत: कारणं परम्।
आत्मेश्वर उषद्रष्टा स्वयंदृगविशेषण:।।
आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज।
सृजन् रक्षन् हरन् विश्वंदध्रे संज्ञां क्रियोचिताम्।। (४|७|५०-५१)

हम ब्रह्मा और शिव संसार के परम कारण हैं, हम सबके आत्मा, ईश्वर, साक्षी, स्वयंप्रकाश और निर्विशेष हैं। हे ब्राह्मण! वह मैं (विष्णु) अपनी त्रिगुणमयी माया में प्रवेश करके संसार की सृष्टि, रक्षा तथा प्रलय करता हुआ भिन्न-भिन्न कार्यो के अनुसार नाम धारण करता हूँ। इसलिये ब्रह्या, विष्णु, महेश इनको भिन्न मानना भूल है। ये एक ही परमात्मा की तीन संज्ञाएँ हैं। इसीलिये शिवपुराण में भी लिखा है-

शिवो महेश्वरश्चैव रुद्रो विष्णु: पितामह:।
ससांरवैद्य: सर्वज्ञ: परमात्मेति मुख्यत:।।
नामाष्टकमिदं नित्यं शिवस्य प्रतिपादकम्। (६।९।१-२)

शिव, महेश्वर, रूद्र, विष्णु, पितामह, संसार-वैध, सर्वज्ञ और परमात्मा- ये आठ नाम मुख्य रूप से शिव के बोधक हैं। इसलिये यह स्पष्ट है ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ ‘ॐ नमो नारायणाय’ ‘ॐ नम: शिवाय' ‘श्रीरामाय नम:’ ‘श्रीकृष्णाय नम:’ -ये सब मंत्र एक ही परमात्मा को वन्दना हैं।

विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक्सम्यगवस्थितम्।
सत्यं पूर्षामनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम्।।
ऋषे विदन्ति मुनय: प्रशान्तात्मेन्द्रियाशया:। (२।६।३९,४१)

ज्ञानं मात्रं परं ब्रह्म परेमात्येश्वर: पुमान।
दृश्यादिभि: पृथग्भावैर्भगवानेक ईयते।। (३|३२|३२६१)

ब्रह्म सत्य है, सदा रहा है, है भी, सदा रहेगा भी। वह ज्ञानमय, चैतन्य और आनन्दस्वरूप है। उसका स्वयं शरीर नहीं है, किन्तु विनाशवान् शरीरों में पैठकर वह संसार की लीला कर रहा है। वह केवल निर्मल ज्ञानस्वरूप है, पूर्ण है। उसका आदि नहीं अन्त नहीं। वह नित्य और अद्वितीय है। एक होने पर भी अनेक रूपों में दिखाई देता है।

दूसरे स्थान में कहा है- शरीरों के भीतर बैठा हुआ आत्मा पुराणपुरुष साक्षात् स्वयंप्रकाश, अज, परमेश्वर, नारायण, भगवान्, वासुदेव अपनी माया से अपने रचित शरीरों में रम रहा है। ब्रह्म का पूर्ण और अत्यन्त हृदयग्राही निरूपण-वेद, उषनिषद् और पुराणों का सारांश-भागवत के एकादश स्कन्ध के तीसरे अध्याय में दिया हुआ है।

राजा जनक ने ऋषियों से कहा- ‘हे ऋषिगण! आपलोग ब्रह्मज्ञानियों मे श्रेष्ट हैं, अतएव आप मुझे यह बताइये कि जिनको नारायण कहते हैं उन परब्रह्म परमात्मा का ठीक स्वरूप क्या है?’

पिप्पलायन ऋषि ने कहा- ‘हे नृप! जो इस विश्व के सृजन, पालन और संहार का कारण है, परन्तु स्वयं जिसका कोई कारण नहीं है, जो स्वप्न, जागरण और गहरी नींद की दशाओं में भीतर और बाहर भी वर्तमान रहता है, देह, इन्दिय प्राण और ह्रदय आदि जिससे संजीवित होकर, अर्थात् प्राण पाकर अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं, उसी परमतत्त्व को नारायण जानो। जैसे चिनगारियाँ अग्नि में प्रवेश नहीं पा सकतीं, वैसे ही मन, वाणी, आँखें, बुद्धि, प्राण और इन्द्रियाँ उस परमतत्त्व का ज्ञान ग्रहण करने में असमर्थ हैं और वहाँ तक पहुँच न सकने के कारण उसका निरुपण नहीं कर सकतीं|

वह परमात्मा कभी जन्मा नहीं, न वह कभी मरेगा, न वह कभी बढ़ता है और न घटता है; जन्म-मरण आदि से रहित वह सब बदलती हुई अवस्थाओं का साक्षी है एवं सर्वत्र व्याप्त है, सब काल में रहा है और रहेगा, अविनाशी है और ज्ञानमात्र है। जैसे प्राण एक है तो भी इन्दियों के भिन्न होने से आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, नाक सूंघती है, इत्यादि भावों के कारण एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं, ऐसे ही आत्मा एक होने पर भी भिन्न-भिन्न देहों में अवस्थित होने के कारण भिन्न प्रतीत होता है।

जितने जीव जरायु से उत्पन्न होते हैं- मनुष्य, गौ, घोड़े, हाथी, सिंह, कुत्ते, भेड़, बकरी आदि; जो पक्षीवर्ग अण्डों से उत्पन्न होते हैं, जो कीटवर्ग पसीने, मैल आदि से उत्पन्न होते हैं, और जो वृक्षवर्ग (पेड़-विटप) पृथ्वी को फ़ोड़कर उगते हैं, इन सबों में- सम्पूर्ण सृष्टि में-जहाँ-जहाँ जीव के साथ प्राण दौड़ता हुआ दिखाई देता है, वहाँ-वहाँ ब्रह्म है। जब सब इन्द्रियाँ सो जाती हैं, जब ‘मैं हूँ’ यह अहम्भाव भी लीन हो जाता है, उस समय जो निर्विकार साक्षी रूप हमारे भीतर बैठा हुआ ध्यान में आता है और जिसका हमारे जागने की अवस्था में 'हम अच्छे सोए' 'यह सपना देखा' इस प्रकार की स्मृति होती है, वही ब्रह्म है इत्यादि।

ब्रह्म कहाँ है? वेद कहते हैं-

एक देव: सर्वभूतेषु गूढ: सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्ष: सर्वभूताधिवास: साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। (श्वेता.६।११)

एक ही पत्मात्मा सब प्राणियों के भीतर छिपा हुआ है, सबमें व्याप रहा है, सब जीवों के भीतर का अन्तरात्मा है, जो कुछ कार्य सृष्टि में हो रहा है, उसका नियन्ता है। सब प्राणियों के भीतर बस रहा है, सब संसार के कार्यो का साक्षी रूप में देखने वाला, चैतन्य, केवल, एक, जिसका कोई जोड़ नहीं और जो गुणों के दोष से रहित है। वेद, स्मृति, पुराण कहते हैं कि यह देवों का देव अग्नि में, जल में, वायु में, सारे भुवन में, सब औषधियों में, सब वनस्पतियों में, सब जीवधारियों में व्याप रहा है। कहते हैं-

एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्ट:।
हृदा ह्रदिस्थं मनसा य एवमेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति।।

कि वह परमदेव विश्व का रचनेवाला सदा प्राणियों के हृदय में स्थित है। अपने-अपने हृद्रय में स्थित इस महात्मा को जो शुद्ध हृदय से, विमल मन से अपने में विराजमान देखते हैं, वे अमर होते हैं।

न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिन्गम्।
स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिप:।। (श्वेता.६।९)

लोक में न उसका कोई स्वामी है, न उसके ऊपर आज्ञा चलाने वाला है, न उसका कोई चिह्न है। वही सबका कारण है, उसका कोई कारणा नहीं, उसका कोई उत्पन्न करने वाला नहीं, न उसका कोई रक्षक है।

तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् || (श्वेता.६।७) द

उस सब सामर्थ्य और अधिकार रखने वालों के सबसे बड़े परम ईश्वर, देवताओं के सबसे बड़े देवता, स्वामियों के सबसे बड़े स्वामी, सारे त्रिभुवन के स्वामी परम पूजनीय देव को हम लोगों ने जाना है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं-

सोइ सच्चिदानन्द घन रामा। अज विज्ञान रूप बल धामा।।
व्यापक व्याप्य अखण्ड अनन्ता। अखिल अमोघ सक्ति भगवन्ता।।
अगुण अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।
निर्मल निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख स्न्दोहा।।
प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
इहाँ मोह कर कारण नाहीं। रवि-सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।

सूरदासजी ने कहा है-

जगतपिता जग के आधार।
तुम सबके गुरु सबके स्वामी, तुम सबहिन के अन्तर्यामी।।
हम सेवक तुम जगत अधार, नमो नमो तोहिं बारंबार।
सर्व शक्ति तुम सर्व अधार, तोहिं भजै सो उतरै पार।।
घट-घट माँहिं तिहारो बास, सर्व ठौर जिमि दीप-प्रकास।
एहि बिधि तुमकौं जानैं जोई, भक्त अरु ज्ञानी कहिए सोई।।
जगतपिता तुम ही हौ ईश, याते हम बिनवत जगदीश।
तुम सम द्वितीय और नहिं आहि, पटतर देहि नाथ हम काहि।।
नाथ कृपा अब हम पर कीजै, भक्ति आपनी हमकौं दीजै।
प्रेम भक्ति बिन कृपा न होइ, सर्व शास्त्र में देखै जोइ।।
तपसी तुमको तपकरि पावैं, सुनि भागवत गृही गुण गावैं।
कर्मयोग करि सेवत कोई, ज्यों सेवै त्यों ही गति होई।।
तीन लोक हरि करि विस्तार, ज्योति आपनी करि उँजियार।
जैसा कोऊ गेह सँवार, दीपक वारि करै उँजियार।।
त्यों हरि-ज्योति आप प्रकटाई, घट-घट में सोई दरसाई।
नाथ तिहारी ज्योति-अभास, करत सकल जगको परकास।।
थावर-जंगम जहँलौं भये, ज्योति तुम्हारी चेतन किये।
तुम सब ठौर सबनतें न्यारे, को लखि सके चरित्र तिहारे।।
ये बान्धवाऽबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु यश्चास्मत्तोयमिच्छति।। (विष्णु.३।११।३३-३६)

देवता, दैत्य, यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्ष-वर्ग, पक्षीगण, जल में रहने वाले जीव, बिल में रहने वाले जीव, वायु के आधार पर रहने वाले जन्तु, ये सब मेरे दिए हुए जलसे तृप्त हों। समस्त नरकों की यातना में जो प्राणी दु:ख भोग रहे हैं, उनके दु:ख शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ। जो मेरे बन्धु-बान्धव रहे हों, और जो बान्धव न रहे हों, और जो किसी और जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, उनको तृप्ति के लिये और उनकी भी तृप्ति के लिये, जो मुझसे जल पाने की इच्छा रखते हों, मैं यह जल अर्पण करता हूँ।

वैश्वदेव में जो अन्न कुत्ते और कौवों के लिये निकाला जाता हैं, उसको छोड़कर शेष बलि की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिये वह 'सर्वभूतेभ्य: सब प्राणियों को पहुँच नहीं सकता। तथापि यह जानते हुए भी-बलिवैश्व्देव का करना प्रत्येक गृहस्थ का कर्त्तव्य इसलिये माना गया है कि वह उस पवित्र, उदार भाव को प्रकट करता है कि मनुष्य मानता है कि उसका सब जीवधारियों से भाईपन का सम्बन्ध है और इस भाव को आँसुओं के समान प्रेम के जल से नित्य सींचकर जगत् के आकाश में जीवधारीमात्र में परस्पर भाईपन का भाव स्थापित करने का उत्कृष्ट और प्रशंसनीय मार्ग है।

इस धर्म की उदारता की प्रशंसा कौन कर सकता है? इसकी उदारता इस धर्म के बड़े-से-बड़े परम पूजित आचार्य महर्षि वेदव्यास की, जो 'सर्वभूतहिते रत:’ सब प्राणियों के हित में निरत रहते थे, इस प्रार्थना से भी प्रगट है कि-

सर्वे च सुखिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिदु:खभाग् भवेत्।।

सब प्राणी सुखी हों, सब नीरोग रहें, सब सुख-सौभाग्य देखें, कोई दु:खी न हो। उसी धर्म के प्राणाधार भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने सारे जगत् के प्राणियों को यह निमंत्रण दे दिया है कि- ‘सब और धर्मो को छोड़कर तुम मुझ एक को शरण में आओ। मैं तुम को सब पापों से छुड़ा लूँगा। सोच मत करो, उन्होंने यह भी प्रतिज्ञा की है-

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छातिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय:।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शुद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्।। (गीता १|२९-३२)

कि ‘मैं सब प्राणियों के लिये समान हूँ। न मैं किसी से द्वेष करता हूँ, न कोई मेरा प्यार है। जो मुझको भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ; पापी-से-पापी भी क्यों न हो, यदि वह और सबको छोड़ कर मेरा ही भजन करता है तो उसको साधु ही मानना चाहिए। थोड़े ही समय में वह धर्मात्मा हो जायगा और उसको शाश्वती शान्ति मिल जायगी। हे अर्जुन! मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, जो कोई मेरा भक्त है, उसका बुरा नहीं होगा। हे कुन्ती के पुत्र! मेरी शरण में आकर पापयोनि से उत्पन्न प्राणी भी तथा स्त्री, वैश्य, और शुद्र भी निश्चय सबसे ऊँची गति को पावेंगे।

न्य है वे लोग जिनको इस पवित्र और लोक-प्रेम से पूर्ण धर्म का उपदेश प्राप्त हुआ है। मेरी यह प्रार्थना है कि इस ब्रह्यज्योति की सहायता है सब धर्मशील जन अपने ज्ञान को विशुद्ध और अविचल कर और अपने उत्साह को नूतन और प्रबल कर सारे संसार में इस धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करें और समस्त जगत् को यह विश्वास करा दें कि सबका ईश्वर एक ही है, और वह अंश रुप से न केवल सब मनुष्यों में, किन्तु समस्त जरायुज, अण्डज, स्वेदज, उद्भिज अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष और विटप सबमें समान रुप से अवस्थित है और उसकी सबसे उत्तम पूजा यही है कि हम प्राणीमात्र में ईश्वर का भाव देखें, सबसे मित्रता का भाव रक्खें और सबका हित चाहें। सार्वजनीन प्रेम से इस सत्य ज्ञान के प्रचार से ईश्वरीय शक्ति का संगठन और विस्तार करें। जगत् से अज्ञान को दूर करें, अन्याय और अत्याचार को रोकें और सत्य, न्याय और दया का प्रचार कर मनुष्यों में परस्पर प्रीति, सुख और शान्ति बढ़ावें।। इति शम्।। (काशी, वैशाख शु.९, सं.१९८९)

भगवान् कृष्ण की महिमा

सच्चिदानन्दरूपाय स्थित्युत्पत्त्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयन्नुम:।।

भले लोगों को शरण देने वाले, सत्, चित् और आनन्द स्वरूप, संसार के सृजन, पालन और संहार के कारण, और आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तीनों तापों को दूर करनेवाले भगवान् कृष्ण को हम लोग प्रणाम करते हैं।

इस बात को मैं कई बार कह चुका हूँ कि मनुष्य जाति के इतिहास में जितने पुरुषों की कथा संसार में विदित है, उनमें सबसे बड़े भगवान् कृष्ण हुए हैं। मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्तियों का जितना ऊँचा विकास उनमें हुआ, उतना किसी दूसरे पुरुष में नहीं हुआ। जैसे विमल ज्ञान और जैसी सात्त्विक नीति का उन्होंने उपदेश किया, वैसा किसी और ने नहीं किया। उनकी महिमा के विषय में मैंने अपना सब अभिप्राय दो श्लोकों में लिख दिया है-

सत्यव्रतौ महात्मानौ भीष्मव्यासौ सुविश्रुतौ।
उभाभ्याम्पूजित: कृष्ण: साक्षाद्विष्णुरिति ह्यलम्।
माहात्म्यं वासुदेवस्य हरेरद्भुतकर्मण:।
तमेव शरणं गच्छ यदिश्रेयोऽभिवाञ्छसि।

अर्थात् जिन भगवान् कृष्ण ने अपने प्रकट होने के समय से अन्तर्धान होने के समय तक साधुओं की रक्षा, दुष्टों का दमन, पाप और धर्म की स्थापना आदि अनेक अद्भुत कर्म किए, उनका माहात्म्य केवल इसी बात से भलीभाँति विदित है कि महाभारत के रचयिता श्री वेदव्यास और भीष्म पितामह, जिनका सत्य का व्रत प्रसिद्ध है और जो दोनों कृष्ण के समकालीन थे, और इसलिये जो उनके गुणों से भलीभाँति परिचित थे, दोनों ही महात्माओं ने भगवान् कृष्ण को साक्षात् विष्णु मानकर पूजा है।

जितना ही मैं कृष्ण-चरित्र का मनन करता हूँ, उतना ही यह दृढ़ विश्वास होता जाता है और मेरे हृदय में यही उत्कण्ठा होती है कि किस प्रकार से भगवान् के गुणों और उनके पवित्र उपदेशों का ज्ञान समस्त प्राणियों में फैला दूँ। जैसे मनुष्य कितनी ही बार अमृत का पान कर फिर अमृत के पीने के लिये ही इच्छा करता है, वैसे ही भगवान् कृष्ण के दिव्य चरित्र को बार-बार स्मरण करने पर भी फिर उसके रस को जानने वाला भक्त उनके नाम और गुणों के कीर्त्तन करने से तृप्त नहीं होता। संसार के लिये यह मंगल की बात है कि भगवान् के दिव्य चरित्र का और उनके अमृतमय उपदेश का ज्ञान समस्त संसार में फैलाया जाया।

इस समय मैं भगवान् की अलौकिक बाललीला की चर्चा न करूँगा। वह तो युग-युगान्तर से करोड़ों प्राणियों के कण्ठ से गाई गई है। आज भी अनगिनत प्राणियों के कण्ठो से निकलकर मनुष्यों का अनन्त उपकार करते हैं।

आज मैं कृष्ण-चरित्र के कुछ प्रधान-प्रधान रूप और उपदेशों के प्रति पदकों का ध्यान खीचूँगा। परन्तु कृष्ण-चरित्र के पढ़ने के पूर्व हमको भीष्म का चरित्र पढ़ना आवश्यक है। भीष्म, व्यास और कृष्ण ऐसे तीन महापुरुष एक समय में कहीं दूसरी जगह प्रकट नहीं हुए।

भीष्म की महिमा का वर्णन भगवान् कृष्ण ने स्वयं अपने मुख से बड़े प्रेम और सम्मान के साथ किया है। शान्ति-पर्व में जब भगवान् कृष्ण ने भीष्म से कहा कि आप युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश करें, तो भीष्म पितामह ने कहा कि आपके रहते मैं क्या उपदेश करूँ? और भीष्म ने पूछा कि-

मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुत:।

भवतो वा गुणीर्युक्त: पृथिव्यां पुरुष: क्वचित्।।
त्त्वं हि सर्वगुणै: राजन् देवानप्यतिरिच्यसे।
तपसा हि भवाञ्छक्त: स्त्रष्टुं लोकाञ्चराचरान्।।
किं पुनश्चात्मनो लोकानुत्तमानुत्तमैर्गुणै:।

इस पर भगवान् कृष्ण ने कहा कि हे महाबाहो! मैंने इसीलिये आप में अपनी विपुल बुद्धि रख दी है, जिससे आप ही धर्म का उपदेश करें। जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक आपकी कीर्त्ति अटल रहेगी। उन भीष्म पितामह का सत्य का प्रेम प्रसिद्ध है। उन्होंने अपनी माता और पिता को जो वचन दिया था, उसका जन्मभर प्रतिपालन किया। उन भीष्मपितामह ने अखण्ड ब्रह्यचर्य्य-व्रत का पालन करके जगत् में अपूर्व कीर्त्ति पाई है। उसी स्थल पर भीष्म के प्रति भगवान् कृष्ण ने कहा-

त्त्वं हि धर्ममयो निधि: सर्वभूतहिते रत:।
स्त्रीसहस्त्रै: परिवृतं ब्रह्मचर्य्यव्रते स्थितम्।।

उन भीष्म पितामह ने कैसी कैसी कसौटी के समय में कृष्ण को साक्षात् भगवान् कहकर पूजा है।

महाभारत के सभा-पर्व में सैंतीसवें अध्याय में वैशम्पायनजी कहते हैं कि ‘युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ के प्रारम्भ में, जब सब देवर्षि, महर्षि, राजर्षि, आचार्य, ऋत्त्विक्, स्नातक और मान के योग्य अनन्त पुरूषों की सभा में युधिष्ठिर ने पूछा कि सबसे पहले किसकी पूजा की जाय, उस समय सनातनधर्म के स्वरूप भीष्म पितामह ने विचारकर कहा कि संसार में सबसे अधिक पूजा के योग्य कृष्ण हैं। शिशुपाल ने इस बात का विरोध किया। उस समय भीष्म पितामह ने जो कृषण की महिमा कही है, वह सभा-पर्व के अडतीसवें अध्याय में वर्णित है। उसको पढ़ने से ही उनका महत्त्व ध्यान में आ सकता है। भीष्म पितामह ने कहा है कि उन्होंने प्राण छोड़ने के समय भगवान् कृष्ण का ध्यान किया और भगवान् उनके सामने आकर खड़े हो गए। उस मरण के समय जब कि मनुष्य को अनेक प्रकार की सांसारिक चिन्ताएँ व्याकुल करती हैं, उस समय पितामह ने भगवान् कि वह स्तुति की जिसकी बराबरी का उदाहरण आज तक नहीं मिलता। भीष्म पितामह ने अपने विश्वास और सच्चाई को इसी से प्रकट किया है कि भगवान् कृष्ण के सामने आते ही उन्होंने वासुदेव कृष्ण की स्तुति की।

आरिराधयितु: कृष्णं वाचं जिगदिषामियाम्।
तया व्यास समासिन्या प्रीयताम्पुरुषोत्तम।।

फिर अन्त में कहा-

इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडित:।
वाग्यज्ञेनार्चि्चतो देव: प्रियताम्मे जनार्द्दन।

और वैशम्पायनजी कहते हैं-

एतावदुक्त्त्वा वचनं भीष्मस्तद्रतमानस:।
नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत्तदा।
भवतु ये कृष्णपदं शरणं जरामरणहरणम्।।

अब कृष्ण का प्रथम गुण जिस पर मैं पाठकों का ध्यान खीचूँगा, वह उनकी धर्म में दृढ़ता है। स्वयं भगवान् ने उद्योग-पर्व में कहा है-

नाहं कामान्न संरम्भान्नद्वेषान्नार्थकारणात्।
न हेतुवादाल्लोभाद्वा धर्मं जह्यां कथञ्चन।।

मैं काम से, क्रोध से, द्वेष से, धन के कारण, हेतुवादवश या लालच से धर्म को कभी नहीं छोड़ सकता।

जन्म के समय परीक्षित निष्प्राण बालक हुआ था, उसको भगवान् कृष्ण ने अपने योगबल से जिला दिया था। उस समय का भगवान् का वचन है कि जैसा सत्य और धर्म मुझमें प्रतिष्टित रहते हैं, अर्थात् मैं कभी और धर्म के विरुद्ध नहीं चलता, यदि यह बात सत्य है, तो यह अभिमन्यु का मरा हुआ बालक जी उठे। धर्म को कृष्ण भगवान् सबसे ऊपर मानते थे। इस बात का यह भी प्रमाण है कि जब छ: महीने की तपस्या के उपरान्त शिवजी ने भगवान् कृष्ण को दर्शन दिया और कहा कि इच्छा के अनुसार वरदान माँगो, तो पहला वरदान कृष्ण ने ‘धर्म’ दृढत्त्वं’ अर्थात् सदा धर्म में दृढ़ता का वरदान माँगा।

दूसरा गुण भगवान् का सत्य-प्रेम है। द्रोपदी के उत्तर में भगवान् ने कहा है-

एष ह्योषां समस्तानां तेजोबलपराक्रमै:।
मध्ये तपन्निवाभाति ज्योतिषामिव भास्कर:।।
असुर्य्यमिव सुर्य्येण निर्वात इव वायुना।।
भासितं ह्लादितञ्चैव कृष्णेनेदं सदो हि न:।।

फिर आगे कहा था-

पूजितायाञ्च गोविन्दे हेतूद्वावपि संस्थितौ।
वेदवेदांगविज्ञानं बलञ्चाप्यधिकं तथा।।
नृणां लोके हि कौऽन्योऽस्ति विशिष्ट: केशवादृते।।

इस प्रकार उन्होंने समझाया कि हमारे ही लिये कृष्ण सबसे अधिक पूजा के योग्य नहीं हैं, बल्कि ये महापुरुष तो तीनों लोकों से पूजा योग्य हैं। मैंने बहुत से ज्ञान-वृद्ध पुरुषों की सेवा की है और मैंने उनको इकट्ठा होकर श्रीकृष्ण के बहुत से गुणों का वर्णन करते सुना है और कृष्ण ने जन्म से ही जो-जो अद्भुत कार्य किए हैं, उनको भी मैंने बहुत बार लोगों को कहते सुना है। हे शिशुपाल! हम कृष्ण की इसलिये पूजा करते हैं कि वे पृथ्वी पर सब प्राणियों को सुख पहुँचाने वाले हैं और उनके यश को, उनकी शूरवीरता को और उनकी जय को समझ करके सत्पुरुषों ने उनको पूजा है, इसलिये हम उनकी पूजा करते हैं। ब्राह्मणों में जिसका ज्ञान अधिक हो, उसका मान अधिक होता है, क्षत्रियों में जिसका बल अधिक हो, वैश्यों में जो धनधान्य से सम्पन्न हो, और शूद्रों का केवल उनके आचरण से मान होता है। कृष्ण के पूजनीय होने के दोनों ही कारण हैं, वेद-वेदांग का ज्ञान और सबसे अधिक बल। संसार में ऐसा कौन है जो कृष्ण के समान गुण-सम्पन्न हो। इनमें दानशीलता है, निपुणता है, शास्त्र का ज्ञान है, बल है, नम्रता है, यश है, उत्तम बुद्धि है, विनय है, लक्ष्मी है, धैर्य है, सन्तोष है, हृष्टि-पुष्टि है। ये सब गुण सदा केशव में पाए जाते हैं। ये आचार्य, पिता, गुरु, अर्घ पाने के योग्य, पूजे हुए और पूजा के योग्य, प्रजा-पालक और लोक-प्रिय हैं। इसलिये हमने इनको पूजा के योग्य माना है। इसी बात को धर्मराज युधिष्ठिर ने भी कहा था-

यो वै कामान्न भयान्न लोभन्नान्यकारणात्।
अन्यायमनुवर्त्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुप:।।
धर्मज्ञो धृतिमान्प्राज्ञ: सर्वभूतेषु केशव:।
ईश्वर: सर्वभूतानां देवदेव: सनातन:।।

भीष्म पितामह के इस विश्वास की दृढ़ता और सचाई की कसौटी में उत्साह देने के लिये उनके साथी बने। जब महाभारत में दोनों दलों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हो गईं और सम्बन्धियों और मित्रों को लड़ने के लिये और मरने के लिये तैयार देखकर अर्जुन के मन में विषाद हुआ कि लड़ाई न लड़ें, तब भगवान् कृष्ण ने उनको यह ऊँचा उपदेश दिया जो भगवद्गीता के नाम से जगत् को पावन कर रहा है। यह उसी उपदेश का फल था कि अर्जुन के हृदय का सब सन्देह मिट गया और वे लड़ने के लिये खड़े हो गए और उन्होंने विजय प्राप्त की। अर्जुन और कृष्ण के इस सम्बन्ध को और उसको लोकोत्तम फल को भगवान् वेदव्यास ने गीता के नीचे लिखे श्लोक में कूजे में मिश्री के समान भर दिया है-

यत्र योगेश्वर: कृष्ण: यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयोभूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।

जहाँ योगेश्वर कृष्ण हों, जहाँ गाण्डीवधारी अर्जुन हों, जहाँ मष्तिष्क-बल, हृदय-बल और बाहु-बल एकत्र हों- वहाँ लक्ष्मी है, वहाँ विजय है, वहाँ विभूति है और निश्चित नीति है। ये कृष्ण प्राणी-प्राणी के हृदय में बैठे हुए हैं। स्वयं भगवान् का वचन है- ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्ज्जुन तिष्ठति। हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में बैठा है। इस बात को स्मरण रखते हुए कि ईश्वर हृदय में बैठा हुआ है और गाण्डीवधारी अर्जुन के समान बाहुबल का प्रयोग करते हुए, जो प्राणी धर्म-युद्ध उपस्थित होने पर क्रोध और अमर्ष को छोड़कर युद्ध करेगा, वह अवश्य विजय पावेगा। भगवान् कृष्ण में भीष्म पितामह की कैसी भक्ति थी, यह भीष्मस्तवराज से विदित है, जिसके द्वारा भीष्म ने मरने के समय भगवान् कृष्ण की स्तुति की थी और जो स्तोत्रों में एक अति उत्तम स्तोत्र हैं। उस स्तोत्र में से मैं केवल दो श्लोक लिखकर इस लेख को समाप्त करता हूँ

अतसीपुष्पसन्काशं पीतवाससमच्युतम्।
ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भयम्।।
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमोनम:।।

तीसी के फूल के समान जिसका वर्ण है, जो पीताम्बर को धारण किए हुए हैं, ऐसे अच्युत गोविन्द को जो नमस्कार करते हैं, उनको किसी प्रकार का भय नहीं रहता। जो व्रह्मण्यदेव हैं और गौ और ब्राह्मण के हित की रक्षा और उपकार करने वाले हैं और सारे जगत् के प्राणियों का हित करने वाले हैं, ऐसे कृष्ण को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ।

कृष्ण ने स्वयं उद्योगपर्व में कहा है-

चलेद्धि हिमवाञ्छैलो मेदिनी शतधा भवेत्।
द्यो: पतेत्सनक्षत्रा न मे मौघं वचो भवेत्।।

हिमवान् पर्वत चल जाय तो चल जाय, पृथ्वी सौ टूक हो जाय तो हो जाय, आकाश नक्षत्रों के साथ गिरे तो गिरे, परन्तु मेरा वचन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिये उद्योग-पर्व में अर्जुन ने कहा है-

यत: सत्यं यतो धर्मो यतो ह्लीरार्जवं यत:।
ततो भवति गोविन्दो यत: कृष्णस्ततो जय:।।

जहाँ सत्य है, जहाँ धर्म हैं, जहाँ लज्जा है, जहाँ नम्रता है, वहाँ गोविन्द हैं और जहाँ गोविन्द हैं वहीं विजय है। एक तीसरा गुण भगवान् का, जिसका मैं पाठकों को स्मरण कराना चाहता हूँ, वह अक्रोध है। वह क्रोध के वश कभी नहीं आते थे। उद्योग-पर्व में लिखा है-

सत्कृतोऽसत्कृतो वापि न क्रुध्येत जनार्दन:।
नालमेवमवज्ञातुं नावज्ञेयो हि केशव:।।

उनका कोई सत्कार करे या न करे, कृष्ण कभी क्रोध नहीं करते। उनका अनादर कोई नहीं कर सकता। उनका अनादर करना सम्भव ही नहीं।

कृष्ण का चतुर्थ गुण, उनका असीम धैर्य था। किसी अवस्था में भी कृष्ण घबराए नहीं। कितने ही शत्रुओं के बीच में क्यों न हों, कैसा ही संकट क्यों न दिखाई पड़ता हो, उनका धैर्य कभी नहीं डिगता था। तभी अर्जुन ने कहा था-

अनन्ततेज: गोविन्द: शत्रुपूंगेषु निणर्यय:।
पुरूष: सनातनतयो यत: कृष्णस्ततो जय:।।

कृष्ण के तेज का वारापार नहीं था। कितने ही शत्रुओं से वे घिरे हों, उसके कारण उनके चित्त में कभी घबराहट नहीं होती थी। वे सनातन पुरुष थे- परमात्मा के रूप थे। जहाँ कृष्ण थे- वहाँ विजय निश्चित थी। इस छोटे लेख में भगवान् कृष्ण के अनन्त गुणों का वर्णन करना सम्भव नहीं है, इसलिये इस प्रयास को मैं यहीं समाप्त करता हूँ। (कृष्णाष्टमी सं.१९९२)। ‘सनातनधर्म’ सप्ताहिक वर्ष २, अंक ७, ३० अगस्त १९३४

हिन्दू धर्मोपदेश:

सघ्ने शक्ति: कलौ युगे।

हिताय सर्वलोकानां निग्रहाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय प्रणम्य परमेश्वरम।।
ग्रामे ग्रामे सभा कार्या ग्रामे ग्रामे कथा शुभा।
पाठशाला मल्लशाला प्रतिपर्व महोत्सव:।।
अनाथा: विधवा: रक्ष्या: मन्दिराणि तथा च गौ:।
धर्म्यंसंघटनं कृत्त्वा देयं दानं च तद्धितम्।।
स्त्रीणां समादर: कार्यों दु:खितेषु दया तथा।
अहिंसका न हन्तव्या आततायी वधार्हण:।।
अभयं सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं धृति: क्षमा।
सेव्या: सदाऽमृतमिव स्त्रीभिश्च पुरुषैस्तथा।।
कर्मणां फलमस्तीति विस्मर्तव्यं न जातु चित्।
भवेत्पुन: पुनर्जन्म मोक्षस्तदनुसारत:।।
स्मर्तव्य: सततं विष्णु: सर्वभूतेष्ववस्थित:।
एक एवाऽद्वितीयो य: शोकपापहर: शिव:।।
‘पवित्राणां पवित्रं यो मन्गलानां च मन्गलम्।
दैवतं देवतानां च लोकानां योऽव्यय: पिता'।।
सनातनीया: सामाजा: सिक्खा: जैनाश्च सौगता:|
स्वे स्वे कर्मण्यभिरता: भावयेयु: परस्परम्।।
विश्वासे दृढ़ता स्वीये परनिन्दा विवर्जनम्।
तितिक्षा मतभेदेषु प्राणिमात्रेषु मित्रता।।
‘श्रुयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्त्वा चाप्यवधार्यताम्।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मन: कर्म पूरुष:।
न तत्परस्य कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मन:।।
जीवितं य: स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रघातयेत्|
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत्’।।
न कदचिद्विभेत्त्वन्यान्न कन्चन विभीषयेत्।
आर्यवृत्तिं समालम्ब्य जीवेत्सज्जनजीवनम्।।
सर्वे च सृखिन: सन्तु सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तुमा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्।।
इत्युक्त लक्षणा प्राणिदु:खध्वंसनतत्परा।
दया बलवतां शोभा न त्याज्या धर्मचारिभि:।।
पारसीयैर्मुसल्मानैरीसाईयैर्यहुदिभि:|
देशभक्तैर्मिलित्त्वा च कार्या देशसमुन्नति:||
पुण्योऽयं भारतोवर्षो हिन्दुस्थान: प्रकीर्तित:।
वरिष्ठ: सर्वदेशानां धन-धर्म-सुखप्रद: ।।
‘गायन्ति देवा: किल गीतकानि। धन्यास्तु ये भारतभूमि भागे।।
स्वर्गापवर्गस्य च हेतुभूते। भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्त्वात्।।
मातृभूमि: पितृभूमि: कर्मभूमि: सुजन्मनाम्
भक्तिर्महति देशोऽयं सेव्य: प्राणैर्धनैरपि।।
चतुर्वणर्यं यत्र सृष्ट गुणकर्मविभागश:।
चत्त्वार आश्रमा: पुण्या: चतुर्वर्गस्य साधका:।।
उत्तम: सर्वधर्माणां हिन्दूधर्मोऽयमुच्यते।
रक्ष्य: प्रचारणीयश्च सर्वलोकहितैषिभि:।।

हिन्दी-अनुवाद

कलियुग में एकता ही में शक्ति है।

परमेश्वर को प्रणाम कर, सब प्राणियों के उपकार के लिये, बुराई करनेवालोंको दबाने के लिये, धर्म संस्थापना के लिये, धर्म के अनुसार संगठन-मिलाप कर गाँव-गाँव में सभा करनी चाहिए, गाँव-गाँव में कथा बिठानी चाहिए, गाँव-गाँव में पाठशालाखोलनी चाहिए, गाँव-गाँवमें अखाड़ा खोलना चाहिए और पर्व-पर्व पर मिलकर बड़ाउत्सव मनाना चाहिए।

सब भाइयों को मिलकर अनाथों, विधवाओं, मन्दिरों और गौ की रक्षा करनीचाहिए और इन सब कामों के लिये दान देना चाहिए। स्त्रियों का सम्मान करना चाहिए।दुखियों पर दया करनी चाहिए। उन जीवों को नहीं मारना चाहिए जो किसी पर चोटनहीं करते। मारना उनको चाहिए जो आततायी हों, अर्थात् जो स्त्रियों पर या किसी दूसरेके धन, धर्म या प्राण पर वार करते हों, या किसी के घर में आग लगाते हों। यदि ऐसेलोगों को मारे बिना अपना या दूसरों का धर्म, धन या मान न बच सके तो उनको मारना धर्म है।

स्त्रियों तथा पुरुषों को भी निडरपन, सच्चाई, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य,धीरज और क्षमा का अमृत के समान सदा सेवन करना चाहिए। इस बात को कभी न भूलना चाहिए कि भले कर्मों का फल भला और बुरे कर्मों का फल बुरा होता है, और कर्मोंके अनुसार ही प्राणी को बार-बार जन्म लेना पड़ता है या मोक्ष मिलता हैं।

घट-घट मे बसने वाले भगवान्विष्णु का, सर्वव्यापी ईश्वर का सुमिरन सदाकरना चाहिए, जो कि एक ही अद्वितीय है, अर्थात् जिनके समान दूसरा कोई नहीं औरजो दुःख औऱ पाप के हरने वाले शिवस्वरूप हैं। जो सब पवित्र वस्तुओं से अधिकपवित्र, जो सब मंगल कर्मों के मंगलस्वरूप, जो सब देवताओं के देवता हैं और जोसमस्त संसार के आदि सनातन अजन्मा अविनाशी पिता हैं।

सनातनधर्मी, आर्यसमाजी, ब्रह्मसमाजी, सिक्ख, जैन और बौद्ध आदि सबहिन्दुओंको चाहिए कि अपने विशेष धर्म का पालन करते हुए एक दूसरे के साथ प्रेमऔर आदर से बरतें। अपनेविश्वास में दृढ़ता, दूसरे की निन्दा का त्याग, मतभेद में (चाहे वह धर्म-सम्बन्धी हो या लोक-सम्बन्धी) सहनशीलताऔर प्राणीमात्र से मित्रतारखनी चाहिए।

धर्म के सर्वस्व को सुनो और सुनकर उसके अनुसार आचरण करो। जो कामअपने को बुरा या दुखदायी जान पड़े उसको दूसरे के साथ न करो। मनुष्य को चाहिएकि जिस काम को वह नहींचाहता है कि कोई दूसरा उसके साथ करें, उस काम को वह भी किसी दूसरे के प्रति न करे। क्योंकि वह जानता है कि यदि उसके साथ कोई ऐसी बात करता है जो उसको प्रिय नहीं हैं, तो उसको कैसी पीड़ा पहुँचती हैं।

जो चाहता है कि मैंजीऊँ वह कैसे दूसरे का प्राण हरने का मन करे?जो-जो बात मनुष्य अपने लिये चाहता है वही-वही औरों के लिये भी सोचनी चाहिए।

मनुष्य को चाहिए कि न कोई किसी से डरे,न किसी को डर पहुँचावे।श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश के अनुसार आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों की वृत्ति में दृढ़ रहतेहुए ऐसा जीवन जीवे जैसा सज्जन को जीना चाहिए।

हरएक को उचित है कि वह चाहे कि सब लोग सुखी रहें, सब नीरोग रहें,सबका भला हो। कोई दु:ख न पावे। प्राणियों के दु:ख को दूर करने में तत्पर, यह दयाबलवानो की शोभा है। धर्म के अनुसार चलनेवालों को कभी इसका त्याग नहीं करनाचाहिए।

देश की उन्नति के कामों में जो पारसी, मुसलमान, ईसाई, यहूदी देशभक्त होंउनके साथ मिलकर भी काम करना चाहिए।

यह भारतवर्ष जो हिन्दुस्थान के नाम से प्रसिद्ध है, बड़ा पवित्र देश है। धन,धर्मऔर सुख का देनेवाला यह देश सब देशों से उत्तम है। ‘कहते हैंकि देवता लोगयह गीत-गाते हैं कि वे लोग धन्य हैंजिनका जन्म इस भारतभूमि में होता है, जिसमेंजन्म लेकर मनुष्य स्वर्ग का सुख और मोक्ष दोनों को पा सकता हैं|’

यह हमारीमातृ-भूमि है, यह हमारी पितृ-भूमि है। जो लोग सुजन्मा हैं-जिनके, जीवन बहुत अच्छे हुए हैं, राम, कृष्ण, बुद्ध आदि महापुरूषों के, महात्माओं,आचार्यो,, ब्रह्मर्षियों और राज़र्षियों के, गुरुओं, धर्मवीरों, शुरवीरों, दानवीरों के, स्वतंत्रताके प्रेमी देशभक्तों के उज्ज्वल कामों की यह कर्म-भूमि है। इस देश में हमको परमभक्ति करनी चाहिए और प्राणों से और धनसे भी इसकी सेवा करनी चाहिए।

जिस धर्म में परमात्मा ने गुण और कर्म के विभाग से ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शुद्र ये चार वर्ण बनाए और जिसमें धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थोंके साधन में सहायक,मनुष्य का जीवन पवित्र बनाने वाले ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ,और सन्यास, ये चार आश्रम स्थापित हैं| सब धर्मो से उत्तम, इसी घर्म को हिन्दूधर्म कहते हैं। जो लोग सारे संसार का उपकार चाहते हैं,उनको उचित है कि इस धर्म की रक्षा और इसका प्रचार करें।

सन्तान क्री प्रार्थना

आर्य-सन्तान में से प्रत्येक युवती और युवा को, जिनका विवाह हो गया हैऔर जो चाहते हैं कि उनकी सन्तान देशभक्त, वीर, धीर, विद्वान् और धर्म में दृढ़ हो,उनको प्रतिदिन स्नान के उपरान्त सूर्य के सामने खड़े होकर परमात्मा का ध्यान करनीचे लिखी प्रार्थना करनी चाहिए।

प्रार्थना

रवि शशि सिरजनहार प्रभु, मैं बिनवत हौं तोहिं।
पुत्र सूर्यसम तेजयुत जगउपकारी होहिं।।
होय पुत्र प्रभु रामसम अथवा कृष्ण समान|
वीर धीर बुध धर्मदृढ़ जगहित करै महान||
जो पै पुत्री होय तो सीता सती समान|
अथवा सावित्री सदृश धर्म शक्ति गुन खान||
रक्षा होवै धर्मकी बढ़ै जाति को मान|
देश पूर्ण गौरव लहै जय भारत सन्तान||
मैं दुर्बल अति दीन प्रभु पै तुव शक्ति अपार|
हरहु अशुभ शुभ दृढ़ करहु बिनवहुँ बारम्बार||

जन्म-संस्कार

सन्तान का जन्म होते ही नाल छेदन के पहिले हरएक बच्चे के एक-एककान में तीन-तीन बार परमात्मा के सबसे उत्तम नाम 'राम' इस महामंत्र को कहकरउसको नीचे लिखे श्लोक या दोहों से आशीर्वाद देना चाहिए और जब तक बच्चा स्वयम् राम-राम कहने न लगे तबतक माता को नित्य एक बार ऐसा ही करना चाहिए। –

श्लोक

रमते सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।
अन्तरात्मस्वरुपेण यो हि राम: प्रकीतर्यते।।
तस्यैवांशौऽसिजीव त्त्वंसच्चिदानन्दरुपिण:।
देहे निरामये दीर्घं वस धर्मे दृढो भव।।

दोहा

थावर जंगम जीवमें घट-घट रमता राम।
सत-चित-आनन्द-घन प्रभू सब विधि पूरण काम।।
अंश उसीके जीव हो करो उसीसे नेह।
सदा रहो दृढ़ धर्म चिर वसो निरामय देह।।

ईश्वर का ध्यान

राम ब्रह्म चिन्मय अविनासी।सर्वरहित सब उरपुर बासी।।
आदि अन्त कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।
बिनु पद चलइसुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करै बिधि नाना||
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु वानी वकता बड़ जोगी।।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहीं बरनी।।

विद्यारम्भ-संस्कार

शास्त्र कहते हैं-

विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्त्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं तत: सुखम्।।

गरुड़पुराणमें लिखा है-

इहाऽमूत्र सुखक्षेममाहुर्विद्याधनं धनम्।
विद्ययाऽमलया युक्तों विमुक्तिंयाति संयमी।।
विद्यया च सुखं गच्छेत् विद्यया च परान्गतिम्।

एक दूसरे पुराण में लिखा है-

अन्त्यजा अपि यां प्राप्य मोदन्ते ग्रहराक्षसै:।
सा विद्या केन मीयेत यस्या: कोऽन्य: समोऽपि: न।।

विद्या से विनय होता है, विनय से मनुष्य पात्र (योग्य) बनता है, योग्यता से धनप्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और उससे सुख होता है। विद्यारूपी धन बड़ा धन है।वह इस लोक में और परलोक में भी सुख और कल्याण का देनेवाला है। विमल विद्याके ही द्वारा सन्यासी मूक्ति पाता है, विद्या से ही मनुष्य सुख पाता है, और इसी के द्वारापरम गति को पाता है। जिस विद्या को पाकर अन्तयज लोग भी ग्रहराक्षसों के अर्थात् बड़े-बड़े लोगों के साथ सुख से मिलते डोलते हैं उस विद्या की किससे तुलना की जाय। उसकेबराबर कोई नहीं। इसलिये जो लोग इस लोक मेंधन, धर्म, सुख और सन्मान चाहते हैंउनको उचित है कि अपने बालकों और बालिकाओं को विद्या अवश्य पढावें। विष्णुधर्मोत्तर में लिखा है-

विद्या कामदुघा धेनुर्विद्याचक्षुरनुत्तमम्।

विद्या मनवांछित फल कीदेने वाली कामधेनु है और विद्या सबसे उत्तम ज्ञान देने वाला नेत्र है। मार्कण्डेय मुनि ने लिखा है कि-

प्राप्ते तु पंचमे वर्षे विद्यारम्भं तु कारयेत्।
पूजयित्त्वा। हरिंलक्ष्मी देवीं चापिसरस्वतीम्।।

जब बालक का पाँचवाँ वर्ष आरम्भ हो तो विद्यागुरु परमेश्वर की,लक्ष्मीजी की और सरस्वती देवी की पूजाकर उसको पढ़ना प्रारम्भ करना चाहिए। उचित है कि बालकोंको कम-से-कम पाँच वर्ष से चौदह वर्ष तक पढाया जाय।

देवनागरी-वर्णमाला

देवनागरी अक्षर संसार के सब अक्षरों से अधिक सरल और स्पष्ट हैं। एकमहीने में बालक उन अक्षरों को सीख लेते हैं। इन्हीं अक्षरों में हिन्दुओं के सब धर्मशास्त्रऔर समस्त ग्रन्थ लिखे हुए हैं। प्रत्येक हिन्दूको उचित है कि अपनी सन्तान को पहलेइन्हीं नागरी अक्षरों का लिखना और पढ़ना सिखाकर तब किसी दूसरी भाषाके अक्षरों को सिखावे।

धर्म-महिमा

विद्या रूपं धनं शौर्य कुलीनत्त्वमरोगिता।
राज्यं स्वर्गश्च मोक्षश्च सर्वं धर्मादवाप्यते।।
तस्मात्सर्वात्मना धर्मं नित्यं तात समाचर।
मा धर्मविमुख: प्रेत्य तमस्यन्धे पतिष्यसि।।

धर्म से विद्या, रूप, धन, शूरता, कुलीनता, निरोगता, राज्य, स्वर्ग और मोक्षसब प्राप्त होता है। इसलिये,हे पुत्र! नित्य हृदय से धर्म का आचरण करो। धर्म सेविमुख होकर अधर्म मत करो, नहीं तो घोर नरक में गिरोगे।

वेदव्यासजी का वचन है-न जातु कामान्न भयान्न लोभात् त्यजेद्धर्मं जीवितस्यापिहेतो:। किसी सुख या सम्पत्ति पाने कीइच्छा से, या डर से, या लालच से और प्राण के बचाने के लिये भी धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो दृढ़ राखै धर्म को तेहि राखै करतार। जो अपने धर्म में दृढ़ रहता है उसकी परमात्मा रक्षा करते हैं। मनुष्य का सबसे बड़ाधन धर्म है। इसीलिये बड़े और छोटे कितने प्राणियोंने संकट पड़ने पर अपने प्राण दे दिए, किन्तु अपना धर्म नहीं छोडा। न केवल इस लोक में किन्तु परलोक में भी साथ देनेवाला एक धर्म ही है। इसलिये भक्तलोग प्रार्थना करते हैं कि- सिर जावै तो जाय प्रभु मेरो धर्म न जाय।

मंत्र-संस्कार

हरएक हिन्दू सन्तान का धर्म है कि वह अपने बालक और बालिकाओं काउनका आठवाँ वर्ष प्रारम्भ होते ही किसी सद्गुरु के द्वारा मन्त्र-संस्कार करा दे।

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ ‘ॐ नमो नारायणाय’ ‘ॐ नम: शिवाय’और‘श्री रामाय नम:’इन मंत्रों के ग्रहण करने का और जपने का अधिकार ब्राह्मण से लेकरचाण्डालपर्यन्त सबको है। चारों वर्णों के पुरुषों और स्त्रियों के लिये ये मंत्र मंगलकारीहैं। इन मंत्रों के द्धारा बालक और बालिका को जगत्पिता परमात्मा का ज्ञान करा देनामाता, पिता, गुरु आदि का परम कर्त्तव्य है।

प्रात:काल 'ॐ नमो नारायणाय'इस मंत्र के द्वारा सूर्य के सामने खड़े होकरईश्वर को सूर्यमण्डलमें विराजमान ध्यान कर अर्घ्यदेना चाहिए। और अर्घ्यदेकर एकसौ आठ बार या कम-से-कम दस बार मंत्र जपना चाहिए। सायंकाल फिर पवित्रहोकर सूर्य के सामने खड़े होकर ईश्वर को सूर्यमण्डल में विराजमान ध्यान कर अर्घ्यदेना चाहिए और 'ॐ नम: शिवाय'इस मंत्र को एकसौ बार या कम-से-कमदस बार जपना चाहिए। जिनका वैदिक विधि से उपनयन-संस्कार हुआ है, उनको वैदिक विधि सेसंध्या करने के उपरान्त इन मंत्रों के द्वारा ईश्वर का ध्यान करना चाहिए। मनुष्य के मनको पवित्र करने, पाप से छुटाने,धर्म के मार्ग में ले जाने और ईश्वर का ज्ञान और ध्यानकराने के लिये ये मंत्र परम साधन हैं।

प्रायश्चित्त और सन्ध्या

रात्रि में पुरुष या स्त्री से जो पाप या भूल हो जाय उसका प्रातःकाल उठकरनहा-धोकर पछतावा करना चाहिए और ईश्वर से उस पाप या भूल के लिये क्षमा माँगनीचाहिए और यह संकल्प करना चाहिए कि फिर पाप या भूल न होवे। इस प्रकार से तनऔर मन को पवित्र कर 'ॐ नमो नारायणाय' इस मंत्र से सर्वव्यापक और सूयंमण्डलमें प्रकाशमान ईश्वर का ध्यान कर श्रद्धा और भक्ति से जल और फूल से अर्घ्य देकरमंत्र के द्वारा उनकी उपासना करनी चाहिए। इसी प्रकार दिन में जो पाप या भूल बन पड़े उसका प्रायश्चित्त सायंकालसन्ध्याके द्वारा करना चाहिए और सब पवित्रता और मंगल के निधान परब्रह्म का 'ॐनम: शिवाय'इस मंत्र के द्वारा पूजन और ध्यान करना चाहिए। नारायण, वासुदेव, रुद्र,बिष्णु, पितामह, राम, कृष्ण, शिव, ईश्वर, परमेश्वर, परब्रह्म, आदिदेव, महादेव, यह सबएक ही जगत्पिता के अनेक नाम हैं। इनमें भेदभाव समझना भूल है। जो पुरुष और स्त्री ऊपर लिखी विधि से सबेरे और साँझ को मन, वचन से,या काया से, भूल से या जानकर भी जो पाप हुए हैंउनका प्रायश्चित्त करते रहते हैंउनका मनपाप में लिप्त नहीं होता और प्रतिदिन ईश्वर के ध्यान से उनका मन पवित्रऔर प्रकाशमय होता जाता है। इसलिये जो अपना भला चाहता है, उस प्रत्येक प्राणी को नित्य नियम और श्रद्धा के साथ ऊपर लिखी विधि से सन्ध्या और परमात्मा की उपासनाकरनी चाहिए।

एकादशी-व्रत

मनुष्य अपने कपड़े को रोज धोता है, तथापि कई दिन पहन चुकने के बादजब कपड़ाअधिक मैला हो जाता है तो उसको चौथे, आठवें या पन्द्रहवें दिन साबुनया रीठे से धोता है या धूलवाता है, और उस कपड़े की मैल जो नित्य धोने पर भी बचरही है वह निकल जाती है। इसी प्रकार ऋषियों ने मनुष्यमात्र केहित के लियेप्रात:काल और सायंकाल की सन्ध्या और उपासना विधि के अतिरिक्त पन्द्रहवें दिनएकादशी व्रत का विधान किया है। इस एकादशी व्रत कीबड़ी महिमा है। चौदह दिनमें जो कुछ पाप या भूल बनी हो उसके प्रायश्चित्त के लिये इस एकादशी के व्रत कीविधि कही गई है। इस तिथि को हरिवासर, आर्थत्ईश्वर का दिन कहते हैं। इसका यहअभिप्राय है कि यद्यपि ईश्वर का ध्यान और पूजन प्रतिदिन करना चाहिए तथापि पन्द्रहवेंदिन अपने नित्य के काम और व्यापार से मन को खींचकर धर्म के भाव से विशेषभावित होना,पन्द्रह दिन में जो कुछ पाप या भूल बन गई हो उसका पछतावा करनाऔर इस प्रकार से उसके कालेपन से अपने मन को मुक्त और पवित्र करना, ईश्वर केध्यान और स्तुति से, मंत्र के जप से, कथा और उपदेश के सुनने से, मन में ज्ञान, भक्तिऔर धर्म का भाव दृढ़ करना, यह विशेष मंगल का मार्ग है। एकादशी व्रत करने काब्राह्मण से लेकर चाण्डालपर्यन्त चारों वर्णोंको अधिकार है। तत्त्वसागर में लिखा है-

मातेव सर्वबालानामौषधं रोगिणामिव।
रक्षार्थंसर्वलोकानां निर्मितैकादशी तिथि:।।
संसाररोगदष्टानां नराणां पापकर्मणाम्।
एकादश्युपवासेन सद्य एव सुखं भवेत्।।

जैसे सब बच्चों के लिये माँ सहारा और हित करनेवाली है, जैसे रोगी केलिये औषधि है,वैसे ही सब प्राणियों की रक्षा के लिये एकादशी तिथि नियत की गईहै। संसार के रोग से डसे हुए पाप करने वाले प्राणियों के लिये एकादशी का उपवासतुरन्त ही सुख और मंगल करने वाला होता है। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में लिखा है-

विशोधनमिदं पुंसां शुष्कार्द्रस्यांहस: परम्।
तत्स्यरूपं श्रुतं तीर्थं स्नानादप्यधिकं विदु:।।
स्वर्गमोक्षप्रदा ह्येषा राज्यपुत्र प्रसाधिनी।
सुकलत्रप्रदा ह्येषा शरीरारोग्यदायिनी||

जो पाप पुराने होकर सूख गए हैं या जो अभी ओदे अर्थात् तुरन्त के किए हैं, उन सब पापों के धोने के लिये यह एकादशी का व्रत सबसे ऊँचा साधन है। इसके फल को कुछ लोग तीर्थस्नान से भी अधिक बताते हैं। श्रद्धा और भक्तिपूर्वक व्रत करनेवालों को यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, राज्य, पुत्र और भली स्त्रीको देनेवाली है। इसलिये प्रत्येक हिन्दू-सन्तान को उचित है कि एकादशी के दिन व्रत रहा करें। उपवास करना सबके लिये आवश्यक नहीं।बच्चों, बूढों,सधवास्त्रियों औररोगियों को उपवास करना विहित नहीं है। जिनको उपवास करने की शक्ति नहीं है,उनको उचित है कि दूध या फल खाकर रहेंअथवा केवल एक समय शुद्ध भोजन कर दिन बितावेंऔर यह भी न हो सके तो एकादशी के दिन माँस तो कदापि न खायं औरपुरुष-स्त्रीदोनोंब्रह्मचर्य से रहें। उस दिन विशेष रूप से ईश्वर का ध्यान और आराधनकरें, और सायंकाल कथा सुनें और ईश्वर के नाम और उसकी महिमा का कीर्त्तन करें।

मद्य का निषेध

बुद्धिं लिम्पति यद्दव्यं तद्धिमादकमुच्यते।

मनुष्य को परमात्मा ने सबसे बड़ी निधि बुद्धि दी है। जो वस्तु बुद्धि को मैलीकरती या हर लेती है उसको मादक अर्थात् नशीली वस्तु कहते हैं। मनुष्य को उचितहै कि किसी प्रकार का नशीला पदार्थ कभी ग्रहण न करे। ब्राह्मण से लेकर चाण्डालपर्यन्तहिन्दू-सन्तान के लिये मदिरा पीना मना है। मनुजी से लेकर सब ऋषियों ने लिखा हैकि मदिरा का पीना ब्राह्मण की हत्या के समान महापातक है। और शिवपुराण में लिखाहै कि सब वर्णों के प्राणियों का यह धर्म है कि वे मद्य को और मद्य की गन्ध को भीबचावें। इसलिये प्रत्येक हिन्दू-सन्तान को उचित है कि वह स्वयं मद्य का ग्रहण न करे और अगर उसका कोई भाई मद्य ग्रहण करता हो तो अपनी सामर्थ्य भर उसकोमदिरापान के पाप और दोष से छुटाने का जतन करें।

व्यापार

धनाद्धर्मं तत: सुखम्

पुरुष और स्त्री सब मनुष्य-सन्तान को उचित है कि वे अपने परिश्रम सेकुछ-न-कुछ धन अर्जन करें। उसका सबसे अच्छा और सरल उपाय यह है कि देशका प्रत्येक प्राणी और विशेषकर प्रत्येक स्त्रीथोड़ा सूत कातें और गाँव भर के प्राणीमिलकर इतना सूत कातें जितना उनके आवश्यक वस्त्र बनाने के लिये काफी हो, औरअपने गाँव ही में उस सूत को बुनवा कर कपड़ेको काम में लावें। इससे उनको घनऔर धर्म दोनों का लाभ होगा। देश में हाथ के काते सुत और हाथ के बुने कपड़ेका प्रचार से हमारे करोड़ों भाइयों और बहनों को पेट को अन्न और तन को वस्त्र मिलनेलगेगा और कितनों की लाज और पत रह जायगी। इसलिये जितना ही हम देशी कपड़ेका बुनना और काम में लाना बढ़ावेंगे उतना ही हमको अपने भूखे भाइयों और बहनोंको अन्न वस्त्र के दान का पुण्य मिलेगा। विदेशी कपड़े के द्वारा इस समय हमारे देश का बहुत अधिक धन हर साल दूसरे देशों को जाता है। इसको पाकर वहाँ के लोग तोसुखी होते हैं, किन्तु इस देश के लोगों की जीवन-शक्ति घटती जाती है। इंगलैण्ड तथाऔर देशों में मनुष्य की औसत आयु पचास वर्ष के लगभग है, किन्तु इस देश में केवलतेईस वर्ष के लगभग है। इन कारणों से प्रत्येक भारतवासी का यह कर्त्तव्यहै कि वह विदेशी वस्त्र का व्यवहार और व्यापार बन्द करें और स्वदेशी वस्त्र का और उसमें भी जहाँ तक हो सके खद्दर, अर्थात् हाथ से काते सूत के कपड़ेका व्यवहार बढ़ावें। शारीरिक बल शास्त्र में लिखा है कि-

धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलकारणम्।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पदार्थों के साधन का मूल कारणआरोग्य है। आरोग्य, निरोगता, तन्दुरुस्ती के बिना इनमें से एक का भी साधन नहीं हो सकता। आरोग्य रखने के लिये यह आवश्यक है कि पुरुष और स्त्री नियम के साथउचित परिश्रम, अर्थात् कसरत करें। पुरुष और स्त्री सब स्नानकर प्रात:काल सूर्यनारायणके सामने खड़े होकर अपनी शक्ति के अनुसार १०, २०, ५०, १०० बार नमस्कारकरके अपने मन को पवित्र और शरीर को निरोगऔर बलवान कर सकते हैं। प्रत्येक स्त्री और पुरुष को उचित है कि किसी-न-किसी प्रकार का व्यायाम नित्य करें। जिसमें धर्म के साधन,अर्थ के कमाने,सुख के भोगने और अन्त में परमात्माके प्राप्त करने के लिये उसकी काया प्रबल और मन निर्मल बना रहे। जो प्राणी नित्यव्यायाम करते हैं उनको रोग नहीं सताता। यदि किसी संयोग से आ भी जाता है तो बिनाबहुत क्लेश दिए उनको छोड़कर चला जाता है। समस्त हिन्दू-सन्तान के लिये शास्त्र के अनुसार मैंने सन्क्षेप में हिन्दूधर्म काकुछ उपदेश लिख दिया है। जो प्राणी श्रद्धा और भक्तिपूर्वक इस उपदेश को बर्तेगा वहइस लोक में सुख और मान पावेगा और परलोक में परम पद को पहुँचेगा। श्री विश्वनाथ: प्रसीदतु। (माघ कृष्ण अमावश्या, सं.१९९०)

सनातनधर्म
धर्मो विश्वस्य जगत: प्रतिष्ठा लोके धर्मिष्ठं प्रजा उपसर्पन्ति।
धर्मेण पापमपनुदन्ति धर्मे सर्वं प्रतिष्टितं तस्माद्धर्मं परमं वदन्ति।

उपनिषद् कहते हैं कि सारा जगत् धर्म के मूल पर स्थित है। इसीलिये लोक में लोग उसी के पास जाते हैं जो धर्मिष्ठ हैं, धर्म से पाप को दूर करते हैं, धर्म में सब प्रतिष्ठित है, इसलिये धर्म को सबसे बड़ा कहते हैं। दूसरे स्थान में भी लिखा है-

विद्या रूपं धनं शौर्य्यं कुलीनत्त्वमरोगिता।
राज्यं स्वर्गश्च मोक्षश्च सर्वं धर्मादवाप्यते।।

विद्या, रूप, धन, शूरवीरता, कुलीनता, नीरोगता, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष, ये सब धर्म से प्राप्त होते हैं।

सनातनधर्म पृथ्वी पर सबसे पुराना और पुनीत धर्म है। यह वेद, स्मृति और पुराण से प्रतिपादित है। संसार के सब धर्मों से यह इस बात मे विशिष्ट है कि यह सिखाता है कि इस जगत् का सृजन, पालन और संहार करने वाला आदि, सनातन, अज, अविनाशी, सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप, पूर्ण प्रकाशमय परब्रह्म परमात्मा है, और यह कि यह परमात्मा मनुष्य से लेकर सिंह, हाथी, घोडे, गौ, हरिन आदि सब थैली से उत्पन्न होने वाले जीवों में, अण्डों से उत्पन्न सब पखेरुओं में, पृथ्वी फोड़कर उगने वाले सब वृक्षों मे और पसीने और मैल से उत्पन्न होने वाले सब कीट-पतंगों में समान रूप से बस रहा है। इसी तत्त्व के कारण-

एष धर्मो महायोग दानं भूतदया तथा।
ब्रह्मचर्य्यं तथा सत्यमनुक्रोशो धृति: क्षमा।
सनातनस्य धर्मस्य मूलमेत् सनातनम्। महा. अश्वमेध पर्व, ९१.३२.

यह धर्म बड़े-बड़े गुणों का समूह है। दान, जीवमात्र पर दया, ब्रह्मचर्य, सत्य, दयालुता, धैर्य्य और क्षमा, इन गुणों का योग सनातनधर्म का सनातन मूल है। इन गुणों के कारण भी सनातनधर्म अन्य धर्मों से विशिष्ट है।

सनातनधर्म की दूसरी विशेषता वर्ण और आश्रम का विभाग हैं। जैसा कि भगवान् कृष्ण ने अपने श्रीमुख से कहा है -

चातुवर्ण्य मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:

मैंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, इन चार वर्णों को गुण और कर्म के विभाग से रचा है। गुण में जन्म भी अन्तर्गत है। इसलिये गुण-कर्म के विचार में जन्म, अन्य गुण और कर्म, तीनों का समावेश हो जाता है। जैसे विद्या और तप ब्राह्मण की ब्राह्मणता के आवश्यक अंग हैं

तथापि पूर्ण ब्राह्मणत्त्व की प्राप्ति के लिये- विद्या तपश्च योनिश्च त्रयं ब्राह्मणकरणम्।

विद्या, तप और ब्राह्मण-माता-पिता से जन्म, ये तीनों आवश्यक हैं। ब्राह्मणों के छ: धर्म हैं। अध्ययन, अध्यायन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह| इनमें से तीन-अध्ययन, यजन और दान तो, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों के लिये समान हैं।

वेद पढ़ाना, यज्ञ करना और दान लेना, ये तीन विशेषकर ब्राह्मणों के ही कर्म हैं। तथापि अवस्था विशेष में क्षत्रिय और वैश्य भी वेद पढ़ा सकते हैं। सामान्यतया इन तीन विशेष कर्मों के करने का अधिकार उन्हीं ब्राह्मणों को होता है जो न केवल विद्या और तप से युक्त है बल्कि जो जन्म से ब्राह्मण हैं।

सामान्य रीति से धर्मग्रन्थों में चारों वर्णों के गुण अलग-अलग वर्णित हैं। महाभारत के शान्तिपर्व में वर्णों के लक्षण अलग-अलग इस प्रकार लिखे हैं-

जातिकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारै: संस्कृत: शुचि:|
वेदाध्ययनसम्पन्न: षट्सु कर्मस्ववस्थित:||
शौचाचारस्थित: सम्यग् विधसाशी गुरुप्रिय:|
नित्यव्रती सत्यपर: स वै ब्राह्मण उच्यते||
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययन सन्गत:|
दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते||
वाणिज्या पशुरक्षा य कृष्यादान रति: शुचि:|
वेदाध्ययनसम्पन्न: स वैश्य इति संज्ञित:||
सर्वभक्षरतिर्निंत्यं सर्वकर्म करोऽशुचि|
त्यक्तवेदस्त्तवनाचार: स वै शूद्र इति स्मृत:||

और इसके अन्त में लिखा है-

शौचेन सततं युक्त: सदाचारसमन्वित:|
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद्धि जातिषु लक्षणम्|

सदा शौच से युक्त रहना (काया और मन को शुद्ध रखना और शुद्ध भोजन करना), सदाचार का पालन करना, सब प्राणियों पर दया रखना, ये द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य) के लक्षण हैं। इसी के साथ महाभारत के वनपर्व में लिखा है-

वर्णोंत्कर्षमवाप्नोति नर: पुण्येन कर्मणा|
तथापकर्षं पापेन इति शास्त्रनिदर्शनन्||

मनुष्य पुण्य-कर्मों के करने से वर्ण में ऊपर उठ जाता है और नीच कर्म करने से नीचे गिर जाता है, यह शास्त्र कहता है | यह भी वहीं लिखा है-

शूद्रोऽपि शीलसम्पन्नो गुणवान ब्राह्मणो भवेत्|
ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीन: शूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्||

शूद्र भी सुशील अर्थात् पवित्र चरित्रयुक्त और गुणवान् हो तो वह ब्राह्मण हो जाता है और ब्राह्मण भी अपना धर्म, छोड़ दे या उससे रहित हो तो वह शूद्र से भी नीचे गिर जाता है।

शुद्रे तु यद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण:।।

शूद्र में जो ब्राह्मण के गुण हों और ब्राह्मण में वे गुण न हों तो न वह शूद्र शूद्र है और न वह ब्राह्मण ब्राह्मण| युधिष्ठिर का वचन है-

सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंत्यं तपो घृणा।
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृत:||
यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मण: स्मृत:|
यत्रैतन्न भवेत्सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत्||

हे नागेन्द्र ! जिसमें सत्य, दान, क्षमा, शील, अहिंसा, तप, दया दिखाई दें, उसको ब्राह्मण कहते है। जहाँ अच्छा शील-स्वभाव दिखाई दे उसको ब्राह्मण कहना, जहाँ ये न दिखाई दें उसको शूद्र कहना, चाहिए। श्रीमद्भागवत् में भी सातवें स्कन्ध में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अलग-अलग गुणों का वर्णन कर नारदजी ने कहा-

यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकम्|
यदन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनैव विनिर्दिशेत्||

अर्थात् जिस पुरुष को जो वर्ण का प्रकट करने वाला लक्षण कहा गया है, जहाँ दूसरे में भी वह लक्षण दिखाई दे, तो उसको उसी गुणवाले वर्ण के नाम से बताना चाहिए। इन वचनों से स्पष्ट है कि यदि जन्म से ब्राह्मण होने वालाभी अपने धर्म-कर्म से रहित हो जाय या कुकर्म करने लगे, तो वह शूद्र से भी नीचे गिर जाता है। और नीच-से-नीच शूद्र भी यदि अच्छे आचारों को ग्रहण करे और ऊँचा पवित्र जीवन व्यतीत करने लगे, तो वह भी ब्राह्मण के समान मान पाने के योग्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त यह प्रसिद्ध है कि भक्ति नीच-से-नीच प्राणी को भी ऊपर उठा देती है और भगवान् का प्रीति-पात्र बना देती है। उस भक्ति की यह महिमा है कि चाण्डाल भी भगवान् का नाम जपने से ब्राह्मण के समान आदर के योग्य हो जाता है। उसी भक्ति का साधन मंत्र-दीक्षा की विधि है। जैसा वैष्णव-तंत्र लिखा है-

यथा काञ्चनतां याति कांस्यं रसविधानत:|
तथा दीक्षाविधानेन द्विजत्त्वं जायते नृणाम्।।

जैसे काँसे पर रस का प्रयोग करने से वह सोने के समान चमकने लगता है, वैसे ही मंत्र-दीक्षा के लेने से मनुष्य द्विजत्त्व को प्राप्त करता है, अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के समान आदर के योग्य हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह शूद्र इस योग्य हो जाता है कि उससे रोटी-बेटी का सम्बन्ध करें या उसको वेद पढ़ाने या यज्ञ कराने को निमन्त्रित करें। इसका यह अर्थ है कि सामान्य शूद्र क्या चाण्डाल में भी यदि विद्या, ज्ञान, शौच, आचार आदि द्विजों के गुण पाए जावें तो ज्ञान के क्षेत्र में और सामान्य सामाजिक व्यवहार में द्विज लोग उसकी विद्या, ज्ञान, सदाचार के अनुरूप उसका आदर करें। मेरा विश्वास है कि सनातनधर्म के तत्त्व को जानने वाले सब विद्धान् ऊपर लिखी व्याख्या को धर्मानुकूल मानेंगे। यदि यह धर्मानुकूल नहीं है तो मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि निष्कल्मष, धर्मज्ञ, धर्मशील विद्धान् हिन्दू-जाति पर और विशेष कर सनातनधर्म के अनुयायियों पर अनुग्रह करके यह बतावें कि उसमें क्या दोष है। मेरा अभिप्राय यह है कि जो सत्य और धर्म का मार्ग है वही संसार को बताया जाय| और यदि ऊपर लिखे विचारशास्त्र के अनुकूल हैं तो उन्हीं के अनुसार अछूतों को आर्थिक दशा सुधाकर सदाचार सिखाकर और उनको मंत्र-दीक्षा देकर उनका उद्धार करना हमारा धर्म है। इसाई, मुसलमान जिन अछूतों को अपने धर्म में मिलाते हैं, उनको अपने समाज में बराबर स्थान देते हैं। किन्तु अछूत सनातनधर्म समाज के अंग हैं। इनकी उन्नति करना, इनको सामान्य और धार्मिक शिक्षा देना और समाज के दूसरे अंगो के समान इनकी रक्षा करना और इनको आगे बढ़ाना हमारा अवश्य कर्तव्य है। इससे हमारे धर्म की रक्षा और वृद्धि होगी और धर्म को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचेगी। हिन्दू-जाति का इसी में भला होगा। ऐसे ही मार्ग के अबलम्बन करने से सनातनधर्म की महिमा पूर्ण रीति से स्थापित होगी। इस प्रकार धर्म-बुद्धि से धर्म के प्रश्नों का निर्णय करने से और उनके अनुसार चलने से समाज में धार्मिक एकता और शक्ति स्थापित होगी। (‘सनातनधर्म' साप्ताहिक, वर्ष १, अंक ९ से उद्धत)

अछूतोध्दार
अन्त्जोध्दार-विधि:

अछूतोध्दार

(१)

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
यत: कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय: |
यत्कीर्तन यत्स्मरण यदीश्रण यव्दन्दन यच्छ्रवण यदर्हणम् |
लोकस्य सधो विधुनोति कल्मष तस्मै सभ्रदश्रवसे नमो नम: || भागवते |
करुणामूर्तिना येन चतुरस्य साधका: |
चत्त्वारो रचिता वेदा वर्णाच्श्रत्त्वार आश्रमा: ||
धर्मश्रेत्रे कुरुश्रेत्रे विश्रुते रणमूर्धनि |
यो हृादादर्जुन ज्ञान विशुद्ध विजयप्रदम् ||
सच्चिदाननन्दरूपाय विव्श्रोत्पत्त्यादिहेतवे |
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वय नुम: ||
यं पृथग्धर्मचरणा: पृथग्धर्मफलैषिण: |
पृथग्धर्मौ: समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नम: || भारते |
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रश्रति रश्रित: |
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् || मनु: |
न जातु कामान्न भयान्न लोभात्त्यजेद्धर्म जीवित्स्यापि हेतो: |
धर्मो नित्य: सुखदुःखे त्त्वनित्य जीवो नित्यो हेतुरस्य त्त्वनित्य: || व्यास |
नाह कामान्न सरभान्न द्वेषान्नार्थकारणात् |
न हेतुवादाल्लोभाव्दा धर्म जहम्ँ कथच्ञन || कृष्ण:भारते |
विधा रूप धन शौर्य कुलीनत्त्वमरोगता |
राज्य श्वर्गच्श्र मोश्रच्श्र सर्व धर्माद्वाप्य्ते ||
देवता ब्राह्मणा: संतो यश्रा मनुश्चारणा: |
धार्मिकान् पूजयन्तीह न धनाढयान्न कमिन: || भीष्मपूर्व |
मम प्रतिज्ञाच्श्र निबोध सत्याँ वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च |
राज्यच्ञ पुत्राच्ञ यशो धनच्ञ सर्व न सत्यस्य कलामुपैति || युधिष्ठिर: |

कोऽयं धर्म:
यतोऽन्यदस्ति:श्रेयससिद्धि: स धर्म: | कणाद |
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियम: कृत: |
उभयत्र सुखोदर्क: एस चैव परत्र च ||
अकारणो हि नैवास्ति धर्म:सुश्र्मो हि जाजले |
भूतभव्यार्थमेवेह धर्मप्रवचन कृतम् || भारते |
धारणाद्धर्ममित्याहु: धर्मो धारयति प्रजा: |
य: स्याद्धारणसयुक्त: स धर्म इति निच्श्रय: ||
प्रभवार्थाय भूताना धर्मप्रवचन कृतम् |
य: स्याद्धारणसयुक्त: स धर्म इति निच्श्रय: ||
अहिंसार्थाय भूताना धर्मप्रवचन कृतम् |
य: स्याद्धारणसयुक्त: स धर्म इति निच्श्रय: ||

कोऽयं सनातनोधर्म: ?
वेदोऽखिलो धर्ममूल स्मृतिशीले च तव्दिदाम् |
आचारच्श्रैव सधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च || मनु: |
पुराणन्यायमीमाँसाधर्मशास्त्राग्डमिश्रिता: |
वेदा: स्थानानि विधाना धर्मस्य च चतुर्दश || याज्ञवल्क्य: |
वेदार्थादधिक मन्ये पुराणार्थ वारनने |
वेदा: प्रतिष्ठिता देवि ! पुराणे नात्र संशय: ||
यन्न दृष्ट हि वेदेषु तददृष्ट स्मृतिषु व्दिजा: |
उभयोर्यन्नदृष्ट तत् पुराणे परिगीयते ||
बिभेत्यल्पश्रुताव्देदो मामय चालयिष्यति |
इतिहासपुराणाभ्या वेद समुपबरुहयेत् ||

युधिष्ठिर: ----

भगवन् ! श्रोतुमिच्छामि नृणा धर्म सनातनम् |
वर्णाश्रमाचारयुतं यत्पुमान्विन्दते परम् ||

नारद उवाच----

नत्त्वा भगवतेऽजाय लोकाना धर्महेतवे |
वश्र्ये सनातनधर्म नारायणमुखाचछु्तम् ||
धर्ममूल हि भगवान् सर्वदेवमयो हरि: |
स्मृत च तव्दिदा राजन् येन चात्मा प्रसीदति ||
सत्य दया तप: शौच तितिक्षेक्षा शमो दम: |
आहिंसा ब्रह्माचर्यच्च त्याग: स्वाध्याय आर्जवाम् ||
सन्तोष: समद्दग्सेवा ग्राम्येहेपरम: शनै: |
नृणा विपर्ययेहेक्षा मौनमत्मविमशरम् ||
अन्नाधादे: स्न्विभागो भूतेभयच्च यथहत: |
तषवात्मदेवता बुद्धि: सुतरा नृशु पाण्डव ||
श्रवण कीर्तन चास्य स्मरण महता गते: |
सेवेज्यावनतिद्रस्य अख्य्मात्मसमपूर्णम् ||
नृणामय परो धर्म: सर्वेशा समुदाहत: |
त्रिशल्लक्षणवान राजन सर्वात्मा येन तुष्यति ||
शमो दमस्तप: शौच सन्तोष: क्षान्तिरार्जवम् |
ज्ञान दयाऽच्युतात्मतत्व सत्य च ब्रह्मालक्षणम् ||
शौर्य वीर्य धृतिस्तेजसत्याग आत्माजयक्षमा |
ब्रह्माणयता प्रसादचश्र रक्षा च क्षत्रलक्षणम् ||
देवगुर्वच्युते भक्तिस्त्रीवर्गपरिपोषणम् |
आस्तिकिमुधमो नित्य पैपुण्य वैशयलक्षणमृ ||
शुद्रस्य सन्नति: शौच सेवा स्वामिनयमायाय |
अन्मत्रयज्ञो ह्मस्टेय सत्य गोविप्ररक्षणम् |||

तथा भारते -----

जातकर्मदिभिर्यस्तु सन्सकारै: संस्कृत: शुचि: |
वेदाध्ययन्स्मपन्न: षटसु कर्मस्वनुष्ठीत: ||
शौचाचास्थित: सम्यक विघसाशी गुरुप्रिय: |
नित्यव्रिति सत्यपर: स वै ब्राह्मण उच्चते ||
क्षत्रज सेवते कर्म वेदाध्ययनसगडत: |
दनादन रतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्चते ||
वाणिज्य पशुरक्षा च कृषया दानरति: शुचि |
वेदाध्ययनसम्प्न्न: स वैश्य इति संज्ञित: ||
सर्वभक्षरतिनिरत्य सर्वकर्मकरोऽशुचि: |
त्यतत्कवेदसत्त्वनाचार: स वै शुद्र इति समृत: ||
यस्य यल्लक्षण प्रोक्त पुंसा वर्णनाभिव्यज्जकम् |
यदन्यत्रिपि दृशयेत त्तेनैव विनिदिर्शेत् ||
सवे सवे कर्मणयभिरत: सनसिद्धि लभते नर: |
स्वकम्रनिरत: सिद्धि यथा विन्दति तच्छणु ||
यत: प्रवत्तिभुर्ताना येन सर्वमिद ततम् |
स्वकर्ण तमभयचर्च सिद्धि विन्ति मानव: ||
श्रयान अव्धार्मो विगुण: परधर्मातस्वनुष्टितात् |
स्वभावनियत कर्म कुर्वेन्नाप्नोति किल्विषम् ||
सहज कर्म कौन्तोय सदाषमपि न त्यजेत् |
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरविावृता: ||
सर्वकर्मानयति सदा कुर्वाणो मद्दयपाश्रय: |
मत्प्रसादादवाप्नोति शश्रत पदम्व्ययम् ||

महाभारत के उध्योग पर्व में लिखा है -------

एष धर्मो महायोग दान भुतदया तथा |
ब्रह्माचर्य तथा सत्यमनुक्रोशो धृति: क्षमा |
सनातनस्य धर्मस्य मूलमेंततसनातनम् ||

भगवान् मून ने धर्म के देश लक्षण कहे है ----

धृति: क्षमा दमोऽसतेय शौचमिन्द्रियनिग्रह: |
धीर्विधा सत्यमक्रोधो दशक धर्मलक्षणम् ||

और चारो वर्णों के लिए आमसिक पांच धर्म कहे है -----

अहिंसा सत्यमसतेय शौचमिन्द्रियनिग्रह: |
एत सामाजिक धर्म चातुर्वणयेऽब्रविन्मनु: ||

ऊपर उद्धत वचनों से स्पष्ट है कि सनातनधर्म में धर्म का एक मूल अंग शौच भी है | दक्ष सहित में लिखा है ---

शौचे यत्न: सदा कार्य: शौचमुलो द्दिज: स्मृत: |
शौचाचारविहीनस्य समस्ता निष्फला: क्रिया: ||

शौच- सफाई के विषय में सदा यत्न करना चाहिए | द्दिजाती ब्राह्मण क्षित्रय वैश्य होने का मूल शौच है | जो सदा और सदाचार से रहित है , उसकी सब क्रियाए निष्फल होती है |

शौचेन सतत युक्त: सदाचारसमन्वित: |
सानुक्रोशश्र बुतेषु त्द्दीजतिशु लक्ष्मण ||

शास्त्रकारो ने भिन्न भिन्न वर्णों का धर्म बरण कर यह भी लिखा है कि सदाचार के सेवन से , सत्कर्म करने से , शुद्र भी द्दीज्त्त्व को पहुच सकता है और दुराचार , अर्थात बुरे कामो के करने से ब्राह्मण भी नीचे गिरकर शुद्र्ता को पहुच सकता है |

वर्णोंतकर्षमवाप्नोति नर: पुण्येन कर्मणा |
यथाऽप्कर्ष पापेन इति शास्त्रनिदर्शनम् ||
यथादयगिरौ द्रव्य सन्निकषेण दीप्यते |
तथा सत्यसन्निकषेण हिन्वर्णोंऽपि दीप्यते ||
शुद्रोऽपि शिलासम्पन्नो गुणवान् ब्राह्मणों भवेत् |
ब्रह्माणोऽपि क्रियाहिन्: शुद्रात् प्रत्यन्वरो भवेत् ||
शुद्रे तु यभ्दवेल्लश्र्म व्दिजे तच्च न विधते |
न वै शुद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणों न च ब्राह्मण: || वन.१८०-२५ |

युधिष्ठिर:---

सत्य दान श्रमा शीलमानृशस्य तपो घृणा |
दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण हति स्मृत: ||

नहुष:----

चातुर्वण्र्य प्रमाण च सत्य च ब्रह्म चैव हि |
शूद्रेष्वपि य सत्य च दानमक्रोध एव च ||
आनृशस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर |

अन्यच्च

यत्रैतल्लश्र्यते सर्प वृत्त स ब्राह्मण: स्मृत: |
यत्रैतन्नभवेत्सर्प तं शूद्रेति विनिर्दिशेत् || वनपर्व१८० |
धर्मेप्सवस्तु धर्मज्ञा: सता वृत्तमनुष्ठिता: |
मंत्रवज्य न दुष्यन्ति प्रशंसा प्राप्नुवन्ति च || मनु.१०

अयमर्थ:----

ये पुन: शूद्रा: धर्मप्राप्तिकामा: त्रैवर्णिकानामाचारमनिषिद्धमाश्रिता: ते नमस्कारेण
मंत्रेण मंत्रान्तररहित पंचयज्ञादि धर्मान् कुर्वाणा न प्रत्यवयन् ख्याति च लोके लभन्ते |
यथा यथा हि सदवृत्तमातिष्ठत्यनसूयक:|
तथा तथेममामुच्च लोंक प्राप्नोत्य्निन्दित:||
पार्गुणानिंदक: शुद्र यथा यथा दियात्याचारमनषिदधमनुतिष्ठति तथा यथा ज्नेर्निन्दित इह लोक उत्कृष्ठ: स्मृत : स्वर्गादिलोक च प्राप्नोति | इति कुल्लूक :|

इसी प्रकार के शास्त्र के और वचन है जिनसे यह सीधी होता है कि निच्तिनिच शुद्र भी बुरे कर्मो के त्यागने से और भले कर्मो के पालन करने से ब्राह्मण के समान मान पाने के योग्य हो सकता है | और ऐसा सुदर यदि विज्ञानं हो तो दिज्नमा उससे आत्मज्ञान तक सिख सकता है | स्वयं मनुजी का वचन है

श्रद्दधान: शुबहा विद्यामाद्दिताअवराद्पि |
अत्याद्पी पर धर्म स्त्रीरत्न दुष्कुलादपि||

अर्थात-श्रध्द्युक्तो दिज: सुबह द्रिश्श्क्ति गारूडादिविद्यमवराच्छुद्रद्पि गृहणीयात| अन्त्श्चाणडालस्तस्माद्पी जातिस्म्रदेर्वीहित्योगप्रषरत दुश्क्त्शेषोपभोगार्थ्म्वाप्त चाणडालजनमत: पर धर्मं मोक्षोपायमात्मज्ञानमाद्दित | इति कुल्लूक :| तथा अज्ञानमेवोप्क्रमय मोक्षधर्म “प्राप्य ज्ञान ब्राह्मणत क्ष्त्रियादा वैश्यच्छद्रदपि निचादभीक्ष्णम श्रदातव्य श्रद्दधानेन नित्य न श्रदिन प्रति जन्म्रित्यु विशेषता |”

उत्कर्ष के दो बड़े उदाहरण

चाण्डाल और व्श्रभी इसी जन्म में ब्राहमण,क्षात्रिय, वैश्य के समान मान पाने के योग्य हो सकते है, इसके दो बड़े उदाहरण है | एक धर्मव्याध की कथा जो महाभारत के वनपर्व में है, और दूसरी मूल चाण्डाल की कथा जो पद्मपुराण में मिलती है |

धर्मव्याध की कथा

एक कौशिक नाम वेदाध्यायी तपोधन ब्राहमण था | उसको क्रोध और अभिमान आ गया | उस दशा में उनको एक पतिव्रता स्त्री ने उपदेश किया कि आप धर्म को अभी नहीं जानते है | आप जाइए | मिथिलापुरी में धर्मव्याध रहना है, उससे धर्म का उपदेश लिजिए | ब्राह्मण धर्मव्याध के पास गया , वः धर्मव्याध अपनी मॉस की दुकान पर बैठा था | वह ब्राह्मण को अपने घर ले गया और ब्राहमण ने वहा उससे कहा की तुम मुझे शिष्टाचार का उपदेश करो | व्याध ने बहुत विस्तार के साथ ब्राह्मण को धर्म का उपदेश किया | वः कथा वनपर्व के १०५वे अध्याय से २१४वे अध्याय तक में वरणत है | उसी प्रसग्ड में व्याध ने कहा-----

अशीलच्श्रापि पुरुषो भूत्त्वा भवति शीलवान् |
प्रणिहिसारतच्श्राऽपि भवते धार्मिक: पुमान् || वनपर्व२०६-३३ |

पुरुष दुच्श्ररित्र होकर भी सुचरित्र हो सकता है और प्राणियो की हिंसा में रत रहने पर भी मनुष्य धार्मिक हो सकता है |

पापचेत् पुरुष: कृत्त्वा कल्याणमभिपधते |
मुच्यते सर्वपापेभ्यो ,आहाभ्रेणेव चन्द्रमा: ||
यथादित्य: समुधन् वै तम: पूर्व व्यपोहति |
एवं कल्याणमातीष्ठन् सर्वपापै: प्रमुच्यते || वनपर्व२०६-५५-५६

आगे चलकर व्याध ने कहा-----

शूद्रयोनौ हि जातस्य सद्गुणानुपतिष्ठत: |
वेश्यतत्व लभते ब्रह्मन क्षत्रियत्त्व तथैव च ||

अर्थात, शूद्रयोनी में भी उत्पन्न हुआ पुरुष यदि अपने में अच्छे गुणों को संग्रह करे, तो हे ब्रह्मन ! वह वैश्य हो जाता है, और क्षत्रिय यदि सदाचार से जीवन यापन करे तो उसमे ब्राह्मण की योग्यता भी उत्पन्न हो जाती है | धर्मव्याध ने ब्राह्मण से कहा कि तुम अपने माता-पिता को दुखी करके पढ़ने के लिए घर से निकल आए हो, इसलिए तुम जाकर प्रसन्न करो, तक तुम परम धर्म को प्राप्त होगे | ब्राह्मण ने व्याध को धन्यवाद दिया और खा कि------

आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते |

तुम्हारे समान धर्म को बताने वाले संसार में दुर्लभ है | तब व्याध से पूछा की हे व्याध ! कारण बताओ कि कैसे शुद्रयोनि में तुम्हारा जन्म हुआ | व्याध ने अपनी सब कथा कही | उसको उनकर ब्राह्मण ने कहा-----

ईदृशा दुर्लभा लोके नरा धर्मप्रदर्शका: ||
साम्प्रतच्श्र मतो मेंऽसि ब्राहमणों नात्र सशय: |
ब्राह्मण: पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु ||
दाम्भिको दुष्कृत: प्राय: शुद्रेण सदृशो भवेत् ||
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थित: |
तं ब्राह्मणमह मन्ये वृत्तेन हि भवेद् व्दिज: || वनपर्व२१५-११-१२

अर्थात्, यधपि शूद्रयोनि में तुम्हारा जन्म है तथापि मै तो तुमको इस समय ब्राह्मण ही मानता हू | मेरे मन में इसमे कुछ भी सशय नहीं है | जो ब्राह्मण नीचे गिराने वाले बुरे कर्मो में लगा हो, दाम्भिक तो और दुष्कर्मा हो, वह प्राय: शूद्र के सामान होता है | और जो शूद्र, मन के और इन्द्रियों को रोकने मई , सत्य मई और धर्म में सदा लगा रहता हो, उस को मै ब्राह्मण मानता हू | चरित्र से ही ब्राह्मण होता है | मार्कण्डेय मुनि कहते है कि चलते समय व्याध ने ब्राह्मण को फिर प्रणाम किया और ब्राह्मण उसकी प्रदक्षिणा करके अपने घर चला गया |

मुक चाण्डाल की कथा

दूसरी कथा पद्मपुराण में मुक चाण्डाल की है | यह संक्षेप: में नीचे वर्णित है-----

“कथयामि पूरा वृत्त विप्रा: शृणुत यत्नत: |
यं श्रुत्त्वा न पुनर्मोह प्रयास्यथ पुनर्भुवि ||
पूरासीच्च व्दिज: कच्श्रिन्नरोत्तम इति स्मृत: |
स्वपितरावनादृत्य गतोऽसै तीर्थसेवया ||
तत: सर्वाणि तीर्थानि गच्छतो ब्राह्मणस्य च |
आकाशे स्नानचैलानि प्रशुष्यन्ति दिने दिने ||
अहक्ड़ारोऽविशत्तस्य मानसे ब्राह्मणस्य च |
मत्समो नास्ति वै कच्श्रित् पुण्यकर्मा महायशा: ||
इत्युक्ते चानने तस्य अहदच्श्र बकस्तदा |
क्रोधाच्चैवेरितस्तस्य स शशाप व्दिजो बकम् ||
भीर्व्दिजो महामोह: प्राविशच्चान्तकर्मणि |

ददेववाण्युवाच-----

गच्छ वाडव चाण्डाल मूक परमधार्मिकम् |>br> तत्र धर्म च जानीषे क्षेमं ते तव्दचो भेवत् ||

व्यास उवास-----

खाच्च तव्दचन श्रुत्त्व गतोऽसौ मूकमन्दिरम् | शुश्रूषन्त च पितरौ सर्वारम्भान्ददर्श स: ||
ददत शीतकाले च सम्यगुषणं जल तयो: |
तैलतापनताम्बूलं तथा तुलवती पटीम् ||
नित्याशंन च मिष्टानन्न दुग्धखण्ड तथैव च |
दप्यंत वसन्ते च मधुमाला सुग्न्धिकाम् ||
त्त्सत्यो: प्राच्यो च क्रित्त्था भुद्त्त्टकेअथ सर्वदा |
श्रमस्य वारण कुर्यात्सनतापस्य तथैव च ||
एभि:पुण्यै: स्थियो विष्णुस्तस्य गेहोदरे चिरम् |
तेजोमय महासत्त्व शोभयंत च मन्दिरम् ||
दृष्टावा विस्मयमपन्नो विप्र: प्रोवाच मुककम् |
अनन्तर विष्णु दृष्ट्वा विप्र उचाव-
महापातकिस्न्सर्गान्नराचश्रैवाति पातका: |
इति जल्पन्ति धर्मज्ञा: स्मृतिशास्त्रेशु सर्वदा ||
पुराणागमवेदेषु कंथ तत्व तिष्ठसे गृहे |

श्री भगवानुवाच ---

कल्याणाना च सर्वेषा कर्त्ता मूको जगत्त्रये |
वृत्तस्थे योअपि चणडालसन्त देवा ब्राह्मण विदु: ||
मुक्स्य सदृशो नास्ति लोकेषु पुण्यकर्मत: |
पित्रोंभ्रतत्किपरो नित्य जित तेन जगत्त्रयम् ||
तयोभ्रतत्किचा त्त्वह तुष्ट: सार्वदेवगणै: सहा |
तिष्ठामि द्दीजरूपेण तस्य गेहोदरे च खे ||
पित्रोर्भत्किपर: शुद्धचश्राणडालो देवता गत: |
तस्मातेन सह प्रीत्या तिष्ठामि तस्य पन्दिरे ||

माता पिता की भांति से शुद्ध होकर चंडाल देवता की पदवी के योग्य हो गया | यह कथा इस बात के लिये पर्याप्त प्रमाण है कि सदाचार से , धर्म के पालन से , चंडाल भी अपने जीवन में विद्वान् तपस्वी ब्राह्मण से ऊचे से ऊचा आदर पाने के योग्य हो सकता है | ये कथाए हमारे ही कल्याण के लिये कही गी है | इसीलिये स्मृति और पुराणों के प्रमाण से यह सिद्ध होता है की चंडाल और श्रवपच को आवश्यक शौच और आचार सिखाकर , उनमे धर्म की भावना दृढ कर हम उनको धर्म के उस मार्ग में प्रवृत कर सकते है जिसमे चलकर मूक चंडाल ब्राह्मण और धर्म व्याध की तरह कोई भी चंडाल ब्राह्मण के योग्य हो सकता है | इन कथाओ का यह आर्थ नही है कि हम अन्त्यजो के साथ भिजन या विवाह का सम्बन्ध करे | भोजन और विवाह का सम्बन्ध तो शास्त्र और लोकमर्यादा के अनुसार उन्ही विराद्रियो में ही हो सकता है जिनमे शास्त्र और लोकमर्यादा के अनुसार होता चला आया है | इसका यह भी अर्थ नही है की जो धर्मव्याध या मूक चंडाल के समान धर्मज्ञ और सदाचारी हो उनके हम सब विषयों में ब्रह्म्नोचित व्यवहार करे | ब्राह्मण के छ: कर्म है – अध्ययन – अध्यापन यजन याजन , दान और पतिग्रहदान देना और लेना | इन छ: कामो में अध्ययन , यजन और दान ये तीनो काम ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य सबमे समान है | अध्ययन – याजन और प्रतिग्रह वेद पढाना , यज्ञ करना और दान लेना , इन तीनो कामो के अधिकारी सामान्यतया ब्राह्मण ही है | “ विद्या तपचश्र योनिचश्र त्रय ब्राह्मणकरणम् “ अर्थात जिसमें विद्या , तपस्या और जन्म तीनो गुण हो वाही ब्राह्मण है | इन कथाओ का सार यह है कि जो चंडाल भी विद्वान् , ज्ञानवान और सदाचारी हो तो उसके जन्म्मात्र के कारन उसका अनादर न करे |

दिशा का अर्थ महत्त्व एवं फल

मनुष्य को पास से छूटने और पुण्य के मार्ग में ऊपर उठाने के लिये और धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष चारो पदार्थो के सम्पादन करने के लिए शास्त्र के अनुसार दीक्षा ही एक परम साधन है | दीक्षा का विधान अन्त्यज पर्यन्त सभी सनातनधर्मियों के लिये आया है जिसके प्रभाव से अन्त्यज भी शुद्ध , पवित्र , सदाचारी और मानी हो सकता है | यह सब आगे प्रकरण से स्पष्ट हो जायगा |

“दीक्षामहत्त्व , मंत्रमाहातमय और दिक्षाकाल “

दीक्षा का अर्थ यो लिखा है ---

दीयते ज्ञानमत्यर्थ क्षीयते पाप्बंध्नात् |
अतो दिक्षेति देवेशि कथिता तत्त्वचिंतकै: || योगिनीतन्त्रे

दीक्षा के द्वारा मनुष्य को परम ज्ञान दिया जाता है और मनुष्य पाप के बंधन से छूटता है , हे पार्वती ! इसलिये तत्त्व के जानने वाले इसको दीक्षा कहते हैं | दुसरे स्थल में दीक्षा का महत्त्व इस प्रकार वर्णीत है ----- यस्य विज्ञानंमात्रेण देवत्त्व लभते नर: |

दिव्य ज्ञान यतो दधात् कुर्यात्पापक्षय तत: ||
त्स्माद्दीक्षेती स्म्प्रोत्का सर्वतन्त्रस्य सम्मता |

जिस दीक्षा के पाने मात्र से मनुष्य को ज्ञान होता है , जिस दीक्षा से दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है और जिससे पाप का क्षय होता है , इसीलिये इसको दीक्षा कहते है , और सब तंत्रोंशास्त्रों का इस विषय में एक ही मत है | शस्त्र कहता है –

भवेद्दीक्षाविहीनस्य न सिधिर्न च सद्गति: |
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरुना दीक्षितो भवेत् ||

स्कन्द पुराण में लिखा है की “ देवता लोग भी दीक्षा लेने को उत्सुक रहते है |” स्वमिकारत्तिकेय ने विश्वामित्रजी से नीचे लिखे शब्दो में दीक्षा मांगी |

त्त्कच्च माँ श्रुतिसन्सकारै: सर्वै: संस्कत्तुमर्हसि |
संस्काररहित जन्म यतचश्र पशुवत्स्म्रतम् ||

आप सब वेदों के संस्कारो से मेरा संस्कार करे | क्यंकि बिना संस्कार पाए मनुष्य का जीवन पशु के समान है | आज कल दीक्षा देने का चलन बहुत कम हो गया है | और बहुत थोड़े ब्राह्मण बालको को शास्त्र के अनुसार गायत्री की दीक्षा दी जाती है | जिनको गायत्री की दीक्षा दी भी जाती है उनसे नियमानुसार वर्त का पालन नही कराया जाता | क्षत्रियो में दीक्षा का कर्म कही कही फैल रहा है | किन्तु हिन्दू जाती के कल्याण के लिए यह आवश्यक है की प्रत्येक हिन्दू सन्तान को दीक्षा दी जाय | गायत्री की दीक्षा उन्ही बालको दी जाती है जिनकी शास्त्रानुकुल उपनयन संस्कार किया जाता है | धर्मरक्षा और प्रचार के लिए अत्यावश्यक है कि प्रत्येक हिन्दू – संतान को वह दीक्षा दी जाय जिसका विधान ब्राह्मण से लेकर चंडाल पर्यन्त समान हो | मन्त्र मुत्कावली में लिखा है कि मंत्र की दीक्षा लेकर ही जप और देवता की पूजा करनी चाहिए |

जपो देवार्चनविधि: कार्यो दीक्षान्वितैनरै: |

जी बिना दीक्षा लिय अपना जीवन स्य्तित करता है , वह दुःख पाकर मोहन्धकार रूपी गढ्ढे में गिरता है , जैसे की स्वमिरहित मनुष्य की कोई रक्षा करने वाला नही होता है | उसका इस लोक में भी और परलोक में भी कोई रक्षक नही होता |

अथ दीक्षाविहीनो हि वत्र्तते भुवि पापभुक् |
मिहान्धकारे नरके गर्ते पतति दुख:ती: ||
अनीच्श्ररस्य मतर्यस्य नास्ति त्राता यथा भुवि |
तथा दीक्षाविहीनस्य नेह स्वामी परत्र च || दत्तात्रेयामले

रुद्राध्याय में लिखा है कि जिस ब्राह्मण ने दीक्षा पाइ है वह अमृतमय ब्रह्मलोक को पहुचता है, वैश्य प्रजापतिलोक को पहुचता है और दीक्षा के फल से शूद्र गन्थर्वलोक को पहुचता है |

दीक्षितो ब्राह्मणों याति ब्रह्मलोक सुधामयम् | ऐन्द्र लोक क्षत्रियोऽपि प्राजापत्यं विशस्तथा ||
याति गन्धर्वनगरं शुद्रो दीक्षाप्रसादत: | रूद्रयामले

वैष्णवतन्त्र ने लिखा है :----

यथा काच्ञनतां याति कास्य रसविधानत: |
तथा दीक्षाविधानेन व्दिजत्त्व जायते नृणाम् ||

जैसा कासे पर रस का प्रयोग करने से वः सोना हो जाता है, वैसा ही दीक्षा लेने से मनुष्य व्दिजत्त्व को प्राप्त करता है | तन्त्रचिन्तामणि में लिखा है कि महाविधा के प्रभाव से शूद्र वैशयत्त्व को प्राप्त होता है | हे देवि ! शूद्र जाति प्रणव-पूर्वक मंत्र ग्रहण करे |

महाविधाप्रभावेण शूद्रो वैशयत्त्वमाप्नुयात् |
प्रणवाधं महेशानि ग्रिह्नियु शुद्रजातय: ||

नवरत्नेचश्र में आया है की किसी प्रकार की दीक्षा क्यों न हो , उसका फल अवश्य अखण्ड मुक्ति है | मुक्स्ती तो बना विरोध के ही प्रसंगत हो जाती है ----

सर्वासामपि दिक्षणा मुक्ति: फलमखण्डित् |
अविरोधभद्वन्त्येव प्रस्डिगक्यस्तु मुक्तय: ||

दीक्षित मनुष्य का महत्त्व दिखाते हुए कुलार्णवतंत्र में आया है कि जैसे राजेंद्र से बिधा हुआ लोहा स्वर्ण बन जाता है , वैसे ही दीक्षा – विद्ध आत्मा शिवतत्व को प्राप्त होता है | मनुष्य दीक्षाग्नि से दग्धकर्म हो जाता है और बंधन – रहित हो जाता है | जीव भी भाव से रहित होकर शिव हो जाता है | जैसे शिवलिगड में देव बुद्धि छोड़कर पत्थर बुद्धि करने से मनुष्य पाप का भागी होता है , उसी प्रकार दीक्षित मनुष्य में उसकी पूर्वावस्था का खयाल क्लारने वाला मनुष्य भी पाप का भागी होता है ------

रसेंद्रेंण यथा विद्दमय: सुवार्नता वृजेत् |
दीक्षाविद्धस्तथैवात्मा शिवत्तंव लभते प्रिये ||
दीक्षाग्निग्धकर्मासौ पशाद्दिच्छिन्नबंधन: |
गतस्तस्य कर्मबंधो निर्जीवचश्र शिवो भवेत् ||
शिव्लिग्ड़े शिलाबुद्धि कुर्वन् यत्पापमाप्नुयात् |
दीक्षितस्यपि पुर्वत्त्व स्मरन् तत्पापमाप्नुयात् ||

शैवी दीक्षा का सर्वोत्तम मंत्र ‘ ॐ नम: शिवाय’ है | इसमें यह छ: अक्षर का मात्र है , किन्तु लोक में पंचाक्षर कहा जाता है | ‘ॐ नम: शिवाय’ का अर्थ है कि सरे जगत् की सृष्टि , पालन और संहार करने वाले परम मगडलस्वरूप परमात्मा को मै प्रणाम करता हू | इसके विषय के स्कन्द पुराण में लिखा है की शुद्र हो चाहे अन्त्यजादि हो , किन्तु शिव दीक्षा से युक्त होकर भक्ति पूर्वक यदि एक पुष्प शिवाजी के ऊपर षडक्षर मात्र से रखता है तो वह उस परम गाती को प्राप्त होता है , जिसे विधि पूर्वक यज्ञ करने वाले पाते है |

शुद्रो वा यदि वा विप्रो म्लेच्छो वा पाप्क्रिन्नर: |
शिवदीक्षासमोपेत: पुष्पमेंक तु यो न्यसेत् ||
षडक्षरेण मत्रेंण लिग्डस्योपरि भक्तित: |
स ता गतिमवाप्नोति यां यांतीह हि यज्विन: ||

शिवपुराण वायवीय सहिता के ऊतर भाग में ११वे अध्याय में शिवाजी ने अपने श्री मुख्य से श्री पार्वतीजी को उपदेश किया है कि ----

ब्रम्हाक्षत्रविशा देवि यतिना ब्रह्मचारणिम् |
तथैव वानप्रस्थाना गृहस्थाना च सुन्दरी ||
शुद्रणामथ नारीणा धर्म एष सनातन: |
ध्येयसत्त्वयाह सेवेशी सदा जाप्य: षडक्षर: ||

अर्थात हे देवि ! ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य ,याति ,ब्रह्माचारी , वानप्रस्थ , गृहस्थ , शुद्र और स्त्री सबो का ( सर्वमान्य ) यह सनातनधर्म है कि तुम्हारी मुक्ति से युक्त मेरी मूर्ति का ध्यान किया करे , और सदा ‘ ॐ नम; शिवाय’ इस षडक्षर मंत्र का जप किया करे | शिवपुराण में उसी सहित के 12 वे अध्याय में लिखा है कि भगवन् श्री कृष्ण ने महर्षि उपमन्यु के कहा कि आप पंचाक्षर का महात्म्य मुझे सुनाइए | इस पर उपमन्तु जी बोले ------

बपंचाश्रारस्य माहात्म्य वर्षकोटिशतैरपि |
अशक्य विस्तराव्दत्क्तु तस्मात्सक्षेपत: शृणु ||

पंचाक्षर मंत्र का महात्म्य करोड़ वर्ष में भी विस्तार के साथ कहना सम्भव नहीं है | इसलिये संक्षेप में सुनिए |

वेदे शिवागमे चायमुभयत्र षडक्षर: |
मंत्रस्थित: सदा मुख्यो लोके पंचाक्षर: स्मृत: ||
सर्वमंत्राधिकच्श्रायमोक्डाराध: षडक्षर: |
सर्वेषां शिवभत्क्तानामशेषार्थप्रसिद्धये ||
प्राहोनम: शिवायेति सर्वज्ञ: सर्वदेहिनाम् |
अन्त्यजो वाऽधमो वाऽपि मूर्खो वा पण्डितोऽपि वा ||
पंचाक्षरजपे निष्ठो मुच्यते पापपच्ञरात् |
इत्युक्त्त परमेशेन देव्या पृष्टेन शुमिना |
हिताय सर्वमतर्याना जनानामविशेषत: ||

वेद और शैव आगम दोनों में यह छ: अक्षर का सदा से स्थित है, और सब मंत्रो में मुख्य है | श्लोक में यही पंचाक्षर के नाम से प्रसिद्ध है | ॐकार से युक्त यह मंत्र सब मंत्रो में बड़ा है | जिनको आदिदेव महादेव में भक्ति है, उनकी सब कामनाओ को पूरा करने वाला है | सर्वज्ञ शिवजी ने सब प्राणियों के सब अर्थो की सिद्धि के साधन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र को अपने श्रीमुख से कहा है जिसको सब लोगो सुख से उच्चारण कर सकते है | अन्त्यज या नीच, मुर्ख या पण्डित, जो भी पंचाक्षर मंत्र का जप नित्य श्रद्धा से करता है वह पाप के पंजर से छुट जाता है | परमेच्श्रर शिवाजी ने सब प्राणियों के हित के लिये पार्वतीजी के पूछने पर ऊपर लिखा वचन खा है|

शिव-पार्वती संवाद

इसका संक्षेप नीचे लिखते है | पर्वतीजीने शिवाजी से पूछा कि-----

कलौ कलुषिते काले दुर्जये दुरतिक्रमें |
अपुणयतमसाचछन्ने लोके धर्मपराड्मुखे ||
क्षीणे वर्णसदाचारे सक्डरे समुपस्थिते् |
सर्वाधिकार सन्दिग्धे निच्श्रिते वा विपर्यये ||
तदोपदेशे विहिते गुरुशिष्ट क्रमेंगते |
केनोपायेन मुच्यन्ते भक्त्तास्तव महेव्श्रर ||

कलियुग में विकराल काल आने पर जब पापरूपी अन्धकार फैल जाय और लोग धर्म से विमुख हो जायँ और वर्णसंकर बढने लगे, जब सब लोगो को सभी धर्म विषयों पर सन्देह होने लगे, गुरु और शिष्य के क्रम से उपदेश देने का क्रम न रहे तो महेव्श्रर ! आपके भक्त किस उपाय से पाप से छुटते है ?

शिवाजी बोले
आश्रित्य परमा विधा दृश्या पंचाक्षरी मम |
भक्त्या च भावितात्मानो मुच्यन्ते कलिजा नरा: ||
मनोवाक्कायजैर्दोषैर्वक्त्तुं स्मर्तुमनोचरै: ||
दूषिताना कृतघ्नाना निर्दयाना खलात्मनाम् |
मम पंचाक्षरी विधा संसारभयतारिणी ||
मय्यैवमसकृछेवि प्रतिज्ञात धरातले |
पतितोऽपि विमुच्येत मभ्डक्त्तो विधयानया ||

कलियुग में उत्पन्न प्राणी मेरी पंचाक्षरी विधि का आश्रम कर, अर्थात पंचाक्षर मंत्र कप नित्य श्रद्धा से जप करके और मेरी भक्ति से अपनी आत्मा को पवित्र करके पाप से छूट सकते है | मन से, वचन से और काया से किए हुए पापो से दुषित प्राणियों को, जिन पापो को मुख से वर्णन करना और जिनका स्मरण करना भी कठिन हो, जो किए हुए उपकार को नहीं मानते----ऐसे कृतघ्नो को और पापियों को, दया रहित क्रूर प्राणियों को और दृष्ट आत्माओ को, लोभियों को और कुटिल मन वालो को भी मेरा पंचाक्षर मंत्र संसार के सब डरो से दूर कर देता है, यदि वे मेंरी ओर अपनी आत्मा को झुकावे | हे देवि ! मैने पृथ्वी तल पर बार-बार प्रतिज्ञा-पूर्वक यही खा है कि यदि पतित भी हो तो इस मंत्र के व्दारा पाप से छूट जाता है |

अरुद्रो वा सरुद्रो वा सकृत्पचाक्षरेण य: |
पूज्यो वा पतितो वाऽपि मढो वा मुच्यते नर: ||
षडक्षरेण वा देवि तथा पंचाक्षरेण वा |
सब्रह्मा्ग्डेण मां भक्त्या पूजयेधदि मुच्यते |
पतितोऽपतितो वापि मंत्रेणानेन पूजयेत् ||

चाहे उसने शिव-मंत्र का उपदेश विधि से लिया हो चाहे न लिया हो, पतित हो वा मुर्ख हो, जो एक बार भी श्रद्धाभक्ति से पंचाक्षर का जप करता है वः पाप से छूट जाता है | हे देवि ! षडक्षर ‘ॐ नम: शिवाय’ से या ५ अक्षर ‘ॐ नम: शिवाय’ से जो भक्ति-पूर्वक मेरा पूजन करता है वह मुक्ति को पाता है | चाहे पतित हो या अपतित हो, सबको एस मंत्र से पूजन करना चाहिए | शिवाजी ने कहा है ------

किमत्र बहुनोंक्त्ते भक्ता: सर्वेऽधिकारिण: | मम पंचाक्षरे मंत्रे तस्माच्छेष्ठतरो हि स: ||

अर्थात , इस विषय में बहुत कहने से क्या ? जिन प्राणियों को मुझमे भक्ति है वे सब इस पंचाक्षर मंत्र के जपने के अधिकारी हैं | इसीलिए यह सब मंत्रो में शेष्ठ है |

स्दाचार्विहीनस्य पतितस्यन्त्यजस्य च |
पंचाक्षारात्पर नास्ति परित्राणा कलौ युगों ||
अन्त्यज्स्यापी मुर्खस्य मूढ़स्य पतित्स्य च |
निर्मर्यादस्य नीचस्य मन्त्रोअय न च निष्फल: ||
सर्वावस्था गत्स्यापी मयि भक्तिमत: परम् |
सिद्धचत्येव न संदेहों नापरस्य तु कस्यचित् ||

अर्थात , सदाचार से विहीन जो पतित है , अर्थात सारे कुकर्म करने से या अपना धर्म छोड़कर किसी दुसरे मत को मान मेले के कारन जो धरम से गिर गया है , अथवा अन्त्यज है उसका इस कलियुग में पंचाक्षर से परे कोई रक्षा करनेवाला नही है | अनपढ़ अन्त्यज भी हो और दुबुद्धि पतित भी हो , जो सब मर्यादा से गिर गया हो और सब प्रकार से नीच हो , वह भी इस मंत्र को जपे तो उसका जपना निष्फल नही जाता | किसी भी अवस्था में किसी प्राणी का मुझसे भक्ति रखकर पंचाक्षर मंत्र जपना उसे सब पापो से छुडाता है और उसके लिए सब सुख का साधन बन जाता है | इनसब प्रकरणों से यह स्पष्ट है क्की ब्राह्मण से लेकर अन्त्यज पर्यन्त सभी सनातनधर्मानुयायी पुरुषो और स्त्रिओ को पंचाक्षर मंत्र जपने का अधिकार है , चाहे वह ॐ कर – सहित जपा या ॐ कर रहित |

मत भक्तो जितक्रोधो ह्यलब्धो लब्ध एव वा |
अल्ब्धालब्ध एवेह कोटिकोटिगुणाधिक: ||
तस्माल्ल्ब्धेव मा देवि मन्त्रेणानेन पुज्येत् |
लब्ध्वा स्म्पुजयेधस्तु मैत्रयादिगुणसंयुत: ||
ब्रह्मचर्यरतो भक्त्या मत्सादृश्यमवाप्नुयात् |
किमत्र बहुनोक्त्तेन भक्ता: सर्वेऽधिकारिण: ||
मम पंचाक्षरे मन्त्रे तस्माच्छेष्टतरो ही स: |
तस्मादनेन मन्त्रेण मनोवाक्काय भेदत: ||
आवयोरर्चनं कुर्याज्जपहोमादिकं तथा |
यदा कदापि वा भक्त्या यत्र कुत्रापि वा कृता ||
येन केनापि वा देवि ! पूज्य भुक्ति नयिष्यति |
मय्यासक्त्ते मनसा यत्कृत मम सुन्दरि ||
मत्प्रिय च शिवच्ञैव क्रमेणाप्यक्रमेण वा |
तथापि मम भक्ता ये चात्यन्त विवशा: पुन : ||
तेषामर्थेषु शास्त्रेषु मयैष नियम: कृत: |

मंत्रग्रहण किए बिना पूजा करने की अपेक्षा मंत्र ग्रहण करके पूजा केना कोटि गुणा अधिक होता है | इस कारण हे देवि! मंत्र हो ग्रहण करके ही इस मंत्र से मेरी पूजा करे | मंत्र-दिक्षा लेकर सर्व सुहभ्दा वाला ब्रह्मचर्य व्रत में रत जो पुरुष भक्ति-पूर्वक मेरी पूजा करना है वह मेरे सदृश हो जाता है | इस पर अधिक क्या कहे | मेरे पंचाक्षर मंत्र का सभी भक्तो को अधिकार है | इसी कर्ण यह मंत्र सर्वश्रेष्ट है | अत: सबको चाहिए कि इस मंत्र से मन, वचन और कर्म से ह्म दोनों की पूजा और जप होमादी करे | हे देवि ! अपनी बुद्धि, श्रद्धा, काल, विचार, शक्ति, सम्पत्ति, यथायोग और अपनी प्रीति के अनुसार जब कभी, कही भी तथा किसी प्रकार भी भक्तिपूर्वक की हुई मेरी पूजा मुक्ति तक पहुचा देती है | हे देवि ! मुझमे आसक्त्त मनसे जो कुछ भी मेरा प्रिय और मंगल कार्यक्रम या अक्रम जिस किसी प्रकार किया जय वह सब मुक्ति देनेवाला होता है | हे देवि ! जिससे मेरे भक्त अत्यंत कठिनाई में भी रहकर मेरी पूजा कर सके, इससे उनके लिए शास्त्रों में मैने यह नियम किया है |

व्दादशाक्षर और अष्टाक्षर मंत्र

इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तर में व्दादशाक्षर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और अष्टाक्षर ‘ॐ नमो नारायणाय’ ये मंत्र विशेषकर स्त्री तथा शुदो के लिये खे गए है , किन्तु ये मंत्र वडीजातियों के लिए भ कल्याण –कारक है | अर्थात चारो वर्णों को मंत्रो को जपना चाहिए |

एतत्प्रोक्त्त व्दिजातीना स्त्रीशूद्रेषु च यचछृणु |
व्दादशाष्टाक्षरौ मंत्रौ तेषा प्रोत्क्तौ महात्मनाम् ||
हितौ तौ च व्दिजातीना मंत्रश्रेष्ठौ नराधिप |
तेभ्योप्यधिकर्मत्रोऽपि विधते नहि कुत्रचित् ||

नृसिह पुराण के ६२वे अध्याय में राजा सहस्त्रानीक ने
मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि वह पूजा की विधि बताईये कि जो सबके हित के लिए हो, अर्थात् जिसके अनुसार सब प्राणी विष्णु का पूजन कर सके | इसके उत्तर में मार्कण्डेयजी ने कहा -------

अष्टाक्षरेण मन्त्रेण नरसिहमनामयम् |
गन्धपुष्पादिभीर्नित्यमर्चयेडच्युत नर: ||
राजन्नष्टाक्षरो मंत्र: सर्वपापहर: पर: |
समस्त यज्ञफलद: सर्वशान्तिकर: शुभ: ||

मनुष्य ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर मंत्र से विष्णु भगवान् नरसिह की पूजा करे | इसी से गन्ध पुष्पादि सोलहो उपचारों से पूजा करे | हे राजन् ! यह अष्टाक्षर मंत्र सब पापो का हरनेवाला, सब यज्ञो के फल के देनेवाला, सब दुःख और दोषों की शान्ति करनेवाला है | उसी पुराण के १८वे अध्याय में लिखा है कि शुकदेवजी के ह प्रश्न करने पर कि किस मंत्र को जपता हुआ मनुष्य संसारसागर के दुःख से छुटकारा पाता है ----- भगवान् वेदव्यासजी ने कहा-----

अष्टाक्षरं प्रवक्ष्यामि मंत्राणां मंत्रमुत्तमम् |
यं जपन्मुच्यते मत्र्यो जन्मसंसारबन्धनात् ||
एकान्ते निर्जेने स्थाने विष्ण्वग्रे वा जलान्तिके |
जपेडष्टाक्षरं मंत्र चित्ते विष्णु निधाय वै ||

अष्टाक्षर मंत्र सब मंत्रो के उत्तम है | कोई मनुष्य हो, मत्र्य ही---जिसको एक दिन अवश्य मरना है ----इस मंत्र को जपकर जन्म और संसार के बन्धन से छुट जाता है | एकान्त में, निर्जन स्थान में, विष्णु के आगे वा नदी वा जल के पास भगवान् विष्णु को मन-मन्दिर में बिठाकर इस मंत्र को जपे | भगवन् के नाम अनन्त है | विष्णु सहस्त्र-नाम और शिव- सहस्त्र-नाम उन नामो को पूर्ण रूप से नहीं गिना सके | उनमे से किसी एक नाम को भी जो मनुष्य श्रद्धा-भक्ति से उच्चारण करे तो उसका सब प्रकार से मंगल होना | किन्तु जिस प्रकार से ईख का रस निकालकर कुज्जे में भर दिया जाता है ,उसी प्रकार जगत् का हित चाहने वाले ॠषियो ने कुछ मंत्र विशेष प्रकाश कर दिए है, जिसके जपने का अधिकार ब्राह्मणों से लेकर चाण्डाल तक को है | इस विषय को मैने ‘मंत्रमहिमा’ नामक छोटी पुस्तक में विस्तार से लिखा है, उसको मै निवेदन के साथ सम्मिलित करता हू , सज्जन वृन्द कृपाकर उसको देखे | इन मंत्रो की महिमा अति गम्भीर है मेरी भुत दिनों से यह प्रार्थना है कि ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल पर्यन्त समस्त हिन्दू सन्तान इन मंत्रो की दीक्षा ले और उससे ऐहिक और परलौकिक लाभ उठावे | इन सब बातो को लेकर रुद्रयामल में आया है कि अनेक जन्मो की पुण्यराशी से मनुष्य दीक्षित होता है, उस पर भी अनेक पुण्यो का उदय होने पर शिव और विष्णु में परायण होता है |

अनेकजन्मपुण्यौघैर्दीक्षितो जायते नर: |
तत्राप्यनेकपुण्येन शिवविष्णुपरायण: ||

दीक्षा में जो कर्तव्य किया जाता है वः सब मंत्र ग्रहण के लिये ही किया जाता है; उस मंत्र ग्रहण रूप दीक्षा का ही सब फल शास्त्रों में कहा गया है | अतएव शास्त्रों में मंत्रो की बड़ी उतकृष्ट महिमा पाई जाती है | मंत्र किसे कहते है, एस पर शास्त्रों में आया है कि जिसके मनन करने से विच्श्र का विशेष ज्ञान हो जाता है, संसार-बन्धन से रक्षा होती है और जिससे सिद्धि प्राप्त होती है, उसे मंत्र कहते है-------

मन्नाव्दिव्श्रविज्ञानं त्राणं संसारबन्धनात् | यत: करोति ससिद्धि मंत्र इत्युच्यते तत: || पिग्डलामल |

मंत्र के महत्व के विषय में आया है कि मंत्र ही साक्षात् ईव्श्रर और महौषधि है | मंत्र से बढकर सिद्धि देनेवाला कोई नहीं है | साधको को सिद्धि देने के लिए देवताओ ने तत्तत्स्वरूप को धारण किया, परन्तु उन स्वरूपों में मंत्र का ही मुख्य स्वरूप है------

मंत्र: सर्वेव्श्रर: साक्षान्मंत्र एव महौषधम् |
न हि मंत्रात् पर कव्श्रित् सर्वसिद्धिप्रदायक: ||
साधकाना फल दातु त्त्तद्रूप धृतं सुरै: |
मुख्यस्वरूप तेषा तु मंत्रा एव न चेतरत || मेरुतंत्र

मंत्र देनेवाले गुरु कैसे होने चाहिए , इस पर स्कन्द पुराण में लिखा है की गुरु निर्मल , साधू , स्वल्प बोलने वाले , काम क्रोधादि से रहित , जितेन्द्रिय और सदाचारी होने चाहिए | ऐसे गुरु से दिया हुआ मंत्र शीघ्र ही सिद्ध होता है -------

गुरवो निर्मला शांता: साधवो मितभाषिण: |
कामक्रोधविनिमुर्कता: सदाचार जितेन्द्रिया: ||
एतै: करुणयतो दत्तो मत्र: क्षिप्र प्रसिध्यति |

मंत्र ग्रहण एक प्रकार का धार्मिक व्रत धारण करना है | इस कारन मन्त्र लेने वाले शिष्य को कैसे होना चाहिए , इस पर भविष्य पुराण में लिखा है ---------

क्षमा सत्य दया दान शौचमिन्द्रियनिग्रह: |
देव्पुजग्निहवन सन्तोष: स्तेय्वर्जनम् |
सर्वव्रतेषवय धर्म सामान्यो द्शाधा स्थित: || भविष्य पु० |

अर्थात , व्रत धारण करने वाले शिष्य को अनानादी से शुद्ध , सत्य , दया, क्षमा, दान , जितेन्द्रिय , अग्नि में हवन , देवपूजन , सनतोष , और चोरी न करना , इन दस धर्मो का पालन करना चाहिए | महर्षि देवल का कहना है की किसी भी बाट के लिए वर्त धारण करनेवाले को ब्रह्मचर्य , अहिंसा, सत्य और मांस का परित्याग , इन चार बातो का पालन सदा करना चाहिए --------

ब्रह्मचारीमहिंसा च सत्यमामिषवर्जनम् |
व्रतेषवेतानि च्त्त्वारि चरितव्यनि नित्यशः ||

शिवपुराण में लिखा है कि चारो वर्णों को मघ का और मघ की गन्ध का त्याग करना भी आवश्यक है |

मघस्य मघग्न्धस्य वर्जन सामान्य सर्ववर्णानांम् |

इस प्रकार शास्त्रानुसार गुरु और शिष्य्भाव से सम्पन्न होकर रात्रि में उपवास करके मंत्रदीक्षा लेनी चाहिए | यघपि शैव वैष्णवादि का भेद लेकर एव अधिकारी और उद्देश्य का हेड लेकर मंत्र अनेक प्रकार के है , और उनकी दीक्षा के लिए लगन , मुहूर्त , वार , योगादि की शुधि अपेक्षित होती है , तथा अधिकारी भेद से मंत्रदीक्षा की अनेक विधिय भी है , तथापि शारीरिक और मानसिक शुद्धी के लिए संस्कार के रूप में शैव और वैष्णवादी मुख्य दो तिन प्रकार के ही भेद मने जाते है , और गुरु देश और भावना विशेष के कारन मंत्रदीक्षा के सरल और सर्वहित नियम भी शास्त्रों में देखे जाते है | इस कारन गुरु , शिष्य , तिथि और स्थान विशेष के महत्त्व का विचार कर किसी भी अनुकूल अवसर पर मंत्रदीक्षा ली जा सकती है | योगिनी तन्त्र में आया है कि जब भगवान् की महापूजा का दिन हो , चतुर्दशी हो , अष्टमी , पंचमी या चतुर्थी हो तो उस दिन दीक्षा कायर्य हो सकता है | क्यंकि ये सब तिथिया शुभ देने वाली कही गयी है ---

मन्वन्तरासु सर्वासु महापूजा दिने तथा |
चतुर्थी पंचमी चैव चतुर्दश्य्ष्टिमी तथा ||
.............”तिथय: शुभदा: प्रोक्ता:”|

एव पुराण और तन्त्र ग्रन्थो में यह वचन भी आया है कि जिस दिन गुरु मंत्रदीक्षा देने के लिए प्रसन्न हो जाय उस दिन सभी वार , ग्रह , नक्षत्र और राशि शुभ हो जाते है ------

सर्वे वारा ग्रहा: सर्वे नक्षत्राणि च राशय: |
यस्मिनन्हनि सन्तुष्टो गुरु: सर्वे शुभावहा: ||

योगिनीतन्त्र में यह भी आया है कि ग्रहण और महतीर्थो के काल-निर्णय की आवश्यकता नही होती है ------

ग्रहणे च महतीर्थे नास्ति कालस्य निर्णय: |

इतना ही नहीं, किन्तु दिक्षातत्त्व में यह भी वर्णन आया है कि गुरु की आज्ञा के अनुरूप जब इच्छा हो तभी दीक्षा हो सकती है और जब भी स्वेच्छा से सद्गुरु मिल जाय तभी दीक्षा ली जा सकती है | उस दशा में तिथि, वार, व्रत, होम, स्नान, जपादि क्रियाओ की प्रबल कारणता भी नहीं रहती है -------

यदैवेच्छा तदा दीक्षा गुरोराज्ञानुरूपत: |
न तिथिर्न व्रतं होमो न स्नान न जप: क्रिया |
दीक्षाया: कारणं कीच्ञित् स्वेच्छयाप्ते तु सदगुरौ ||

इन सब बातो को विचारकर इस वर्ष सनातनधर्म महासभा ने महाराज दरभंगा के सभापतित्त्व में महाशिवरात्रि के पुण्य अवसर पर अन्त्यज पर्यन्त समस्य वर्णाश्रम धर्मी हिन्द-सन्तान को, जिन्होंने अब तक किसी मंत्र की दीक्षा न ली हो, शैव पंचाक्षर से मंत्रदीक्षा देने का पस्ताव पास किया है, इसलिए कि उसके द्वारा हिन्दू-सन्तान में बल, विधा, बुद्धि और सद्भाव की वृद्धि हो | फाल्गुन मास के दीक्षा के फल में भी आया है कि फाल्गुन मास में दीक्षा लेने से बुद्धि की वृद्धि होती है----

माघे भवेन्मेधा विवर्धनम् |
फाल्गुनेऽपि विवृद्धि: स्यात् ||
अगस्त्यसंहिता |

दीक्षा के लिए सर्वोत्तम स्थानों का निर्देश करते हुए योगिनितंत्र में आया है कि मंत्रज्ञ पुरुष गोशाला, गुरुगृह, देवमंदिर, स्वच्छ जग्डल, तीर्थ क्षेत्रादि पुण्य स्थान, बाग-बगीचे, नदी का स्वच्छ किनारा, आवले और बेल के वृक्ष के निकट, पर्वतों की सुंन्दर गुफाओ के समीप और गंगतट पर मंत्रदीक्षा दे | क्योकि दीक्षा के लिये ये सब स्थान उत्तम होते है | इनमे भी गंगा का तट करोड़ो गुण वाला होता है---

गोशालायां गुरोर्गेहे देवागारे च कानने |
पुण्यक्षेत्रे तथोधाने नदीतीरे च मंत्रवित् ||
धात्रीबिल्वसमीपे च पर्वताग्रे गुफासु च |
गग्डायास्तु तटे वापि कोटिकोटि गुण भवेत् ||

दीक्षा लेने की विधि

दीक्षा लेने की साधारण और सरल विधि यह है कि गुरु पूर्व रात्रि में ब्रह्मचर्य-पूर्वक उपवास करे | अगले दिन प्रात:काल शैाच-स्नानादि से शुद्ध होकर दीक्षा के पवित्र स्थान में जावे | वह पर सब दिक्षार्थी उपवास और स्नानादि से शूद्ध होकर दीक्षा ले |जो गुरु असमथ्र्य या कारण विशेष से रात्रि में उपवास न कर सके, वे हविष्यान्न ग्रहण कर सकते है | नारद पंचरात्र में आया है कि मंत्र देनेवाले गुरु पहले दिन उपवास करे | यदि उपवास न कर सके तो हविष्यान्न, अर्थात् नारियल का फल दधि, घी, गौ का शुद्ध दूध, केला, आँवला आदि, अथवा चावल, जैा,मूंग की दाल, टिल आदि हविष्यान्न ग्रहण करे |

दधान्मंत्र गुरु: स्वच्छ शिष्य भक्तिसमन्वितंम् |
उपोष्यैकदिन पूर्व यद्वा भुक्त्वा हविष्यकम् ||

इस प्रकार गुरु और शिष्य शुद्ध होकर दीक्षा होकर दीक्षा-स्थान में जावे और वहा पर गुरु पूर्व की और मुख करके तथा शिष्य उत्तर की ओर मुख करके बैठे |

स्नात्त्वा तु निर्मले तोये पूर्वास्य सुस्थमानस: |
शिष्टच्ञोदड्मुखस्थच्ञ..........|| नारद पंचरात्र|

इसके बाद आचमन से शुद्ध होकर जिस मंत्र की दीक्षा देनी हो उसके मुख्य देवता को गुरु नमस्कार करे | शिव-मंत्र की दीक्षा देने के लिये शिवाजी को और विष्णु-मंत्र की दीक्षा के लिये विष्णु को नमस्कार करे | फिर मंत्र लेने वाले शिष्य के कानो में तिने बार मंत्र सुनाकर माथे पर हाथ रखकर शास्त्र-निर्दिष्ट शैव और वैष्णवं मंत्र की दीक्षा देनी चाहिए | शिवपुराण में सर्वोपयोगी एसी ही सरल विधि का वर्णन मिलना है | इस प्रकार मंत्र लेकर शिष्य गुरु को प्रणाम करे और गुरु अपने शिष्य को अहिसा, चोरी न करना, शैाच, ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-जय, सदाचार, जुवा न खेलना, मध-माँस का त्याग, दम, दया, सन्तोष, नम्रता, ज्ञान, ईश्वर भक्ति, देव, गुरु और धर्म में दृढ भक्ति, उधम, उत्साह और परोपकारादी व्रत के पालन का उपदेश करे | अन्त में शिष्य को यह आशीर्वाद दे, “हे शिष्य! तुम सदाचारी रहो | तुम्हे सदा कीर्ति, श्री, कान्ति, मेध, आयु, आरोग्य और बल की प्राप्ति हो |”

उतिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि समयगाचारवान् भव | कीर्ति श्री कान्ति मेधायुर्बलारोग्यं सदास्तु ते || क्रियासंग्रह |

इस प्रकार मंत्र-दीक्षा लेकर नित्य प्रात:काल स्नानादि से शुद्ध होकर भगवान् को नमस्कार करके १०८ बार मंत्र का जप करना चाहिए | सूर्य में स्थित परमेव्श्रर का ध्यान करना और अध्र्य देना चाहिए | पुराणों में मंत्रो की महिमा बड़े विस्तार के साथ वर्णित है | पंचाक्षर के महत्त्व की एक अत्यन्त मनोहर कथा स्कन्दपुराण के ब्रह्मखण्ड में इस प्रकार आई है कि मथुरा में दाशार्ह नाम का एक यदु रजा था | काशिराज की कलावती नाम की कन्या उसकी धर्मपत्नी थी | जब रजा ने उसे अपने पास बुलाया तो कलावती उसके पास नहीं आई और कहा कि तुम अशुद्ध ओ, मधपान करते हो, नित्य स्नान नहीं करते हो , वेश्यागामी हो, इस कर्ण मुझे छूने का साहस मत करो, और यह भी खा कि जब स्त्री अप्रसन्न हो, रोगिणी, गर्भवती तथा व्रतवाली हो तब उसे नहीं छूना चाहिए | कलावती की इतनी धर्मयुक्त बाते सुनने पर भी राजा ने अपने हठ नहीं छोड़ा और अपने भार्या को पकड़कर खीचना चाहा | ज्योही राजा ने उसे छुआ तो रजा को उसका शरीर अग्नि के समान जलता हुआ मालूम पड़ने लगा | तब आच्श्रर्य और भय के साथ राजा ने पूछा कि तुम्हारा शरीर जलता क्यों है ? उत्तर में रानी ने कहा कि बचपन में दुर्वासा ॠषि के दयाभाव से मुझे पंचाक्षर मंत्र की दीक्षा मिली थी | उसी का यह प्रभाव है कि कोई अपवित्र पुरुष मुझको छु नहीं सकता है | यह सुनकर राजा ने शुद्ध और पवित्र जीवन बिताने के लिए रानी कलावती से मंत्रदीक्षा माँगी |रानी ने कहा कि आप मेरे गुरु है, इस कर्ण मै आपको मंत्रोपदेश नहीं कर सकती | किन्तु आप मंत्र जानने वाले गर्ग मुनि से दीक्षा ले | रजा ने वैसा ही किया और मंत्रदीक्षा लेंते ही रजा के सब पाप ऐसे निकल भागे जैसे हजारो कौवे उड़ चले हो | इसके उपरांत राजा स्त्री सहित गुरु को प्रणाम करके अपने घर चला गया और स्त्री-पुरुष दोनों ने धार्मिक जीवन यापन कर परम सुख प्राप्त किया | इन शास्त्रीय विधानों के द्वारा समस्त असस्कृत हिन्दू-सन्तान को विशेषकर अन्त्यज भाईयो को शुद्ध और धर्मप्रमी बनाना प्रत्येक सनातनधर्म का कर्तव्य है |

(२)

भक्ति की महिमा

इस बाट को कहने की आवश्यकता नहीं है कि हरएक विचारशील हिन्दू मानता है या मान लेना कि अन्त्यजो का उद्धार करना सारा हिन्दू जाति का धर्म है | इसके दो कर्ण है | एक यह कि वे हमारी परम आवश्यक और उपकारी सेवा सरते है, इसलिय उनका उपकार करना हमारा धर्म है | दुसरे यह कि वे हमारे धर्मी है |जिस सनातनधर्म को हम मानते है, उसी को वे भी मानते है | बहुत-सा क्लेश सहने पर भी उनकी श्रद्धा आज तक इस धर्म में बनी है | वे हमारे है | हमारा सनातनधर्म हमको उन दिन भाइयो के द्धार केने का उपदेश करता है और उसका उत्तम और सरल मार्ग बतलाता है, वः भक्ति का मार्ग है | नारदजी का वचन है ------

सत्यादित्रियुगे बोधवैरागयौ मुक्तिसाधकौ |
कलौ तु केवला भक्तिर्ब्रह्मसायुज्यकारिणी ||

(२)

सतयुग, त्रेता, द्वापर में ज्ञान और वैराग्य मोक्ष के देनेवाले होते है | कलियुग में तो केवल भक्ति ही भजनेवाले को भगवान् से मिला देती है | नारदजी ने भक्ति के प्रति कहा है--------

तत्व तु भक्ति प्रिया तस्य स्त्त प्राणतोअधिका |
त्त्व्यहुत्स्तु भगवान् याति नीचगृहश्वपि ||
कलीना सदृश: कोअपि युगों नास्ति वरानने |
त्सिम्स्त्तवा स्थापयिश्यमी गेहे गेहे जाने जाने ||
अन्य धर्मास्तिरसकृतय पुरस्कृतय म्होत्सवान् |
तदा नाह ह्रेद्रसो लोके त्त्वान्न प्रवत्तरये ||
त्त्वद्न्विताचश्र ये जीवा भविष्यन्ति क्लाविह |
पपिनोअपी गमिष्यन्ति निर्ह्भ्य कृष्णमन्दिरम् ||
येषा चीते वसेभ्दक्ति: सर्वदा प्रेमरूपीणी |
न ते नश्यन्ति कीनाश स्वप्नेअप्यमलमुत्तरये: || पद्मपुराण , भागवत माहात्म्य

हे भक्ति ! तुम तो भगवान् की प्यारी हो , सदा उनको प्राण से भी अधिक प्रिय हो | तुम्हारे बुलाने से भगवन नीचों के घर भी चले जाते है | हे सुमुखी ! कलि के समान कोई दूसरा युग नही है | इसमें मै तुमको घर घर , प्राणी प्राणी के ह्रदय में बैठाऊँगा | दुसरे धर्मो को अलग रख , महोत्सवो में आगे रख , मै तुमको संसार में न फैला दूँ तो मै हरी का दास नही | इस कलयुग में जिन प्राणयो की भगवन ने भक्ति होगी , वे पापी भी क्यों न हो , निर्भय होकर कृष्णमंदिर को – वैकुण्ठ को जावेगे | जिनके चित में प्रेमरूपी भक्ति सदा बसेगी वे विलं मुक्ति स्वप्न में भी यमराज को नही देखेंगे | भगवन ने अपने श्रीमुख से कहा है -----

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभक् | साधुरेव स मंतव्य: सम्यक व्यवसितो ही स: || क्षिप्र भवति धर्मत्या शचश्रच्छानति निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न में भक्त: प्राणश्यति ||

कोई कैसे भी दुराचारी क्यों न हो , जो मुझको अनन्य बाव से भजता है , उसको मानो कि वह साधु ही है | उसने अच्छा निचश्रय किया है | वह शीघ्र ही धर्मात्मा होता है और सदा ठहरने वाली शान्ति को पाता है | हे अर्जुन ! मै तमसे प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मेरे भक्त का भला ही होता है , बुरा नही होता |

श्रध्दावन्तो मत्परमा भक्तातिव में प्रिया; |

श्रध्दावान् मत्परायन भक्त मुझको अत्यंत प्रिय है | इसी अभिप्राय को गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने ललित गंभीर श्ब्धो में कहा है -------

भक्तिवंत आती नीचहु प्रानी | मोहि प्राण सम प्रिय मम बानी ||
भक्तिविही विरचि किन होई | सब जीवन सम प्रिय मोहि सोई ||

अन्त्यजो के उधार करने का यही अर्वोत्तं मार्ग है कि हम उनको श्रध्दावान भगवभद्त्त्क बनने में सहायता दे | भक्ति साधन के अनेक मार्ग बताए गए है | उनमे से मै विशेष कर दो उपायों को सामान्य मनुष्यों के लिए विशष उपकारी मानता हूँ | एक कीर्त्तन , अर्थात नामस्मरण , दूसरा भगवन की मूर्ति का दर्शन | नाम का स्मरण सामान्य से सामान्य प्राणी के लिए भी सरल बाट है , किन्तु बड़े फल का देने वाला है | मंस्म्रण की महिमा इसीलिए है की “ यतस्तद्दिष्या मति:” नाम के स्मरण से मनुष्य की मति ईश्रर को ओर ही जाती है | उनके गुणों के स्मरण से मनुष्य के दोष और पाप छूत जाते है | और मान पवित्र तथा प्रकाशमान होता है | आजामील की कथा प्रसिद्ध है | वह कितना बड़ा पापी था तो भी ‘नारायण ‘ उच्चारण करने से वह सब पापो से छुट गया |

सर्वेषामप्यधवतामिदमेव सुनिश्कृतम् |
नाम व्याहरण विष्णोर्यतसतद्दिष्या मति: |

सब पापियों के लिए यह उत्तम प्रायश्रित है की वे भगवन का नाम जपे जिससे कि उनके मान में भगवन की भावना जागे | अन्यत्र लिखा है ------/p>

नामसकडीत्तन विष्णो: सर्वपापप्राणाशनम् | प्राणामो दुःखशमनस्त नमामि हरि परम् || भगवते |

नामस्मरण से चंडाल श्रपाक भी पवित्र हो जाता है | इस बात को माता देवहूति जी ने बड़े प्रेम से भरे ऊचे स्वर से कहा है -----

यन्नामधेयश्रवणाभिधानात् यत्प्रह्वणात् यत्स्मरणाद्पि क्वचित् | श्रादोऽपि सघ: स्वनाय कल्पते कुत: पुनस्ते भागव्न्नु दर्शनात् || अहो बत श्रचपचोऽतो गरीयान य्ज्जिह्वाग्रे वतर्तते नाम तुभ्यंम् | तेपुस्तपसते जुहुवु: स्स्नुरार्या गृहणन्ति ये तो ||

भगवन ! जो आपके नमो के श्रवण से वा कीर्तन से या आपको नमस्कार करने से अथवा कभी आपका स्मरण से साक्षात् , हो तो वह भी सोम्योग करने वाले पुरुषो के समान आदर के योग्य हो जाता है , तो हे भगवन ! आपको दर्शन करने की महिमा को मै क्या कहू | आहा हा , हे परमेश्वर | वह चंडाल इसीलिए शेष्ट है कि उसकी जिह्वा पर आपका नाम रहता है | जो लोग आपके नाम का कीर्तन करते है , वे श्रेष्ट पुरुष सब ताप कर चुके , सब हवन कर चुके , सब तिथो में स्थान कर चुके और उन्होंने सब वेदों का पठान पठान कर लिया | क्योकि सब पुण्यफल आपको नाम के कीर्तन से प्राप्त हो जाते है | पदमपुराण में लिखा है ------

तीर्थीनाच्च पर तीर्थ कृष्णनाम मह्र्षय: | तीर्थीकुर्वन्ति जगती गृहीत कृषणनाम यै: ||
तीर्थाद्प्यधिक तीर्थ विष्णोर्भजनमुच्यते |
तस्मात् भधंव मनुय: कृष्ण परममगडलम् ||
मुर्ख वा पण्डित वाऽपि ब्राह्मण केशव प्रियम् |
श्रपाक वा मोचयति नारायण: स्वय प्रभु: ||
विष्णुभक्ति विना नृणा पपिष्ठाना विशाम्वर |
उपायों नास्तिक नास्त्यान्य: संततु नरकाम्भुधिम् ||
प्रतिमच्च हरेदृरष्टवा सर्वतीथरफल लभेत |
विष्णुनाम पर जप्त्त्वा सर्व मंत्रफल लभेत ||
पुल्कस: श्रपचो वापी ये चान्ये म्लेच्छजातय: |
तेअपी वन्धा महाभागा हरिपादेकसेवका: ||
किम्पुंनब्राह्मणा पुण्य भक्ता राजर्षयस्तथा |

इन सब वचनों से स्पष्ट है की भवन्नाम जपने से पुल्कस और श्रपच भी आदर के योग्य हो जाते है |

हरेरर्ग सवनेरुच्चेनृत्यस्तन्नामकृन्नर: |
पुनाति भुवन विप्रा: गडादिस्लिल यथा ||
दर्शनत्स्पर्शनात्तस्य आलापद्पी भक्तित: |
ब्रह्महत्यादिभिपरापैमर्चयते नात्र संशय: ||
एषा मुखे हरेनाम ह्रदि विष्णु: सनातन |
उदरे विष्णुनैवेध स श्रपाकोऽपि वैष्णव: ||
यस्य नाम महापाप राशि दहित सत्त्वरम् |
तदीयचरण वन्दे भक्तिर्यस्त स वैष्णव: ||

इन सब वचनों से यह सार निकलता है की जो श्रध्दावान भक्त है , वह चंडाल या श्रपच भी क्यों न हो , यदि यह श्रध्दाभक्तिपूर्वक देवदर्शन की अभिलाषा से मंदिर में जावे तो उसके देखने से , उसके बोलने से और उसके स्पर्श करने से किसी प्राणी को भी दोष नही प्राप्त हो सकता , वरन पुण्य ही प्राप्त हो सकता है |

( ३ )
अन्त्यजों का देवदर्शन

पिछले प्रकरण में यह दिखा दिया गया है कि अन्त्यजो को संस्कार के रूप में शिव या वैष्णव किसी सम्प्रदाय की मंत्रदीक्षा लेने का अधिकार है | अब इस प्रकरण में यह बाट प्रकट ही जाती है की मंत्रदीक्षा के प्रभाव से शुद्ध और सदाचारी मदिरा मांस- त्यागी , भक्तिभाव से अम्न्वित अन्त्यजो को देवदर्शन का अधिकार है या नही ? इस बाट को स्पष्ट करने के लिए पुराणों का पर्यालोचन सहायक होगा | क्योकि वेदों में प्रचलित देवपूजन का अदिखर , महात्मा और उसकी विधि स्पष्ट रूप से देखने में नही आती है | वेदों में केवल अग्नि , इन्द्र , विष्णु , रूद्र , आदि नामो से देवताओ का वर्णन पाया जाता है | इसके बाद मनवादी प्राचीन स्मृतियो में देवपूजन के अतिरिक्त रूप में इस बाट की कुछ भी चर्चा नही आई है | इसके बाद की अनेक स्मृतियो में अंशत: कुछ कुछ वर्णन पाया जाता है | महात्मा , फल और अधिकारादी समस्त बातो को लेकर पुराण और महाभारतादि ग्रन्थो में ही संगोपान पूर्ण वर्णन मिलता है | इससे सिद्ध है की वर्तमान काल में जितने भी तीर्थ , मंदिर और जी कोई भी पुण्य – स्थान है उनका प्रचार पुराणों में ही प्रतिपादित है न की मनवादी जैसी प्राचीन स्मृतियो में | यधपि पुराणों में वैदिक मत और वैदिक विधान भी पाए जाते है , एव श्रुति और स्मृति के कथित बहुत से निषेध प्रकरण पाए जाते है , तथापि पुराणों का दर्जा स्मृतियों से कम नही माना गया है यही बाट है की श्रीशंकराचर्या जैसे प्राचीन धर्मोचरयो ने महाभारत और पुराणादि वाक्यों को स्म्रितिवाक्य के रूप में माना है | वर्तमान समय में अनातनधर्मियों के अन्दर जितना भी किर्यातमक धर्म विद्वान है उसका सबसे अधिक श्रेय पुराणों को ही है | पुराण सदा पंचम वेद के रूप में मानी है | पंचदशी में आया है की नारदजी में पंचम वेदरूप को पढ़ा था – “ स पुराणान पंच्वेदन “ | उत्तर्मीमनसा में आया है की इतिहास और पुराण वेद्मुलक है –“तस्मात्समूलमितिहासपुराणम्” , महाभारत में तो पुराणों की महत्ता के विषय में बहुत कुछ वर्णन मिलता है | अनुशासन पूर्व में आया है कि पुराण , मंवासी स्मृति , अंग सहित वेद और चिकित्साशास्त्र , ये सब इधर की आज्ञा से सिद्ध है | इस कारण कुतर्क से इनका हनन नही करना चाहिए |

पुराण मानवों धर्म: साग्डो वेदच्श्रिचिकित्सितम् |
आज्ञासिद्धानि चत्त्वारि न ह्न्तव्यानि हेतुभि: ||

महाभारत के प्रारम्भ में ही यह लिखा है कि व्यास जी ने अट्ठारह पुराणों के बनाने के बाद उनके उपबृंहणस्वरूप महाभारत को बनाया |

अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुत: |

इनके बाद आदिपर्व में यह वर्णन भी आया है कि इतिहास और पुराण से वेदों की वृद्धि करनी चहिए----“इतिहास पुराणाभ्या वेद समुपृबृंहयेत्” | इसी प्रकार मनु, याज्ञवल्क्य, व्यासादि स्मृतियों में पुराणों को धर्म के विषय में वेद की तरह बड़े महत्व का स्थान दिया गया है | याज्ञवल्क्य में लिखा है कि पुराण, न्याय, मीमाँसादि चौदह, विधाएँ धर्म के स्थान है-----

पुराणन्यायमीमाँसा धर्मशास्त्रग्डमिश्रिता: |
वेदा: स्थानानि विधना धम्मस्य च चतुरर्दश ||

छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय के प्रथम खण्ड में नारद और सनत्कुमार के संवाद में पुराणों को स्पष्ट रूप से पाँचवाँ वेद खा है | “इतिहास पुराण: पच्ञमो वेदाना वेद:” | धर्म के विषय में पुराणों के इन सब महत्त्वो को लेकर ही महाभारत के आदिपर्व में यह लिखा है कि पुराणों की पुण्य कथाएँ धर्म और अर्थ को देनेवाली होती है----“पुराणसंश्रिता: पुण्या: कथा धर्म्मार्थ संश्रिता:” | श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित सुश्र्म धर्म का भी विस्तार पुराणों ने सरल और स्पष्ट कर दिया है | जहाँ साधारण रूप से स्मृति ग्रन्थो में यह आया है कि चाण्डालादी शूद्र जाति को विशिष्ट धर्मादिक उपदेश नहीं देना चाहिए, वहाँ उसी बात को पुराणों में इस प्रकार दिखाया गया है कि यधपि साधारण प्रकार से जैसे व्दिज जाती का बालक उपनयन के पूर्व वेदादि के अध्ययन का अधिकार नहीं रहता है, किन्तु उपन्यनादी संस्कार से संस्कृत और गायत्र्यादि के मंत्र से दिक्षित हो जाने पर उन बातो का अधिकारी हो जाता है, वैसे ही चाण्डालादी अन्त्यज साधारणत: बहुत अंश में सम्मानित नहीं रहता है, किन्तु जब उसको अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौचादी का उपदेश मिल जाता है , और जब वह शैव वैष्णवादि मंत्रो से दीक्षित ह जाता है, तथा मध, मॉस और जुए का परित्याग करके नित्य स्नानादि क्रिया से पवित्र होकर भक्ति-भाव से युक्त होता है तो वह भी समाज में सम्मान का पात्र होकर देवदर्शन, कूप, पाठशाला, तीर्थ, व्रत, उत्सव और कथा पुराण श्रवणादि सामाजिक सर्वसाधारण कार्यो में भाग लेने का पूर्ण अधिकारी हो सकता है | यह पुराणों के विधानों से ही स्पष्ट हो जाता है | इसके निर्णय के लिए पुराणों से बढकर दूसरा कोई भी साधन नजर नहीं आता है | पुराणों में अनेक कथाएँ एसी आई है कि जो चाण्डालादी अन्त्यजो के देव-दर्शन और पूजन से ही विशेष सम्बन्ध रखती है, जिससे यह मालूम होता है कि देव-दर्शन करने से किसी भी अन्त्यज की इहलोक और परलोक में कभी भी दुर्गति नहीं हुई बल्कि सर्वोत्तम गति ही हुई | इस विषय पर स्कन्द्पुराण में बहुत सी कथाएँ इस प्रकार आई है -----

नन्दी वैश्य की कथा

स्कन्दपुराण के महेव्श्रर खण्ड में केदारखण्ड के पाँचवे अध्याय में आया है कि पूर्व समय में एक नन्दी नाम का वैश्य अवन्ती नगर में रहता था | वह प्रतिदिन प्रात: तपोबन के एक शिवलिग्ड की बड़ी विधि से पूजा करता था और अनेक प्रकार के फल-फूल मणि-माणिक्य चढाता था | इस प्रकार नन्दी ने वर्षो तक रुद्राभिषेक और शिवार्चन किया | इसी अवसर पर उस घोर जंगल में घूमना हुआ अविवेकी, भूतहिंसक, पापरत एक शिकारी किरात (चाण्डाल जाति) अकस्मात् उस स्थान पर आ पहुचा | वह बहुत प्यासा था, इस कारण पानी ढूँढ़ रहा था | इतने में उसने एक तालाब देखा और उसमे प्रवेश कर, कुल्ला करके पानी पिया | तालाब के सामने ही अभ्दुत शिव मन्दिर को देखा और उसमे अनेक रत्नों से अलग अलग पूजित शिवलिग्ड को देखकर पूजा में चडी हुई रत्नादि सामग्री को बटोर कर इधर उधर कर दिया | पास में पात्र न होने के कारण किसी प्रकार मुह में भरे हुए जल से ही शिवलिग्ड को स्नान कराकर एक हाथ से बिल्बपत्र और दुसरे हाथ से मृगमाँस चढाया तथा दण्डप्रणाम करके मन में यह सकल्प किया कि हे शक्डरजी! आज से मै सावधान होकर पूजा करुगा | आज से तुम मेरे स्वामी हो और मै तुम्हारा भक्त हूँ | इसी प्रकार नियमबद्ध होकर किरात अपने घर चला आया | इसके बाद हर रोज की तरह जब नन्दी पूजा करने आया तो उसने वहाँ का वह सब किरात का कार्य्य देखा | यह देखकर नन्दी बहुत चिन्तित हुआ और सोचने लगा कि यह सब कार्य विघ्न सूचित कर रहा है | न जाने कैान दोष हो गया है | जान पड़ता है कि मेरे दुर्भाग्य से ही यह विध्न आ गया है | इस प्रकार्र बहुत विचार कर शिवमंदिर को धोकर अपने घर लौट गया | घर में नन्दी को दुखी देखकर उसके ओउरिहित ने पूछा कि आप क्यों उदासीन है ? नन्दी ने पुरोहित से सब कथा कह सुनाई | तब पुरोहित ने कहा की इसमें सन्देह नही है की जिसने रत्नादि सामग्री को इधर –उधर फेका है , वह कार्य और अकार्य को न जानने वाला मुर्ख ही था | किन्तु आप तनिक भी चिंता न करे | मेरे साथ प्रात: शिवमंदिर चले, मै उस मुर्ख ही था | किन्तु आप तनिक भी चिंता न करे | मेरे साथ प्रात: शिब्मंदिर चले , मै उस दुष्ट को देखूंगा | यह सुनकर नन्दी दुखित मान से घर में बैठा रहा , और जब रात्रि बीती तो प्रोहित के साथ शिवालय को चला गया | वहा पर उसने विधि विधान के साथ नाना रत्नों से शिव की पूजा की और ब्राह्मणों के साथ दोपहर तक शिवजी जी स्तुति की | इतने में हाथ में धनुष लिए वह बली , महाप्रतापी “महाकाल “ नमक किरात आ पहुचा | किरात को देखते ही नन्दी दर कर विलाप करने लगा और ब्राह्मण भी भयभीत हो गया | तब वह किरात नि:संकोच होकर पहले की तरह सब सामग्री हटाकर शिवजी को बिल्वपत्र , नैवेध और फल चदकर दण्डवत प्रणाम करके घर चला गया | यह सब देखकर नन्दी पुरोहित – सहित शोक से व्याकुल हो गया | नन्दी को अपनी रत्नमय सामग्री के आगे एक दिन गरीब पत्र पुष्पवाली पूजा अभ्व्य लगी और उसने विघ्नों की आकांशा होने लगी | इस कारन उस ने बहुत से वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाया और कुल घटना सुना दि | नन्दी को अति शक्ति देखकर सब विप्रो ने यह निश्चय किया कि इस विध्न को देवता भी नही रोक सकते , इस कारन तुम लिग्ड को घर ले चलो | यह सुनकर नन्दी शिवलिग्ड को उखाड़ कर घर में गया और स्वर्ण पीठ में विधि पूर्वक स्थापिक कर अनेक प्रकार के उपचारों से उसकी पूजा की | इसके उपरांत जब दुसरे दिन किरात शिवमंदिर में आया तो उसने देखा की मंदिर में शिव्लिग्द नही है तो वह एकाएक चुप हो गया और एक गंभीर करुण क्रन्दर के साथ भगवन शंकर की प्राथना इस प्रकार करने लगा की हे शम्भो ! कहा चले गए हो | आज मुझे दर्शन दो | यदि मै तुम्हारा दर्शन न कर सका तो निश्चय आज मै आपका शरीर छोड़ दूँगा | हे शम्भो ! हे जगनाथ ! हे त्रिपुरान्तक प्रभो ! हे रूद्र और महादेव ! अपने आप मुझे दर्शन दो |

हे शम्भो हे जगन्नाथ त्रिपुरांतकर प्रभो |
हे रूद्र हे महादेव दर्शयात्मान्मत्मना ||

इस प्रकार मधुर वाक्यों से शिव को पुकार कर उस वीर किरात ने आपका पेट फाड़ा , फिर बाहुओ को ठोककर क्रोध से बोलने लगा की शम्भो ! मुझे दर्शन दो , मुझे चोद्द्कर कहा जाते हो ? इस प्रकार क्रोध से शिव जी पुकार मचाकर शरीर से मास और आंत को काटकर शिवलिग्द वाले गड्डे में चडाने लगा | फिर कुछ देर बाद स्वस्थचित होकर उसके पास के तालाब में देर तक स्नान किया और उसी भांति शीघ्र ही जल तथा बिल्वपत्र लाकर उससे जैसा बन पढता था , वैसा शिवपूजन कर वहा पर शिव के ध्यान में मगन होकर भूमि में दण्ड के समान गिर गया | यह सब हो जाने के बाद वहा पर कपूर के समान गौरवर्ण और जटाजूटधारी चन्द्रशेखर भगवन संकर अपने गणों के साथ प्रकट हुए . और उस दिन , किन्तु परम भक्त किरात को हाथ से पढ़कर आश्रासन देते हुए शिवजी कहने लगे कि हे महात्मे और ऊचे विचारवाले वीर ! मेरे भक्त हो , तुम्हे जो अच्छा लगे वह मांगो | भगवन शंकर के यह कहने पर वह महाकाल नाम की किरात प्रसन्न होकर परम भक्ति के साथ भूमि में दण्ड के समान गिर गया | इसके अनन्तर भगवन शंकर से बोला की वरदान के विषय में आप से मेरी यह प्राथना है की हे शंकर ! इसमें सन्देह नही है कि मै आपका दास हुन्न और आप मेरे स्वामी है | आप जन्म जन्मान्तर में आपकी भक्ति दीजिय | तुम माता पिता , भाई बन्धु , मित्र , गुरु , महामंत्र और सदा मंत्र्वेध कारन तीनो लोको में आप से बढ़कर दूसरा कुछ भी नही है | महाकाल किरात की इन सब निश्क्मा बातो को सुनकर आशुतोष भगवन शंकर के तुरन्त ही उसे आपकी सभा का मुख्या और द्वारपाल का पद दे दिया | उस समय चारो ओर से भरी . डमरू , दुन्दुभी और शंख का नाद होने लगा | संसार में चारो ओर ध्वनि फैल गयी | उस समय के हर्षनाद को सुनकर आति आश्रचर्य के साथ नन्दी शीघ्र ही उस तपोवन में गया , जहा पर अपने प्रथम गणों के सहित भगवान शंकर विराजमान थे | नन्दी ने वहा पर किरात को बड़े ध्यान से देखा और आश्रचर्ययुक्त होकर बड़ी नर्मता के साथ उससे खा कि हे परंतप! तुम भक्त हो , तुमने परम समाधि से शुभ को यहाँ बुलाया है |मै तुम्हारा भक्त होकर यहाँ आया हूँ | मेरे विषय में शंकर जी से निवेदन कर दो | नन्दी की इस बाट को सुनकर वह दयालु किरात जल्दी से नन्दी को अपने हाथ में लेकर शंकर जी के पास गया | इतने में भगवन शंकर ने किरात से हंसकर कहा की रूद्रगणों के समीप तुम किसको ले आय हो ? किरात ने कहा , भक्तवत्सल भगवन ! यह नित्यप्रति आपकी पूजा करनेवाला , नन्दी नाम का वैश्य है , इसको आप मेरा मित्र समझे| क्योकि यह अनेक पुष्प , धन , धान्य और नाना प्रकार के रत्नों से तथा आपके जीवन से भी आपकी पूजा करता था | यह सुनकर शिवजी ने कहा --- “ हे महामते” ! महाकाल ! मै नन्दी वैश्य को नही जनता , तुम मेरे भक्त हो और सखा हो | जो मनुष्य उपधिरहित है और जो उदार मान कि भगवन ! मै तुम्हारा भक्त हूँ और नन्दी मेरा हितैषी है | भगवन के किरात की यह विनती सुन ली और उन दोनों को आपना और ईश्वर की पूजा के द्वारा महाप्रभाव वाले उस श्रेष्ट किरात ने एक वैश्य का उद्धार किया | इसी अध्याय के पहले इस प्रकार का वर्णन मिलता है की अच्छे आचार विचार वाले जो वर्णश्रमि ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शुद्र मुरुमुख से उपदेश पाकर शिवपूजा में लगे रहते है और विध को शिवमय देखते है तथा इसी प्रकार जी कोई भी पुरुष एव चाण्डाल भी शिवपूजक हो तो वः शम्भु का अत्यन्त प्रिय होता है | इसी खण्ड के तैतीसवे अध्याय में आया है कि किसी पुल्कस (अन्त्यज) ने प्रसंगवश शिवपूजा की, उसने अविनाशी शिव को पाया, तो फिर जो मनुष्य श्रद्धा, भक्ति के साथ शिव रूप परमात्मा के लिए पत्र, पुष्प, फल, चन्दनादी चढाते है, उसके फल के विषय में कहना ही क्या है, वे तो इस संसार के रूद्र के ही समान होते है, इसमे सन्देह नहीं | स्वल्पबुद्धिवाले ‘चण्ड’ नामक पुल्कस ने प्रसंगवश शिवपूजा की तो उसका जीवन सफल हो गया | फिर आगे चलकर तिरानबेवे श्लोक में यह वर्णन आया है कि भगवान् शंकर के प्रसाद से व्श्रपच भी वरिष्ट (मान्य) होता है | इस कारण प्रयत्न से शंकर की पूजा करनी चाहिए | इसी अध्याय के तिरासिवे श्लोक में इस प्रकार की कथा आई है कि किसी चच्ञला ब्राह्मणी के अधर्म कर्म से एक चाण्डाल पैदा हुआ | वः अत्यन्त पापी, सुरापी, चोर, ठग, शिकारी, धर्मरहित और अत्यन्त दुष्टात्मा था | वह एक समय शिवरात्रि के अवसर पर शिवालय में गया, और शिव के पास उसके उपवास रक्खा | उसको स्वयम्भु लिग्ड रुपी भगवान् शंकर के समीप ही अकस्मात् मौके- मौके पर शिवशास्त्र भी श्रवण हो गया | इन सब कामो के फ्लो से वह चाण्डाल पुण्ययोनि को प्राप्त हुआ | इसी महेशखण्ड में केदारखण्ड के आठवे अध्याय के एक सौ सोलहवें श्लोक में यह विधान आया है कि स्त्री, शूद्र और व्श्रपचादि अन्त्यज जो कोई भी लिग्ड रुपी सदाशिव की पूजा केते है, वे सर्व-दुःख-विनाशक उस शिव को प्राप्त करते ही है | इसी के आगे यह भी वर्णन आया है कि मनुष्य क्या पशु भी किसी प्रकार दर्शनदि करने से परम स्थान को चले गए----“पशवोऽपि परं याता: कि पुनर्मानुषादय:” || आगे इसी खण्ड के इकतिसवे अध्याय में यह वर्णन मिलता है कि गिरी लोग (पर्वताधिष्ठातृ देवता) कहते है कि हे शम्भो ! हम तुम्हे नमस्कार करते है, ह्म आपकी शरण में आए है | तुमने अपने दर्शन से व्श्रपचो को वरिष्ठ (मान्य) किया है | एक जगंह इसी अध्याय में भगवान् शंकर धर्मराज से कहते है |

बहुना जन्मनामन्ते मयि भावोऽनुवर्तते |
प्राणिना सर्वभावेन जन्माभ्यासेन भो यम ||
तस्मात्सुकृतिन: सर्वे येषा भावोऽनुवर्तते |
जन्मजन्मानुवृत्तानां विस्मय नैव कारयेत् ||
स्त्री बाल शुद्रा: व्श्रपचाधमाच् प्राग्जन्मसंस्कारवशाद्धि धर्म |
योनि गता: पापिषु वर्तमानास्तथापि शुद्धा मनुजा भवन्ति ||

अर्थत् हे यम् ! प्राणियों को जन्म-जन्मान्तर के अध्याय से अनेक जन्म वाले सभी प्राणियों को पुन्यात्मा समझना चाहिए | इस विषय में थोडा भी आच्श्रर्य न करना चाहिए | हे धर्मराज ! यधपि मनुष्य पूर्वजन्म के कर्मानुसार स्त्री, बाल, शुद्र, व्श्रपच या अधम से भी अधम योनि में पहुचा जाता है, और पाप-कर्मो में विधमान रहता है, फिर भी मुझमे भाव रखने वाले ऐसे प्राणी शुद्ध मनुष्य होता है, अर्थात उन्हें अशुद्ध या घृणित नहीं समझना चहिए | इस खण्ड के उन्नीसवे अध्याय में लोमशजी ब्रह्मणों से कहते है कि शिवभक्ति में लगे हुए मुक, अंध, पंगु, अज्ञानी और अन्त्यज जाति के चाण्डाल तथा व्श्रपचादि कोई भी हो, वे सब परम गति को जाते है | इस कारण सब मनुष्यो को सदा शिव की पूजा करनी चहिए | केदारखण्ड के इकतीसवे अध्याय में स्वामी कार्तिकेय को शिव का ही स्वरूप बताते हुए यह वर्णन आया है कि सत्यशील, शान्त, दानी, वेद-वेदाग-पारंगत, धर्मनिष्ठ, जितेन्द्रिय, रागव्देषरहित और निर्लोभी याज्ञिक लोग जिस उत्तम गति को प्राप्त करते है, उसी गति ही हे शम्भो ! आपका दर्शन करने वाले अधम व्श्रपच भी प्राप्त करते है | इसी बाट को व्ही पर फिर सत्ताइसवे श्लोक में भी खा है-----

कुमारदर्शनात्सर्वे व्श्रपचा अपि यन्ति वै |
सद्गति त्त्वरितेनैव कि क्रियते मयाऽधुना ||
कर्म-चाण्डाल की कथा

इस कथा में जाती-चाण्डाल की अपेक्षा कर्म-चाण्डाल को अधम दिखाया गया है | इस कथा से यह बाट स्पष्ट हो जाता है कि जाति-चाण्डाल के देवदर्शन और पूजनादि से देव-विग्रह में वैसा दोष नहीं होता है जैसा कि कुछ लोग समझते है, किन्तु कर्म चाण्डाल चाहे किसी भी ऊँची जाति का क्यों न हो | यह कत्था स्कन्द महापुराण के ब्रह्मखण्ड के धर्मारण्य के सत्ताइसवे अध्याय के गोवात्स्तीर्थ के महात्म्य प्रकरण में इस प्रकार आई है कि देवताओ ने गोवत्सतीर्थ में एक प्राचीन शिवलिग्ड की स्थापना की | स्थापना के बाद वह लिग्ड प्रतिदिन बढने लगा | इस प्रकार की वृद्धि देखकर देवताओ को भय होने लगा | इतने में आकाशवाणी के रूप में यह शिववाणी हुई कि “आप लोग बिलकुल भय न करे, किन्तु किसी चाण्डाल को लाकर उसे मेरे सामने स्थापित करे|” यह सुनकर देवता लोगो ने भी वैसा ही किया, किन्तु इस पर भी शिवलिंग्ड की वृद्धि में कमी नही हुई, कारण कि देवता लोगो को यहा मालूम नही था कि यहा पर किसी प्रकार का चाण्डाल विवक्षित है, इस कारण वे लोग जाति चाण्डाल को ले आए | इसके बाद पुन: यह आकाशवाणी हुई कि देवता लोगो में जो कर्म- चाण्डाल हो उसे मेरे आगे लाओ | यह सुनकर देवताओ को अति आच्श्रर्य हुआ और किसी कर्मचाण्डाल को नगर तथा गाँवो में खोजने लगे | इतने में उन्हें पापकर्म में रत और अपने को ब्रह्मण बताने वाला मनुष्य मिला | वः ब्राह्मण भूखे, प्यासे, दुर्बल लोग शिवजी के आगे ले आए | देवली के आगे आते ही वः कर्म-चाण्डाल भस्म हो गया, तब से उस जगह का नाम चाण्डाल स्थल पड़ गया | उसी समय शिवलिग्ड वृद्धि को छोडकर अपने अव्रूप में आ गया | इसी ब्रह्मखण्ड के ब्रहमोतर खण्ड में आया है कि शिवभक्तियुक्त चंडाल , पुल्कस , स्त्री , पुरुष , नपुसक चाहे जो कोई भी हो वह संसार के बंधन में छूट जाता है | भक्ति के आगे कुल, आचार , शील और गुणों से क्या , यदि मनुष्य शम्भु की भक्ति से युक्त है तो वह सब देहधारियो का बंध होता है |

शबर की कथा

जिसकी जैसी भावना और श्रद्धा होती है उसको वैसा फल अवश्य मिलता है , इस विषय को लेकर इसी ब्रह्मोत्त्र खण्ड के सत्रहवे अध्याय में सूतजी ने ॠषियो से शबरी की कथा कहीं है | शास्त्र से चंडाल जाति का ही एक भेद शबर जाति मानी जाती है | वह कथा इस प्रकर है की पच्चल के रजा का सिहकेतु नाम का एक पुत्र था | वह क्षात्रधर्म में तत्पर और सर्व गुणों से युक्त था | एक समे वह राजकुमार कुछ नौकरों को साध लेकर जीव जन्तुओ से भरे हुए जंगल में शिकार खलने गया | शिकार के लिए वान में घूमते हुए उसके किसी “ शबर “ नौकर ने जीर्ण , टूटे टूटे और गिरे हुए एक देवालय को देखा | उसने उस मंदिर में गिरे हुए आधारपीठ के ऊपर अपने मूर्तिमय भाग्य के समान एक सीधा और सूक्ष्म शिवलिग्द देखा | अपने पूर्वजन्म के शुभ कर्मो से प्रेरित होकर उस शबर ने तुरन्त ही शिवलिग्द को लेकर राजपुत्र को दिखाया और कहने लगा कि स्वामिन ! देखिये , यह कैसा मनोहर लिग्ड है ! मैंने इसको देखा है , इस कारन मै अपने विभव के अनुसार आदर से इसकी पूजा करूँगा | मुझे इसकी पूजा – विधि बताइए , क्योकि भगवन महेश्रर तो मंत्रज्ञ और बिना मत्रज्ञ सभी के पूजने पर प्रसन्न हो जाते है | निषाद के इस प्रकार पूजा विधि पूछने पर हसी करने में चतुर उस राजकुमार ने हसकर पूजा की यह साधारण विधि कही की संकल्प लेकर शुद्ध और ताजे पानी से स्नान करके पवित्र आसन और बैठकर सुन्दर गन्ध , पत्र , पुष्प , धुप और दीप से शिव की पूजा करे | भगवन शंकर चिता भस्मधारी है | अत: पूजा के उपरांत चिताभस्म उपहार देवे और अपने भोज्य अन्न का नैवेध चड़ावे , फिर धूप दिपदि समग्री चडावे , यथा शक्ति गाना बजाना और नृत्य भी करे | इसके बाद भगवान् को नमस्कार करके प्रसाद धारण करे | साधारण रूप में तमसे पूजा विधि कह दि है | भगवन शंकर चिताभ्स्य से शीघ्र संतुष्ट हो जाते है ------

इति तेन निषादें पृष्ट पार्थीवन्दन: |
प्रत्युवाच प्रह्स्येन परिहासविचक्षण: ||
सडकल्पेन सदा कुर्यादभिषेक न्वम्भसा |
उप्वेश्यसने शुद्रे शुभेर्गन्धाक्षतैन्रवै: ||

सूतजी कहते है की रजा ने हसी के साथ यह पूजा का उपदेश दिया और चंद नाम के शबर ने रजा के वचनों को नतमसतक होकर धारण किया | इसके बाद वह शबर अपने घर चले आने पर भी प्रतिदिन लिग्डमूर्ति महेश्रर की पूजा करता था | और पूजा में राजकुमार के उपदेशानुसार धूप , दीप , नैवेध , गन्ध , अक्षत , पुष्प और चिताभस्य का उपहार चढाया करता था | इस प्रकार अपनी स्त्री के साथ भक्ति – पूर्वक शिवपूजन करते हुए उसके कुछ वर्ष सुख के साथ बीते | किन्तु राजकुमार ने शिवपूजा के उपहार में चिताभस्य देने पर विषय जोर दिया था | एक दिन ऐसा हुआ कि जब शबर शिवपूजा के लिए प्रवृत हुआ है चिताभस्म से पूर्ण पात्र में जरा भी भस्म नही दिखाई दि | इस पर उसने इधर उधर बहुत खोज की | जब उसे भस्म नही मिली तो वह थक कर घर चला आया | उसने अपनी स्त्री को बुलाया और कहा की आज मुझे चिताभस्म नही मिली | हे प्रिय! बताओ, अब मै क्या करू? मालुम पढ़ता है मुझ पापी की शिवपूजा में विध्न आ गया है | जो कुछ हो , परन्तु मै पूजा के बिना क्षण भर भी जीवित रहने का उत्साह नही कर सकता | क्या करू , पूजा सामग्री के लुप्त होने पर कोई नही सूझ रहा है | समस्त अर्थ को देनेवाला गुरु का आदेश भी नष्ट नही होना चाहिए | आर्थ भस्म नष्ट हो गयी है | उसके बिना पूजा करू तो गुरु का उपदेश बाधित होता है | अपने पति को इस प्रकार याकुल देखकर शबर की स्त्री बोली कि पतिदेव ! डर मत करो , मै उपाय से चिताभस्म मिल जायगी |” इस पर शबर ने कहा कि शारीर ही धर्म , अर्थ , कम और मोक्ष का साधन है | इस नवयोवन वाले शरीर को क्यों छोड़ती हो ? तुम्हारे संतान भी नही है , फिर क्यों इसे जलाना चाहती हो ? पति को ऊतर देती हुई वह स्त्री बोली कि जो कोई दुसरे के लिए प्राणत्याग करता है उसका हिवन की सफलता के विषय में कहना ही क्या है ! क्या मैंने पूर्व जन्म में घेर ताप किया है , दान दिया है , क्या मैंने सौकड़ो पूर्व जन्मो में शम्भु का अर्चन किया है , क्या मेरे पिता का कुछ भी पुण्य है , क्या मेरे जन्म से माता की कुछ भी कृतार्थता है ? यदि ये सब बाते होती तो यह दुःखद दशा न होती | अत: मै भगवान शंकर के लिए प्रदीप्त अग्नि में शरीर छोड़ दूंगी | अपनी पतनी का दृढ निच्श्रय और शंकर में भक्ति देखकर शबर ने भी दृढ संकल्प होकर शिव की पूजा की | शबर की स्त्री अपने पति के पास जाकर स्नान से शुद्ध और आभूषणों से अलकृत होकर, घर में अग्नि लगाकर भक्ति से घर की प्रदक्षिणा, अपने गुरु को नमस्कार और हृदय में शिव का ध्यान करके अग्नि में प्रव्वेश करने के लिये तैयार होती हुई हाथ जोडकर यह विनती करने लगी-------

पुष्पाणि सन्तु त्व देव ममेन्द्रियाणि धूपोऽगुरुर्वपुरिदं हृदय प्रदीप: |
प्राणा हवीषि करणानि तवाक्षताच्श्र पूजाफल व्रजतु सम्प्रत्मेष जीव: ||
वाञ्छामि नाहमपि सर्वधनाधिपत्य न स्वर्गभूमिमचला न पद विधातु: |
भुयो भवामि यदि जन्मनि जन्मनि स्या त्त्वत्पादपक्डजलसन्मकरन्दभृग्डी ||
जन्मनि सन्तु मम देव श्ताधिकानी माया न में विशतु चितमबोधहेतु: |
किच्चित्क्षणाधर्मपि ते चरणरविनदान्नापैतु में ह्रदयमीश नमो नमस्ते ||

अर्थात हे देव ! मेरी इन्द्रिया तुम्हारे लिए पुष्प हो , यह शरीर अगुरु धूप के रूप में हो जाय , ह्रदय प्रदीप हो , प्राण हविष हो और कर्मेन्द्रिया अक्षत हो जाय | इस प्रकार की पूजा के फल को अब यह जिव प्राप्त होवे | मै सम्पूर्ण धन का मालिक होना नही चाहती , स्थिर सर्वर्गभूमि और ब्रह्मा का पद भी नही चाहती , किन्तु मै यही चाहती हूँ की यदि मेरा पुर्नजन्म हो तो उसमे मै तुम्हारे प्द्कलम में शुशुभित प्राग को चाहने वाली भ्रमरि बनू| हे देव ! चाहे मेरे सैकड़ो जन्म हो , किन्तु उन जन्मो में मेरे चित के अन्दर अज्ञान को पैदा करने वाली माया प्रवेश ना करे , और हे ईश ! मेरा चित आधे क्षण के लिए भी तुम्हारे चरणारविन्द से अलग ना हो “ बस , आपको नमस्कार है | इस प्रकार शंकर को प्रसन्न करके दृढ संकल्प वाली शबरी जलती हुई अग्नि में कूद पड़ी और क्षण भर से भष्म हो गयी | इधर शबर को भी शिवपूजन के आगे संसार का कुछ पता नही था | वह जले हुए घर के पास पूजा कर रहा था | उसे चिताभस्म भी मिल गयी | पूजा करने के बाद प्रसाद लेते समे शबर को प्रतिदिन नम्रता के साथ हाथ जोड़ कर प्रसाद लेने के लिए आने वाली अपनी स्त्री का स्मरण हुआ | स्मरण के साथ ही उसने पीछे खड़ी अपनी स्त्री को देखा और घर को भी फेले की तरह ज्यो का तयो देखा | यह सब देख कर शबर को बड़ा आश्चर्य हुआ | वह सोचने लगा की यह स्वप्न तो नही है , अथवा माया तो नही है | सन्देह – निनृति के लिए स्त्री से पूछना लगा की अग्नि में भस्म होने पर भी तुम कैसे आ गयी और यह माकन कैसे खड़ा हो गया ? उत्तर में वह बोली की जब मैंने घर जला कर अग्नि में प्रवेश करा तो मुझे अपना कुछ भी खयाल नही रहा और ना अग्नि का ही अनुभव हुआ | मुझे बिलकुल भी ताप नही मालूम हुआ | मुझे ऐसा जान पड़ा जैसे मैंने जाल में प्रवेश किया हो | मै क्षण भर से सुषुपति जैसी अवस्था में पढ़ गयी , इतने में मैंने घर को बिना जले के समान देखा | इस समय देव पूजा के बाद प्रसाद लेने आई हू | भगवन भक्तो की परीक्षा के लिए अनेक माया रचा करते है | सुधामा के मुट्ठी भर तणडुल के भक्षण के ही भगवन ने ही उसका जीवन पलट दिया था | इसे चमत्कार मय रहस्यों से हमारा धर्मिक साहित्य भरा पड़ा है | युँही बाट इस शबर की कथा में समझनी चाहिए | इसके बाद उस दम्पति के सन्मुख एक सुन्दर दिव्य विमान आ पंहुचा | उसमे शिव के चार अनुचर भी थे | उन लोगो ने शबर और शबरी का हाथ पकड़ कर उन्हें विमान पर बैठा लिया देव दूतो के करो का स्पर्श होते ही वे दम्पति शिव के सारुप्य को प्राप्त हो गये | यह सब कथा सुना कर सुत जी कहते है -------

तस्माच्छुध्दव सर्वेषु विधेया पुण्यकर्मसु |
निचोऽपि शबर: प्राय श्रध्दया योगिना गतिम ||
की जन्मा सकलवर्णजनोंत्त्मेन |
कि विद्या सकलशस्त्रविचारव्त्या ||
यस्यास्ति चेतसि सदा परमेशभक्ति: |
कोऽन्यस्ततस्त्रिभुवने पुरुषोऽस्ति धन्य: ||

अर्थात , सब पुण्य – कर्मो में श्रध्दा अवश्य करनी चाहिए | श्रध्दाके प्रभाव से ही नीच शबर भी योग्यो की गति को प्राप्त हो गया | सबमे उचे वर्ण और जन्म से क्या ? समस्त शतर में विचार वाली विद्या से क्या ? जिसके ह्रदय में परमेश्वर के प्रति अटूट भक्ति होती है उसके बढ़ कर इस संसार में और कोन धन्य हो सकता है ? आगे चल कर काशी खण्ड में लिखा है की तुलसीदल से शाली ग्राम की पूजा करने वाला ब्राह्मण , श्त्रिये , वैश्य शुद्र , अन्तत्यजादी , चाहे कोई भी , वह देवताओ के यहाँ “पारिजात “ की माला से पूजा जाता है | विष्णु भक्ति से युक्त इसे मनुष्य को विष्णु का भक्त और सर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए |

शालिग्रामशिला येन पूजिता तुलसीदलै: |
स पारिजातमलाभि: पूज्यते सुरसदमनी ||
ब्राह्मण: क्षत्रियो वैश्य: शुद्रो वा यदि वेतर: |
विष्णुभक्तिसमायुक्तो ज्ञेय: सर्वोत्तमचश्र स: ||

काशीखण्ड के ब्यासिवे अद्याय में ‘विरेश म्हालिग्द’ के आविभार्व की कथा के प्रशंग में यह वर्णन आया है की “ मित्र जित “ नाम के रजा के राज्य में अन्त्यज भी वैष्णवी दीक्षा प्राप कर के शंखचक्रादी से विहीनत थे और वे लोग यग्य में दीक्षित के समान हो गये , अर्थात दीक्षित की समान पवित्र आचरण हो गये | प्राचीन काल में चंडाल प्रयत्न अन्त्ज्य मात्र को तिरत – यात्रा करने का पूर्ण आधिकार था | इस विषय पर काशीखण्ड के अठटान्वेवे अध्याय में महा देव जी “ महानंद “ नाम के ब्राह्मण की कथा में विष्णु से कहते है की महा नन्द नाम का कोई ब्राह्मण काशी में रहता था | फेले वे बड़ा शान्त और सदा चारी था कुछ काल के बाद विवाह हुआ | उसकी स्त्री स्दाचारनी नही थी | उसके संसर्ग से वह ब्राह्मण भी पतित और भ्रष्ट चारी हो गया | इसी अवसर पर पर्वत प्रान्त से एक धनी चंडाल आया | उसने “ चकर “ नाम के तलाब में स्नान कर के यह घोषणा की कि मै धन देना चाहता हू , जाती का चंडाल हू | कोई प्रतिग्रह लेने वाला हो तो उसे धन दूँगा | यह घोषणा सुन कर ऊँगली के इशारे से ब्राह्मण को दिखा कर कहा की यही तुमसे प्रतिग्रह लेना | यह सुन कर वह अन्त्यज उस ब्राह्मण के पास क्या और दंडवत – प्रणाम कर के कहने लगा की हे महाब्राह्मण ! मेरा उधार करो | मेरी तीर्थ यात्रा सफल करो , मेरे पास कुछ वास्तु है , अनुग्रह के सत्न उससे ग्रहण करो | इस प्रकार महाब्राह्मण ने अन्त्ज्य से सब धन देने को कहा | चंडाल ने भी कहा की कोई चिंता नही ,में जितना धन लाया हूँ , उससे आपको दे दूँगा | आप मेरे लिए विश्वनाथ के सामान है , क्यंकि जो मनुष्य दुसरे का उधार करते है , दुसरे के इच्छा पूरी करते है और प्रुपकर शील है , वे विश्वेश के अंश ही है | इस प्रकार ब्राह्मण की प्प्रथ्ना स्वीकार कर के चंडाल “ विश्वेश: प्रियता “ कह कर विश्वेश की बुद्धि से ब्राह्मण को सब धन दे कर घर लौट गया | आसत प्रतिग्रह के कारन ब्रह्मण को अधम योनि प्राप्त हुई | उस लोगो में उससे अपमानित भी होना पढ़ा |पीछे काशी में मरने के कारन वह मुक्त हो गया | किन्तु तीर्थ यात्रा और दान करने वाले चंडाल का विरोध किसी ने नही किया , उसने प्रसंता – पूर्वक तीर्थ यात्रा की | इन प्रकरणों से यह पता लगता है की पूर्व काल ने अन्त्यजो के लिए तीर्थ यात्रा की कुछ रोक – टोक नही थी | आगे चल कर अन्त्य्खंड में यह वर्णन आया है की महा देव जी पारवती जी से खाते है अवन्तय में मुक्तिश्वर से दर्शन से एक अन्त्यज जाती का व्याध मुक्ति को प्राप्त हुआ था | यह कथा इस प्रकार है ---- शिवजी बोले की हे पारवती ! मुक्तिश्वर के दर्शन मात्र से मुक्ति हो जाती है |

‘यस्य दर्शनमात्रेण मुक्तिर्भवति पार्वति |’

पहले रथन्तर मन्वंतर में मुक्ति नाम का ब्राह्मण था | उसने महाकाल वान ने समीप योग में तत्पर हो कर १३ वर्ष तक ताप किया | वाही पर महाकाल के समीप सुन्दर मुक्तिलिग्ड भी था | एक समय वह ब्राह्मण शिप्रा नदी में स्नान करने गया जब वह स्नान करके जप करने लगा तो उसने अपने सन्मुख एक भयंकर व्याध को देखा | उसके हाथ में धनुष था , लाल लाल आखे थी | उससे देखते ही ब्राह्मण दर गया और नारायण देव का ध्यान करता हुआ वाही पर खड़ा रह गया | इस प्रकार मान में हरि का ध्यान करने वाले ब्राह्मण को सामने देख कर भयभीत सा होकर धनुष – बाण फेक कर व्याध ने कहा की मै तुम्हे मारने की इच्छा से जाहा आया था , किन्तु इस समय तुम्हारे प्रभाव शाली दर्शन से ही बुद्धि बदल गयी है | मैंने आज तक जीविका के लिए हजारो ब्रह्मा हत्याए और स्त्री हत्याय की है , किन्तु मेरा चित कभी भी दुखी नही हुआ | परन्तु अब मै तुम्हारे समीप ताप करना चाहता हू , अत: उपदेश देकर मुझ पर अनुग्रह करो | ब्राह्मण ने यह विचार कर की यह तो ब्रह्मा घटी है और पाप करने वाला है , व्याध की प्राथना पर चुप होकर कुछ भी ध्यान नही दिया | किन्तु कुछ ना कहने पर भी व्याध वाही तहर गया और स्नान कर के मुक्ति लिग्ड के समीप आ गया | हे देवि ! ब्राह्मण से साथ ज्यो ही उसने अविनाशी मुक्तिलिग्द देव का दर्शन किया , उस्सी समय देवी देह होकर उसी लिग्ड में लीन हो गया | हे देवि ! यह आश्चर्य देख कर मुक्ति नमक ब्राह्मण मन – ही मन विचारे लगा की पाप युक्त और समाधि रहित यह व्याध एकदम मुक्त हो गया , किन्तु घोर ताप करने पर भी मैंने ना तो परम मुक्ति पाई और ना भगवन की मूर्ति ही पाई | यह कथा इस प्रकार हमारे लिए अत्यंत उपदेश प्रद है| क्यंकि वासी ही स्थिति इस समय हमारे समाने है | मुक्ति नमक ब्राह्मण अपनी श्रेष्ठता और तपस्या के आगे उस अन्त्यज जाती के व्याध को हिन् और पतित समझता था | किन्तु जब सामने ही स्नानादि से शुद्ध हो कर व्याध ने साथ ही दर्शन किया तो उस व्याध को भगवन का दर्शन और मुक्ति मिल गयी , परन्तु ब्राह्मण आश्चर्य करके देखता ही रह गया | फिर जाल ले , अन्दर जाकर घोर ताप करने लगा | आगे चल कर इसी प्रकाण्ड के तिरपनवे अध्याय में भगवन शंकर पारवती से महाकाल वान के विश्वेश्वर के दर्शन के महातमय में कहते है की विदर्भ देश का विदुरथ नाम का रजा अत्यंत पापा वहारी था | पापा धिन जन्म – कर्म के अनुसार ग्यारहवे जन्म में भी वह अवन्तय शेत्र के अन्दर चंडाल योनि ने जन्मा | एक दिन चोरी के लिए ब्राह्मण के घर गया तो तत्काल चोरी में पकड़ा गया | उससे लाथ्दारी चोकी दरो ने बांध कर पेड़ में लटका दिया | उसके पास ही शुलेश्वर के ऊतर की और एक हिव्लिग्द था , चंडाल ने उससे देख लिया | वहा उत्तम ऐश्वर्य भोग कर पुनह भूतल के अन्दर विदर्भ देश में विश्वेश नाम का रजा हुआ | लिग्ड – दर्शन के पुण्य से उससे पूर्व जन्म की बात भी याद रही | इसी प्रकार की एक कथा इसी खण्ड के छियासठवे अध्याय में आई है | संशेओ में वह यह है | शिवजी पार्वती जी कहते है ---- द्वापर युग में एक चंडाल बालक को किसी के आक्षेपपूर्ण बचनो से यह पता लगा की मै चंडाल योनि का हूँ | उसको अत्यंत दुःख हुआ और वह ताप के लिए जंगल में चला गया | उसके घोर ताप किया | उसके ताप से देवता चिंतित होने लगे | इन्द्र ने आकर उससे कहा की तुम मुशी के भोगो को छोड़ कर ताप क्यों करते हो | हे माँ तंग ! मै वरदान देना चाहता हू |जो इच्छा हो मॉंगो | इस पर माँ तंग ने कहा की मै ब्राह्मणय चाहता हू , इस कारण मै ताप कर रहा हू | बस , मुझे यही वर दो | उत्तर में इन्द्र ने कहा की यह वर कठिन है , तुम इससे प्राप्त नही कर सकते हो | तपस्या छोड़ दो नही अनिष्ट होगा | किन्तु उस चंडाल ने एक गंदुठे से खड़े होकर 100 वेर्ष तक घोर ताप किया | इन्द्र ने आकर फिर वाही बाते कही | परन्तु माँ तंग तुसी तरह फिर घोर ताप करने लगा | इस तरह अनेक बार इन्द्र आये पर चंडाल भी कुछ परवाह ना कर कठिन ताप करता गया | इन्द्र भी पुन:- पुन: आकर उसको समझाते गये की ब्राह्मण दुर्लभ है , तुमे वह नही ,मिल सकता है | अत: उसको छोड़ दो , कोई दूसरा वर मानगो | इस पर होकर ब्राह्मण मा तंग ने बड़ी फटकार के साथ कहा की दुःख से पीड़ित मेरे ह्रदय को क्यों बेधते हो ? मुझ मरे हुए को क्यों मरते हो ? मुझे उस पर शॉक है जो ब्राह्मणय प्राप्त कर उसका पालन नही करता है | हे इन्द्र ! यदि क्षत्रियादी तीनो वर्णों के लिए ब्राह्मणय बाव दुषप्राप्य है तो बताओ की विश्वामित्र ने उससे कैसे प्राप्त किया ? देखो राजषिृ ! वित्हव्य ने भी ताप के प्रभाव से ब्राह्मणय प्राप्त किया था , इस कारन मै द्वन्द और परिग्रह – रहित होकर ताप करूँगा और आहिंसा , दम , सत्य तथा धर्म में स्थिर क्यों ना हो सकूंगा ? फिर नम्रता के साथ मा तंग ने कहा की हे इन्द्र ! किसिस प्रकार पुरुषार्थ से दैव – बल को ना हटा सका | इतना प्रयत्न करने पर भी विप्रता को प्राप्त ना कर सका | मेरा कुछ भी पुंज हो और यदि मै तुम्हारा कृपा पात्र हू तो हे देव ! मुझे वहा उपाय बताओ जिससे मै विप्र हो जाऊ और मेरी अक्षय कीर्ति हो जाये | मातंग के इतना कहने पर इन्द्र ने प्रसन्न होकर शिवलिग्ड का उतम महातम्य कहा और चंडाल को यह आदेश दिया कि महाकाल वन में ब्रह्रा ने दिव्या मुर्तिधारी सुन्दर लिग्ड की स्थापना की है ,वह लिग्ड सिंध्देश्वर के पूर्व में है |उसके दर्शन करने से ही तुम विप्रत्व को प्राप्त कर लोगे | अर्थात ब्राहमण की तरह सदाचारी ,सत्यव्रता ,जितेंद्र्य और मान्य हो जायोगे | इन्द्र का उपदेश पा कर मातंग रमणीक महाकाल वन में गया, वहा पर दूसरे सिद्ध शेत्र में अशेष फल देने वाले उस लिग्ड का दर्शन किया और अनेक प्रकार के पुष्पों से शिवार्चन किया | इस प्रकार मातंग से पूजित भगवान शंकर बोले, ओह ! तुम बड़े भाग्यशाली हो की तुमने मुझे प्रसन्न कर लिया | भुर्भुवादी सारा ब्रह्माण्ड मुझसे उत्तपन्न हुआ है | मै भाकत्जानो को वर देने वाला हू और दुष्ट आत्माओ को शाप देने वाला भी हू | मेरे प्रसाद से और दिग्द्दर्शन के कारन तुम्हे अक्षय विप्रतव की प्राप्ति होगी | वह चंडाल बह्मंडय को पा गया, फिर वह दिव्ज पूजा के प्रभाव से बह्रमालोक में चला गया | हे देवि ! इस लिग्ड के प्रभाव से चंडाल मातंग ने दुर्लभ विप्रतव प्राप्त किया | इसी कारन ब्रम्ह्लोक को देने वाले उस लिग्ड को संसार में “ मतेंगेश्वर “ कहते है इतना ही नहीं शिवजी कलिकाल के लिए विशेष आदेश कहते है की कलयुग में जो लोग वर्णाश्रम से द्वेष रखते हो, पाखंड वचनों पर विशेष धयान देते हो, मर्यादा रहित हो, शंकित, लोलुप, निर्दय, निष्ठुर और धृष्ट हो, वे लोग भी उस शिव लिग्ड के दर्शन से सवर्ग को जाते है | इसी के आगे अटत्र्वे अध्याय में यह वर्णन आया है की राजा चित्रसेन की लड़की चित्रसेन से अपने पूर्व जन्म के वृतांत में कहती है की पूर्व जन्म में मैंने अपने पति को वश में करने के लिए औषधि का प्रयोग किया यहा | उस दुष्ट कर्म के फल के कर्मानुसार चंडाल योनि में गयी | वहा में अनेक फोड़ो से पीड़ित रही | मुझ दींन दुखिया को चारो और से कुत्ते घेरे रहते थे और बार-बार नोच खाते थे इस प्रकार मार्ग में कुत्तो से नुची हुई मुजको भेडियो ने छेक लिया | उसके द्वारा व्यथित की जाती हुई भी मै किसी प्रकार महाकाल वन में चली गयी | वहा पर भगवान के दर्शन की लालसा से पिपलादेश्वर के पास में महादेव जी का दर्शन पा गयी | बस मै भगवान के दर्शन मात्र से दिव्य विमान से इन्दर्पुरी को चली गयी | मै दिव्यमाला, दिव्यभूषण और दिव्यम्बर्धरिणी हो गयी | वहा पर देवताओ ने मेरी पूजा की और बंदीजनो ने स्तुति की | उसके उपरांत उस लिग्ड के दर्शन के प्रभाव से ही अब तुम्हारे घर में पैदा हुई हू | अवन्त्य खण्ड के रेवाखण्ड में एक सो इक्तालिस्वे अध्याय में तापेश्वर तीरथ के महातम्य के प्रसंग में माकंडेयजी युधिष्टिर से कहते है ----- हे युधिष्टर ! इसके बाद सर्वोत्तम पपेक्षर तीर्थ में जाना चाहिए | जहा पर व्याध से भयभीत हरिणी सिद्ध होकर ओने अंगो को त्यागकर अन्तरिक्ष लोक में चली गई | यह सब देख कर हरिणी का पीछा करने वाला व्यद भी आचर्य में पढ़ गया | व्याध ने धनुष-बाण छोडकार हजारो वर्ष तक तपस्या की | इसके बाद महेश्र्वर प्रसन्न होकर व्याध से बोले की हे महाव्याध ! अपनी इच्छा के अनुसार वर मागो | व्याध ने कहा की हे देवेश ! यदि आप संतुष्ट है और वर देना चाहते है तो मुझे अपने समीप वास दीजिए | हे व्याध ! ऐसा ही होगा | यह कह कर महादेव जी अंतर्धान हो गए | भगवान के अंतर्धान हो जाने के बाद व्याध ने महेश्वर की स्थापना की और वह विधि-पूर्वक पूजा कर के स्वर्ग को चला गया | तब से वह तीर्थ तीनो लोको में प्रसिद्ध हो गया और व्याध के कारण वह तीर्थ तापेश्र्वर नाम से प्रसिद्ध हो गया | उस तीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य शंकर का पूजन करता है वः शिवलोक में जाता है | नागरखण्ड में यह कथा आई है कि जब वसिष्ठ के पुत्रो ने त्रिशंकु को शाप देकर चाणडाल बना दिया , उसने चंडालत्व को छोड़ने और यज्ञपूर्ति के लिए विश्वामित्र से प्राथना की | विश्वामित्र ने कहा की मै तीर्थयात्रा के प्रभाव से तुम्हारा चंडालत्व छोड़ दूँगा | इस कारन तुम मेरे साथ तीर्थयात्रा करो | तीर्थयात्रा के प्रभाव से तुम शुद्ध होकर यज्ञ क्रिया के भी पात्र हो जाओगे | क्यंकि संसार में ऐसा कोई भी पाप नही है कि जो तीर्थयात्रा के प्रभाव से नाश न हो सरे | इस प्रकार विश्च्य करके विश्वामित्र त्रिश्कु को अनेक तीर्थो में ले गए | अन्त में अर्बुद पर्वत के अचलेशवर मंदिर से बाहर निकलते समय उन्हें मार्कण्डेय मुनि मिले तो विश्वामित्र ने त्रिश्कु का सब अमाचार सुनाया | इस पर मार्कण्डेय ने विश्वामित्र से खा कि इस पर्वत के नैॠत्य दिशा की ओर आनर्त देश में पटल के अन्दर हाटकेश्वर का मंदिर है , वहा पर एक गंगम नदी भी है | उसमे स्नान करके हाटकेश्वर का दर्शन करने से त्रिशकु से विश्वामित्र बोले कि हे राजेन्द्र ! प्रसन्नता की बाट यह है कि तुम चंडालत्व से मुक्त हो गए हो | प्रभासखण्ड के तीसवे अध्याय में आया है | शिवजी पार्वतीजी से कहते है कि हे पार्वती ! द्दिज लोग समुंद्र स्नान करने के उपरांत प्रभाव क्षेत्र के “कपर्दी “ महादेव की पूजा “ गणानानत्वा “ मंत्र से करे | और शुद्र लोग अष्टाक्षर मंत्र से पूजा करे | आगे चलकर फिर शिवजी कहते है कि कार्य के अनुसार भगवान शंकर के अलग अलग अवतार होते है | प्रभासक्षेत्र ‘सोमेश्रर; का दर्शन स्त्री , म्लेच्छ , शुद्र और जो कोई भी अन्त्यजाती करते है , वे स्वर्ग जाते है | हे देवि ! यज्ञ , दान तथा स्वाध्याय और वर्त को न करने पर भी सब मनुष्य शिवालय में जाते है | सोमनाथ का यह प्रभाव देखकर ही अग्निष्टोमादी क्रिया लुप्त हो गई है | बाल , वृध्द , स्त्री और शुद्र्दी सभी लोग उनका दर्शन करके परम गति को प्राप्त करते है | एक कथा के अन्दर मार्कण्डेय मुनि राजा इन्द्रधुमन से कहते है कि चन्द्रशर्मा नाम के ब्राह्मण के पितामह कर्मवशात प्रेतयोनि में चले गए | उनकी मुक्ति के लिए चन्द्रशर्मा तीर्थयात्रा करने लगा | अन्त में वह ‘ सोमनाथ ‘ तीर्थ में पंहुचा | सोमनाथ की तीर्थयात्रा करने पर उसके पितामह लोग प्रेतयोनि से छूट गए | इस पर पितामहो ने उससे कहा की संसार में वे पुत्र पौत्र धन्य है , जो सोमनाथ को देखकर द्वारिका की यात्रा करके कृष्ण का दर्शन करते है | इस प्रकार चंडाल भी जो सोमनाथ में शंकर और द्वारिका में कृष्ण की यात्रा करता है वह पितरो के साथ परम मुक्ति पाटा है | आगे इसी खण्ड में इसी प्रकरण के अडतीसवे अध्याय में प्रह्लाद अपने पौत्र बलि से कहता है कि तीर्थयात्रा के प्रसंग से स्वरिका जाने वाले श्रपचादी अन्त्यज भी धन्य होते है | इस प्रकार पितरो के उद्देश्य से लोग भगवत्सम्बन्धी तीर्थो को प्राप्त करते है | इस प्रकार पितरो के उद्देश्य से लोग भगवत्सम्बन्धी तीर्थो को प्राप्त करते है , दान और भक्ति के साथ भगवान् की पूजा करते है , ऐसे विष्णु के भक्तो के सत्कार से हमे जो तप्ति होती है , वैसी गया के पिण्डदान से नही होती है | अत: वे संकीर्ण जातिया भी पवित्र है , जो मधुसूदन की भक्त है तथा जनार्दन की भक्ति न करने वाले कुलीन भी म्लेच्छ के समान है | इस प्रकार सकन्द्पुरण की समाप्ति पर यह वणन आया है कि शिवजी पारवती से कहते है कि हे सुरसुन्दरि इधर – उधर बहुत –से शिवलिंगडो के दर्शन से क्या प्रयोजन है ,”वरुणेश” को देखने से ही सब तीर्थो का फल मिल जाता है |ब्राह्राण ,क्षत्रिय ,वैश्य , शूद्र ,अन्त्यज ,मूक ,बधिर ,बाल और स्त्री चाहे जो कोई भी हो ,वरुणेश का दर्शन करने से सब स्वर्गधाम को चले जाते है | इसी प्रकार पदमपुराण में भी स्पष्ट रीति से अन्त्यजो द्वारा देवदर्शन और पूजन की अनेक कथाए देखी जाती है | पुराणो में जहा कही भी भूमिस्थ देवताओ का वर्णन आया है ,वहा पर प्रायः इस तरह का वर्णन आया है कि “ सौराषट में सोमनाथ ,उज्जैन में महाकाल ,अमलेश्वर मे ॐकार ,हिमालय में केदार ,काशी में विश्वेश और सेतुबंधादि में रामेशादि नाम से शिवलिग्ङ की प्रतिष्ठा रहती है | “ इन लिगङो के जो महात्म्य पुराणों में दिए गए है , उन सबो में अधिकांश इस प्रकार की ही कथाए है कि अमुक लिग्ड की पूजा अमुक निषाद , चांडाल या शबर ने की तो उसको परम गति प्राप्त हुई | अमुक लिग्ड के दर्शन करने से अमुक शबर को भगवान का दर्शन हुआ | इन माहात्म्यो को लेकर ही वर्तमान काल में काशी , सेतुबन्ध प्रभृति स्थानों में मंदिरों के अन्दर शिवपूजा चली आ रही है | एव अयोध्या , मथुरा प्रभृति तीर्थ – स्थानों में विष्णु का निवास तथा उनका महात्म्य भी पुराणों में उसी प्रकार वर्णित है | उसमे भी अन्त्यजो के दर्शन और पूजन का महत्व दिखाया गया है | ऐसा कही भी नही आया है कि अन्त्यजो के देवदर्शन करने से मूर्ति अपवित्र होती हो | इस विषय पर पदमपुराण में अनेक कथाए आई है | उनमे कुछ इस प्रकार है | पहले समय रत्नग्रीव नाम का राजा काशीपुर में राज्य करता था | वह अत्यंत धर्मात्मा और दयालु था | इक दिन उसने सोचा कि मै आनन्द के साथ बहुत दिनों तक राज्य कर चुका हू अब मुझे हरिपूजन और तीर्थयात्रा करनी चाहिये | रात्रि में इस प्रकार धयान करके वह सो गया | स्वप्न में उसे एक तपस्वी ब्राहमण दिखाई दिया | प्रातः उठकर राजा मंत्रयो के सहित सभा में बैठा | इतने में उसने एक तपस्वी ब्राहमण को देखा और कहा कि आपके दर्शनों से मेरा पाप छूट गया है | मुझे ऐसा तीर्थ बताया कि मै गर्भवास के बन्धन से छूट जाऊ | ब्राहमण ने कहा कि सब देवो में रामचंद्र सेव्य है | हे राजन मै कच्ची , काशी , अयोध्यादी अनेक तीर्थो में गया हूँ | परन्तु जो अध्दुत बाट मैंने पुरुषोतम से समीप नील पर्वत पर देखी है , वैसि कही भी नही देखी | उस पर श्रद्धा करने से पुरुष लोग सनातन ब्रह्मा पा जाते है | हे राजन ! जब मै घूमता हुआ नील पर्वत पर पहुंचा तो मैंने भीलो ( अन्त्यज विशेषों ) को देखा जो चतुभुर्ज ( धर्म , अर्थ , कम , मोक्ष से युक्त ) दिखाई देते थे | मै आश्चर्य में पढ़ गया | मै सोचने लगा कि शंख , च्रक , गदादी धारण किए हुए और वनमाला से विभूषित ये लोग विष्णुभक्त से लगते है | मैंने सन्देह दूर करने के लिए उनसे पूछा कि आप लोगों का यह उत्तम स्वरूप कैसे हो गया ? उन्होंने हस करके कहा कि यह बेचारा ब्राह्मण पिण्ड के महत्त्व को नही जनता है | मैंने उससे पिण्ड का महत्त्व पूछा , तो उत्तर में किरातों ने कहा कि हे ब्राह्मण ! हमारा एक बालक एक दिन जामुन का फल खता , खेलता और कूदता हुआ बालको के सहित मनोहर गिरि – शिखर पर चला ह्या | वहा उसने सोने की बित्वाला तथा नाना रत्नों से जटित एक अभ्द्रुत मंदिर देखा | यह देखकर बालक को बड़ी उत्सुकता हुई कि यह क्या है और इसके अन्दर क्या चीज़ है ? यह सोचकर बड़े भाग्य से घर ( मंदिर ) के अन्दर चला गया | बालक ने अन्दर जाकर सुरसुरों से अन्द्नीय हरि का दर्शन किया और नैवेध भक्षण किया | मूर्ति का दर्शन करने और नैवेध करने और नैवेध भक्षण करने के कारन बालक चुतुभुर्ज हो गया | जब बालक घर लौट आया तो हम लोगो ने पूछा कि तुम्हे यह सवरूप कैसे प्राप्त हुआ ? ऊतर में बालक ने कहा कि मै पर्वत के शिखर पर चला गया था | वहा पर मैंने भगवान का दर्शन और नैवेध ग्रहण किया था , उसी से यह सब हुआ है | इसके बाद हम लोगो ने भी उस दुर्लभ देव का दर्शन किया और स्वादिष्ट उन्नादी का भक्षण किया | तुम भी जाकर दर्शन कर लो | हे राजन ! यह सब सुनकर मैंने भी देवदर्शन किया और ऊतम फल पाया | अत: शीघ्र जाकर दर्शन कर आओ | रजा ने ब्राह्मण से यह सब समाचार और तीर्थयात्रा क विधान सुनकर मंत्रियों को यह आदेश दिया कि मेरे नगर में रहने वाले और मेरी आज्ञा मानने वाले सभी लोग मेरे साथ चले | मंत्रियों यह घोषणा की कि सब लोग चल कर पापनाशक पुरुषोतम भगवान के दर्शन करे | यह घोषणा सुनते ही ब्राह्मण से लेकर रजक , चर्मकार , किरात , मिस्त्री , दर्जी , तमोली प्रभ्रति अनुलोम और प्रतिलोम श्द्रपर्यन्त सभी लोग देवदर्शन और तीर्थयात्रा के लिए पुर से बाहर चले गए | इस प्रकार रजा रत्नग्रीव अनेक तीर्थ और दानादि क्रिया करता हुआ ब्राह्मण से लेकर अन्त्यज पर्यन्त सब लोगो को लेकर नील पर्वत पर पहुचा | वहा पर उसने अनेक सेवको के साथ भगवान का दर्शन , उनकी स्तुति और पूजा की | इसी पुराण के उत्तरखण्ड में शिवरात्रि के माहात्म्य में आया है कि एक चणड नाम का पुलकं अत्यन्त क्रूर और पापी था | शिवरात्रि के दिन रात्रि जागरण और किसी प्रकार उसने शिवपूजा कर ली | उसके प्रभाव से उसे परम गति प्राप्त हुई | शिवजी कहते है कि चंडाल जाति का एक चंड नाम का पुल्कस भी शिवार्चन से तीर्थानां को प्राप्त हुआ , तो फिर जो श्रद्धा तथा भक्ति से शिवजी को पुष्पादि चढाते है , वे इस संसार में रूद्र स्वरूप ही होते है | इस प्रकार निषाद की कथा से युक्त शिवरात्रि का महात्म्य लिग्डपुराण , शिवपुराण , स्कन्दादिपुराण में बड़े विस्तार के साथ वर्णित है | ये सब कथाए प्रसिद्ध है | उनका विस्तार करना व्यर्थ है | संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि एक निषाद , चंडाल , शबर या पुल्कस से किसी प्रकार शिवरात्रि का व्रत और शिवार्चन हो जाने के कारन ही आज शिवरात्रि का वर्त बड़े महत्त्व के साथ भर में जाना जाता है | पदम्पुराण में ब्रह्माखण्ड के बीसवे अध्याय में लिखा है कि महापिनी कलीप्रिया नाम की एक शुद्रा थी | वह अपने पति को जीवित रखना नही चाहती थी | उसकी दुष्टता से किसी प्रकार उसका पति मर गया और उसके उपपति को भी गैंडे ने खा लिया | इस पर वह अत्यन्त विलाप करके लगी | अन्त में वह दुसरे नगर में चली गई | नगर में जाते ही उसने देखा कि बहुत से पुरुष और स्त्रिया धूप दिपादी से राधादामोदर की पूजा कर रहे है | क्लिप्रिया ने पूछा कि आप लोग क्या कर रही हो ? ऊतर में उन स्त्रियों ने कहा कि यह कार्तिक का मास है | हम सब लोग सर्वपापहर राधादामोदर की पूजा कर रही है | यह सुनकर उसने भी मांस का परित्याग करके राधादामोदर की पूजा की | फलत: अन्त में विष्णुपद को प्राप्त हो गयी | उसको विश्नुदूत सुन्दर विमान में बैठकर विष्णुलोक को ले गए | पद्मपुराण के उत्तरखंड के पचासवे अध्याय में “ दोलोत्सव “ का विस्तत वर्णन आया है |यह उत्सव बड़े समारोह के साथ अनेक स्थानों में मनाया जाता है | इस उत्सव में अन्त्यज पर्यन्त सभी सनातनधर्मिको को एकत्रित होकर दर्शानादी का शिकार कहा गया है | इस उत्सव का वर्णन महादेवजी ने पार्वतीजी से इस प्रकार किया है | हे देवि ! अब मै तुमसे उत्सवो की विधि कहता हूँ | उनमे सबसे पहले चैत्रमास के “ दोलोत्सव “ को कहता हूँ , उसे सुनो | हे देवि ! चैत्रशुक्ल एकादशी के दिन दोलारूढ़ विष्णु का पूजन विशेष रूप से करना चाहिए | जो पुरुष दोलारूढ़ कृष्ण को देखते है वे हजारो अपराधो से मुक्त हो जाते है | अधिक क्या कहे , कलिकाल में जो मनुष्य दोला में आरुद भगवान ह्नार्दन को देखते है वे यदि गोधाती पापी जन हो तो भी मुक्त हो जाते है फिर औरो के विषय में कहना ही क्या है | डोलोतसव में विष्णु को देखने के लिए सभी रुद्रादी देवता दोला में चले आते है | डोले में स्थित विष्णु को देखते से तीनो लोको का उत्सव हो जाता है चैत्र , वैशाख में जो मनुषय डोले में स्थित विष्णु को देखते है वे महादेव से स्तुत्य होकर विष्णु के साथ आनंद क्रीड़ा करते है | डोले में दक्षिण ओर मुंह किय हुए विष्णु के दर्शन करने से मनुष्य ब्रह्माहत्या से मुक्त हो जाता है | अधिक क्या कहे , डोले में स्थिति विष्णु सर्वपापहर होते है | जो मनुष्य उनकी पूजा करता है उनको भगवान सब कुछ देता है | “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय “ इस मन्त्र से दोलाविष्णु की पूजा करनी चाहिय | “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्रेण पुंजन तत्र कारयेत् “| पुन: अघर्य देकर बचे हुए अघर्य के जल को वैष्णवों को देवे | फिर वहा उपस्तिथ सभी लोगो को विष्णु के दोले ( झूले ) को झुलाना चाहिए | हे देवि ! उस दिन दोलोत्सव देखने के लिए पृथ्वी भर के तीर्थ और क्षेत्र आते है | एवम् बरहमन क्षत्रिय , वैश्य और शुद्रादी अन्य जातिया उसे देखने आती है | उन सबों को शंखचक्रधारी ही समझना चाहिए | अर्थात दर्शनार्थ आय हुए ब्राह्मण से लेकर अन्त्यजपर्यन्त मनुष्य जाति को वैष्णव समझना चाहिए | इसके आगे के भगवन शकर ने दोलोत्सव की तरह दुमनोत्सव की भी विधि और उसका महात्म्य दिखाया है | उसमे भी भगवान शकर कहते है की चैत्रमास की शुक्ल द्व्रद्शी को विधि पूर्वक दुमनोत्सव मनाना चाहिए | हे देवि ! जो मनुष्य दुमनोत्सव के दिन मज्जरी से विष्णु की पूजा करता है वह मेरी ही पूजा करता है | मधप , मांसभक्षी , स्वर्णहरी और ब्राह्मणघाती दुमनोत्सव देखते है , तो पापों से छुट जाता है | ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शुद्र , अन्त्यजादि किसी का भी कुल क्यों न हो , वह कुल धन्य धन्य और महान है जो दुमनोत्सव में मज्जरी से विष्णु की पूजा करता है | आगे चलकर इसी उत्तरखंड के एक सौ सताइसवें अध्याय में शालिग्राम शिलार्चन और दर्शन के विषय में शिवजी कहते है कि शालिग्राम की शिला पुण्य , पवित्र और धर्माकरिणी है | जिसके दर्शन मात्र से ब्रह्माघाती शुद्ध हो जाता है | श्रुति के अनुसार वह घर सब तीर्थो मेंश्रेष्ट तीर्थ के समान है जिसमे शिलाग्रम्शिला रहती है | ब्राह्मण को पांच , क्षत्रिय को चार, वैश्य को तीन और शूद्र को एक शिला पूजनी चाहिए | शालिग्राम शिला के पूजन मात्र से ही शूद्र मुक्ति को प्राप्त होता है | से देवि ! अधिक क्या कहे, मुक्ति चाहने वाले पुरुषो को शालिग्राम शिला का पूजन करना चाहिए | इसी अध्याय में एकसौदोवे श्लोक में भगवन् शंकर कहते है-----

भक्तिहीनैच्श्रतुर्वेदै: पठितै: कि प्रयोजनम् | व्श्रपचो भक्तियुक्त्स्तु त्रिदशैरपि पूज्यते ||

अर्थात्, भक्ति-हीन होकर चारो वेद पढ़ने से क्या लाभ है ! यदि चाण्डाल भी भक्ति करे तो उसकी देवता लोग पूजा करते है | आगे एकसै चवालीसवे अध्याय में साभ्रमती गंगा के किनारे धवलेव्श्रर तीर्थ में “धवलेश” के महात्म्य में स्कन्दपुराण वाली नन्दी और किरात की कथा ज्यो-कीत्यों आई है | उसके अन्त में भगवान् शंकर कहते है ------

एको नन्दी महाकालो द्वावेतौ शिववल्लभौ | ये पापिनो ह्मधर्मिष्ठा अन्धा मूकाच्श्र पग्डव: ||
कुलहिना दुरात्मन: व्श्रपचाधा हि मनवा: |
यादृशास्तादृशाच्श्रान्य आराध्य धवलेव्श्ररम् ||
“गतास्तेऽपि गमिष्यन्ति नात्र कार्या विचारणा |” --पदमपु. उत्तर ख. १४४ अ.

अर्थात, इस धवलेव्श्रर के पूजन और दर्शन से किरात और नन्दी शिव के द्वारपाल हो गए | अत: पापी, अधर्मरत, अन्ध, दुरन्ता, मूक, पंग और कुलहीन तथा व्श्रचादि मनुष्य चाहे जैसे भी हो धवलेव्श्रर की आराधना करके उत्तम लोक को जायेगे और चले भी गए है, इसमे सोच-विचार करने की कोई बाट नहीं है | नन्दी और किरात की कथा की तरह की एक कथा ब्रह्मपुराण के गौतमी महात्म्य के निन्योन्वेवे अध्याय में आई है | यह बढ़ी सुन्दर कथा है | एक ब्राह्मण से ब्रह्माजी ने उस कथा को इस प्रकार कहा है------ हे द्विज ! महादेव के चरणों की भक्ति देने वाला, रोग और पाप नाशक “भल्ल” नाम का एक तीर्थ है, उसकी पुण्यकथा सुनो | गंगा के दक्षिण और क्षीगिरि के उत्तर तट पर “आदिकेश” नाम के लिग्डरुपी महादेव है | वे ॠषियो से पूजित और सब कामो को देनेवाले है | हे द्विज ! परम श्रमिक सिन्धुद्वीप नाम के एक ॠषि थे | उनके भाई का नाम “वेद” था | वे भी परम ॠषि थे | वे वेद-ॠषि त्रिलोचन त्रिपुरारी उन “आदिकेश” को मध्याह्र में सदा पूजते थे और भिक्षाटन करने के लिए गाँव में चले जाते थे की उसी समय एक परम धार्मिक किरात उस पर्वत पर शिकार के लिए आता था और चारो और घूम कर अनेक मृगो को मारकर थका हुआ, माँस को धनुष पर लटका कर ‘आदिकेश’ शिव भगवान के पास जाया करता था | उस समय मॉस को बाहर ही रख देता था | समीप में ही गंगा पर जाकर मुह से पानी तथा एक हाथ से किसी भी पेड का पत्ता और दुसरे हाथ से नैवेध के लिए मास लाकर तन्मय होकर आदिकेश के पास जाकर वेद ॠषि के द्वारा की गई पूजा को पाँव से हटाकर “शिव प्रसन्न होवे” कहकर स्नान, पत्र और मॉस के नैवेध से पूजा करता था | शिव-भक्ति के बिना उसको कुछ भी अच्छा नहीं लगता था | इस प्रकार प्रतिदिन आकर शिव-पूजा करके घहर लौट जाता था | ब्रह्माजी कहते है कि जैसी उसकी अपूर्व भक्ति और पूजा थी, शंकर भगवान् भी उसके लिए वैसे ही प्रसन्न थे | भगवान् की स्तिथि ही विचित्र होती है | जब तक वः भील नहीं आता था तब तक भगवान् भी सुखी नहीं रहते थे | भला शम्भु की भक्ति के ऊपर अत्यन्त कृपा को कौन जन सकता है ? इस प्रकार व्याध को पार्वती-सहित “आदिकेश” महादेव की पूजा करते भुत दिन बीत गए | इधर वेद- ॠषि क्रुद्ध होकर यह सोचा करते थे कि मंत्र और भक्ति ये युक्त मेरी शिवपूजा को प्रतिदिन कैान पापी नष्ट कर देता है ? ऐसे पापी को अब मै मार डालुँगा | क्योकि जो पुरुष गुरु, देव ,व्दिज और स्वामी का द्रोही होता है वः मुनि का भी बध्य होता है, फिर यह शिवद्रोह करने वाला तो सबका बध्य हो सकता है | इस प्रकार वेद- ॠषि विचारने लगे कि न मालूम यह किस दुष्ट पापात्मा की चेष्टा है | मै तो सुन्दर फल, पुष्प, कन्द और मूल से शिव- पूजा कर जाता हू , वह सब हटाकर मॉस और पेड के पत्तो से दूसरी पूजा कर जाता है | जो हो अब मै उसको मार डालुँगा | यह सब सोचकर वेद-ॠषि पूजक कप ता लगाने के लिए चिप गए | इतने में प्रतिदिन की भांति वः व्याध “आदिकेश” के पास आया | नित्य की तरह पूजा करते हुए उस व्याध से आदिकेश महादेव बार-बार कहने लगे कि हे महाबुद्धिवाले व्याध ! क्या तुम थके हो ? तुम देर में कैसे आए ? हो तात ! तुम्हारे बिना मै दु:खिता था | हे पुत्र ! मै कुछ भी सुख नहीं पा रहा हू | इस कर्ण तुम थोडा विश्राम कर लो | ब्रह्माजी कहते है कि इस प्रकार बोलते हुए शिवाजी को देखकर वेद-ॠषि आव्श्रर्य में पड़ गए और क्रोध के मरे कुछ भी नहीं बोले | किन्तु व्याध प्रतिदिन की तरह पूजा करके अपने घर चला गया | वेद-मुनि क्रुद्ध हो शिवाजी के पास आकर बोले की हे ईश ! इस पापी, क्रिया-ज्ञान-रहित, जिवहिंसा करने वाले , क्रुर, निर्दय, नीच-जाती, अज्ञानी, गुरुपरम्परा-रहित, सदा बुरा काम करनेवाले और अजितेन्द्रिय व्याध को तो आपने दर्शन दिया है और मुझसे बात तक नहीं करते हो | मै व्रती होकर विधानानुसार तुम्हारी पूजा करता हू, स्त्री-पुत्रादि से रहित होकर सदा तुम्हारी पूजा करता हू | किन्तु यह बड़े आच्श्रर्य की बाट है कि वह व्याध दूषित मॉस से तुम्हारी पूजा करता है उसके लिए तो आप प्रसन्न है और मेरे लिए नहीं | इस प्रकार क्रुद्ध होकर वेद- ॠषि ने निच्श्र्य किया की इस अपकारी व्याध के सिर में पत्थर मार देता हू | ब्रह्माजी कहते है कि वेद भुनी के यह सब ख चिकने पर “आदिकेश” महादेव हँसकर बोले की कल तक ठहर जाओ, तब मेरी शिला को उसके शिर पर मरना | इस पर वेद-मुनि ने भी अच्छा कहकर हाथ में उठाई हुई शिला फेक दि और क्रुद्ध होकर यह खा की अच्छा कल ही सही | इसके बाद वेद-मुनि अगले दिन आकर स्नानादि करके प्रतिदिन की तरह शिवपूजन करने लगे, तो उन्होंने देखा की शिवजी के मस्तक में बडा भरी घाव हुआ है और उससे लहू की धारा भ रही है | यह देखकर वेद-मुनि आच्श्रर्य और शंका में पड़ गए | वः सोचने लगे कि कोई महा उत्पात हो नहीं वाला है | फिर उन्होंने मिट्टी, कुशा, गोबर और गंगाजल से उस लिग्ड को धोकर पूजा की | इस बीच वः निष्पाप व्याध आ गया | उसने जब शिवाजी के मस्तक पर घाव देखा तो तुरंत ही ‘यह कैसी विचित्र बात है’ कहकर तीखे बाणो से अपने शरीर को सैकड़ो बार छेद दिया | वः विचार करने लगा कि कौन ऐसा पवित्र हृदय वाला होगा जो स्वामी की विवृत दशा सहन कर लेगा | वह अपने को बार बार धिक्कारने लगा कि मेरे जीतेजी भगवान की यह दशा हो गई | व्याध के इन सब कर्मो को देखकर महादेवी आश्चर्य में पढ़ गए और वेदज्ञो में श्रेष्ट वेद – मुनि से बोले –

पश्य व्याधं महाबुद्धे भक्तं भावेन स्न्युतम् | तत्व तु मृद्धि: कुशौर्वभिर्मुधन स्पृष्टवासि || अनेन सहसा ब्रह्मन् ममाऽऽत्मापी निवेदित: | भक्ति: प्रेमथ्वा श्क्तिर्विचारो यत्र विधते | तस्मादस्मै वरान्दासये पश्च्तुभ्य दिजीत्तम ||

अर्थात , हे वेद ! भाव से भरे हुए भक्त व्याध को देखो | तुमने तो केवल कुश , मिट्टी और जल से मेरा मस्तक छुआ है , पर इसने तो एकदम मेरे लिए अपना शरीर भी दे दिया | इसमें भक्ति , प्रेम , शक्ति और विचार विधमान है | इस कारण सर्वप्रथम इसको वर दूँगा , फिर तुम्हे दूँगा | ब्रह्माजी कहते है कि महेश्रर ने कयाध के वरदान मांगने के लिए अनुरोध किया | व्याध ने कहा कि देवेश ! तुम्हारा जो निर्माल्य है वह हमे मिले और मेरे नाम से तीर्थ हो जय और इस तीर्थ का ऐसा महत्त्व हो की इसके स्मरण से ही सब यज्ञो का फल मिल जय | शिवजी ने व्याध की प्राथना स्वीकार कर ली | इस कारन वह “ भिल्ल “ तीर्थ समस्त पापस्मुह का विनाशक हो गया | इस कथा से यह बाट स्पष्ट है कि एक अन्त्यज के पुराने पर भी वेदज्ञ ब्राह्मण ने शिवलिग्द को अपवित्र नही माना | एवम् एक भक्त व्याध अज्ञ होने पर भी भावमात्र से शिव पुराण करने पर सर्वोत्तम फल पा गया | वराहपुराण में धर्मव्याध और मातंग की एक कथा आई है | उसमे यह वर्णन आया है कि एक धर्मव्याध अत्यन्त धर्मात्मा था | वह पंचयज्ञ और देव्पुजनादी विधियों को जनता था | एक समय व्याध और उसकी लाध्की के ससुराल वालो से पवित्रता के विषय में झगड़ा चला | धर्मव्याध ने अपनी लाध्की के ससुर मातंग से कहा कि तुम मुझे झूठे ही हिंसक होने का दोष लगा रहे हो | मै तो एक ही हिंसा करता हूँ | तुम्हारे घर में तो आचार , देवपूजा , अतिथि का पूजन आदि क्रियाओ में एक भी कर्म नही है | इस कारन मै तुम्हारे घर भोजन नही करूँगा | मुझे घर जाकर श्राद्ध करना है |इतना कहकर व्याध अपने घर चला गया | घर जाकर उसने देवता और पितरो का पूजन किया , अन्त में घर का भार पत्र के ऊपर छोड़कर लोकप्रसिद्ध पुरुषोत्तम तीर्थ की यात्रा करने चला गया | वहा जाकर श्लोकपाठ के साथ ताप करने लगा | इस प्रकार तीर्थ में जाकर व्याध ने अनेक स्तोत्रो से स्तुति की | उनमे सर्वप्रथम श्लोक यह है -----

नमामि विष्णु त्रिदशारिनाशन विशालवक्ष: स्थल संश्रितश्रियम् | सुशासन नीतिमता परागडति त्रिविक्रम मंदरधारिण सदा ||

इस प्रकार पुरुषोत्तम तीर्थ में ताप करता और सतोत्रपाठ करता हुआ वह धर्मव्याध भगवान का दर्शन पाकर सनातन पद को पहुच गया | शिवपुराण स्नत्युकार सहिता के पन्द्रहवे अध्याय में शिवपुराण और दर्शन के विषय में आया है कि शिवजी के दर्शन , शिव्शास्त्र के श्रवण और नाम सकिर्तन से स्त्री , शुद्र और अन्त्यजादि कोई होवे , सब अश्रमेध के फल को पाते है और पाप मुक्त हो जाते है | इस प्रकार सब पुराणों में अनेक कथाए आई है , यो यह सिद्ध करती है की शुद्ध और भावभक्ति से युक्त स्नारणधर्मानुयायी अन्त्यज भी सदा से देवदर्शनादी का अधिकारी होता आया है | प्राचीन ॠषि , मुनि , महात्मा , संत , सद्धू , सभी धर्मात्मा लोग इन दिन आशय सधर्मी भाइयो के लिए उदार होते आए है | मर्यादापुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र जब वन में भक्तिन शबरी के आश्रम में पहुचे तो उन्होंने उससे घ्रणा नही की | क्योकि भीलनी बह्मा और आभ्यंतर शुद्धि तथा भ्किभाव से समन्वित थी | भगवन ने उस अन्त्यज जाति की बुढिया की कुतिया में जाने में जरा भी संकोच नही किया | पद्मपुराण में आया है कि भगवान रामचंद्र शबरी के पास गए तो शबरी ने उनका स्वागत किया और अन्स्कर करके उन्हें अपनी कुतिया में बैठाया और पाव धोकर वन्य फल पुष्पों से पूजा की तथा अनेक प्रकार के सुन्दर मधुर फलमुल दिय | भगवन ने शबरी के फ्लो को खाकर उसे मुक्ति दि | इतना ही नही बल्कि भगवन व्याध ने तो इन दिन भाइयो के उद्धार के लिए ही महाभारत और पुराणों का संकलन किया | भागवत में आया है कि ---

स्त्री शुद्र दिजबंधूना त्रयी न श्रुतिगोचरा | कर्मश्रेयसि मूढ़ाना श्रेय एवं भवेदिह || “इति भारतमखयान कृपया मुनिना कृतम् |”

अर्थात , स्त्री , शुद्र और दिजबंधु के कान तक श्रुति नही पहुच सकती है | किन्रू किसी प्रकार उन्हें अपने धर्म , अर्थ और कामादि पदार्थो की प्राप्ति हो , इस कारण व्यास मुनि ने उनके कल्याणार्थ महाभारत जैसे वेद्सरामय ग्रन्थ की रचना की | इस बात को व्यासजी ने अपने ही मुख से उसी वचन से और भी स्पष्ट कर दिया है -----

भारत व्यपदेशेन हमामनायर्थश्र दर्शित: |
दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्री शुद्रादिभिरप्युत ||

अर्थात , मैंने महाभारत के भने वेदों का भी अर्थ दिखा दिया है , जिसमे कही हुई धर्मदी विधि में स्त्री शुद्रदि भी अभिकारी हो जाते है | इन सब बातो के पर्यालोचन से यह स्पष्ट है कि महाभारत तथा पुराणों की रचना दिजो के हित के अतिरिक्त विशेषता स्त्री शुद्रादि जाति के कल्याण के लिए ही की गयी है | यही बाट है कि विष्णु पुराणादि ग्रंतो में पुरुष सूक्त जैसे वैदिक मंत्रो को कुछ हेर फेर करके रखा गया है | एव त्रेवंणिरक सम्बन्धि गय्त्र्यादी मंत्रो की दीक्षा के बदले इन भाइयो के लिए पुराणों में पंचाक्षर , अष्टाक्षर और दादशाक्षर जैसे बहुत से मंत्रो का विधान दिया गया है | इस विषय में मैने “ मंत्र – महिमा “ और “ सनातन धर्म प्रदीप “ में कुछ विस्तार के साथ वर्णन किया है | इसी प्रकार पुराणदि ग्रन्थो में आए हुए स्तोत्र तथा महात्म्य ग्रन्थो के पढ़ने के विषय पर शुद्रादिको के लिए स्पष्ट रूप से आया है कि यदि शुद्र इस स्तोत्र को पढ़े तो उसे सद्गति प्राप्त होती है | नर्मदा स्तोत्र के बारे में मत्स्यपुराण में लिखा है ----

वैश्यस्तु लभते लाभ शुद्र: प्राप्नोति सद्गतिम | मुर्खस्तु लभते विधा त्रिसन्ध्य य: पठेन्नर: ||
वैश्यस्तु लभते लाभ शुद्रश्रैव शुभा गतिम् ||

खेद है की इस पर भी कुछ निबन्धकरो ने शुद्रो के पुराण पढने के विरुध्द सम्मति दि है | लोकमान्य बल गंगाधर तिलक भी पौराणिक विधान के द्वारा स्त्री , शुद्र अन्त्यजादि जाति के उद्धार के विषय में गीता के नवे अद्याय और गीतारहस्य में स्पष्ट सम्मति दे गए है | कलियुग में शुद्रो के लिए भक्ति मुख्य कही गयी है | कुछ लोगो की यह धरना है की शूरो जो जप और ताप का अधिकार नही है , अन्यथा “ शम्बूक” को राम्चद्र्जी न मरते | किन्तु एसी धारणा पर यह समझ लेना अत्यवश्यक है कि युग भेद से धर्म भेद और यगानुसार अधिकारी का भी भेद माना गया है | मनुस्मृति में आया है कि सत्य , त्रेता , द्वापर और कलियुग में विभिन्न धर्मो की प्रधानता रहती है | सत्ययुग ताप प्रधान होता है , त्रेता ज्ञान प्रधान , द्वापर यज्ञ प्रधान , और कलियुग में दान की मुख्य धर्म होता है | उस समय ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य तपस्वी और ज्ञाननिष्ट होते थे | उनकी सेवा से ही शुद्र भी संस्ग्रानुसार धर्म , अर्थादि पुरुषार्थ का भागी हो जाता था | अत: उस युग के विरुद्ध स्मार्त ताप करना शुद्र के लिय उचित नही समझा गया | किन्तु लाकियुग में ही यही कहा गया है की शुद्र और ब्राह्मणदि वर्ग की विष्णु और शिवदी देवपूजन और भगवन्नाम – कीर्तन से मुक्त हो सकते है | गरुणपुराण में आया है की कलियुग में हरी कीर्तन से श्रय होता है | इस कारन हरी का ज्ञान , ध्यान और पूजन करना चाहिए | पदम्पुराण उत्तर खण्ड में आया है की कलियुग में विष्णु के ध्यान में लगे हुए शुद्र धन्य होते है | वे इस लोक में सुख भोग कर परलोक में विष्णु पद को पाते है | जिस समय में जो नियम विशेष रूप से रहता है उसके विरुद्ध करने पर ही दंड मिलता है | किन्तु इसका यह अभिप्राय नही है कि श्द्रो को पहले कोई अधिकार ही नही था | शुद्र के लिए यह कही नही आया की वह “ सेवा “ धर्म के सिवाय अन्य कोई धर्म ना करे | किन्तु जहा कही भी शुद्र के लिए सेवा धर्म का विधान किया गया है वहा पर सेवा धर्म मुख्य धर्म समझा गया है , अर्थात विरती के लिए शुद्र का सेवा धर्म ही मुख्य धर्म है | यदि शुद्र के लिए सेवा धर्म के अतिरिक्त सब धर्म वर्जित होते तो स्मृतिग्रन्थो में शुद्र के दस या बारह संस्कार विहित ना होते | व्यास स्मृति में आया है कि गर्भाधान से लेकर व्र्तादेश संस्कार –पर्यत्न दस संस्कारो को शूद्र करे ,किन्तु वेद –मंत्र –रहित विधि से | निर्णय सिन्धु में उद्धत शागड़ृधर का वचन है कि दिव्जो के सोलह संस्कार है और शुद्र के बारह | मदनरत्न में शुद्रो के जातकर्म , नामकरण , निष्क्रमण अन्न प्रशन , चुडाकर्म , विवाह और पुन्चम हा यज्ञ ये गेहारह संस्कार कहे गये है | विष्णु स्मृति में आया है की पंच हा यज्ञो का विधान शुद्र के लिए भी कहा गया है और उसके लिए नमस्कार मंत्र कहा गया है | इन सब वाक्यों की संगती लेकर यह स्पष्ट हो जाता है की यहाँ पर शास्त्रों में यह आया है की शुद्र का कर्म केवल सेवा – धर्म है , उसका अभिप्राय यही है की सेवा धर्म की शुद्र की व्रिति के लिए प्रधान धर्म है , जैसे की व्रिति के लिए ब्राह्मण का अध्यापन , याजन और प्रतिग्रह मुख्य धर्म है , न की दुसरे के लिए| किन्तु इन विधानों का यह अभिप्राय नही है की ब्राह्मण अध्यापननदि के सिवाय और कर्म करे ही नही | यही बाट शुद्र के सेवा – धर्म में भी लागु है | अतएव मनु के -----

“ एकमेव तु शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत् “

इस श्लोक की टिका में कुल्लूक भट्ट ने लिखा है की ‘एक ही ‘ कहने से प्रधन्य का निर्देश होता है क्योकि द्नादी कर्म भी उनके लिए विहित है | इसी प्रकार अन्त्यजो के लिए भी धर्म और कर्म का विधान कहा गया है क्योकि अन्त्यज जाति भी शुद्र वर्णन के ही अंतर गत है | शुचि और अशुचि का तारतम्य लेकर ही उनको कही – कही पर एक जाति या अवर्ण कहा है | किन्तु शत्रो में अनेक जगह अन्त्यजो को भी शुद्र वर्णन में ही गिनाया है | कुछ लोगो का यह कहना है की वियातीय सयोग से पैदा होने वाली यह जाति वर्णन के अन्दर नहीं आ सकती है | यदि इस न्याय से ही इस जाति को वर्णन ना मने जाये तो कोई भी शुद्र जाति इसी नही है जो शास्त्रत: शंकर सिद्ध ना होती हो | अत: शत्रो में शुद्र वर्णन को ही दो विभागो में कर दिया है | उसमे अन्त्यज वह वर्ग है जिसकी गर्भ और शरीर – संबंधी अशुचि अधिक रहती है | इसी कारण इन्हें असच्छुद्र कहा गया है | किन्तु व्रिति- निमितक सामजिक कार्य को स्पष्ट करने के लिए ही कही – कही पर शस्त्रों ,में उनका वणोतरादि स्वतंत्र रूप से प्रतिपादन किया गया है , किन्तु ये सब शुद्र वर्ण में ही है | इसी लिए शास्त्र कर स्च्छुद्र और असच्छुद्र की परिभाषा इस प्रकार करते है की जो शुद्र पंच यज्ञ करता हो , द्विजाति सेवा करता हो वह सच्छुद्र है | इसके अतिरिक्त मनमानी करने वाला असच्छुद्र है | तात्पर्य है की अन्त्यज भी शुद्र श्रेणी की ही एक जाति है | अत; उसे भी शुद्रो के तुल्य अनेक धार्मिक सामान अधिकार कहे गये है | इस विचार को लेकर ही अनेक जगह अन्त्यजो के संस्कार भी कहे गये शागड़ृधर में आया है की गर्भाधनादि पांच संस्कार अन्त्योजो को बी विहित है | इसी प्रकार अन्त्यज प्रयतन सभी शुद्रो को ब्राह्मणदि वर्णों के सामान ही अहिंसादि का उपदेश मनु में दिया गया है ----

अहिसासत्यमस्तेय शौचमिन्द्रियनिग्रह: |
एतसामासिक धर्म चातुर्वनयेऽब्रवीन्मनु: ||

अर्थात – अहिंसा , सत्य , चोरी ना करना और पवित्रता से धर्म ब्राह्मण से लेकर अन्त्यज पर्यन्त सभी के लिए है |

प्रकरणसामथ्र्यात्संकीणृानामप्य्यधर्मो वेदितव्य: | कुलपुक:

पआगे चल कर मनु ने पुन: यह कहा की जितने भी व्यभिचार – जन्य अर्तिलोम सक्डर है वे सब शुद्रो के सधर्मा है | यही बाट है की ज्ञानवल्क्य ने अन्त्यजपर्यत्न सब शुद्रो को अहिंसा , सत्य , अस्तेय , शौचइन्द्रिया , निग्रह , दान , दम , दया और शान्ति धर्म का उपदेश किया है | शुद्र कमला कर में लिखा है की “ अहिंसादि “ धर्म सबके लिए सामान है| इसलिए निबंद – ग्रन्थो में शुद्र के तुल्य ही अन्त्यजो को भी महीने भर का अशौच कहा है | शुद्र और द्वजति के सधर्म अहोने के कारण ही पुराणादि शास्त्रों में अन्त्यजो के लिए तीर्थ , वर्त देव पूजनदि का अधिकार कहा गया है | नृसिहपुराण , में लिखा है ----

पब्राह्मण: क्षत्रिय वैश्य: स्त्री: शुद्रनत्यजातय: |
सम्पूज्य त सुरश्रेष्ट नरसिह अपुधर |
मुच्यन्ते चाशुभैर्भार्जन्मकोटि स्मुभ्दवै: ||

यही श्लोक ब्रह्मा पुराण के पचपनवे तथा उन्स्थ्वे अद्याय में भी आयुआ है | [पुन: इसी पुराण के कृष्णस्नान प्रकरण वाले बसठवे अध्याय में आया है की ज्येष्ट की पूर्णिमा के दिन कृष्ण स्नान के लियए ऊतम मच्च बनाना चाहिए | उस दिन सुभद्रा , राम और कृष्ण की मूर्ति को स्थापित करना चाहिए और उस मच पर स्थापित कृष्ण आदि की मूर्ति जब धूप – दिपदि तथा ब्राह्मण ,क्षत्रिय , वैश्य और अनुलोम प्रतिलोम आदि शुद्रो से तथा हजारो स्त्री –पुरुषो से घिरी रहती है तब ग्रस्त स्नातक , याति और ब्रह्मा चारी लोग बलराम के सहित भगवन को स्तनं करवाते है | ऐसे अवसर पर जो मनुष्य पुरुषोतम भगवन को देखते है , वे अविनाशी पद प्राप्त करते है | इसी तरह वर्त के बारे में देवि पुराण में आया है की स्नान किये हुए और हर्ष चित वाले भक्ति युक्त ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और अन्त्यजादि शुद्र , म्लिच्छ , स्त्री और जो कोई भी हो वे सब वर्त के अभिकारी है | किन्तु वैश्य और शुद्र दो रात्रि से आधिक उपवास ना करे | यहाँ पर उपवास का निषेद महातप के विषय में समझना चाहिये ना की सब वरतो में | ईशान सहिता का वचन है की शिवरात्रि का वर्त सब पापो को नाश करने वाला है , उसका अधिकार ब्राह्मण से लेकर चंडाल तक सबको है | देवल का कथन है की सभी वर्णों के मनुष्य वर्त , उपवास और शारीरक कष्ट सहन से पाप – मुक्त हो जाते है ------

वरतोपवास नियमै : शरीरोतापनैस्तथा | वर्णना: सर्वे विमुच्यन्ते पातकेभ्यो न संशय: ||

व्यस्स्मृति का वचन है की चतुर्थ वर्ण होने पर भी शुद्र में वर्णतत्व होने के कारन वह धर्म का अधिकारी है – “ शुद्रो वर्णश्रतुथोऽपि वर्णत्त्वाध्दर्ममहति |” यहाँ पर यह आशंका हो सकती है कि स्मृतिग्रन्थो में अत्यजो में से जिन्हें अस्पृश्य कहा गया है वे कैसे देव्दार्शनादी को सकते है ? ऋषि और शास्त्र के तात्पर्य के अनुसार इस आशंका पर पौरणिक विधानों के अनुसार यह समझ लेना उचित है कि कोई शुद्र जाति गर्भ , बिज और वृति सम्बन्धी आशुचिता के कारण किसी अंश में कभी अस्पृश्य भी हो तो जब सदुपदेश का पालन करे और पौराणिक मंत्रो से दिखित हो जय , अथवा उसमे उत्कृष्ट भक्ति जग तथा वह सदाचार , अमेध्य भक्षण का त्याग , स्वकर्म में रत और स्नानादि से पवित्र जीवन बिताने लगे तो वह ‘ निषाधस्थ पति न्याय’ से उपयुक्त बातो का पूर्ण अधिकारी हो सकता है | अन्यथा चंदाडलादी के विषय का सारा महात्म्य कथा आदि विधान निरर्थक हो जायेगे | इसी जगह अर्थवाद की कल्पना करने पर शिष्टो का यह वचन है कि भगवान के नाम में जो मनुष्य अर्थवाद की सम्भावना करता है वह नरक में गिरता है | इस पर भी अर्थवाद की शंक की जय तो कोई हेतु नही है की सभी पौराणिक विधानों ने अर्थवाद ना माना जाये | क्योकि तीर्थ , स्नान , व्रतादि सभी कृत्यों का मह्त्व्व उसी प्रकार वर्णित है जैसे चंडालादी के देवपूजन और दर्शनादि अधिकार की कथा | ऐसे विधानों का सब जगह यही अभिप्रिय रहता है कि पहले मनुष्य में स्वाभाविक या नामितिक , चाहे कोई भी दोष क्यों न हो , या समझा जय , किन्तु वह मनुष्य के पवित्राचरण , ब्रह्मा आभ्यन्तर शुद्धि और भगवभ्द्क्ति होने पर दूर हो जाता है | तात्पर्य यह कि मनुष्य चाहे स्वाभाविक या अस्वाभाविक , चाहे किसी तरह के दुष्ण से युक्त क्यों न हो , यदि वह सत्कर्म और भगवभ्द्क्ति की ओर चले लगता है तो उसके दूषन धीरे धीरे लुप्त होने लगते है | वह फिर अपने जातिकार्य और उसी में रहते हुए भी दिन दिन ऊचा उठता जाता है | लोक में सम्मानित और आदरणीय होकर अन्त में परम पद को प्राप्त होता है | इन आशयो को लेकर ही भगवन गीता में कहते है-----

मा हि पर्थ व्यापाश्रित्य येऽपि स्यु: पापयोनय: | स्त्रियों वेश्यास्तथा शुद्रस्तेऽपि यान्ति परा गतिम् || अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् | साधुरेव स मंतव्य: स्म्यग्यव्यवसितो हि स: | क्षिप्र भवति धर्मात्मा षश्रच्छनति निगच्छति ||

यही बाट है की भगवान रामचंद्र एक अन्त्यज जाति की बुढिया स्त्री शबरी की जीर्ण शीर्ण कुटी में गए और उन्होंने उसके अघर्य , फल तथा फुल आदि को ग्रहण किया | यही बाट है कि जजली जैसा तपस्वी ब्राह्मण एक बनिये के पास धर्मोपदेश सुनने गया है और एक तपस्वी ब्राह्मण धर्मोपदेश लेने के लिए धर्मव्याध के पास गया | एसी एसी कथाओ , विधानों और महत्म्यो का यही तात्पर्य रहता है कि मनुष्य पहले चाहे कैसे ही स्वाभाविक या नौमितिक दोषों से युक्त कतो न हो , यदि वह मंदिक्षा , भाकिभावना और सदाचार से सम्पन्न हो जाता है तो वह दोषनिर्मुक्त होकर सम्मान्य , आदरणीय और स्व्वर्ग के सामाजिक साधारण धर्म का अधिकारी हो जाता है | इनता ही नही , बल्कि उसकी बीज सम्बन्धी और शरीर सम्बन्धी अपवित्रता चली जाती है , जैसे की ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य दिजतियो की मर्भ और राजवीर्य दोष की अशुद्धि , नामकरण , चूडाकर्म , उपनयनदी संस्कार से दूर हो जाती है , तथा स्वाध्याय , मघमांस के त्याग का वर्त , होम , ज्योतिष्टोमादी यज्ञ और पंचमहायज्ञो से शरीरस्थ आत्मा ब्रह्मा पर्पटी के योग्य हो जाता है | इस बाट को मनु ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है | मनु के दितीय अद्याय में आया है कि दिजतियो को वैदिक कर्मो से गर्भाधनादि संकर करना चाहिए , क्योकि वह इस लोक और परलोक में पाप क्षयकारी होता है | यहाँ पर क्ल्लुक लिखते है कि परलोक में यज्ञ सम्बन्धी फल के साथ सम्बन्ध होता है , इस कारन संस्कार परलोक का पवन है | इस लोक में वे संस्कार के द्वारा वेदादि के अधिकारी हो जाते है | गर्भाधान जत्क्र्मादी संस्कारो में दिज लोगो के गर्भ और बीज सम्बन्धी पाप दूर हो जाते है | इस शुद्धि के बाद दिज बालक अशुद्धि के कारन अब तक जिन स्वाध्यायादि कार्यो में अनधिकारी या अस्पृश्य था , उन स्वध्ययादी कार्यो का अधिकारी हो जाता है | इस प्रकार शुद्ध ब्राह्मणदि दिज की आत्मा ब्रह्मा प्राप्ति के योग्य हो जाती है | बस इसी प्रकार अन्त्यजादि शुद्र भी पुराणदि विहित मंत्रदीक्षा , कथा पुराणदि श्रवण , सदाचार और भक्ति भवदी से सम्पन्न होकर उत्तम शुद्र हो सकता है और अनेक कार्यो के अधिकारी हो सकते है | इन सब बातो को लेकर ही पुराणों में अन्त्यजादि शुद्रो के लिए अनेक विधान देखे जाता है | इसी प्रकार कार्य तथा उत्पतिक्रिम की प्रधनाता को लेकर ही शुद्रो में उत्तमादी भेद का विधान देखा जाता है | वस्तुतः अन्त्यज भी शुद्र वर्ण की अवांतर जाति है | जैसे ब्राह्मण से ब्राह्मणी में उत्पुन्न ब्राह्मण कहा जाता है , और वह कन्यकुब्ज आदि अवांतर जातिवाला भी कहा जाता है | उसी प्रकार शुद्रा से उत्पन्न संतान शुद्र और अन्त्यजादि की गणना शुद्रो में न हो तो शास्त्रों में सच्छुद्र का यौगिकरत बोधक लक्षण कभी न किया होता , बल्कि ऐसा पारिभाषिक लक्षण किया होता है कि गोपनापितादी अमुक जाती से अमुक जाति तक स्च्चुद्र है और शेष असच्छुद्र है | किन्तु सब जगह सच्छुद्र का यौगिकरत सूचक लक्षण ही किया गया है | यही बाट चारो वर्णों के अवांतर माननीय वर्ग विशेष के लिए भी शास्त्रों में कही गयी है | जैसे कि श्रोत्रिया ब्राह्मण या पडीक्तपावन ब्राह्मण नाम किसी कन्यकुब्ज आदि वर्ग के लिए नही कहा गया है , बल्कि वेदज्ञो में श्रेष्ट और वेदविहित कर्मो से सल्गन ब्राह्मण को ही श्रोत्रियदि शब्दों से कहा गया है | यह दूसरी बाट है कि वैसे ब्राह्मण के कुल को एक श्रोत्रिय जाती मान लिया गया है | इसी प्रकार शास्त्रों में सच्छुद्र का जो विस्तृत मिलता है , वह किसी शुद्रांतगर्त वर्ग विशेष के लिए नही कहा गया है | स्कन्दपुराण में सुन्दर वैज्ञानिको और शास्त्रियों दंग से स्च्छुद्रो का निरूपण किया गया है | इस विषय में स्कन्द के पूछने पर शिवजी बोले कि सच्छुद्र वाही है जिसकी पत्नी धर्म की मर्यादा और वेदमार्ग से विवाहिता हो , समान कुल और रूपवाली हो | तथा सच्छुद्र वाही है जिसकी पत्नी देवोक्त रीति से विवाहिता हो और नपुंसकतत्व , हिनंगता आदि दस दोषों से रहित हो | इनमे विवाहादि बहुत सि मर्यादा की बाते अन्त्यजो में भी पूर्ण रूप से विधमान है | शास्त्रों में अन्त्यजो की विभिन्न परिभाषा देखी जाती है | व्यासस्मृति में तो ग्वाले , नाऊ आदि को भी अन्त्यज कहा है | इन बातो के विचार से यह सिद्ध होता है कि अन्त्यज शब्द अछूत का बोधक नही है , बल्कि शुद्रो के वर्ग विशेष को अन्त्यज कहा है | उसमे भी कुछ स्मृतियों को छोड़कर शेष में अन्त्यजो की गणना में विरोध है | यह भी नही है की सभी प्रतिलोम शुद्र अन्त्यज कहे जाते हो | क्योकि यम, अग्नि, और अग्डिरा में मत से धोबी , चमार , नट मघमांस ने निरत जाति , मल्लाह , मेद और भील , ये सात जातिया ही अन्त्यज है |

रजकश्रर्मकारश्रच नटो बुरुड एव च |
कैवर्टमेदभिल्लाश सप्तैते अन्त्यजा: स्मृत: ||

इन जातियों में अब एक आध को छोड़कर अन्य अस्पृश्य नही मणि जाती है | उदाहरण के लिए कैवर्त को कोई भी अस्पृश्य नही मानता है | किन्तु रजक जैसी एक आध जाति को कही कही पर अंशत: अछूत मानते है | यह भाव भी धीरे धीरे हट रहा है | मनुस्मृति में अन्त्यज की अरिभाषा कही नही की है | दसवे अध्याय में केवल , अंत्यावसायी शब्द दिया है | उसमे भी दो चार जातियों की गणना नही है , किन्तु निषाद की स्त्री में चंडाल से उत्पन्न को अंत्यावसायी कहा है | मनु के अनुसार अन्त्यज कोई परिगणित जाति नही है | संकर जाती का निरूपण करने वाले दसवे अध्याय में अन्त्यज शब्द तक नही आया है | किन्तु एकसौ दसवे श्लोक में शुद्र का बोधक “ अन्त्यज्नमा “ शब्द आया है | इसी प्रकार यह भी विधान देखने में नही आता है कि जितने भी “प्रतिलोम” शुद्र है वे सब अस्पृश्य है | नही तो सुत , मगध , वैदेह प्रभृति प्रतिलोम शुद्रो को उत्तम शुद्र न समझा जाता | इस सुत जाति में उत्पन्न होकर ही सूतजी ने ऋषयो को पुराण सुनाया था | यधपि कुर्मपुराण और अग्निपुराण में पुराण के वक्ता सूतजी ब्रह्मा के यज्ञ के पृषदाज्य से पैदा हुए थे , तथापि पुराणों में अनेक जगह यह भी वर्णन आता है कि वाही सूतजी शुद्र जाती के थे | इस विषय में स्कन्दपुराण नागरखण्ड के एक सौ चौरानवेवे अध्याय में आया है कि जब सूतजी ने ऋषयो से कहा की दिन , रात , युग और ब्रह्मादी प्राप्ति ही नित्य वस्तु है | उसकी प्राप्ति के बाद पुनर्जन्म नही लेना पढता है | इस पर ऋषयो ने ब्रह्माज्ञान की प्राप्ति के बारे में सूतजी से पुच्चा की किस प्रकार मनुष्यों को ब्रह्माज्ञान की प्राप्ति हो सकती है ? यदि जानते हो तो हमसे कशो | उत्तर में सूतजी बोले की मेरी शक्ति ही क्या है जो ब्रह्माज्ञान कह सकू | जो खुद नही जनता वह दुसरे से कैसे कह सकता है | किन्तु अपने पिता के आदेश से मै हाटकेश्रवर तीर्थ में गया था | वहा पर रक्खी हुई पादुकाओं की मैंने पूजा की | उसी से मुझे ज्ञान हो गया और जो कुछ भी मैंने पुराणों का उतम तत्व सुना है , वह सब और वर्तमान तथा भविष्य को मै पादुका के प्रसाद से जानता हू | किन्तु मै वेद का पढना नहीं जानता , क्योकि मै सूत जाति का हू , मुझमे सूतत्व विधमान है | फिर भी वेद के सब अर्थ को मै जानता हू | यहाँ पर सूतजी ने अपनी स्थिति या जाती को स्वतः वर्णन किया है | इन सब विचारो को लेकर यही सिद्ध होता है कि अनुलोम संकरत्व या प्रतिलोम संकरत्व किसी जाती की अस्पृश्यता का हेतु नहीं है बल्कि व्यभिचार के कारण ही किसी – किसी को कही – कही पर अस्पृश्य कहा गया है | मनु चाहते थे कि व्यभिचार फैलने न पावे | आज भी वयभिचार –जन्य संतान को नीच दृष्टि से देखा जाता है | सांकर्य को रोकने और लोकमर्यादा को स्थिर करने के लिए ही मनु को इस प्रकार के दंड का विधान करना पड़ा | यह बात मनु के दसवे अधयाय के संकर प्रकरण के अंतिम भाग से सूचित होती है | किन्तु अब उन अन्त्यजो में अनन्त काल से विवाहित मर्यादा बंध गई है और वे लोग सहृद जाती की सेवा आदि मुख्य कर्म करते आ रहे है | इस पर उन्हें सदुपदेश, पुराणवार्त्ता और मंत्रदीक्षा आदि दी जाय तो उन्हें भी उतम शूद्र की तरह आदरणीय और देवदर्शनादी का अधिकार मानना चाहिए | इस पर भी कुछ लोगो का यह कहना है कि मनु के निम्नलिखित वचनों के अनुसार-----

इन शुद्राय मतिं दधान्नोच्छिष्ट न हविष्कृतम् |
न चास्योपदिशेद्धर्म न चास्य व्रतमादिशेत् || अध्याय ४-८ |
विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्ट कर्म कीत्यते |
यदतोऽन्यद्धि कुरुने तभ्दवत्यस्य निष्फलम || अध्याय१०-१२३
न शूद्रे पातक किच्ञिन्न च संस्कारमर्हति |
नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति न धर्मेत्प्रतिषेधनम् | अध्याय ||१२६||

अर्थात् शूद्र को धर्मव्रतादि का उपदेश नहीं देना चाहिए | सेवाकर्म ही उसका मुख्य धर्म है, इससे कर्म निष्फल हो जाता है | शूद्र को कोई पातल नहीं लगता, उनके लिए कोई संस्कार नहीं है, उनको धर्म का भी अधिकार नहीं है |” “एव स्त्री शूद्रपतनानी षट्”, “प्रतिलोमास्तुधर्महीना:” “सर्वधर्मबहिष्कृत:” इत्यादि स्मृत्त्यन्तर के वचनों के अनुसार शुद्रों को या अन्त्यजो को किसी प्रकार के धर्म का अधिकार नहीं है | किन्तु ऐसी आशंका पर प्राचीन निबन्धकारो और व्याख्याकारो ने यही समाधान किया है कि शुद्रादि के लिये साधारणत: धर्ममात्र का निषेध नहीं है, किन्तु उसी धर्म या उपदेश का निषेध है जिसका सम्बन्ध वैदिक तथा स्मार्त विधातो से है, जो कि केवल वेदमंत्र-पूर्वक उपनयन-संस्कार-युक्त व्दिजो को प्राप्त है | यदि उसको धर्म मात्र का उपदेश वर्जित होता तो स्मृति और पूराणादि ग्रन्थो में पंचयज्ञ का विधान, विष्णुपूजन, शिवपूजन, और व्दादश संस्कारादि का विधान शूद्र के लिये कभी न किया होता | ऊपर एक सौ तेइसवे श्लोक के कुल्लूक ने लिखा है कि सेवाधर्म का ही उपदेश अन्य धर्म की निवृति के लिए नहीं है | क्योकि उसके लिए पाक यज्ञ भी खे गए है | अत: “सेवैव” यह विधान सेवा-धर्म की स्तुति के लिये है | फिर आगे “न शूदे् पातक किच्ञित्” एस श्लोक पर कुल्लूक ने लिखा है – ‘न पात के किच्ञित्’ का अभिप्राय यही है कि जिस लहसुन, प्याज आदि के भश्रण में ब्राह्मण आदि को पाप माना गया है, वह पाप शूद्र को नहीं लगता है | इसका यह अभिप्राय नहीं है कि ब्रह्मह्त्यादि पंच महापातको का दोष शूद्र को लगता ही नहीं | एव “न संस्कारमर्हति” इसका यही अभिप्राय है कि वैदिक मंत्रपूर्वक होने वाले उपनयनादि संस्कार शूद्र के लिये नहीं होते | एव “नास्याधिकारोऽधर्मेऽस्ति” इत्यादि वाक्यों का यही अभिप्राय है कि अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्म करने का उसको अधिकार नहीं है | इसी प्रकार जहा पर यह कहा गया है कि “सर्वबहिष्कृत:” वहा पर भी यही अभिप्राय है कि अन्त्यज आदि अपने आचरण और धर्म में न हो तो ऐसे उन्मत्त, ‌उछण्ड, उच्छृड्खल और मर्यादा-रहित को धर्म-उपदेश न दे | किन्तु जो अपनी मर्यादा और आचार पर स्थिर है, उसे स्मृति और पुराणादि विहित धर्मो का उपदेश अवश्य दे | अतएव अन्त्यजादि शुद्रो को लश्र्य करने ही मनु कहते है कि यदि प्रतिलोक शूद्र निर्लोभ होकर शुद्ध भाव से गौ, ब्राह्मण, स्त्री और बालक में से किसी एक की रक्षा के लिये प्राण दे दे तो स्वर्ग प्राप्ति के समय सिद्दि प्राप्त करता है | फिर इस श्लोक के आगे ही मनु ने सब लोगो के लिये अहियादी का विधान किया है | इनसे स्पष्ट है कि अन्त्यजादि किसी के लिए भी साधारण रूप से धर्मोपदेश का निषेध नहीं है | जहा मनु ने “न शुद्रे पातक किच्ञित्” यह विधान दिया है | उसके आगे ही लिखा है कि जो धर्मज्ञ शूद्र धर्म की प्राप्ति चाहते है, वे यदि आचारवान् लोगो का आचरण करते हुए वैदिक मंत्ररहित किन्तु नमस्कार मंत्रपुर्वपंचयज्ञादी क्रिया का अनुष्ठान करते रहे तो उन्हें विघ्न नहीं आता है | इस लोक और परलोक में वे प्रशसा पाते है | कुछ लोग त्रिस्थली सेतु में दिए हुए---- “य: शुद्रेणार्चित लिग्ड विष्णु वा प्रणमेंन्नर: | न तस्य निष्कृतिर्द्रृष्टा प्रायच्श्रित्तायुतैरपि” इत्यादि नारदीय वचनों को लेकर खा कहते है कि शूद्र को पुजनादी का अधिकार ही नहीं है | इस पर भी भुत कुछ समाधान पहले दे दिया है, फिर भी------

शूद्र कर्माणि यो नित्य स्वियानि कुरुते प्रिये |
तस्याहमर्चा ग्रह्नमि चन्द्रखण्ड विभुषिते || स्कन्द
“चतुर्वर्णैस्तथा विष्णु: प्रतिष्ठाप्य: सुखार्थिभि:” देवीपुराण

इत्यादि शतश: शूद्र-पूजा-विधायक वचनों के अनुसार यह बात सिद्ध होती है कि शुद्रो के व्दारा बिना मंत्र के प्रतिष्ठापित देव का पूजन नहीं करना चहिए | कारण कि वह प्रतिमा वैदिक मंत्रो से प्रतिष्ठत नहीं रहती है | यहा पर यह विवक्षित नहीं है कि शूद्र व्दिज से प्रतिष्ठत सार्वजनिक मूर्ति की पूजा न करे | इन सब तात्त्विक विचारो से यह स्पष्ट है कि शूद्र को व्दिजसेवा के अतिरिक्त्त, श्राद्ध, देवपूजन, दर्शन, गर्भाधानादि व्दादश संस्कार, व्रत, उपवास, तीर्थ-यात्रा, पौराणिक मंत्र जप, मालाधारण, स्तुति, दया, दान और अहिंसादि अनेक धर्म का पूर्ण अधिकार है | महाभारत में कहा है कि श्राद्ध, न्याय ,सत्य, क्रोध, स्वदार-सन्तोष, शौच, अनसूया, आत्मज्ञान, सहनशक्ति, यह शूद्रपर्यन्त सभी मनुष्यों का धर्म है | हेमाद्रि में विष्णु का वचन है कि क्षमा, शौच, दम, दान, इन्द्रिय संयम, सत्य, अहिंसा, गुरुसेवा, तीर्थयात्रा, दया, नम्रता, अलोभ, देव और ब्राह्मण से लेकर अन्त्यजपर्यन्त के ये सब धर्म है | पुरणो में तो अन्त्यजपर्यन्त शुद्रो के लिये अन्यन्त स्पष्ट और मनोहर रूप में विधि और विधान दिए गए है | क्यों न हो, पुराणों के निर्माण का विषय उदेश्य इन दीन भाइयो को उठाना ही है | भविष्य में लिखा है कि विशेषतया शुद्रो के धर्म, अर्थ आदि की प्राप्ति के लिए व्यासजी ने वेद और धर्मशास्त्र का सार भरकर पुराण और भारत को बनाया | अतएव भागवत के व्दितीय स्कन्ध के चतुर्थ अध्याय के अठारहवे श्लोक में खा गया है कि जिस भगवान् के भक्तो के आश्रय पर रहने से ही किरात, हूणादि जाती और भी जो कोई पतित-से-पतित क्यों न हो शुद्ध हो जाती है , ऐसे भगवान् को नमस्कार है | यह सब अन्त्यादि जनों को भगवभ्डक्त्या शुद्ध करने के लिए ही खा गया है | यदि उनके लिए भी हम भगवान् का दर्शन रोक दे तो परमात्मा जाने हमे कहा स्थान मिलेगा | एस प्रकार उत्तम और संस्कृत शूद्र के लिए बड़ा ही सुन्दर प्रकरण स्कन्द्पुराण के व्याहखण्ड के दो सैा इकतालिसवे अध्याय में देखा जाता है | शिवाजी कहते है कि शुद्रो को अपनी भार्या में प्रेम, शुद्धि, नैकरी का पोषण, नित्य श्राद्ध-क्रिया, अग्निहोत्रादि रूप इष्ट क्रिया करना, पंचयज्ञ, स्नान, तर्पण, अग्नि में मंत्ररहित होम , ब्रह्मयज्ञ और स्त्री के साथ अतिथि-पूजा केनी चाहिए | आगे इसी अध्याय में अन्त्यज जाति का धर्म एस प्रकार विशेष रूप से आया है | यहा पर पहले शिल्पी, नर्तक, रजकादि अठारह जातियों प्रकृति नाम से कही गई है | इस कारण ‘तासा’ शब्द उसी प्रकृति के लिए आया है | अत: शिल्पी, रजक, नर्तक, चाण्डाल, वर्धकि, मत्स्यघाति प्रभृति जातियों को ब्रह्मण की सेवा, वष्णु का ध्यान, मंत्ररहित शिवार्चन, तीर्थस्नानादि पुण्यकर्म और दानकर्म करने चाहिए, क्योकि श्रद्धा से दुष्ट दान का क्षय कभी नहीं होता है | एवम् इस प्रकृति की जातियों के लिये अहिसादि धर्म का भी उपदेश भी दिया गया है | फिर इसी अध्याय में गृहस्थ शूद्र का लक्षण बताया गया है कि शुद्र नित्य षड्दैवत श्राद्धा और ह्न्तकारपूर्वक अग्निपूजन बिना मंत्र के करे और देव-व्दिज को नमस्कार और उनमे भक्ति करे | प्रात:काल उठकर देवादि का पादाभिवन्दन करके विष्णुभक्ति के श्लोको को पढ़ने से विष्णुत्त्व प्राप्त होता है | वर्ष में होनेवाले व्रत करने वाला, तिथि, वार और देवता के बारे में विचार रखकर चलने वाला और जीवो को अन्न देने वाला शूद्र गृहस्थ शूद्र खा जाता है | अमंत्रपूर्वक कर्म करता हुआ भी शूद्र मुक्त हो जाता हिया और चातुर्मास्य व्रत करनेवाला शूद्र भी हरिभाव को पहुचना है | इस प्रकार स्मृति, पुराण, भारतदि इतिहास ग्रन्थो में उदारता के साथ भुत से सामाजिक विधान और कथाएँ है जिनका अधिकार व्दिजति ही तरह अन्त्यजादि शूद्र भाइयो को भी है | इस पर भी आत्मबल की कमजोरी के कर्ण आजकल बहुत सि बातो में उन्हें अनधिकारी समझकर रथयात्रा जैसे कई एक “देवोत्सवो” में परस्पर विवाद और व्देषमय झगड़ा चल जाता है | किन्तु ॠषियो का हृदय उदार था | उन्होंने रथयात्रादि जैसे देवोत्सवो में शामिल होने का अधिकार उन्हें भी दे रक्खा है | वे भी व्दिजातियो की तरह सनातनधर्मो है | उनके सर्वसाधारण सामाजिक कार्यो में प्रवेश पाने में बाधा नहीं डालनी चहिए | ऐसे अवसर के लिए ही तो शास्त्रों का कथन है कि यदि कोई अपने सधर्मा भाई को हर समय अस्पृश्य समझता हो तो उसको यह समझ लेना चाहिए कि देवयात्रा, विवाह, यज्ञप्रकरण और समस्त उत्सवो में छुआछुत का विचार नहीं रहता है -------

देवयात्राविवाहेषु यज्ञप्रकरणेषु च |
उत्सवेषु च सर्वेषु स्पृष्टास्पृष्ट न विधते || अत्रि, २४६ |

इसी प्रकार बृहस्पति का वचन है कि तीर्थ, विवाह, यात्रा, संग्राम, देशाविप्लव, नगर और ग्रामदाह के समय छुआछुत से कुछ भी दोष नहीं होता है----/p>

तीर्थे विवाहे यात्रायां संग्रामे देशाविप्लवे |
नगर ग्रामदाहे च स्पृष्टास्पृष्टिर्न दुष्यति || बृहस्पति: |

इसी प्रकार शातातप का भी वचन मिलना है-------

ग्रामे तु यत्र संसृष्टिर्यात्रायां कलहादिषु |
ग्रामसन्दूषणे चैव स्पृष्टिदोषों न विधते ||

केवल विधान ही नहीं किन्तु ॠषि लोगो ने इस तरह के नियमो का पूर्ण पालन भी किया था | स्कन्द्पुरण नागरखण्ड के सड़सठवे अध्याय में यह वर्णन आया है कि जब परशुराम ने सहरत्रार्जुन पर चडाई की तो इन अन्त्यजो की सुसज्जित सेना को साथ लेकर ही चडाई की थी | पितृअशौच से मुक्त होकर तीक्ष्ण पुलिन्द, मेदक, भील्ल आदि की सुसज्जित सेना लेकर परशुरामजी सहरत्रार्जुन से लड़ने गए | उस लड़ाई में वीर शबरो ने सहरत्रार्जुन की सेना को परास्त किया और सैनिको को बांध लिया | फिर इसके आगे के अध्याय भी आया है कि पुन: जब क्षत्रियों ने उपद्रव मचाया तो भी पुलिन्द, शबर, मेदक आदि अन्त्यजो की सेवा लेकर परशुराम, युद्ध के लिए निकल पड़े | इतना ही नहीं, बल्कि जब वसिष्ठजी और विव्श्रमित्रजी में घोर युद्ध के लिये निकल पड़े | इतना ही नहीं, बल्कि जब वसिष्ठजी और विव्श्रमित्रजी में घोर युद्ध हुआ तो वसिष्ठजी की और से शबरादि अन्त्यजो ने बड़ी वीरता के साथ लड़ाई में विजय पाई | अर्थात् गाय के चीत्कार को सुनकर वसिष्ठजी की ओर से असख्य शबर पुलिन्दादी लड़ाई के लिए निकल पड़े और उन लोगो ने विव्श्रमित्रजी की सेवा का नाश के दिया | यहा यह ध्यान रहे कि जिन पुलिन्द, शबर, मेद प्रभृति जातियों को लेकर परशुराम आदि वीरो ने लड़ाई लड़ी थी, वे सब चाण्डाल जाति के ही भेद मने जाते है, अर्थात् प्लव, मातगादि चाण्डाल कहे जाते है | इसी के बाद फिर आया है कि किरात, शबर, पुलिन्द, ये तीन मलिन जतियाँ भी चाण्डाल के ही भेद है--------|

“भेदा: किरातशबरपुलिन्दा म्लेच्छजातय: |” अम. शूद्रवर्ग १९-२० |

अब यहा पर यह विचरता चाहिए की उस अवसर पर इन्हे अस्पृश्य माना जाता तो कब सम्भव था कि वे लोग परशुराम आदि का साथ देते या स्पर्शदोष को मानकर भी सेना का संचालन कर लेते, एव पुलिन्दादि से क्षत्रिय लोग लडने आते ? इत्यादि | इसी प्रकार रथयात्रादि जैसे देवोत्सवो में भी अन्त्यज आदि सनातनधर्म शूद्र भाइयो के शामिल होने में कोई दोष नहीं समझा गया है | रथयात्रा के विषय को लेकर ही पद्मपुराण में आया है कि रथ में बैठे हुए पुरुषोत्तम भगवान् और बलभद्र, सुभद्रा और देवो को जो पुरुष देखता है वः विष्णुलोकवासी होता है और मुक्त हो जाता है | इसके बाद आया है की रथयात्रा में द्विजादि लोग स्तोत्र-पाठ करते हुए जाते है और सूतमाग्ध प्रभृति लोग कृष्ण की कीर्ति गाते हुए जाते है | फिर आया है कि रथयात्रा के समय जो लोग भगवान् को प्रणाम करते है वे मुक्त हो जाते है, जो लोग पीछे-पीछे चलते है, वे देवता के समान शरीर वाले होते है, और जो लोग जय शब्द करते, नाचते और गाते हुए जाते है वे लोग उत्तम वैष्णवों के संसर्ग के कर्ण मुक्त हो जाते है | ये सब स्पष्ट वाक्य है | इनमे संकोच करने का कोई कारण नहीं है | अत: इन वचनों के अनुसार कम-से-कम साधारण रीति से अन्त्यजादि सभी जाति के सनातनधर्मियो को रथयात्रा जैसे साधारण देवोत्सवो में शामिल होने का अधिकार शास्त्र से प्राप्त है |

अन्त्यजो कस विधाधिकार

विधा के बिना किसी देश या जाती की उन्नति असम्भव है | अन्यजो में जो कुछ भी त्रुटि समझी जाती है , उसका सबसे प्रबल कारण उनमे विधा-प्रचार की कमी है | शास्त्रों में विधा के अनेक भेद है | परन्तु यहा पर विधा का अभिप्राय लिपि बोध द्वारा स्कुल में शिक्षा ग्रहण करना है | इसकी भी अधिकार अन्त्यज भाइयो को पूर्णतया प्राप्त है | सुख है कि अभी तक इस बात का विशेष प्रबन्ध नहीं हो सका | समाज में धर्म की विपरित बावना ने ऐसा कुप्रभाव जमा रक्खा है कि कुछ लोगो ने इन भाइयो के स्कुल में पढने का विरोध किया है | और फलस्वरूप अन्यज भाइयो को कष्ट सहन करना पड़ा | इसके लिए मुझे बड़ा संताप है | धार्मिक भावना को लेकर जिनकी यह धारणा है कि अन्त्यजादि जाति को पढाना उचित है , उनको शास्त्रीय सिद्धान्तो का स्मरण करा देना अन्त्यजो की शिक्षा में उपकारी होना | इस पर पद्मपुराण और देवीपुराण के विधादान के प्रकरण में सर्वोत्तम विस्तृत वर्णन मिलता है | उसमे से परम सारभूत और सर्वोपकारी कुछ वचन ये है ------

विधादानात् परं दान न भूत न भविष्यति |
येन दत्तेन चत्नोति शिवं परम कारणम् |
विधा च श्रूयते लोके सर्वधर्म्मप्रदायिका |
तस्माद्विधा सदा देया पण्डितैधार्मिकैव्र्दिजै: |
पद्मोत्तर खं. ११७ अ. |

अर्थात्, विधादान से बढ़कर प्र्म्दन न तो हुआ और न होगा | विधादान करने से मनुष्य परम कल्याण-स्वरूप शिवाजी को प्राप्त करता है | विधा सब धर्म को देने वाली कही जाती है | इस कर्ण धार्मिक द्विज पंण्दिजो को उचित है कि वे सदा विधा दे | इसी प्रकार देविपुराण में आया है कि विधा कुल की, जाती की , रूप की और पुरुष सम्बन्धी पात्रता की परवाह नहीं करती है | बल्कि जो कोई भी विधा पढ़े उसका उपकार ही करती है | यहा पर यह श्लोक बड़े गौरव का है------

अन्त्यजा अपि यां प्राप्य क्रीडन्ते ग्रहराक्षसै: |
सा विधा केन मीयेत यस्या: कोऽन्य: समोऽपि न ||

अर्थात् जिस विधा के प्रभाव से या विधा पढ़कर अन्त्यज भी चन्द्रसूर्यादि ग्रह और पराक्रमशील राक्षसों के साथ खेला करते है, और जिसके बराबर इस संसार में और कोई भी नहीं है, उस विधा की उपमा किससे दि जा सकती है | इस प्रकार शिक्षा देने के विषय में शिवधर्म में आया है ----

संस्कृतै: प्राकृतैर्वाक्यै: शिष्य चैवानुरूपत: |
देशभाषाधुपापैच्श्र बोधयेत् स गुरु: स्मृत: ||

अर्थात् गुरु व्ही है जो कि संस्कृत, प्राकृत और देशभाषा के द्वारा चाहे किसी प्रकार से भी शिष्य को बोध करा दे | बस इस विषय में इतना ही दिखाना सर्वसन्तोषजनकहोगा | इस पर उदारता के साथ शुद्ध हृदय से मनन करने की आवश्यकारी है कि ‘सर्वभूतहितेरत’ ॠषियो का आशय सदा उदार और सर्वउपकारी रहा | उन्होंने सब समय के उपयोगी विधान अपने अक्षय धर्मग्रन्थो में रख दिए है | उस पर भगवन् व्यासजी से जितना हो सकता है तो व्यासजी की दी हुई धार्मिक अमृत संजीवनी बूटी से | आगे भी यदि हमे धर्मपूर्वक जीवित रहना है तो व्यासजी के ही वचनामृत पीकर जीवित रह सकते है | उसके सिवा और कोई प्रबल शरण नहीं है | व्यासजी की दृष्टि में जैसे द्विजाति थे, उससे भी बढ़कर असमर्थ दीन अन्त्यजादि शूद्र भाई थे | उनको शायद हमसे भी अधिक इन भाइयो की रक्षा की चिंता थी | इसी प्रकार अन्त्यज भाई को भी शामिल कर रक्खा है | बस उनकी इस सूक्ष्म दृष्टि को पहचानना ही स्नात्न्धार्मिक के लिये परम कल्याणकारी होना | अन्त में व्यासजी की इस अमृत वाणी को स्मरण कर इस विषय को यही समाप्त करता हू |

येन येन प्रकारेण परेषामुपजीवनम् |
भविष्यति च तत्काय्र्य धीमता पुरुषेण हि ||
स्त्रियापि चैव तत्काय्र्य परोपकरणान्वितम् |
यदुकत्तं करुणासारै: सारं कि तदिहोच्यताम् |
धर्मार्थी मनुजो यच्श्र न स वार्यो महात्मभि: || स्कन्द पु.
श्री विव्श्रनाथ: प्रसीदतु || (काशी, चैत्र कृष्ण, संवत् १९९३)

अछूतोद्धार
मंत्र-महिमा

वेद सब धर्मों का मूल है- वेदोऽखिलो धर्ममूलम् महाभारत में लिखा है-

सत्यान्नास्ति परो धर्मो नानृतात्पातकं परम्।
न च वेदात्परं शास्त्रं नास्ति मातृसमो गुरु:।।

सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं, झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं, वेद से बड़ा कोई शास्त्र नहीं, माता के समान कोई गुरु नहीं।
यह बात सभी विद्धान् जानते हैं कि पृथ्वीमण्डल पर वेद के समान प्राचीन कोई ग्रन्थ नहीं है। वेद सब धर्मों का मूल है और वह जगत् के समस्त प्राणियों के हित के लिये है। यह विदित है कि वेद की चारों संहिताओं में एक-एक अक्षर के उच्चारण करने के उदात्त, अनुदात्त अथवा स्वरित स्वर नियत हैं। पूर्व काल में द्विजों की कन्याओं का उपनयन-संस्कार होता था और वेद उनको पढ़ाया जाता था। किन्तु वर्त्तमान कल्प में यह प्रथा बन्द कर दी गई और चिरप्रचलित मर्यादा के अनुसार विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य के साथ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष, इन छ: अंगों के साथ स्वरसंयुक्त वेद उन्हीं द्विजाति, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के बालकों को पढ़ाया जाता था, जिनका शास्त्र की रीति से उपनयन-संस्कार किया जाता था, और जिनको कठोर नियमों का पालन कराया जाता था। और न केवल शूद्रों को बल्कि ब्रह्मवादिनियों को छोड़कर सामान्यतया ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य स्त्रियों को भी वेद नहीं पढ़ाया जाता था। किन्तु ऋषियों को यह इष्ट था कि सब प्राणियों को वेद के उपदेश का लाभ प्राप्त हो। इसलिये ऋषियों ने वेदों का अर्थ लोकभाषा में प्रकाश करना अपना कर्त्तव्य समझा और महर्षि वेदव्यासजी ने लोकहित के लिये एक वेद को ऋक् यजु:, साम तथा अथर्व नाम चार विभागों में बाँटकर पीछे वेद का अर्थ अपने समय की लोकभाषा संस्कृत में ‘श्रीमन्महाभारत’ में सब प्राणियों के हित के लिये और विशेषकर स्त्री और शूद्र तथा उन और लोगों के लिये जिनको वेद नहीं पढ़ाया जाता था, बहुत उत्तम रूप में प्रकाशित किया। श्रीमद्भागवत में लिखा है कि द्वापर युग के आने पर महर्षि वेदव्यास ने दिव्यदृष्टि से वह बात विचारी जिससे चारों वर्णों और आश्रमों के प्राणियों का हित हो, और जैसा महाभारत ही में लिखा है-

तपसा ब्रह्मचर्य्येंण व्यस्य वेदं सनातनम्।
इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुत:|
लोकानां च हितार्थाय कारुण्यान्मुनिसत्तम:||

तपस्या से, ब्रह्मचर्य से, एक वेद को चार भाग में बांटकर सत्यवती के पुत्र मुनियों में श्रेष्ठ वेदव्यासजी ने दया के भाव से जगत के प्राणियों के हित के लिये यह महाभारत, नाम इतिहास रचा । भागवत में भी लिखा है कि इस बात को सोचकर कि स्त्री शूद्र और अन्य जातियों के प्राणियों को, जिनको वेद सुनने में नहीं आता, अपने धर्मकर्म का ज्ञान इसी प्रकार से लोकभाषा के द्वारा हो। इस दया के भाव से महामुनि ने भारत की कथा लिखी।
उसी भागवत में दूसरे स्थल पर स्वयं वेदव्यास भगवान् का वचन है कि मैंने व्रत लेकर महाभारत के नाम से वेद का अर्थ भी प्रकाश कर दिया, जिसमें स्त्री शूद्रादि भी सब लोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पदार्थो का उपदेश प्राप्त कर सकते हैं | महाभारत, भागवत, विष्णुपुराण, शिवपुराण तथा अन्य पुराणों में वेद का अर्थ विपुलता के साथ लिखा गया है। इसके अनेक उदाहरण हैं, किन्तु इसका एक बहुत उज्जवल उदाहरण विष्णुपुराण में है। वेदों में पुरुषसूक्त प्रसिद्ध है | प्रायः प्रत्येक विद्वान् ब्राह्मण को वह कण्ठ रहता है। वह पुरुषसूक्त थोड़ा ही बदल और घटा-बढ़ाकर विष्णुपुराण में पूरा दिया हुआ है। उसमें का प्रधान अंश नीचे लिखते हैं-

सहस्त्रशिर्षा पुरुष: सहस्त्राक्ष: सहस्त्रपात्।
सर्वव्यापी भुव: स्पर्शादत्यतिष्ठद्दशान्गुलम्।
यद्भूतं यच्च वै भाव्यं पुरुषोत्तम तद्भवान्।।
त्त्वत्तो विराट् स्वराट् सम्राट् त्त्वत्तश्चाप्यधिपूरुष:|
अत्यरिच्यत सोऽधश्च तिर्यक् चोर्ध्वं च वै भुव:||
त्त्वत्तो विश्वमिदं जातं त्त्वत्तो भूत भविष्यती।
त्त्वद्रूप धारिणश्चान्तर्भुतं सर्वमिदं जगत्।
त्त्वत्तो यज्ञ: सर्वहुत: पृषदाज्यं पशुर्द्विधा||
त्त्वत्तो ऋचोऽथ सामानि त्त्वत्तश्छन्दांसि जज्ञिरे।
त्त्वत्तो यजूंष्यजायन्त त्त्वत्तोऽश्वाश्चाकतोदत:|
गावस्त्त्वत्त: समुद्भुतास्त्त्वत्तोऽजा अवयो मृगा:||
त्त्वन्मुखाद्ब्राह्मणास्त्त्वत्तो बाह्यो: क्षत्रमजायत|
वैश्यास्तवोरुजा: शूद्रास्तव पद्भयां समुद्गता:||
अक्ष्णो: सूर्योऽनिल: श्रोत्राच्चन्द्रमा मनसस्तव|
प्राणेन सुषिराज्जातो मुखादग्निरजायत|
नाभितो गगनं ध्योश्च शिरस: समवर्तत।
दिश: श्रोत्रात् क्षिति: पद्भयां त्त्वत्त: सर्वमभूदिदम्||
व्यक्त प्रधान पुरुष! विराट् सम्राट् स्वराट् तथा।
विभाव्यतेऽन्त: करणै: पुरुषेष्वक्षयो भवान्||
सर्वस्मिन् सर्वभूतस्त्त्वं सर्व: सर्वस्वरूप धृक्|
सर्वं त्त्वत्तस्ततश्च त्तवं नम: सर्वात्मनेऽस्तुते।।

इसी रीति से प्राणियों के हित में निरत ऋषियों ने सम्पूर्ण वेद का अर्थ उस समय की प्रचलित सरल लोकभाषा संस्कृत में लिखकर जगत का असीम उपकार किया|

इतिहास-पुराण वेद के समान हैं।

इसी कारण वाल्मीकीय रामायण और महाभारत तथा भागवत आदि पुराणों को पाँचवाँ वेद कहते हैं। छान्दोग्य-उपनिषद् में लिखा है- ‘ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा आथर्वणवेद चार वेद और इतिहास-पुराण पाँचवाँ वेद हैं। भागवत में भी लिखा है- "इतिहासपुराणं च पंचमो वेद उच्यते”। ‘इतिहास-पुराण को पाँचवाँ वेद कहते हैं”। महाभारत के विषय में उसी में ऋषियों का वचन है कि यह कृष्ण द्वैपायन व्यास-रचित वेद है और उन्होंने इसको 'नाना शास्त्रोपबृंहिता’, 'वेदैश्चतुर्भि संयुक्ता' , 'पुण्या' ‘पाप भयापहा' , ‘ब्राह्मी संहिता' अर्थात् अनेक शास्त्रों से बढाई गई, चारों वेदों के अर्थ से युक्त, पुण्य बढाने वाली, पाप और भय को दूर करने वाली ब्राह्मी (वेद की) संहिता कहकर वर्णन किया है।

इसी प्रकार भागवत के विषय में लिखा है कि उसमें श्लोक-श्लोक में पद-पद में वेद का अर्थ भरा है। पुराणों में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि पुराण चारों वर्णों के लिये कल्याणकारी हैं, किन्तु स्त्री और शूद्रों के लिये विशेषकर मंगलकारी हैँ, भविष्यपुराण में लिखा है कि राजा शतानीक ने सुमन्तु ऋषि से पूछा कि महाराजा! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों के लिये तो वेद, वेदांग और मनु आदि धर्मशास्त्र प्राप्त हैं। दीन शूद्र लोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन कैसे करें ? इनके चतुर्वर्ग के पाने के लिये तथा चारों वर्णों के कल्याणा के लिये कौन से शास्त्र हैं? यह आप मुझे बताइए। इसके उत्तर में सुमन्तु ऋषि ने कहा-

साधु साधु महाबाहो श्रृणु मे परमं वच:। चतुर्णामपि वर्णानां यानि प्रोक्तानि श्रेयसे।।
धर्मशास्त्राणि राजेन्द्र श्रृणु तानि नृपोत्तम।
विशेषतस्तु शूद्राणां पावनानि मनीषिभि:।।
अष्टादश पुराणानि चरितं राघवस्य च|
रामस्य कुरु शार्दूल धर्मकामार्थसिद्धये।।
तथोक्तं भारतं वीरे पाराशर्येंण धीमता।
वेदार्थं सकलं योज्य धर्मशास्त्राणि च ग्रंभो।।
कृपालुना कृतं शास्त्रं चतुर्णामिह श्रेयसे|
वर्णानां भव मग्नानां कृतं पोतो ह्यनुत्तमम्||

हे महाबाहो! आपने अच्छा पूछा-आप मेरे सबसे उत्तम वचन को सुनिए |
जो चारों वर्णों के कल्याण के लिये धर्मशास्त्र कहे गए हैं, और विशेषकर जो शूद्रों को पवित्र करने वाले हैं, उनको सुनिए। सब वर्णों के धर्म, अर्थ तथा काम की सिद्धि के लिये अठारहों पुराण और रामायण लिखे गए और इसी प्रकार सब वेदों के अर्थ और धर्मशास्त्र को मिलाकर वेदव्यासजी ने महाभारत को रचा। वे कृपालु थे। उन्होंने चारों वर्णों के प्राणियों के कल्याण के लिये यह शास्त्र लिखा। चारों वर्णों के जों लोग संसार-सागर में गोता खा रहे हैं, उनके लिये उन महर्षि ने सबसे उत्तम यह नौका रच दी।

इन वचनों से स्पष्ट है कि- इन ग्रन्थों के पढ़ने का सबको अधिकार है। तथापि कुछ विद्धानों को यह भ्रम है कि स्त्रियों और शूद्रों को इन ग्रन्थों के पढने का अधिकार नहीं है, केवल सुनने का अधिकार है। यह भ्रम सर्वथा शास्त्र-विरुद्ध है। वाल्मीकीय रामायण में जिसको ‘वेदैश्च सम्मितं’ वेदों के बराबर मानते हैं, आदि के अध्याय में लिखा है-

पठन् द्विजो वागृषभत्त्वमीयात्। स्यात्क्षत्रियो भूमि पतित्त्वमीयात्।।
वणिग्जन: पुण्य फलत्तवमीयात्। जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात्।।

कि उसको पढ़ने वाला ब्राह्मण बोलने वालों में श्रेष्ठ होता है, क्षत्रिय भूमिका स्वामी होता है, वैश्य व्यापार में लाभ उठाता है और शूद्र भी बड़प्पन पाता है। ऐसा ही रामायण के अन्त में भी लिखा है-

एतदाख्यानमायुषयं पठन् रमायणं नर:|
सपुत्रपौत्रो लोकेऽस्मिन् प्रेत्य चेह महीयते।।

जो प्राणी इस रामायण की कथा को पढ़ता है वह इस लोक में पुत्र, पौत्र और सुख तथा परलोक में आदर पाता है। महाभारत के भी पहले ही अध्याय के अन्त में लिखा है कि जो कोई पवित्र होकर श्रद्धा-भक्ति-सहित इस अध्याय को पढ़े वा सुने वह यहॉ दीर्घायु और कीर्त्ति तथा अन्त में स्वर्ग को पावेगा और अन्त के पर्व में भी लिखा है कि जो कोई सावधान होकर इस भारत की कथा को पढ़ेगा वह नि:सन्देह सबसे बड़ी सिद्धि को पहुँचेगा।

महाभारत के शान्तिपर्व में विष्णु-सहस्त्र-नाम के अन्त में स्पष्ट कह दिया है कि जो मनुष्य इसको सुने और जो इसका पाठ करे उसका इस लोक में और परलोक में भी कोई अमंगल नहीं होगा।

वेदान्तगो ब्राह्मण: स्यात् क्षत्रियो विजयी भवेत्। वैश्यो धन समृद्ध: स्याच्छूद्र: सुखमवाप्नुयात्। अर्थात् ब्राह्मण सुने या पढ़े तो वेदान्त का जानने वाला हो। क्षत्रिय सुने या पढ़े तो विजयी हो । वैश्य सुने या पढ़े तो धनसम्पन्न हो। शूद्र सुने या पढ़े तो सुख पावे। भगवद्गीता के अन्त में भगवान् ने अपने श्रीमुख से अर्जुन से कहा है कि जो कोई मुझमें भक्ति कर मेरे भक्तों के बिच में इसको सूनवेगा और जो कोई मेरे और तुम्हारे इस धर्मयुक्त संवाद को पढ़ेगा, उसने ज्ञानयज्ञ से मेरी पूजा की, ऐसा मैं मानता हूँ | भगवद्गीता के माहात्म्य में भी लिखा है कि इस गीताशास्त्र को जो कोई पुरुष पवित्र होकर पढ़ेगा वह भय और शोक से रहित होकर विष्णुपद को पहुँचेगा। भीष्मस्तवराज के अन्त में लिखा है कि जो इस स्तोत्र को पढ़ेगा या सुनेगा वह सब पाप से मुक्त होकर देहत्याग करने पर विष्णु भगवान् में मिल जायगा। अनुशासनपर्व में शिव-सहस्त्र-नाम के अन्त में भगवान् कृष्ण का वचन है कि जो इन्द्रियों को वश में रखकर पवित्र होकर बिना व्रत भंग किए नियम से एक महीना इस स्तोत्र का पाठ करेगा वह अश्वमेध यज्ञ का फल पावेगा। और वहीं पर यह भी लिखा है कि- वेदान् कृत्स्नान् ब्राह्मण: प्राप्नुयात्तु ज्येन्नृप: पार्थ महीं च कृत्स्नाम्। वैश्यो लाभं प्राप्नुयान्नैपुणं च शुद्रो गति प्रेत्य तथा सुखं च।। अर्थात् ब्राह्मण पाठ करे तो सब वेदों का ज्ञान पावे, क्षत्रिय करे तो पृथ्वी को जीते, वैश्य करे तो लाभ और निपुणाई पावे। शूद्र करे तो यहॉ और परलोक में सुगति पावे। श्रीमद्भागवत में लिखा है- विप्रोऽधीत्याऽऽप्नुयात्प्रज्ञां राजन्यो दधि मेखलाम्| वैश्यो निधिपतित्त्वं च शुद्र: शुद्धयेत पातकात्।। अर्थात् ब्राह्मण भागवत् पढ़े तो बुद्धि पावे, क्षत्रिय पढ़े तो सागरपर्यन्त पृथ्वी पावे, वैश्य पढ़े तो बहुत धन पावे, शुद्र पढे तो पाप से शुद्ध हो जाय| इसी प्रकार से विष्णुपुराण, नारदीयपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण, मार्कण्डेयपुराण, वायुपुराण, ब्रह्मपुराण, अग्निपुराण और पदमपुराण में स्पष्ट लिखा है कि जो मनुष्य उनको पढ़े या सुने वह सुख, सम्पत्ति, दीर्घायु, विजय, भक्ति आदि पाता है। इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, पुरुष और स्त्री सबको पुराणों को पढ़ने का अधिकार है। किसी-किसी पुराण में कहीं-कहीं पर यह लिखा है कि इस कथा या अध्याय को द्विजों को सुनावें। इससे कुछ विद्वानों का यह मत है कि उन अंशों को पढ़ने का अधिकार द्विजों ही को है, और अन्य लोगों के लिये वे अंश निषिद्ध हैं | किन्तु ऐसे अंश बहुत थोड़े हैं। अन्त्यजों को भी इन ग्रन्थों के पढ़ने का अधिकार है। मनुजी के वचन के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ये तीन वर्ण द्विजाति कहे जाते हैं। चौथा शुद्र वर्ण एक जाति है। पाँचवाँ वर्ण नहीं है। उन्हीं मनुजी के अनुसार ‘शूद्राणां तु सधर्माण: सर्वेऽपध्वंसजा: स्मृता:” इसकी टीका में मेधा तिथि लिखते हैं कि- 'ये पुनरपध्वंसजा: संकरजास्ते शूद्राणां सधर्माण: समानाचारास्तद्धर्मैरधिक्रियन्त इत्यर्थ:। अर्थात् जो प्रतिलोम संकर जाति के लोग चाण्डाल आदि हैं वे शूद्र के सधर्मा हैं, अर्थात जो धर्म शूद्रों का है वही धर्म उनका है। इससे यह सिद्ध होता है कि जैसा शूद्रों को इतिहास पढ़ने तथा सुनने का अधिकार है, वैसा ही सब अपध्वंसजों को, जिनमें अन्त्यज तक हैं, इतिहास-पुराण पढ़ने सुनने का अधिकार है | इसका सारांश यह निकलता है कि जिस मनुष्य को -पुरुष हो वा स्त्री और किसी वर्ण वा जाति का - वेदार्थ से भूषित पुराणों के पढ़ने की श्रद्धा और भक्ति हो, वह उनको पढ़ने का अधिकारी है। स्त्री शूद्रों को ॐकार सहित मंत्रों के उच्चारण का अधिकार है। यदि पुर्वोद्धत वचनों से यह सिद्ध है कि स्त्री शूद्रों को पुराणों के पढ़ने का अधिकार है तो यह भी आप ही सिद्ध है कि उन पुराणों के अन्तर्गत मन्त्रों के उच्चारण करने का उनको अधिकार है। पुराणों में जो अनेक मंत्र आए हैं उनका आरम्भ ॐकार से होता है| इसलिये सब पुराण के पढ़ने के अधिकारियों को ॐकार सहित मंत्रों के उच्चारण करने का अधिकार है | इसमें भी पुराण ही प्रणाम हैं| विष्णु-सहस्त्रनाम के पढ़ने का शूद्रों का अधिकार है| यह उसी के अन्त में स्पष्ट लिखा है| उसको वेदव्यासजी ने 'सर्वप्रहरणायुध ओऽमिति’ इन शब्दों मे समाप्त किया है| श्रीमद्भागवत के पढ़ने का शूद्रों को अधिकार है| उसमें आदि के अन्त तक ॐकार सहित अनेक मंत्र भरे हैं| प्रायः सब स्कन्धों के प्रारम्भ में 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ यह मंत्र गर्जता है| पाँचवें स्कन्ध में अनेक ॐकार सहित मंत्र है। ‘ॐ नमो भगवते उत्तम श्लोकाय' इत्यादि। छठें स्कन्ध में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ ‘ॐ नमो नारायणाय’ ये दोनों मंत्र नारायण कवच मे आए हैं। उसी स्कन्ध में ‘ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने विशुद्ध सत्त्वधिष्णाय महाहंसाय धीमहि' यह मंत्र आया है। उसी स्कन्ध में स्त्रियों के पुंसवन व्रतविधान में लिखा है कि जिस स्त्री को अच्छे पुत्र पाने की कामना हो वह पति की आज्ञा लेकर पुंसवन व्रत करे और प्रतिदिन नहाकर लक्ष्मी सहित विष्णु की पूजा इस मंत्र से करे- ‘ॐनमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभुतिभिर वलिमुपहरामि’ इति, और ‘ॐ नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूति पतये स्वाहा’ इस मंत्र से आहुति दे। आठवें स्कन्ध में भगवान् कश्यप ने पयोव्रत के विधान में अदिति देवी को उपदेश किया कि स्त्री 'ॐ नमो नारायणाय' इस मूल मंत्र से होम करे। पद्मपुराण में वासुदेवाभिधान नाम स्तोत्र है, जिसमें 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मंत्र की महिमा वर्णित है। उसमें लिखा है कि उस स्तोत्र को जो ब्राह्मण पढ़ेगा उसकी सब इच्छाएँ पूरी होंगी, क्षत्रिय पढ़ेगा तो जय पावेगा, वैश्य पढ़ेगा तो धनधान्य से पूरा होगा और शूद्र पढ़ेगा तो सुख पावेगा। विष्णु धर्मोत्तर में द्विजों को वैदिक पुरुषसूक्त और श्रीसूक्त से हवन करने की विधि बतला कर लिखा है- एतत्प्रोक्तं द्विजातीनां स्त्रीशूद्रेषु च यच्छृणु। द्वादशाष्टाक्षरौ मंत्रौ तेषांप्रोक्तौ महात्मनाम्।। हितौ तौ च द्विजातीनां मंत्रश्रेष्ठौ नराधिप| तेभ्योप्यधिक मंत्रोऽपि विद्यते न हि कुत्रचित्।। अर्थात् यह वैदिक विधि तो द्विजातियों के लिये कही। अब स्त्रियों और शूद्रों के लिये जो विधि है वह सुनो। उनके लिये द्धादशाक्षर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और अष्टाक्षर 'ॐ नमो नाराणाय’ ये मंत्र गहे गये हैं| हे राजन्! ये मंत्र द्विजातियों के लिए भी कल्याणकारी है, अर्थात् चारों वर्णों को इन मंत्रो को जपना चाहिए | इससे बड़ा कोई मंत्र नहीं हैं। ब्रह्मपुराण में विष्णु पूजनविधि नाम के एकसठवें अध्याय में लिखा है- ॐकरादिसमायुक्तं नमस्कारान्तदीपितम्। तन्नाम सर्वसत्त्वानां मंत्र इत्यभिधीयते || ॐ नम: से युक्त परमात्मा के नाम जैसा ही 'ॐ नमो नारायणाय' प्राणी मात्र का मंत्र है | अर्थात् उसके जपने के सब अधिकारी हैं| उसी पुराण में उसी अध्याय में लिखा है कि जो लोग और किसी मंत्र से विष्णु की पूजा करना नहीं जानते वे ‘ॐ नमो नाराणाय’ इसी मूल मन्त्र से आवाहन ,स्नान, गन्ध, पुष्पादि षोडश उपचार से पूजन करें और इसी का जप करें| नृसिंहपुराण के बासठवें अध्याय में वैदिक पुरुषसूक्त से विष्णु की पूजा विधि वर्णित की गई है| उनको सुनकर राजा सहस्त्रानीक ने मार्कण्डेय ऋषि से कहा कि इस विधि से तो पूजा वे ही लोग कर सकते हैं जो वेद के जानने वाले हैं। इसलिये वह पूजा विधि बताइए जो सर्वहित हो, अर्थात् जिसके अनुसार सब प्राणी विष्णु का पूजन कर सकें। उसके उत्तर में मार्कण्डेयजी ने कहा- अष्टाक्षरेण मंत्रण नरसिंहमनामयम्। गन्धपुष्पादिभिर्नित्यमच्र्चयेदच्युतं नर:|| राजन्नष्टाक्षरो मंत्र: सर्वपापहर: पर:| समस्तयज्ञफलद: सर्वशान्तिकर: शुभ:|| मनुष्य 'ॐनमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर मंत्र से विष्णु भगवान् नरसिंह की पूजा करे। इसी से गन्ध पुष्पादि सोलहों उपचार से पूजन करे। हे राजन्! यह अष्टाक्षर मंत्र सब पापों का हरने वाला, सब यज्ञों के फल का देने वाला, सब दु:ख और दोष की शान्ति करने वाला है। उसी पुराण के अठारहवें अध्याय में शुकदेवजी के इस प्रश्न पर कि- कि जपन् मुच्यते तात सततं विष्णुतत्पर:| संसारदु:खात्सर्वेषां हिताय वद मे पित:|| हे पिताजी! विष्णु भगवान् का भक्त किस मंत्र को जपता हुआ संसार-सागर के दु:ख से छुटकारा पाता है। उत्तर में भगवान् वेदव्यासजी ने कहा है कि- अष्टाक्षरं प्रवक्ष्यामि मंत्राणां मंत्रमुत्तमम्। यं जपन् मुच्यते मर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात्|| एकान्ते निर्जनस्थाने विष्णवग्रे वा जलान्तिके। जपेदष्टाक्षरं मंत्रं चित्ते विष्णु विधाय वै।। अष्टाक्षर मंत्र सब मंत्रों में उत्तम है। कोई मनुष्य हो, जिसको एक दिन मरना अवश्य है, इसको जपकर जन्म और संसार के बंधन से छूट जाता है| एकान्त में, निर्जन स्थान में, विष्णु के आगे या नदी जलाशय के पास, भगवान् विष्णु को मन मन्दिर में बिठाकर इस मंत्र को जपे। ॐ नमोनारायणायेति मंत्र:सर्वार्थसाधक:| भक्तानां जपतां तात स्वर्गमोक्षफलप्रद:|| सर्ववेदरहस्येभ्य: सार एष समुद्धत:| विष्णुनां वैष्णवानां हि हिताय मनुजां पूरा|| एतत्सत्यं च धर्म्यं च वेद-श्रुति निदर्शनात्। एतत्सिद्धिकरं नृणां मंत्ररूपं न संशय:|| अष्टाक्षरमिमं मंत्रं सवंदु:खविनाशनम्। जप पुत्र महाबुद्धे यदि सिद्धिमभीप्ससि।। ‘ॐनमो नारायणाय' यह मंत्र सब कामनाओं को पूरा करने वाला है, भक्ति से जपने वालों को स्वर्ग और मोक्ष तक का देने वाला है। निश्चय करके वैष्णवों के और सब मनुष्यमात्र के लिये प्राचीन काल में भगवान् विष्णु ने सब वेदोपनिषदों में से दूध में से मक्खन की भाँति साररूप इस मंत्र को निकाला। यह मंत्र निश्चय करके मनुष्यमात्र के लिये सब दु:खों का नाश करने वाला हैं और सब सिद्धि का देनेवाला है। हे मेरे महाबुद्धिमान् पुत्र! यदि तुम सिद्धि चाहते हो तो इस मंत्र को जपो। ॐ नम: शिवाय इसी प्रकार ‘ॐ नम: शिवाय’ इस मंत्र को जिसको श्रद्धा हो, वह जपने का अधिकारी है। 'ॐ नम: शिवाय' यह छ: अक्षर का मंत्र है। इसी को लोक में पंचाक्षर कहते हैं। यह बात स्कन्दपुराण, शिवपुराण और लिन्गपुराण के वचनों से स्पष्ट है। स्कन्दपुराण में लिखा है- शैवं षडक्षरं दिव्यं मंत्रमाहुर्महर्षय:| देवानां परमो देवो यथा वै त्रिपुरान्तक:| मंत्राणां परमो मंत्रस्तथा शैव: षडक्षर:|| एष पंचाक्षरो मंत्रो जपतृणां मुक्तिदायक:| संसेव्यते मुनिश्रेष्ठैरशेषै: सिद्धिकांक्षिभि:|| भवपाशनिबद्धानां देहिनां हितकाम्यया। आहों नम: शिवायेति मंत्रमाद्य: शिव: स्वयम्।। मंत्रराजाधिराजोऽयं सर्ववेदान्तशेखर:| सर्वज्ञाननिधानं च सोऽयं चैव षडक्षर:|| तस्मात्सर्वप्रदो मंत्र: सोऽयं पंचाक्षर: स्मृत:| स्तभि: शूद्रैश्च संकीर्णैर्धार्यते मुक्तिकांक्षिभि:|| अर्थात् यह जो छ: अक्षरवाला शैव मंत्र है, उसको महर्षि लोग दिव्य मंत्र कहते हैं। जैसे देवताओं में सबसे बड़े देव त्रिपुरासुर को मारने वाले महादेव हैं, वैसे ही यह छ: अक्षर वाला शिवमंत्र सब मंत्रो से बड़ा है | यही पंचाक्षर मंत्र, अर्थात् लोक में पंचाक्षर नाम से प्रसिद्ध मंत्र जपने वालों को मुक्ति देनेवाला हैं। जो मुनिश्रेष्ठ सिद्धियों की आकांक्षा करते हैं, वे सब इसी मंत्र से उपासना करते हैं, संसार के फ़्राँस में जितने प्राणी बंधे हैं उनके लिये स्वयं आदिदेव महादेव ने 'ॐ नमः शिवाय’ इस मंत्र को अपने मुख से कहा। यह सब मंत्रों का राजाधिराज है, सब वेदान्त का शिरोमणि है, सब ज्ञान इसमें भरा हुआ है। वही यह छ: अक्षर वाला मंत्र है। इसलिये सब मनोरथों को पूरा करने वाले इस पंचाक्षर के नाम से प्रसिद्ध मंत्र को मुक्ति चाहने वाले सब स्त्री, शूद्र और संकर जाति के लोग जपते हैं। शिवपुराण में वायवीय संहिता के उत्तर भाग के ग्यारहवें अध्याय में शिवजी ने अपने श्रीमुख से शैव धर्म का उपदेश किया है। उसमें ब्राह्यण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यासी, सधवा और विधवा स्त्रियों को- अथ वक्ष्यामि देवेशि भक्तानामधिकारिणाम्। विदुषां द्विजमुख्यानां वर्णधर्मं समासत:|| इस श्लोक से आरम्भकर "इति संक्षेपत: प्रोक्तं ममाश्रमनिषेवणम् अर्थात् इस प्रकार से मैंने संक्षेप में मेरे आश्रमनिषेवण करने की विधि कही” यहाँ तक तेइस श्लोकों में सब वर्ण और आश्रमवालों का विशेष-विशेष धर्म अलग-अलग वर्णन कर उसके आगे उन सब वर्ण और आश्रमवालों का सामान्य धर्म नीचे लिखे श्लोकों में बताया है- ब्रह्मक्षत्रविशां देवि! यतीनां ब्रह्मचारिणाम्। तथैव वानप्रस्थानां गृहस्थानां च सुन्दरि|| शूद्राणामथ नारीणां घर्म एष सनातन:| ध्येयस्त्त्वयाहं देवेशि सदा जाप्य: षडक्षर:|| है देवि! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, यती, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ, शूद्र और स्त्री सबों का (सर्वमान्य) यह सनातनधर्म है कि तुम्हारी मूर्त्ति से युक्त मेरी मूर्त्ति का ध्यान किया करें और सदा 'ॐ नम: शिवाय' इस षडक्षर मंत्र का जप किया करें | शिवपुराण में उसी संहिता के बारहवें अध्याय में लिखा है कि भगवान् श्रीकृष्ण ने महर्षि उपमन्यु से कहा कि आप पंचाक्षर का माहात्म्य मुझे सुनाइये। इस पर उपमन्युजी बोले- पंचाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशातैरपि। अशक्यं विस्तराद्वक्तुं तस्मात्सन्क्षेपत: श्रृणु|| पंचाक्षर का माहात्म्य कोटि वर्ष में भी विस्तार के साथ कहना सम्भव नहीं है। इसलिये संक्षेप में सुनिये। वेदे शिवागमे चायमुभयत्र षडक्षर:। मंत्रस्थित: सदा मुख्यो लोके मंचाक्षर: स्मृत:।। सर्वमंत्राधिकश्चायमोन्काराद्य: षडक्षर:। सर्वेषां शिवभक्तानामशेषार्थ प्रसाधक:।। मंत्र सुखमुखोच्चार्यमशेषार्थ प्रसिद्धये| प्रार्होनम: शिवायेति सर्वज्ञ: सर्वदेहिनाम्|| अन्त्यजो वाऽधमो वाऽपि मूर्खे वा पण्डितोऽपि वा। पंचाक्षरजपे निष्ठो मुच्यते पापपंजरात्। इत्युक्तं परमेशेन दैव्या पृष्टेन शूलिना। हिताय सर्वमर्त्यानां तिष्यजानां विशेषत:|| वेद और शैव आगम दोनों में यह मंत्र छ: अक्षर का सदा से स्थित है और सब मंत्रों में मुख्य है। लोक में यही पंचाक्षर के नाम से प्रसिद्ध है। ॐकारयुक्त पूजा मंत्र सब मंत्रों में बड़ा हैं, और जिनको आदिदेव महादेव में भक्ति है, उनकी सब कामनाओं को पूरा करने वाला है। सर्वज्ञ शिवजी ने सब प्राणियों के सब अर्थो को सिद्धि के साधन ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र को, जिसको सब लोग सुख से उच्चारण कर सकते हैं, अपने श्रीमुख से कहा। अन्त्यज हो या नीच हो, मूर्ख हो या पण्डित हो, जो पंचाक्षर का जप नित्य श्रद्धा से करता है, वह पाप के पंजर से छूट जाता है। परमेश्वर शिवजी ने सब प्राणियों के हित के लिये विशेषकर कलियुग में उत्पन्न प्राणियों के हित के लिये पार्वती के पूछने पर ऊपर लिखा वचन कहा। शिव-पार्वती संवाद पार्वतीजी ने शिवजी से पूछा कि- कलौ कलुषिते काले दुर्जये दुरतिक्रमे। अपुण्यतमसाच्छन्ने लोके धर्मपरान्मुखे।। क्षीणे वर्णसमाचारे सन्करे समुपस्थिते। सर्वाधिकारे संदिग्धे निश्चिते वा विपर्यये।। तदोपदेशे विहते गुरूशिष्यक्रमें गते| केनोपायेन मुच्यन्ते भक्तास्तव महेश्वर|| कलियुग में विकराल काल के आने पर जब पापरूपी अन्धकार फैल जाय और लोग धर्म से विमुख हो जायं, जब वर्णाश्रम धर्म क्षीण हो जाय और वर्णसंकर बढ़ने लगे, जब सब लोगों को समी धर्म विषयों में सन्देह होने लगे, और गुरु और शिष्य के क्रम से उपदेश देने का क्रम न रहे तो महेश्वर! आपके भक्त किस उपाय से पाप से छूटते हैं? शिवजी बोले- आश्रित्य परमां विद्यां हृद्यां पंचाक्षरीं मम| भक्त्या च भावितात्मानो मुच्यन्ते कलिजा नरा:|| मनोवाक्कायजैर्दोषैर्वक्तुं स्मर्त्तुमगोचरै: दूषितानां कृत्घ्नानां निर्द्दयानां खलात्मनाम्।। लुब्धानां वक्रमनसामपि मत्प्रवणात्मनाम्। मम पंचाक्षरी विद्या संसारभयतारिणी।। मैयवमसकृद्देबि प्रतिज्ञातं धरातले। पतितोऽपि विमुच्येत मद्भक्तों विद्ययानया ।। इत्यादि। कलियुग में उत्पन्न प्राणी मेरी पंचाक्षरी विद्या का आश्रय लेकर, अर्थात् पंचाक्षर मंत्र को नित्य श्रद्धा से जपकर और मेरी भक्ति से अपनी आत्मा को पवित्र कर पाप से छूटते हैं। मन से, वचन से और काया से किए हुए ऐसे पापों से दूषित प्राणियों को जिन पापों को मुख से वर्णन करना और भी कठिन हो, और जो किए हुए उपकार को नहीं मानते, ऐसे कृतघ्नों को, दयारहित क्रूर प्राणियों को, और दुष्ट आत्माओं को, लोभियों को, और कुटिल मनवालों को भी, यदि वे मेरी ओर अपनी आत्मा को झुकावें तो मेरा पंचाक्षर मंत्र उनको संसार के सब डरों से छुडा देता है। हे देवि! मैंने पृथ्वीतल पर बार-बार प्रतिज्ञापूर्वक यह कहा है कि यदि पतित भी हो तो इस मंत्र के साधन से पाप से छूट जाता है। अरुद्रो वा सारुद्रो वा सकृत् पंचक्षरेण य:| पूजयेत् पतितो वापि मूढो वा मुच्यते नर:|| षडक्षरेण वा देवि तथा पंचाक्षरेण वा। सब्रह्माने्ण मां भक्त्या पूजयेत् यदि मुच्यते।। पतितोऽपतितो वापि मंत्रेणानेन पूजयेत्।। चाहे उसने विधि से शिवमंत्र का उपदेश लियो हो चाहे न लिया हो, पतित हो वा मूर्ख हो, जो एक बार भी श्रद्धा तथा भक्ति से पंचाक्षर मंत्र का जप करता है वह पाप से छूट जाता है। हे देवि! छ: अक्षर 'ॐ नम: शिवाय' से या पाँच अक्षर 'नम:शिवाय' से जो भक्ति से मेरा पूजन करे वह मुक्ति को पाता है। चाहे पतित हो या अपतित हो, सबको इस मंत्र से पूजन करना चाहिए। शिवजी ने कहा- किमत्र बहुनोक्तेन भक्ता: सर्वेऽधिकारिण:| मम पंचाक्षरे मंत्रे तस्माच्छेृष्टतरो हि स:|| अर्थात् इस विषय में बहुत कहने से क्या, जिन प्राणियों को मुझमें भक्ति है, वे सब इस पंचाक्षर मंत्र के जपने के अधिकारी हैं। इसीलिये यह सब मंत्रों में श्रेष्ठ है। हे देवि! यह रहस्य मैं तुमको बताता हूँ| इसको तुम रक्षित रखना। हर एक से इसको न कहना, विशेषकर किसी नास्तिक से न कहना। सदाचारविहीनस्य पतितस्यान्त्यजस्य च| पंचाक्षरात्परं नास्ति परित्राणं कलौ युगे।। अन्त्यजस्यापि मूर्खस्य मूढस्य पतितस्य च| निर्मर्यादस्य नीचस्य मंत्रोरऽयं न च निष्फल:।। सर्वावस्थां गतस्यापि मयि भक्तिमत: परम् | सिद्धयत्येव न सन्देहो नापरस्य तु कस्यचित्|| अर्थात् सदाचार से विहीन जो पतित है, अर्थात् घोर कुकर्म करने से या अपना धर्म छोड़कर किसी दूसरे मत को मान लेने के कारण जो धर्म से गिर गया है अथवा अन्त्यज (चाण्डाल आदि) है, उसका इस कलियुग में पंचाक्षर से परे कोई रक्षा करनेवाला नहीं। मूर्ख अन्त्यज भी हो और दुर्बुद्धि पतित भी हो, जो सब मर्यादा से गिर गया है और सब प्रकार से नीच है, वह भी इस मंत्र को जपे तो उसका इस मंत्र का जपना निष्फल नहीं जाता । किसी भी अवस्था में प्राणी हो, पर यदि उसकी मुझमें भक्ति है, तो उसका पंचाक्षर मंत्र जपना उसको सब पापों से छुड़ा देता है और वह सब सुख का साधन बन जाता है। उपमन्यु ऋषि ने श्रीकृष्ण भगवान् से कहा कि इस प्रकार से साक्षात् महादेवी पार्वतीजी से महादेव शिवजी ने सारे जगत् के हित के लिये इस पंचाक्षर मंत्र की विधि को कहा। लिन्गपुराण में भी पचासवें अध्याय में पार्वतीजी के पूछने पर शिवजी ने पंचाक्षर मंत्र की महिमा और उसका स्वरूप वर्णन किया है। श्री भगवानुवाच पंचाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतैरपि। न शक्यं कथितुं देवि तस्मात्सण्क्षेपत: श्रृणु।। पंचाक्षरप्रभावाच्च लोका वेदा महर्षय:| तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवा: सर्वमिदं जगत्।। तदिदानीं प्रवक्ष्यामि श्रृणु चावहिताऽखिलम्। अल्पाक्षरं महार्थं च वेदसारं विमुक्तिदम्।। आज्ञासिद्धमसदिग्धं वाक्यमेताच्छिवात्मकम्| नानासिद्धियुतं दिव्यं लोकचित्तानुरञ्जकम्।। सुनिश्चितार्थं गम्भीरं वाक्यमेतच्छिवात्मकम्। मंत्रं सुखमुखोच्चार्यमशेषार्थप्रसाधकम्|| तद्विजं सर्वविद्यानां मंत्रमाद्दं सुशोभनम्। अतिसूक्ष्मं महार्थं च ज्ञेयं तद्वदबीजवत्|| वेद स त्रिगुणातीत: सर्वज्ञ: सर्वकृत् प्रभु:| ओमित्येकाक्षरे मन्त्रे स्थित: सर्वगत: शिव:|| मन्त्रे षडक्षरे सूक्ष्मे पंचाक्षरतनु: शिव:| वाक्यवाचकभावेन स्थित: साक्षात्स्वभावत:|| वेदे शिवागमे वापि यत्र यत्र षडक्षर:| मंत्र: स्थित: सदा मुख्यो लोके पंचाक्षरो मत:|| किं तस्य बहुभिर्मन्त्रै: शास्त्रैर्वा बहुविस्तृतै:। यस्यैवं हृदि संस्थोऽयं मंत्र: स्यात् पारमेश्वर:|| तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्टितम्। यो विद्वान् वै जपेत् सम्यगधीत्यैव विधानत:|| एतावधि शिवज्ञानमेतावत् परमं पदम्| एतावद्वब्रह्मविद्या च तस्मान्नित्यं जपेद्बुध:|| लिंगपुराण में लिखा है कि शिवजी ने अपने श्रीमुख से पार्वतीजी से कहा कि जिस पंचाक्षर विद्या का माहात्म्य तुम मुझसे पूछती हो वह वेद में भी और शैव आग्रम में भी, दोनों ही स्थानों मे षडक्षर, छ: अक्षर का मंत्र है। लोक में लोग उसको पंचाक्षर के नाम से कहते हैं। और यह भी कहा है कि- पंचाक्षरै: सप्रणवो मंत्रोऽयं हृदयं मम| गुह्याद्ह्यतरं साक्षान्मोक्षज्ञानमनुत्तमम्।। ॐकार सहित पाँच अक्षरों से युक्त यह मंत्र मेरा हृदय है। सब गुह्य अर्थात् बहुत जतन से रक्षित रखने योग्य वस्तुओं से भी अनमोल है, और साक्षात् मोक्ष का देने वाला है। आगे चलकर भगवान् शिवजी ने मंत्र का विनियोग बताने में स्पष्ट ‘ॐ नम:शिवाय' के ओंकार से आरम्भ कर मकार तक एक-एक अक्षर का ऋषि, छन्द, स्वर आदि अलग-अलग बताया है। इससे अधिक इस बात का प्रमाण क्या हो सकता है कि जिसको लोग पंचाक्षर मंत्र कहते हैं, वह षडक्षर अर्थात् छ: अक्षर का मंत्र है। शिवपुराण, स्कन्दपुराण, लिन्गपुराण तीनों ही शैवपुराण एक स्वर से कहते हैं कि पंचाक्षर नामक मंत्र का रूप 'ॐ नम: शिवाय' ही है। तीनों ही कहते हैं कि शिवजी ने मनुष्यमात्र के हित के लिये 'ॐ नम: शिवाय' इस मंत्र को अपने श्रीमुख से कहा और पार्वतीजी से यह कहा कि कोई भी प्राणी हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज़, पतित, पुरुष या स्त्री, जो इस मंत्र को जपे उसका यह कल्याण करेगा। ‘षडक्षरेण वा देवि तथा पंचाक्षरेण वा’ चाहे 'ॐ नम: शिवाय’ इन छ: अक्षरों से जपे चाहे 'नम: शिवाय' इन पाँच अक्षरों से जपे, इससे यह स्पष्ट है कि श्रुतिस्मृति-पुराण-प्रतिपादित सनातनधर्म के अनुसार श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल पर्यन्त सब मनुष्यों को जिनकी परमेश्वर में भक्ति हो 'ॐ नमो नारायणाय' और "ॐ नम: शिवाय' इन मंत्रों के जपने का और इनके द्धारा ईश्वर की उपासना करने का पूरा अधिकार है। नित्य की उपासना ध्येय: सदा सवितृमण्डलमध्यवर्त्ती। नारायण: सरसिजासनसन्निविष्ट:|| प्रतिदिन सूर्य के उदय और अस्त होने के समय प्रत्येक पुरुष और स्त्री को प्रातःकाल स्नानकर और सायंकाल हाथ, मुँह, पैर धोकर सूर्य के सामने खड़े होकर सूर्यमण्डल में विराजमान सारे जगत् के प्राणियों के आधार परमेश्वर परब्रह्म नारायण को 'ॐ नमो नारायणाय' इस मंत्र से अर्ध्य देकर और जल न मिले तो यों ही हाथ जोड़कर मन को पवित्र और एकाग्र कर श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक एकसौ अठाइस या कम-से-कम दस बार प्रात:काल ‘ॐ नमो नारायणाय' इस मंत्र को सायंकाल ‘ॐ नम शिवाय’ इस मंत्र को जपना चाहिए और जप के उपरांत परमात्मा का ध्यान कर नीचे लिखी प्रार्थना करनी चाहिए| ॐ नमो नारायणाय सब देवन के देव प्रभु सब जगके आधार| दृढ राखौ मोहि धर्मं में बिनवौं बारम्बार|| चन्दा सूरज तुम रचे रचे सकल संसार| दृढ़ राखौ मोहि सत्यमें बिनवौं बारम्बार|| घट-घट तुम प्रभु एक अज अविनाशी अविकार| अभयदान मोहि दीजिए बिनवौं बारम्बार|| मेरे मन मन्दिर बसौं करौ ताहि उजियार| ज्ञान-भक्ति प्रभु दीजिए बिनवौं बारम्बार|| सत-चित-आनन्द-घन प्रभु सर्व-शक्ति-आधार| धनबल जनबल धर्मबल दीजै सुख संसार|| पतित-उधारन दुखहरन दीन-बन्धु करतार| हरहु अशुभ शुभ दृढ़ करहु बिनवौं बारम्बार|| जिमि राखे प्रह्लाद को ले नृसिंह अवतार| तिमि राखौ अशरण-शरण बिनवौं बारम्बार|| पाप दीनता, दरिद्रता और दासता पाप| प्रभु दीजै स्वाधीनता मिटै सकल सन्ताप|| नहिं लालचबस लोभबस नाहीं डरबस नाथ| तजौं धरम वर दीजिए रहिय सदा मम साथ|| जाके मन प्रभु तुम बसौं सो डर कासों खाय| सिर जावे तो जाय प्रभु मेरो धरम न जाय|| उठौं धर्म के काम में उठौं देश के काज| दीनबन्धु तब नाम लै नाथ राखियो लाज|| सनातनधर्म की रक्षा और प्रचार चाहनेवाले समस्त सत्पुरुष और सत्स्त्रियों से विनयपूर्वक मेरी प्रार्थना है कि जो लोग वैदिक दीक्षा पा चुके हैं, उनको भी इन सार्वजनिक मंत्रों का जप करना चाहिए, और प्रत्येक हिन्दू सन्तान को इन परम कल्याणकारी मंत्रों की दीक्षा लेकर तथा अपने और सब भाई और बहनों को दिलाकर अपना और उनका धार्मिक जीवन पवित्र और प्रकाशमय करना चाहिए, जिससे धर्म में उनकी श्रद्धा बढ़े और दृढ रहे, वे अपने देश और समाज में सुख, सन्मान और स्वतंत्रता से रहें, तथा दिन-दिन ऊपर उठें और संसार के अन्य मतों के माननेवाली जातियों की दृष्टि में भी सम्मान के योग्य हों। इससे हमारी आत्मा भी प्रसन्न होगी और सारे जगत् का पिता, सबका सुहृद्, सबको शरण देनेवाला, घट-घट व्यापी परमात्मा भी प्रसन्न होगा। ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:। (प्रयाग, माघ कृष्ण ११ संवत् १९८६)

गोरक्षा के साधन
दूध-उत्पादन में वृद्धि की आवश्यकता

भारत-सरकार द्वारा दूध के व्यवसाय पर हाल की प्रकाशित रिपोर्ट में हम यह पढ़ते हैं- ‘मनुष्य के भोजन में दूध का व्यवहार तभी से चला आता है, जब से मानव इस जगत् में आया है। जितने ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जो अकेले आहार के काम में आ सकते हैं, दूध सबसे अधिक पूर्ण है। इसलिये वह सदा बड़ा आदरणीय समझा जाता रहा है। इसके अन्दर जीवन को स्थिर रखने तथा बढ़ाने के लिये आवश्यक सभी तत्व सुपाच्य रूप में विद्यमान हैं, आज तक किसी ऐसे दूसरे स्वतन्त्र आहार का पता नहीं चला, जिसका प्रयोग दूध के स्थान पर किया जा सके।’

उसी रिपोर्ट के अन्तर्गत ‘दूध के उत्पादन को बढ़ाने की सम्भावनाएँ’ शीर्षक में लिखा है- 'उचित भोजन और व्यवस्था के द्वारा भारतीय पशुओं के दूध का उत्पादन जल्दी ही पचास प्रतिशत के लगभग बढ़ाया जा सकता है। इस कथन की पुष्टि इस बात से होती है कि देहाती गायें जब सरकारी फार्मों में लायी जाती हैं तो आगे के ब्यानों में पहले की अपेक्षा साठ प्रतिशत अधिक दूध देती हैं। इन गायों की पहली सन्तानों के दूध में उनकी माताओं की अपेक्षा भी दस-से-पंद्रह प्रतिशत तक और अधिक वृद्धि देखी जाती है। गाँवों में गौएँ अधिक समय तक दूध नहीं देतीं, छुटी रहती हैं; फार्मों में पहुँच जाने पर उनके छूटे रहने का समय भी बहुत घट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उसी अनुपात में दूध के उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है। इन आशाजनक लक्षणों से तथा इस बात से कि गौओं के बहुत से टोलों के दूध का उत्पादन बीस वर्ष से कम में वस्तुत: तिगुना हो गया है, यह बात सूचित होती है कि भारतीय गौओं को यदि अच्छा भोजन दिया जाय, चुने हुए साँड़ों से उन्हें गाभिन कराया जाय तथा उन्हें रखने का उचित प्रबन्ध हो तो उनका दूध बहुत अधिक बढ़ जाता है।’

प्रति व्यक्ति दूध की खपत

किसी समय इस देश में दूध बहुत अधिक मात्रा में मिलता था। किन्तु अब यह सोचकर बड़ा खेद होता है कि मनुष्य के आहार के ऐसे आवश्यक पदार्थ की खपत प्रति व्यक्ति इस देश में शायद अन्य सभी सभ्य देशों की अपेक्षा कम है। भारत के पशु-व्यवसाय की वृद्धि तथा भारत में दूध के व्यवसाय के सम्बन्ध में प्रकाशित हुई रिपोर्टें में अनेक परामर्श दिये गये हैं, जो विचार करने योग्य हैं तथा जिन्हें ऐसे परिवर्तनों के साथ जो स्थानीय परिस्थिति के अनुसार आवश्यक हों व्यवहार में लाना चाहिये।

‘भारत के दूध-व्यवसाय' पर जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है- "व्यवसाय की दृष्टि से दूध तथा दूध से बने हुए पदार्थों को माँग केवल शहरों में ही अधिक हैं।

यद्यपि दूध देने वाले पशुओं में पंचानबे प्रतिशत से अधिक गाँवों में ही पाये जाते हैं तथा भारत की नब्बे प्रतिशत से अधिक जनता गाँवों में रहती है, तो भी गाँवों मे दूध के ग्राहक अधिक नहीं हैं। इसके कई करणों में एक तो यह है कि दूध खाने वालों में से बहुतों के घर में ही दूध होता है; दूसरे नगरवासियों की अपेक्षा गाँवों के किसानों में दूध खरीदने की सामर्थ्य कम होती हैं उनमें से अधिकांश दूध या दूध से बने हुए पदार्थ खरीद कर नहीं खा सकते। वहाँ बहुत से लोगों को तो, जिनमें बच्चे भी सम्मिलित हैं, कभी दूध मिलता ही नहीं। यहाँ तक कि ऐसे इलाकों में भी, जहाँ दूध का व्यवसाय होता है और जहाँ बहुत अधिक मात्रा में दूध होता है, सोलह प्रतिशत परिवार दूध या दूध से बने पदार्थों का बिल्कुल उपयोग नहीं करते। ऐसी दशा में जहाँ दूध बहुत कम होता है, ऐसे भारतीय देहातों में तो दूध या दूध से बने पदार्थों को खरीद कर खाने की सामर्थ्य और भी कम होनी चाहिये।’

भारत में पशुओं तथा दूध के व्यवसाय की बृद्धि के सम्बन्ध में जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है- 'यदि भारतीय जनता यह चाहती है कि उसे भोजन में दूध पर्याप्त मात्रा में मिले तो सबसे पहले यह आवश्यक है कि देश में दूध का उत्पादन बहुत अधिक मात्रा में बढ़ाया जाय। यह अनुमान किया गया है कि न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति के लिये भी दूध का उत्पादन कम-से-कम दुगुना करना पड़ेगा। किन्तु उत्पादन की इस वृद्धि से तब तक उद्देश्य-सिद्धि न होगी जब तक कि दूध का भाव न घटा दिया जाय, अथवा जनता की औसत आय में बृद्धि न हो। दूसरा उद्देश्य, जिसे सदा ध्यान में रखना हो, यह है कि दूध का भाव इतना मंदा रहे कि उसे अधिकांश जनता खरीद सके।

खपत में वृद्धि की गुंजायश

पर्याप्त गोचर भूमि की व्यवस्था, अच्छी नस्ल पैदा करने के लिये साँड़ों की संख्या में पर्याप्त बृद्धि तथा दूध की बिक्री का प्रबन्ध- इन तीनों बातों की इस समय सबसे अधिक आवश्यकता है और उत्सुकतापूर्वक यह आशा की जाती है कि यथासम्भव शीघ्र ही इन आवश्यकताओं की पुर्ति के लिये यथेष्ट प्रयत्न किये जायेंगे।

गोचर-भूमि

जैसा कि बार-बार बताया जा चुका है, पशुओं के ह्यस का एक मुख्य कारण पर्याप्त गोचर-भूमि का न होना है। एक तो गोचर-भूमि यों ही पर्याप्त नहीं; उस पर भी अधिक शोचनीय बात यह है कि प्रतिदिन जमींदार एवं किसानों के लोभ के कारण इनका क्षेत्रफल लगातार कम होता जा रहा है। कई वर्ष पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल रेमंड ने कहा था कि ‘बंगाल के सभी जिलाधीशों की रिपोर्ट बतलाती हैं कि बंगाल प्रान्त के प्राय: सभी जिलों में गोचर-भूमियों की संख्या कम कर दी गयी है, जिसके परिणाम-स्वरूप पशुओं की संख्या घट गयी है’। श्रीयुत ब्लैंकवुड ने भी कहा था कि ‘निस्सन्देह बंगाल में पशुओं की बृद्धि में सबसे मुख्य बाधा गोचर भूमियों की कमी है।’

ऐसा कहा जाता है कि यूरोप के किसी भी देश की अपेक्षा भारत में भूमि का मूल्य सस्ता है। ऐसी दशा में आशा तो यह होनी चाहिये थी कि यहाँ पशुओं के चरने के लिये और देशों की अपेक्षा भूमि का अधिक भाग सुरक्षित रक्खा जाता, किन्तु बात ऐसी नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व गोचर-भूमि तथा जोती हुई भूमि का अनुपात संयुक्त राज्य अमेरिका में १:१६, जर्मनी में १:६, इंग्लैण्ड में १:३ तथा जापान में १:६ था, किन्तु भारत में केवल १:२७ था। भारत में गोचर-भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाने की आवश्यकता पर जितना अधिक जोर दिया जाय, उतना थोड़ा है।

सन् १९९३ में कृषि बोर्ड के सम्मुख गोचर-भूमि की न्यूनता का प्रश्न विचार के लिये उपस्थित हुआ था। उक्त बोर्ड ने माननीय श्रीयुत् एच.आर.सी. हेली की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति नियुक्ति की। उस समिति ने निम्नाकित परामर्श दिये-

१ . गोचर-भूमि को छोड़ने की व्यवस्था कानून द्वारा होनी चाहिये। पशु-चारण के अधिकार पर सभी प्रकार के नियन्त्रण अवांछनीय समझे जाने चाहिये। स्थानीय अधिकारियों तथा म्यूनिसिपल एवं जिला बोर्डों को चाहिये कि वे गोचर-भूमियों की सीमा बाँध दें तथा उन पर किसी का अधिकार न होने दें।

२ . अनुपयोगी भूमि को खेती के योग्य बनाना। यह कार्य कृषि-विभाग के निकट सहयोग से जंगल-विभाग द्वारा व्यवस्थित रूप में होना चाहिये और इस प्रकार खेती के योग्य बनायी हुई भूमि को गोचर-भूमि के रूप में खुली छोड़ देना चाहिये।

३ . वर्तमान गोचर-भूमियों पर किसी का अधिकर न हो, इसके लिये कानून बनने चाहिये और ऐसे कानूनों द्वारा म्यूनिसिपल एवं जिला-बोर्डों को अधिकार दिये जाने चाहिये कि वे अपनी आय का एक भाग गोचर-भूमियों को अधिकृत करने में व्यय करें।

४. सरकार तथा स्थानीय बोर्डों के खर्च से गोचर-भूमियों को अधिकृत करना चाहिये।


कृषि के सम्बन्ध में सम्राट् की ओर से एक कमीशन (जाँच-समिति) बैठा था, जिसने इस विषय पर विचार करके सन् १९२८ में अपनी रिपोर्ट दी थी। कमीशन ने लिखा था- ‘पशुओं की रक्षा के सम्बन्ध में सबसे आवश्यक बात है- उनके भोजन की व्यवस्था। भारत में, जहाँ पशुओं को बाँधकर खिलाने की प्रथा नहीं-सी है, चराने की सुविधाओं पर ही मुख्य रूप से विचार करना चाहिये। ऐसा कहा जा सकता है कि भारत के प्राय: प्रत्येक भाग में गाँव के समीप की सार्वजनिक गोचर-भूमि तथा घास के मैदानों में सामान्यत: आवश्यकता से अधिक पशु चराये जाते हैं’।

कमीशन ने आगे चलकर लिखा है- ‘पशुओं की उन्नति के लिये मुख्यतया दो बातों पर ध्यान देना आवश्यक है- खुराक और नस्ल। इनमें भी हम खुराक को प्रथम स्थान देते हैं; क्योंकि जब तक पशुओं को अच्छी तरह खिलाया-पिलाया नहीं जायगा, तब तक सन्तानोत्पादन के तरीके में कोई विशेष सुधार नहीं हो सकता। यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है कि कमीशन के सामने बयान देने वालों में से बहुतों ने गोचर-भूमियों को बढ़ाने की सम्मति दी है। किन्तु इस सम्बन्ध में जो कुछ हो सकता है, उसकी पूरी छान-बीन करने के पश्चात् हम लोगों ने यह मत स्थिर किया है कि वर्तमान गोचर-भूमियों में अधिक वृद्धि की गुंजायश नहीं है। अत: हम लोगों को चाहिये कि जितनी भूमि में इस समय घास पैदा होती है, उसी की उत्पादन शक्ति को बढ़ाने में अपना सारा प्रयत्न लगा दें। ऐसे प्रयत्नों के लिये बहुत बड़ा क्षेत्र उपस्थित है’।

मुक्तेसर में स्थित पशु-चिकित्सा-सम्बन्धी राजकीय अनुसंधानशाला के डाइरेक्टर श्रीयुत् एफ. बेयर ने भारत की पशुचारण-समस्या पर एक वक्तव्य तैयार किया था, जिसे उन्होंने ‘बोर्ड ऑफ एग्रिकल्चर एण्ड ऐनिमल हसबंड्री' की 'पशु-प्रबन्ध-शाखा’ की द्वितीय वार्षिक बैठक में उपस्थित किया था। उसमें उन्होंने लिखा है- 'कृषि के सम्बन्ध में बैठाये गये शाही कमीशन की सन् १९२८ की रिपोर्ट निकलने के बाद उस रिपोर्ट में विचारित कई बातों में अच्छी उन्नति हुई है; किन्तु गो-चारण ही एक ऐसा विषय है, जिसके सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं होती। सन् १९२९ में पुराने कृषि बोर्ड की अन्तिम बैठक में इस विषय पर संक्षेप में विचार हुआ था। उसमें दो सामान्य प्रस्ताव ऐसे पास हुए थे, जिनमें वर्तमान गोचर-भूमियों की रक्षा एवं उनके समुचित उपयोग पर जोर दिया गया था। किन्तु अब तक बहुत ही कम स्थानों में गोचर-भूमियों के सुधार के लिये कोई स्थायी प्रयत्न किया गया है’। (पशुओं के व्यवसाय तथा दुग्ध-व्यवसाय की उन्नति पर सन् १९३७ की रिपोर्ट)-

‘पशु-चारण के लिये जंगली इलाकों के समुचित उपयोग के सम्बन्ध में जो ‘प्राथमिक परामर्श-सभा' (Preliminary Conference) हुई थी, उसमें इस विषय पर विचार किया गया था। इस सभा की रिपोर्ट सन् १९३६ में 'बोर्ड ऑफ ऐग्रिकल्चर एण्ड ऐनिमल हसबंड्री' के सम्मुख उपस्थित हुई थी। उस पर बोर्ड ने अपनी निम्नलिखित सम्मति प्रकट की- ‘अनुपयोगी भू-भागों की उन्नति की सम्भावनाओं पर विश्वास करते हुए हमारा यह निश्चित मत है कि रॉयल कमीशन की कल्पना के अनुसार इन अनुपयोगी भूभागों का पुनर्वर्गीकरण किसी प्रान्तीय सरकार के किसी एक विभाग पर नहीं छोड़ा जा सकता। हम सिफारिश करते हैं कि प्रत्येक प्रान्त में एक स्थायी ‘चारा तथा पशु-चारण-समिति’ का निर्माण हो और उसके सदस्य वे अफसर हों, जो जंगल तथा माल (रेवेन्यू) के महकमों द्वारा इस काम के लिये नियुक्त किये जायँ तथा पशु-प्रबन्ध-विभाग का अफसर हो। प्रत्येक प्रान्त की यह स्थायी समिति ‘इम्पीरियर कौंसिल ऑफ एग्रिकल्चरल् रिसर्च’ की एक नवीन ‘पशु-चारण-उपसमिति’ की प्रान्तीय समिति के रूप में काम करेगी। और तब यह उपसमिति सारे भारतवर्ष के लिये सुव्यवस्थित रूप में काम कर सकेगी। यद्यपि यह समस्या भारत भर की समस्या है तथापि इसे हल करने का तरीका प्रत्येक प्रान्त के लिये अलग-अलग होगा। प्रान्तीय ‘चारा तथा पशु-चारण-समिति’ का कर्त्तव्य है कि वह सरकारी जंगलों के बाहर अनुपयोगी भू-भागों के पुनर्वर्गीकरण की जाँच करे तथा ऐसे भू-भागों को चुने, जिनमें चारा उग सकता हो अथवा जिनको गोचर-भूमि के रूप में व्यवस्था की जा सके। समिति को ऐसे भू-भागों के अधिकार तथा प्रबन्ध के विषय में प्रस्ताव भी उपस्थित करने चाहिये।

डॉक्टर एन.सी. राइट ने भारत में पशुओं के व्यवसाय तथा दूग्ध-व्यवसाय की उन्नति पर सन् १९३७ में जो रिपोर्ट उपस्थित की थी, उसमें उन्होंने ‘चारा तथा पशु-चारण-समितियों’ के निर्माण के प्रस्ताव का बड़ा जोरदार समर्थन किया है। यह अत्यधिक वांछनीय है कि ऐसी समितियाँ प्रत्येक जिले में बनें, जिसमें कुछ गैर सरकारी स्थानीय कृषिकार, जमींदार तथा आसामी अपने-अपने इल्कों में काम करे के लिये सम्मिलित कर लिये जाया करें। सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि भिन्न-भिन्न प्रान्तों तथा राज्यों के सरकारी अफसरों और कृषि से सम्बन्ध ऱखने वाली साधारण जनता के मस्तिष्क में यह विश्वास बैठा दिया जाय कि कृषि प्रघान भारत की आर्थिक समस्या का हल ‘मिश्रित खेती' की प्रणाली के ग्रहण करने पर निर्भर करता है। इस प्रणाली के अनुसार किसान अपनी साधारण खेती चालू रखते हुए साथ-साथ गाय-बैल भी पालेंगे तथा इस प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देश भर में गोचर-भूमियों की पर्याप्त वृद्धि हो और पर्याप्त मात्रा में चारे की खेती हो। आशा की जाती है कि भिन्न-भिन्न प्रान्तों तथा राज्यों की सरकारें शीघ्र इस प्रश्न को हाथ में लेकर इन लाभदायक परामर्शों को कार्यरूप मेँ परिणत करेगी।

नस्ल


अब हमें नस्ल के प्रश्न पर विचार करना चाहिये। यह एक सामान्य कहावत है कि भोजन से अधिक प्रभाव नस्ल का पड़ता है। अच्छी नस्ल का मूल्य आँका नहीं जा सकता। श्री नीलानन्द चटर्जी कहते हैं कि अच्छी जाति के साँडों से नस्ल पैदा कराने में दो लाभ हैं। पहला लाभ तो यह है कि हमें बछड़े उत्तम श्रेणी के मिलते हैं। दूसरा लाभ, जो सबसे अधिक महत्त्व का है और जिसका फल तुरंत मिलता है, यह है कि गाय का दूध बढ़ जाता है। स्थायी लाभ इसमें है कि नस्ल की उन्नति के लिये उसी जाति के उत्तम साँड द्वारा गाय को बरधाया जाय। नस्ल का वास्तविक सुधार उत्तम-से-उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्लों की उन्नति करने में है, न कि एक जाति की गौ को दूसरी जाति के साँड़ से बरधारे में अथवा विदेशी रक्त का मिश्रण कराने में। इंग्लैण्ड तथा आस्ट्रेलिया के साँडों से नस्ल उत्पन्न कराने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं।

सरकारी फार्मों से उत्तम जाति वाले साँडों के वितरण के सम्बन्ध में शाही कमीशन ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षिक किया है कि देश के पशुओं की आवश्यकता को देखते हुए सन् १९२६ तक इस दिशा में बहुत ही कम प्रगति हुई है। कमीशन ने गणना करके बताया कि प्रतिवर्ष दो लाख सांडों को वितीर्ण करने की आवश्यकता थी; किन्तु बड़े-बड़े प्रान्तों में वास्तव में ५०० से कुछ ही अधिक साँड प्रतिवर्ष बाँटे गये। यद्यपि प्रतिवर्ष सरकारी फार्मों से बाँटे जाने वाले साँडों की संख्या लगभग दुगुनी कर दी गयी है, फिर भी भारत को जितने साँडों को आवश्यकता है, कुल मिला कर उनका एक क्षुद्र अंश ही अब तक बाँटा गया है। ( ‘पशुओं के व्यवसाय तथा दुग्ध-व्यवसाय की उन्नति’ पर सन् १९३७ की रिपोर्ट)-

सूरज-साँड


भारत में गायों को बरधाने की कोई व्यवस्थित प्रणाली न होने के कारण उसके अभाव की पूर्ति अति प्राचीनकाल से सूरज-साँडों से की जाती रही है। हिन्दू लोग इन साँडों को अपने सम्बन्धी की मृत्यु के ग्यारहवें दिन छोड़ा करते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए साँडों का कार्य केवल गो-वंश की बृद्धि करना है। धर्मशास्त्रों में यह विधान किया गया है कि ऐसे साँडों को जिस काम के लिये छोड़ा जाता है, उसके अतिरिक्त न तो उनसे हल चलाने का काम लिया जा सकता है, न गाड़ी जोतने का, और न कोई अन्य काम ही लिया जा सकता है। उन्हें खूब अच्छी तरह खिला-पिलाकर स्वतंत्र घूमने के लिये छोड़ देना चाहिये, जिससे उन्हें पर्याप्त व्यायाम मिले और वे स्वस्थ तथा बलवान बने रहें। यह प्रथा अब तक कई स्थानों में प्रचलित है। किन्तु बंगाल के कृषि-विभाग के डाइरेक्टर श्री टी.आर. ब्लैकवुड आई.सी.एस. ने यह लिखा है कि प्रान्त भर में ऐसा एक भी जिला नहीं है, जिसमें गो-वंश की वृद्धि के लिये अच्छे साँड पर्याप्त संख्या में हों। उनका यह विचार ठीक ही है कि पवित्र समझे जाने वाले सूरज-साँडों द्वारा नस्ल पैदा करने की हिन्दुओं की पुरानी प्रथा स्वयं पशुओं के दृष्टिकोण से बहुत अच्छी थी; क्योंकि इसका परिणाम यह होता था कि चुने हुए बछड़े ही इस प्रकार छोड़े जाते थे और उन्हें खुला छोड़ देने का परिणाम भी यह होता था कि लोग उन्हें अच्छी तरह खिलाते-पिलाते थे तथा उन्हें पर्याप्त व्यायाम भी मिल जाता था।

्री नीलानन्द चटर्जी का कहना है- पशुओं के नस्ल-सुधार के विषय पर ‘इम्पीरियल बोर्ड ऑफ एग्रिकल्चर’ द्वारा कई बार, विशेष कर सन् १९१३ तथा १९१७ में विचार हो चुका है तथा भारत के विभिन्न प्रान्तों के पशु-चिकित्सा विभाग के डाइरेक्टरों तथा स्यूपरिन्टेन्डेंटों ने भी इस विषय पर मनन-पूर्वक विचार किया है। संक्षेप में उन लोगों के परामर्श निम्नांकित हैं। आशा की जाती है कि सरकार शीघ्र ही इन पर अमल करेगी।

१. सुरज-साँड़ किसी की भी सम्पत्ति नहीं है, अदालतों द्वारा दिये हुए इस प्रकार के निर्णयों के दुष्परिणामों को दूर करने के लिये कानून द्वारा सूरज-साँडों का अधिकार म्युनिसिपैल्टी, डिस्ट्रिक्ट-बोर्ड तथा स्थानीय सभाओं को सौंप कर उन्हें इस बात के लिये बाध्य करना चाहिये कि वे अपनी-अपनी सीमा के भीतर पशु-संख्या तथा आय के अनुपात से नस्ल-वृद्धि के लिये कम-से-कम थोड़े से उत्तम साँडों को अपने खर्च से रक्खें अथवा एक उचित रकम सहायता के रूप में देकर किसी सार्वजनिक या व्यक्तिगत संख्या द्वारा उनके भरण-पोषण की व्यवस्था करें।

२. विशेष कर नस्ल बढ़ाने के उद्देश्य से साँड रखने के विचार को प्रोत्साहन देने के लिये पुरा प्रयत्न करना चाहिये तथा डिस्ट्रिक्ट बोर्डों को चाहिये कि वे जितने साँड रख सकें, अवश्य रक्खें।

३. इस बात को बार-बार दुहराया जा चुका है कि नस्ल में वास्तविक सुधाऱ उत्तम-से-उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्लों के सुधार से ही सम्भव है, संकर-जाति की नस्ल उत्पत्र करके या विदेशी रक्त का मिश्रण करने से नहीं। इंग्लैण्ड तथा आस्ट्रेलिया के साँडों से नस्ल उत्पन्न करने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं। मेजर बाल्डे का कहना है कि मुख्यता आस-पास की सभी नस्लों का ह्यस हुआ है तथा कर्नल एच. ईवन्स के कथनानुसार बर्मियों की संकर-जाति की सन्तान पैदा न करने की नीति ही बर्मी पशुओं के अत्युत्तम गुणों को बनाये रखने में सहायक हुई है।

४. भारत के कृषि-बोर्ड के सन् १९१९ के कार्य-विवरण कर्नल जी.के. वाकर तथा सर्वश्री जैकब, वुड, मेकेंजी, नाइट एवं टेलर ने कहा है कि पूर्ण शक्ति के साथ पशु-वृद्धि के व्यवसाय को प्रोत्साहन देना तथा उसकी वृद्धि करना सरकार का मुख्य कर्त्तव्य है।

(क) सरकारी पशु-पालन-शालाओं की संख्या में वृद्धि करना।

(ख) सरकार को चाहिये कि वह उत्तम-उत्तम नस्ल के देशी पशुओं का पालन करे तथा इन नस्लों की रक्त-शुद्धि बनाये रक्खे।

(ग) पशु-वृद्धि के लिये भूखण्डों को निर्धारित करना तथा उनकी रक्षा करना।

(घ) सरकारी या दूसरे प्रमाणित फार्मों से उत्तम श्रेणी के पशुओं का वितरण

सुरज साँड़ किसी की भी सम्पत्ति नहीं हैं- हाईकोर्ट के द्वारा दिये हुए इस प्रकार के निर्णयों के दुष्परिणाम को रोकने के लिये अब तक कोई कानून नहीं बना। इस प्रकार का कानून यथासम्भव शीघ्र बन जाना चाहिये। अन्य प्रस्तावित उपायों को भी समूचे भारतवर्ष की आवश्यकता के अनुसार थोड़े या अधिक पैमाने पर अमल में लाना चाहिये।

पशू-वध की रोक



किन्तु सबसे महत्त्व का प्रश्न, सब प्रश्नों का एक प्रश्न, है- ‘पशुओं की निर्बाध हत्या’। ऐसा केवल भारत में ही सम्भव है। संसार के अन्य किसी सभ्य देश में इस प्रथा को एक दिन के लिये भी प्रोत्साहन नहीं मिल सकता। श्री निलानन्द चटर्जी लिखते हैं- ‘क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक अच्छी स्वस्थ, जवान गाय का भी, जो छुटाने के समय तक प्रतिदिन लरगभग ढाई सेर दूध देती है, बेखटके वध कर दिया जाता है? कलकत्ते की एक म्यूनिसिपल पशु-वधशाला में मैंने अपनी आँखों ऐसा होते देखा है। इस प्रकार केवल यही एक उदाहरण नहीं है। कलकत्ते की म्यूनिसिपल पशु-वधशाला में ऐसी-ऐसी पाँच सौ गायों का वध प्रतिदिन होता है। सोचिये, कलकत्ते में कई पशु-वधशालाएँ हैं तथा भारत में कई ऐसे नगर और कसबे हैं, जहाँ बारहों महीने गो-वध का कार्य चालू रहता है। खोज करने से पता चला है कि मारे जाने वाले पशुओं में से सत्तर से नब्बे प्रतिशत तक पशु छोटी अवस्या में ही मार दिये जाते हैं और बजाय इसके कि वे दस या बारह वर्ष तक और जीकर मनुष्य को लाभ पहुँचाते, पहले या दूसरे ब्यान के बाद ही मार डाले जाते हैं। इस प्रकार जो थोड़े से उत्तम श्रेणी के पशु बच रहते हैं वे भी समय से पहले ही मार दिये जाते हैं”।

पशुओं के ह्यस के विषय पर लिखने वाले कई विद्वानों का कहना है कि दूध देने वाले पशुओं का वध इस ह्यस का एक मुख्य कारण है। इस विषय पर भी श्री नीलानन्द चटर्जी के निम्नांकित कथन की ओर ध्यान देना चाहिये। वे लिखते हैं- ‘इस देश में अँग्रेजों के आने के पूर्व गो-वध प्राय: नहीं होता था। यह सच है कि मुसल्मानी राज्य में कुछ मुसलमान गो-मांस खाते रहे होंगे; किन्तु उनकी संख्या बहुत कम थी तथा बध किये जाने वाले पशुओं की संख्या तो बिल्कुल नगण्य थी। यहाँ तक कि आज भी जो अच्छे और उच्च वर्ग के मुसलमान हैं, वे गो-मांस को छूने तक में अपनी हतक तथा अपमान समझते हैं। वे मुख्यतया मेढ़े अथवा बकरे का मांस खाते हैं। भारत का जलवायु गो-मांस-भक्षण के अनुकूल नहीं पड़ता। मुसलमानों के गो-मांस से परहेज करने में यह एक मुख्य कारण है। दूसरा कारण, जो इससे कम महत्त्व का नहीं है, हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति आदर का भाव था। इस भाव की प्रतिध्वनि हमें इस बीसवीं शताब्दी में भी सुनायी पड़ी थी, जब कि अफगानिस्तान के स्वर्गीय अमीर हबीबुल्ला साहब भारत में पधारे थे तथा ईद के अवसर पर दिल्ली में इस विषय पर उन्होंने भाषण दिया था। उन्होंने मुसलमानों से कहा था- ‘यद्यपि परम्परा के अनुसार मेरे सत्कार में आप लोगों को सौ गायों की कुर्बानी करनी चाहिये; किन्तु आप लोग एक भी गाय की कुर्बानी मत कीजिये। आप लोगों को दिल्ली या भारत के किसी भी भाग में मेरे नाम पर गाय की कुर्बानी या और कोई ऐसा धार्मिक कृत्य नहीं करना चाहिये, जिससे सम्राट् एडवर्ड के साम्राज्य की हिन्दू प्रजा को पीड़ा या दु:ख हो। क्यों? क्या बकरे पर्याप्त नहीं हैं? क्या दिल्ली की जुमा मस्जिद में कुर्बानी करने के लिये पर्याप्त ऊँट नहीं हैं? मैं आप लोगों के साथ ईद का महत्त्वपूर्ण त्यौहार मनाने जा रहा हूँ। यदि आप लोगों की इच्छा हो तो बकरों की कुर्बानी कर सकते हैं। किन्तु यदि एक भी गाय का वध हुआ तो मैं सदा के लिये आप लोगों से तथा दिल्ली से मुँह फेर लूँगा। यदि मैं आज्ञा दे सकता हूँ तो मेरी बात मानिये; नहीं तो कम-से-कम मेरी प्रार्थना पर अवश्य ध्यान दीजिये?

कुछ ही दिनों से अँग्रेज सैनिकों तथा अपेक्षाकृत निम्नवर्ग की यूरोपियन तथा यूरेशियन जनता द्वारा अधिक मात्रा में गो-मांस की खपत होने लगी। पिछला महायुद्ध छिड़ने के समय तक यह पशु-वध बराबर बढ़ता ही गया। उस समय युद्ध के लिये बहुत से सिपाही भारत से बुला लिए गये, जिसके परिणामस्वरुप पशु-वध में थोड़ी सी कमी आ गयी। किन्तु यह कमी थोड़े ही समय के लिये थी, क्योंकि पशु-वध की संख्या फिर बढ़ती पर है। (इस युद्धकाल में कितना गो-वध हुआ है, यह बताना बहुत ही कठिन है)। आगे चलकर चमड़े के व्यवसाय तथा सूखे मांस के व्यापार के लिये गौओं का वध होने लगा। इन सब कारणों ने मिलकर इस देश में वध होने वाले पशुओं की संख्या में भीषण वृद्धि कर दी।

गो-वध के विरुद्ध हिन्दूमात्र की प्रबल धार्मिक भावना प्रसिद्ध है। अत: उसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। खेद की बात है हिन्दुओं की इस धार्मिक भावना तथा विरोध पर कोई ध्यान न दिया जाकर गो-वध बराबर जारी है। बड़े नगरों तथा कस्बों में हिन्दुओं को प्रतिदिन प्रात:काल छाती पर पत्थर रख कर बहुसंख्यंक गौओं की वधशाला की ओर ले जायी जाती हुई देखना पड़ता है। गायों से मनुष्य-जाति को इतने महान् लाभ होते हैं कि उनकी गणना नहीं हो सकती; उन्हें सभी जानते हैं, अत: उन्हें दुहराने की आवश्कता नहीं है। गाय हमें वह दूध देती हैं, जो मनुष्य को प्राप्त होने वाले आहारों में सबसे पूर्ण है- यह बात अधिक वैज्ञानिक खोजों द्वारा सिद्ध हो चुकी है। ऊपर बतलाया जा चुका है कि दूध मनुष्य के भोजन का एक आवश्यक अंग है। यह दूसरे आहारों को त्रुटियों को पूर्ण कर देता है। दूध के अभाव की पूर्ति करने वाला कोई दूसरा आहार नहीं है। राष्ट्र के शारीरिक विकास को बनाये रखने के लिये तथा राष्ट्र के स्वास्थ्य की उन्नति के लिये यह आवश्यक है कि धनी-निर्धन सबको पर्याप्त मात्रा में दूध मिले। गाय देश को बैल भी देती है, जो हमारे खेत जोतते और हमारे बछड़े खींचते हैं। भारत की खेती में पशुओं से जो सहायता मिलती है, उसका सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग उनकी शारीरिक सेवा है। भारत में कृषि सम्बन्धी जो शाही कमीशन बैठा था, उसके कथनानुसार बिना बैल के खेती नहीं हो सकती। बिना बैलों के पैदावार एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं पहुचायी जा सकती। बैलों की रक्षा

इसीलिये की जाती है कि वे कृषि के लिये अनिवार्य हैं। यूरोप के देशों में लोग दूध देने वाले पशुओं के वध की बात सहन नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो कानून द्वारा उसे दण्ड दिया जाता है अथवा वह समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। किन्तु यहाँ इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ के सबसे अधिक दूध देने वाले पशु नगरों में भेजे जा रहे हैं और वहाँ जब उनका दूध कम हो जाता है, तो उनका बड़ी संख्या में वध कर दिया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि उत्तम गायों की संख्या घट रहीं है।‘ श्री नीलानन्द चटर्जी ने उपर्युक्त बातें कई वर्ष पूर्व लिखी थीं। तब से तो आज की स्थिति और भी अधिक शोचनीय एवं भयानक हो गयी है!

बम्बई की सरकार ने एक ‘पशु-विशेषज्ञ-समिति’ नियुक्त की थी, जिसने सन् १९३९ में अपनी रिपोर्ट लिखी थी। समिति ने लिखा है- ‘समिति का यह मत है कि वर्तमान परिस्थिति में, जिसके कारण दूध के लिये पशु नगरों की सीमा भीतर रक्खे जाते हैं, उपयोगी पशुओं के बध को रोकने के लिये कानून का बनना आवश्यक है। किन्तु समिति इस बात पर जोर देती है कि यदि नगरों की सीमा के बाहर सरकार या म्यूनिसिपैल्टी आदि के द्वारा दूध की पैदावार के हल्कों की स्थापना का उचित प्रबन्ध हो जाय, जहाँ दूध का व्यवसाय करने वाले दूध इकट्ठा कर सकें, दूध देने वाले पशुओं का पालन एवं वृद्धि कर सकें तथा छूटे पशुओं का तब तक पालन कर सकें जब तक कि वे फिर दूध न देने लगें, तो उपयोगी पशुओं के वध की समस्या बहुत कुछ हल्की हो जायगी तथा यह भी सम्भव है कि यथा समय वह समस्या रह ही न जाय। दूसरे शब्दों मे समिति का यह मत है कि दूध देने वाले उपयोगी पशुओं का वध नगर के भीतर दूध का व्यवसाय चलाने की प्रचलित प्रथा का प्रत्यक्ष परिणाम है। समिति बड़े जोरदार शब्दों मे यह बतलाना चाहती है कि दूध देने वाले पशुओं की रक्षा तथा प्रान्त में सन्तोषजनक स्थानीय दुग्ध-व्यवसाय की बृद्धि के लिये बरती जाने वाली नीति में सबसे प्रथम और अत्यन्त आवश्यक बात यह होनी चाहिये कि प्रचलित प्रणाली में परिवर्तन कर के दूध का व्यवसाय क्षेत्र नगर की सीमा के बाहर कर दिया जाय’।

सन् १९१७ में अखिल भारतवर्षीय गो-सम्मेलन-संघ, कलकत्ता के प्रमुख श्री सर जान वुडरफ की प्रेरणा से कई म्यूनिसपैल्टियों ने उपयोगी पशुओं के वध में नियंत्रण लगाने का निश्चय किया था। किन्तु सस्कार ने उनके प्रस्तावों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि वर्तमान कानून के अनुसार ऐसे प्रस्तावों को कार्यरूप में लाना न्याययुक्त नहीं है।’ ( श्री नीलानन्द चटर्जी)

जब कलकत्ता म्यूनिसिपैल्टी बिल धारा-सभा (Legislative Council) के सम्मुख उपस्थित हुआ, तब श्री नीलानन्द चटर्जी तथा कुछ अन्य मित्रों ने उस बिल में एक धारा बढ़ाकर इस कानूनी त्रुटि को दूर करने की चेष्टा की। उस धारा के द्वारा कलकत्ते के कारपोरेशन को यह अधिकार दिया गया था कि आवश्यकतानुसार वह उपयोगी पशुओं के वध पर रोक लगा सके। किन्तु यूरोपियन और मुसलमान सदस्यों द्वारा उस प्रस्ताव का समर्थन न होने से वह प्रस्ताव गिर गया। गाय तथा बछडों का उनके जीवन के प्रारम्भ में ही वधन कर देने की बुरी प्रथा बिना किसी रोक-थाम के जारी है!

हिन्दुओं की धार्मिक भावना को मार्मिक चोट पहुँचाने के साथ-साथ गो-वध की प्रथा ने सारे भारतवर्ष तथा इसमें रहने वाली सभी जातियों को अतुल आर्थिक क्षति पहुँचायी है। राष्ट्र-हित के लिये यह आवश्यक है कि समस्या की गम्भीरता का अच्छी प्रकार अनुभव किया जाय तथ दूध देने वाली गाय और उसकी सन्तान- बैलों एवें साँडों की रक्षा के लिये सरकार या उसके द्वारा नियुक्त अन्य कमेटियों द्वारा आमन्त्रित विशेषज्ञों के बताये हुए उपायों अथवा अन्य उपयुक्त समझे जाने वाले साधनों को काम में लाया जाय। अवश्य ही शान्तिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार का कार्य तो प्रचुर मात्रा में बराबर चलता रहना चाहिये। प्रजा के सभी वर्गों के समर्थन से जीवदया-सम्बन्धी आवश्यक कानून बन जाय- इसके लिये शान्तिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार-कार्य प्रचुर मात्रा में निरन्तर चालू रखने की आवश्यकता है।

जिन तथ्यों की ओर मैंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है, उनको दृष्टि में रखते हुए मैं निम्नलिखित परामर्श उनके सामने प्रस्तुत करता हूँ-

उपाय

१. सारे देश में खेती एवं गोपालन की सम्मिलित प्रणाली (Mixed farming) को प्रचलित करने के लिये देशव्यापी प्रयत्न होना चाहिये। २. प्रत्येक किसान को एक या एक से अधिक गाय अपने घर में रखने तथा गाय और बैलों की नस्ल बढ़ाने के लिये प्रोत्साहन तथा सहायता दी जानी चाहिये। अधिक जनसंख्या वाले नगरों में लोगों को सामुदायिक प्रयत्न से गोशाला अथवा डेरियाँ स्थापित करने के लिये उत्साहित करना चाहिये। ३. प्रत्येक जिले में ‘चारा तथा पशु-चारण समितियों’ की स्थापना होनी चाहिये। ४. गाँव के पशुओं के चरने के लिये यथेष्ट गोचरभूमि कानूनन अलग छुटी रहनी चाहिये। ५. सुरज-साँड़ किसी की भी सम्पत्ति नहीं है- इस विषय में दिये हुए हाईकोर्ट के निर्णयों को व्यर्थ करने के लिये कानून बनना चाहिये। ६. काफी बड़े परिमाण में अच्छे साँडों की नस्ल बढाने के कार्य को प्रोत्साहन देना चाहिये। ७ . जवान गायों के वध को रोकने के लिये ही नहीं, वरन् बूढी गाय, साँड और बैलों के वधन को भी रोकने के लिये कानून बनना चाहिये। ८. बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, लाहौर तथा दूसरे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की माँग पूरी करने के लिये नगरों की सीमा के बाहर दूध-व्यवसाय के क्षेत्रों की स्थापना होनी चाहिये। ९. पशु-चिकित्साशाला तथा दातव्य औषधालयों का प्रबन्ध पर्याप्त संख्या में होना चाहिये। १०. अधिक दूध उत्पन्न करो और खूब पियो’ का आन्दोलन सारे देश में मच जाना चाहिये। ११. अधिक दूध उत्पन्न करने, खपत करने और गो-वध को बंद करने की आवश्यकता के विषय में सरकारी महकमों तथा गैर-सरकारी संस्थाओं को परस्पर मिलकर शिक्षात्मक प्रचार करना चाहिये। १२. सरकार तथा सार्वजनिक संस्थाओं को चाहिये कि वे वर्तमान या भावी गोशालाओं के उपयोग के लिये नि:शुल्क गोचर-भूमि प्रदान करें। यदि ये उपाय काम में लाये गये तो राष्ट्र के स्वास्थ्य तथा भारतीय जनता की आर्थिक उन्नति के लिये एक नया युग उत्पन्न हो जायेगा। (‘कल्याण- गोअंक, वर्ष २०, अंक १, संवत् २००२)

राष्ट्रभाषा
पश्चिमोत्तर प्रदेश व अवध की कचहरियों तथा पाठशालाओं में हिन्दी भाषा-लिपि का प्रवेश

कचहरियों तथा प्रारम्भिक पाठशालाओं में फारसी लिपि के स्थान पर देवनागरीलिपि का प्रचार कराने के लिये संयुक्तप्रान्त के गवर्नर सर एण्टोनी मेकडोनलकी सेवामें भेजने के लिये पूज्य मालवीयजी ने जो (मेमोरेण्डम) अभ्यर्थना लेख लिखा था। उसे६० हजार जनता के हस्ताक्षरों के साथ २ मार्च सन् १८९८ ई. को दिन के १२ बजेगवर्नमेण्ट हाउस प्रयाग में पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध के गवर्नर सर एण्टोनीमेकडोनल की सेवा में उपस्थित किया गया था। उस पर १५ अप्रैल १९०० ई. को स्वीकृति मिली और राजाज्ञा जारी हुई। -सम्पादक मुसलमानोंके भारतवर्ष में आने के समय भारत की देश-भाषा हिन्दीऔरलिपि नागरी तथा उसके रूपान्तर थे, और उसी के द्वारा सब काम चलता था। यद्यपिभारतवासी फारसी नहीं जानते थे फिर भी मुसलमानी राज्य के प्रारम्भ से लेकर अकबरके राज्य के मध्य तक माल-विभाग में हिन्दी का और दीवानी तथा फौजदारी कचहरियोंमें फारसी भाषा का प्रयोग होता था। ब्रिटिश राज्य की स्थापना के बाद कुछ समय तकइसी भाषा से काम चला, पर थोड़े ही दिन बीतने पर यह सोचा गया कि सारी अदालतोंऔर सारे सरकारी दफ्तरों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाय, परन्तु यह प्रस्तावब्रिटिश राज्य के नायकों को रोचक न हुआ। यहाँ तक कि कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स नेअपने २९ सितम्बर सन् १८३० ई. के आज्ञापत्र में यह स्पष्ट कह दिया कि "यहाँ केनिवासियों को जज की भाषा सीखने के बदले जज को ही भारतवासियों की भाषासीखना बहुत सुगम होगा। अतएव हम लोगों की सम्मति है कि न्यायालयों का समस्तलिखित व्यवहार उस स्थान की भाषा में ही हो।" किन्तु इस आदेश का पालन १८३७ ई. के पूर्व न हो सका। इसी बीच इसविषय पर बड़ा विवाद भी चला। कुछ लोगों की यह सम्मति थी कि अंग्रेजी का हीप्रयोग हो,कुछ यह चाहते थे कि फारसी के स्थान पर यहाँ की देशभाषा का ही प्रयोग हो, परन्तु लिपि रोमन हो। सरकार को इन दोनों में से कोई भी विचार पसन्द न आया।सरकार ने यह सोचा कि विदेशी भाषा और लिपि के प्रचार से अदालतों का काम ठीक-ठीक और उत्तम रीति से न चल सकेगा और लोगों को न्याय पाने में कठिनता होगी,इसलिये कोर्ट ऑफ डांइरेक्टर्स की सम्मति के अनुसार यह निश्चय किया गया कि कचहरी और माल सम्बन्धी सारा काम फारसी के बदले यहाँ की देश-भाषा में हुआ करे और अंग्रेजी का प्रयोग सरकारी अफसर लोग केवल ऐसी चिट्ठी-पत्रियों में किया करेंजिनका सर्वसाधारण से कोई सम्बन्ध न हो। सदर बोर्डऑफ रेवेन्यू के मंत्री ने तारीख ३० मई सन्१८३७ ई. को इस आशय का आज्ञापत्र निकाला। बंगाल सरकार के मंत्री ने जो पत्र(नं. ९१४) ३० जून सन् १८३७ ई. को सदर बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के नाम लिखा था, उसमें इस आज्ञा को और भी स्पष्ट कर दिया। उसमें लिखा था कि “श्रीमान् गवर्नर महोदय इस बात को स्पष्ट रूप से समझा देना चाहते हैं कि केवल यूरोपीय अफसरों के आपस के पत्र-व्यहवार को छोड़कर (जो अंग्रेजी में हुआ करें) प्रत्येक विभाग में सरकारी काम देश-भाषा में हो।" इस आज्ञा के विरोध में जो कानून था उसे रद्द करने के लिये एक बिल श्रीमान् वाइसराय की व्यवस्थापक सभा मेंउपस्थित किया गया, जिससे फारसी के स्थान पर देषा-भाषा के प्रचार की आज्ञा स्थिर हुई। इस विधान के अनुसार बंगाल में बंगाली तथा उड़ीसा मेंउड़िया भाषा का प्रचार हुआ। हिन्दुस्तान के अन्तर्गत बिहार, पश्चिमोत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का कुछ भाग है।वहाँ की भाषा हिन्दी थी जो नागरी लिपि या उसके अन्य रूपों में लिखी जाती है| परन्तुइस भाषा के बदले इन प्रान्तों की कचहरियों में उर्दू-भाषा का प्रचार हुआ। इसकाकारण यह था कि यूरोपीय लेखकों ने उर्दू-भाषा को हिन्दुस्तानी नाम दे दिया, जिससेयह समझा गया कि बंगाल कीभाषा बंगाली तथा गुजरात की भाषा गुजराती है, वैसे ही हिन्दुस्तान की भाषा भी हिन्दुस्तानी है। इस भूल से हिन्दुस्तान की कचहरियों मेंउर्दूका प्रचार हुआ। इस भूल का संशोधन सन् १८८१ ई. में बिहार में हुआ। तब से वहाँनागरी या कैथी अक्षरों का प्रचार है। उसी वर्ष मध्यप्रदेश में भी यह भूल सुधारी गईऔर वहाँ हिन्दी-भाषा और नागरी अक्षरों का प्रचार हुआ। पश्चिमोत्तर प्रदेश में अभीइसका सुधरना रह गया है और बहुत से कारणों से अब इस कार्य में विलम्ब करना आवश्यक नहीं जान पड़ता। यह कहा जा चुका है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश की भाषा हिन्दी थी और अबभी है और यह नागरी लिपि में लिखी जाती है। पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार के मंत्री ने ता.१७ अगस्त सन् १८४४ इं. को (पत्र संख्या सातसौ पचास) में आगरा कॉलेज के प्रिन्सिपल को लिखा था कि यहाँ की देश-भाषा हिन्दी है|पश्चिमोत्तर प्रदेश के स्कूलोंके डाइरेक्टर जनरल ने सन् १८४४-४५ विवरण में लिखा है कि “ “हिन्दी सबसे अधिक प्रचलित भाषा है।" बोर्ड ऑफ रेवेन्यूने भी सन् १८३७ ई.के आज्ञापत्र (संख्या ८)में इसी कथन का समर्थन यों किया है:- "बोर्ड इस अवसर पर कमिश्नर और कलेक्टरों की उस आज्ञा (संख्या ४११,ता. ३० सितम्बर सन् १८५४ ई.) का ध्यान दिलाती है जिसके अनुसार पटवारियों के कागज उस भाषा और उस लिपि में लिखे जाने चाहिए जिनको सर्वसाधारण काश्तकार और जमीन्दार भलीभाँति समझते हों। प्राय: वह भाषा हिन्दी और वह लिपि नागरी होगी।" शिक्षा-विभाग के सन् १८७३-७४ केविवरण पर सरकार ने आज्ञा देते समय लिखा है कि "हिन्दी यहाँकि मातृभाषा कहीजा सकती है,क्योंकि अधिकतर लोग उससे भलीभाँति परिचित हैं।" शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टरों ने भी सन् १८७७-७८ के विवरण में लिखा हैकि “हिन्दी ही इस प्रदेश की देश-भाषा है”। सन् १८४८ ई. में एक महाशय ‘कलकत्ता रिव्यू’में लिखते हैंकि हिन्दी केव्यवहार की ठीक-ठीक सीमा निर्धारित करना कुछ सुगम कार्य नहीं है। मोटे तौर से यहकहा जा सकता है कि इसका प्रचार बिहार, अवध, राजपूताना और उन सब प्रदेशों में है जोपश्चिमोत्तर प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर के अधीन हैं। एक यात्री ने कहा है किहिन्दी की सहायता से वे समस्त भारतवर्ष में घूम सकते हैं। शिक्षित मुसलमान उर्दूबोलते हैं,परन्तु साधारण काश्तकार या अन्य मुसलमानअधिकतर हिन्दुओं की ही तरह बोलते हैं। प्रसिद्ध डॉक्टर राजेन्द्रलाल मित्र बंगाल एशियाटिक सोसाइटी के जरनल(१८६४ ई.) में“हिन्द की भाषा की उत्पत्ति और उर्दू बोली से उसका सम्बन्ध”शीर्षक लेख मेंलिखते हैं कि भारतवर्ष की देशभाषाओंमेहिन्दी सबसे प्रधान है। बिहारसे सुलेमान पहाड़ तक और विन्ध्याचल से हिमालय की तराई तक सभ्य हिन्दू-जातिकी यही मातृभाषा है। गोरखा जाति ने इसका कुमायूँ और नेपाल में भी प्रचार कर दियाहै और यह भाषा पेशावर से आसाम तक और काश्मीर से कन्याकुमारी तक के सब स्थानों में भलीभाँति समझी जा सकती है। श्रीयुत् बीम्स ने भी इसी मत का समर्थन किया है, तथा रेवरेण्ड कैलॉग भीलिखते हैं कि पच्चीस करोड़ भारतवासियों में से एक चौथाई, अर्थात् छ:या सातकरोड़ मनुष्यों की मातृभाषा हिन्दी है। ........ २४८००० वर्गमील में जनसाधारण कीभाषा हिन्दी ही है। श्रीयुत् पिनकॉट महोदय लिखते हैं कि उत्तरीय भारतवर्ष की भाषासदा से हिन्दी थी और अब भी है और इसी भाषा के अधिक प्रचार के कारण लोग यह समझते हैं कि साधारण हिन्दुस्तानी भारतवर्ष की मातृ-भाषा हैं। इस विषय पर अब अधिक कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है। जो कुछऊपर लिखा जा चुका है उससे यह स्पष्ट है कि जिस समय सरकार ने फारसी के बदलेदेशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी उस समय पश्चिमोत्तर प्रदेश की मातृभाषा हिन्दी थी,और अब तक वही है। इस समय की हिन्दी फारसी के शब्दों से भरी हुई है। उसे हीअब उर्दू कहते हैं। उसका प्रचार कचहरियों से अधिक सम्बन्ध रखने वाले शिक्षितमुसलमानों और अमलों में ही अधिक है। फारसी, अरबी और तुर्की शब्दों के भार सेलदी हुई यह हिन्दी ही अब उर्दूक़हलाती है तथा फारसी लिपि में लिखे जाने से यह और भी अधिक अस्पष्टहो गई है। इस कारण अबतक भी इन प्रान्तों के निवासियों की समझ में यह भली प्रक्रार नहीं आती। परन्तु जैसा किऊपर कहा जा चुका है पश्चिमोत्तरप्रदेश की सदर दीवानी अदालत ने भूल से उर्दू को यहाँ की देश-भाषा समझकर फारसी के स्थान पर उसके व्यवहार की आज्ञा दे दी। उस उर्दूभाषा को वे ‘हिन्दुस्तानी’कहने लगे और यह स्पष्ट रूप से घोषित कर दिया गया था कि कचहरियों की कार्रवाईऔर वकीलों की बहस सर्वबोध और सरल उर्दू में (या हिन्दी में, जहाँ उसका प्रचार हो) लिखी जाय। यह भाषा ऐसी होनी चाहिए जिससे फारसी से सर्वथा अनभिज्ञ एककुलीन भारतवासी अपनी साधारण बात-चीत में प्रयोग करता हो। इसमें कोई सन्देहनहीं है कि इस आज्ञा को देने के समय सदर दीवानी अदालत को यह इच्छा थी किकचहरियों का काम ऐसी भाषा में हो जिसे सर्वसाधारण सुगमता से समझ सकें। हिन्दीके प्रयोग के लिये जो आज्ञा दी गई थी उस पर कुछ भी ध्यान न दिया गया। बहुत दिनोंतक फारसी से भरी हुई उर्दूलिखते चले आने से अमलोंको ज़नसाधारण की भाषा कोनागरी लिपि में लिखना भद्दा जान पड़ा और इसी से इस प्रान्त की कचहरियों में उर्दूभाषा और फारसी अक्षरों का प्रचार हुआ। इस आज्ञा का फल अत्यन्त ही असन्तोषदायक हुआ, क्योंकि इसके एक हीवर्ष उपरान्त बोर्ड ऑफ रेवेन्यूको पुन: आज्ञापत्र निकालना पड़ा और उसमें पुन: इसबात पर जोर दिया गया कि फारसी-पूरित उर्दून लिखी जाय बल्कि ऐसी भाषा लिखीजाय जो एक कुलीन हिन्दुस्तानी, फारसी से पूर्णतया अनभिज्ञ रहने पर भी बोलता हो।परन्तु इस २८ आस्त सन् १८४० ई. के आज्ञापत्र का भी कोई परिणाम न हुआ। इसकेपन्द्रह वर्ष उपरान्त सरकार ने देखा कि दीवानी, फौजदारी और कलेक्टरी (माल)कचहरियों का कामकाज अभी तक एक ऐसी कठिन और विदेशी भाषा में हो रहा हैजो फारसी से प्राय: मिलती जुलती है। अतएव सदर दीवानी अदालत और बोर्ड ऑफरेवेन्यूकी सम्मति लेने के उपरान्त सरकार ने यह पुन: आवश्यक समझा कि कचहरियोंके अफसरों को इस बात को फिर से ताकीद की जाय कि सरकारी कागज ऐसी भाषामें लिखे जायँ जिन्हेंसर्वसाधारण भलीभाँति समझ सकें। इस सिद्धान्त के अनुसार ता.९ मई सन् ९८५४ ई. को इसी आशय का एक आज्ञापत्र निकाला गया। परन्तु इसकाभी प्रभाव न हुआ। सरकार ने पुन: सन् १८७६ ई.में सब जिलों के हाकिमों के नाम एक आज्ञापत्र भेजा, और देशभाषा के प्रयोग किए जाने के लिए और भी स्पष्ट रूप सेजोर दिया। पर इसका भी कुछ परिणाम न हुआ। आज इस आज्ञा को निकले इक्कीस वर्ष हो चुके,परन्तु अभी तक कचहरियोंकी भाषा की वही अवस्था है जो साठ वर्ष पहले थी, जबकि पहले पहल सरकार नेसन् १८३७ ई. में ऐसी सुबोध और सरल भाषा के प्रचार की इच्छा प्रकट की थी जिसे सर्वसाधारण सुगमता से समझ सकें। केवल सरकार ही यह नहीं चाहती थी और केवल फारसी-मिश्रित उर्दू के दोषों को समझकर ही उसका विरोध नहींकरती थी बल्किबड़े-बड़े भाषाशास्त्रज्ञों ने भी सरकार की उस शुभ इच्छा का समर्थनकिया है |डॉक्टरफैलन ने अपने शब्दकोश में अरबी और फारसी शब्दों के समानार्थी हिन्दी के साधारण शब्दों को रखकर इस बात को पूर्णतया सिद्ध कर दिया है कि कचहरी के कागजों में अरबी और फारसी-मिश्रित उर्दू लिखने का कोई सन्तोषजनक कारण नहीं है। श्रीयुत् ग्राउस इसी विषय पर लिखते हैं कि “आजकल की कचहरी की बोलीबड़ी कष्टदायक है, क्योंकि एक तो यह विदेशी है और दूसरे इसे भारतवासियों काअधिकांश नहीं जानता। ऐसे शिक्षित हिन्दुओं का मिलना कोई कठिन बात नहीं है जोस्वत: इस बात को स्वीकार करेंगे कि कचहरी के मुंशियों की बोली को वे अच्छी तरहबिलकुल नहीं समझ सकते और उसे लिखने में तो वे निपट असमर्थ ही हैं। इसका बड़ाभारी प्रमाण तो यह है कि कानूनों और गश्ती चिट्ठियोंके सरकारी भाषानुवाद को तबतक कोई भी भलीभाँति नहीं समझ सकता जबतक कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी सेमिलाकर उन्हें न समझा दे। मिस्टर फ्रेड्रिक पिनकॉट ने अफसरों की हिन्दुस्तानी भाषा के विषय में लिखाहै कि जिन भारतवासियों की यह मातृभाषा बताई जाती है उन्हें इसे अंग्रेजी की तरहस्कूलों में सीखना पड़ता है। और भारतवर्ष में यह विचित्र दृश्य देख पड़ता है कि राजाऔर प्रजा दोनों अपना व्यवहार ऐसी भाषा द्वारा करते हैं जो दोनोंमें से एक की भीमातृभाषा नहीं है। उस विषमता से जो असुविधाएँ उत्पन्न होती हैं उन्हेंदूर करने केलिये कुछ भारतवासी यह मानने लगे हैं कि सब व्यवहार अंग्रेजी भाषा में ही होनाचाहिए। उनका विश्वास है कि इस भाषा के प्रयोग से राज्य कर्मचारियों को भी सुगमताहोगी और यहाँ के लोगों को भी हिन्दुस्तानी से कुछ ही कठिन भाषा सीखनी पड़ेगी। यहाँ यह पूछा जा सकता है कि साठ वर्ष तक कचहरियों में सरल भाषा केप्रचार का उद्योग करते रहने पर भी सरकार क्यों कृतकार्य न हुई? बार-बार आज्ञा देनेपर भी अभी तक कचहरियों के कागज ऐसी भाषा में क्यों लिखे जाते हैंजो बिना किसीआवश्यकता के फारसी और अरबी शब्दों से भरी रहती है। इसका कारण यही है किअदालतों का काम फारसी लिपि में होता है। सरकार की इच्छा तबतक कदापि पूर्ण नहो सकेगी जबतक अदालतों में फारसी अक्षरों का आधिपत्य रहेगा। आज इनके स्थानपर नागरी अक्षरों का प्रचार कीजिए और तब देखिए कि साथ-ही-साथ सरल औरसुगम हिन्दुस्तानी का प्रचार होता है या नहीं? “पायनियर” पत्र ने अपने १० जनवरीसन् १८७६ ई. के अंक में लिखा है कि "फारसी लिपि और फारसी भाषा में इतनाघनिष्ठ सम्बन्ध है कि इस विषय ( भाषा) का सुधार तबतक पूर्णतया हो ही नहीं सकताजबतक कि हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्त के गैर सरकारी गवाहों के वयान नागरी अक्षरों मेंन लिखे जायेंगे। स्वर्गीय श्री फ्रेड्रिक पिनकॉंट ने इसी मत का जोरदार समर्थन किया है।विचारशील हिन्दुओं ने सन् १८३७ ई. में इसी आशय का एक निवेदन-पत्र भी सरविलियम म्योर को दिया था! गत साठ वर्षों में सरकार ने भाषा-सम्बन्धी जो आज्ञाएँ निकाली हैं, उन्हेंपढ़कर और जहाँ तक उनका आज तक पालन हुआ है, उस पर विचार कर यही सिद्धान्त निकला है कि जबतक कचहरियों में देशी भाषा की कार्रवाई फारसी अक्षरों मेंलिखी जायगी तबतक यह सम्भव नहीं है कि हिन्दुस्तानी भाषा में से अरबी और फारसीके शब्द छाँट दिए जायँ और ऐसी ही सरल भाषा का प्रचार हो जिसके लियेसरकार गत साठ वर्षों में बार-बार अपना मत प्रगट करती रही है | यह मानाजा सकता है कि जैसी आज्ञाएँ सरकार ने आज तक निकाली हैंउनसे भी तीव्रतर आज्ञा निकालकर कचहरियों की भाषा सरल की जा सकती है, पर उसकी इच्छा की पूर्त्ति तबतक पूर्ण रीति से नहीं हो सकती है और न होना सम्भव ही है, जबतक किहिन्दुस्तानी भाषा हिन्दुस्तानी (नागरी) अक्षर मेंन लिखी जाय। कोर्ट ऑफडाईरेक्टर्स ने यह आज्ञा दी थी कि न्यायालयों की समस्त कार्रवाई स्थानीय देशा भाषा में हो, और जब श्रीमान् गवर्नर जनरल ने कहा था कि माल और न्याय-सम्बन्धी सब कार्रवाई उसी भाषा में हो जिसे सर्वसाधारण समझ सकें, तथा जब उन्होंने फारसी के स्थान पर देशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी,तब उनका यही आशय था कि देशी भाषा का प्रचार देशी अक्षरो में ही हो, विदेशी अक्षरों में नहीं। जब कभी हम किसी भाषा के विषय में कुछ कहते हैं तब हमें उस भाषा की लिपि का भी विचार स्वभावत:आ जाता है, जबतक कि कोई बात स्पष्ट उसके विरूद्ध न बताई जाय या कही जाय |सरकार ने जब देशभाषा के प्रचार की आज्ञा दी थी तो उस आज्ञा का स्पष्ट उद्देश्य यही था कि कचहरियों कीकार्रवाई ऐसी भाषा और ऐसे अक्षरों में हो जिसे सर्वसाधारण भलीभाँति समझ और पढ़ सकें और यह उद्देश्य तबतक सफल नहीं हो सकता जबतक देश-भाषा का प्रचार विदेशी अक्षरों में होता रहेगा। प्रारम्भ में यह लिखा जा चुका है कि सन् १८३०और १८३७ के बीच में इस बात पर बड़ाविचार तथा विवाद चला था कि फारसी के स्थान पर किस भाषा काप्रयोग हो? उस समय कुछ लोगों की यह सम्मति थी कि प्रयोग तो देश-भाषा का ही हो परन्तु लिपि रोमन हो। पर सरकार ने इस सम्मति को स्वीकार नहीं किया इससे यह स्पष्ट प्रगट होता है कि सरकार की यही इच्छा थी कि देश-भाषा का प्रयोग देशी अक्षरों में ही हो। फिर सन् १८९२ ई० में भी यहाँरोमन लिपि का झगडा उठा था और उस समय श्रीमान् लेफ्टिनेण्ट गवर्नर ने इस पर विचार करने के लिये एक छोटी सी समिति बना दी थी, पर उस समिति की रोमन के क्रमश: प्रचार करने सम्मति सरकार को स्वीकृत न हुई और श्रीमान् सर एण्टोनी मैकडोनेल ने उस प्रस्ताव को यह विचार करके अस्वीकृत कर दिया कि रोमन के प्रचार होने से सरकारी देश-भाषा की ओर से उदासीन हो जायेंगे| भारतवासियों को अपनी भाषा विदेशी अक्षरों में लिखने को कहना वैसा ही है जैसा कि अंग्रेंजों से अपनी भाषा को नागरी अक्षरों में लिखने के लिये कहना |एक शताब्दी तक उद्योग करते रहने पर भी रोमन लिपि को सफलता प्राप्त न हुई और यह यह आशा कदापि नहीं की जा सकती कि प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति के साथ कभी वह अवसर भी आवेगा जब रोमन लिपि का किसी प्रान्त में प्रचार हो| पर यह समझ में नहीं आता कि जब सरकार ने रोमन अक्षरोंको अस्वीकार किया तो वह अबतक क्यों फारसी अक्षरों को यथास्थित छोड़े हुई है|जो दोष रोमन अक्षरों पर लगाए जाते हैं वे ही दोष फारसी अक्षरों पर भी लगाए जा सकते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि ये अक्षरविदेशी हैं और यद्यपि मुसलमानी राज्य के प्रारम्भ से ही इसका अदालतोंमें प्रचार होतारहा है, पर अबतक शिक्षित मुसलमानों और जीविका के लिये फारसी सीखे हुएहिन्दुओं को छोड़कर और कोई भी इन्हें नहीं सीखता। जनसाधारण तो इन्हें नाममात्र कोभी नहीं जानते। वे अपना सब काम नागरी, कैथी या महाजनी अक्षरों की सहायता सेचलाते हैं। फारसी अक्षरों के प्रचार से यही फल हो रहा है कि जिन लोगों का सर्वस्वअदालतों की कार्रवाइयों पर निर्भर रहता है, वे तबतक उनका एक अक्षर भी नहींसमझपाते जबतक कि वे अत्यन्त कष्ट उठाकर उन्हें किसी मुहर्रिर या मुख्तार से न पढ़वा लें।दर्ख्वास्तेंऔर अर्जीदावे आदि सब फारसी अक्षरों मेंलिखे जाते हैं, परन्तु जो लोग उनपर हस्ताक्षर करते हैं और जिनकी ओर से कचहरी में वे अर्जियाँ दी जाती हैं, वे उनपर हस्ताक्षर तो करते हैं पर उनका एक अक्षर भी नहीं समझ पाते! गाँव के लोगों को बहुधा इससे अवर्णनीय कष्ट उठाना पड़ता है। सरकार कीसदा से यह इच्छा रहती हैकि प्रजा के लिये सुखकर नियम बनाए जायँ और वैसे ही प्रबन्ध हों, तथा इसी इच्छाके अनुसार उसके सम्पूर्ण कार्य होते भी हैं; परन्तु यह समझ में नहीं आता कि ऐसीन्यायप्रिय सरकार उपर्युक्त बातोंको जानकर भी प्रजा के कष्ट को क्यों नहीं दूरकरती? इस बात को सरकार भी स्वीकार करती है कि नागरी अक्षरोंके प्रचार से ये असुविधाएँदूर हो जायँगी, क्योंकि अवध में बेदखली आदि की सूचनाएँ हिन्दी और उर्दू दोनों मेंनिकलती हैं। बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने भी गत वर्ष यह आज्ञा दे दी है कि सम्मन आदि हिन्दीऔर उर्दू दोनोंमेंलिखे जाया करें। बस इन काराजोंको छोड़कर पश्चिमोत्तर प्रदेश में(गढ़वाल और कुमाऊँ जिलों को छोड़कर) कहीं भी हिन्दी का प्रचार नहीं है। फारसी अक्षरोंके विरोध मेंकेवल यही नहीं है कि वे विदेशी हैं तथाभारतवासी उन्हेंनहीं जानते, बल्कि ये अक्षर नितान्त अवैज्ञानिक, अपूर्ण और अत्यन्त भ्रामक हैं। साधारणत: जिस प्रकार से ये अक्षर लिखे जाते हैं और विशेषकर अदालतोंमें जिस प्रकार की लिखावट होती है उससे लोक का बड़ा अनिष्ट होता है। इन अक्षरों में बड़ा भारी दोषतो यह है कि एक बार जो लिखा गया उसका ठीक वैसा ही पढ़ाजाना कठिन तो है ही साथ ही कभी-कभी तोअसम्भव ही हो जाता है। इन कारणों से अदालतों मेंसर्वथा इनका प्रचार अयुक्त है। शिकस्त: फारसीसे जो अनिष्ट होता है वह छिपा नहीं है। अनेक बार उसके विषय में लिखापढ़ी हो चुकीहै | प्रोफ़ेसर मोनियर विलियम्स ने ३० दिसम्बर सन्१८५७ ई. के ‘टाइम्स’नामक पत्रमें फारसी अक्षरों के दोष पूर्ण रूप से दिखाए हैं। उनका कथन है कि "इन अक्षरोंको सुगमता से पढ़ने के लिये वर्षो का अभ्यास आवश्यक है” । वे कहते हैं कि इन अक्षरों में चार ““ज”” के रूप होते हैं तथा प्रत्येक अक्षरके प्रारम्भिक, मध्यस्थ, अन्तिम या भिन्न होने के कारण चार भिन्न-भिन्नरूप होते हैं। अन्त में प्रोफेसर साहब कहते हैंकि चाहे ये अक्षर देखने में कितने ही भले क्यों न लगता हों, पर न तो ये कभी पढ़े जाने योग्य हैं और न छपने के ही योग्य हैं, तथा भारत में विद्या और सभ्यता के विकास में सहायता होने के तों सर्वथा अनुपयुक्त हैं। डॉक्टर राजेन्द्रलाल, प्रोफेसर डॉसन और श्री ब्लैकमैन तथा राजा शिवप्रसाद आदि बड़े-बड़े विद्वानों ने दृढ़तापूर्वक प्रोफेसर मोनियर विलियम्स केमत का समर्थन किया है। भारतेन्दु बाबूहरिश्चन्द्र लिखते हैं कि जिनफारसी अक्षरोंऔर विशेषकर शिकस्त: में अदालतों का काम चलता है वे मुख्तारों,वकीलों और धूर्तो के लिये आय का एक अच्छा मार्ग है। एक ही चिह्न ऐसा बनाओ और यह मान लो कि वह किसी ग्राम का नाम है। यदि हम पहले अक्षर को 'वे'मानलेंतो उसका उच्चारण ११ प्रकार से होगा। जैसे बबर, बपर, बतर, बटर, बसर, बनर,बहर, बयर, बेर, बैर, बीर | फिर यदि हम पहले अक्षर को 'पे', 'सीन', 'ते', 'हे', नून, हे, 'वाव', 'ये" मानेंतो उस शब्द का उच्चारण ७७ प्रकार से हो सकता है। यदि हमउपर्युक्त शब्दों में से प्रथम आठ शब्दों के स्वर को बदल दें तो ६० शब्द और बन जायेंगे। जैसे बुनर, बिनर, हुनर, सिपर आदि। फिर यदि हम अन्तिम अक्षर को 'बे' या ‘रे’मानें तो ३०४ शब्द बन जाते हैं, और यदि हम यह जान लें कि अन्तिम अक्षर में ““दाल”” है तो पुरे १५२ शब्द और बन जाते हैं। इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि एक शब्दजो तीन अक्षरों का है तथा जिसके अक्षर के तीन ही भिन्न रूप हो सकते हैं वह ६०६प्रकार से पढ़ा जायगा। यदि हम इसी शब्द के अन्तिम अक्षर को ‘बे’ में बदल दें तो हम एक हजार और नये शब्द बना सकेंगे। बलिहारी है ऐसे अक्षरों की। इस विषय में‘पायोनियर’ पत्र का यह मत है कि आवश्यक कागजात लिखने के लिये तो इनसे बुरे अक्षरों की मन में कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस बात के कहने को अब कोई आवश्यकता बाकी नहीं रह गई कि इनअक्षरों में अदल-बदल होना कोई कठिन नहीं है, क्योंकि एक बिन्दी के देने मात्र सेही कुछ-का-कुछ हो जाता है। रहा उन अक्षरों का पढ़ना। कलेक्टर, जज और वकीलों को तो छोड़ दीजिए-वे मुहर्रिर भी, जिन्हेंरात-दिन अदालती कागजों के पढ़ने के अतिरिक्त और कुछ काम ही नहीं रहता, बेचारे पहरों एक-एक शब्द पर रुके रह जाते हैं और उसे पढ़ ही नहीं पाते। हिन्दुओं की तो बात ही छोडिए, बी.ए. तक अरबी-फारसी पढ़ने वालेमुसलमान भी वकालत की परीक्षा में साधारण अदालती लिखावट नहीं पढ़ सकते। अभी थोड़े ही दिन हुए कि इलाहाबाद हाइकोर्ट में एक बड़ा भारी मुकदमा पेश हुआथा। उसमेंएक मनुष्य का नाम ऐसा लिखा था जो झिंगुरी राय तथा चिखुरी राय दोनों तरह से पढ़ा जा सकता था। बहुत दिनोंतक छान-बीन करने पर भी यह मुकदमा तय नहीं हुआ और अन्त में प्रिवी कौन्सिल तक गया। वहाँ यह निर्णय हुआ कि झिंगुरी राय तथा चिखुरी राय दोनों एक ही पुरुष के नाम थे। नरही ताल्लुकों के २९ मुक़दमे हाइकोर्ट में पेश हैं, जिनका फैसला गाजीपुर के सब जज ने दो वर्ष हुए,किया था|इन मुकदमों का फैसला नामों के ठीक-ठीक पढ़े जाने पर निर्भर है | एक मुक़दमे में एक नाम कागजों पर कई जगह लिखा मिला जो कहींसहज कुँवर,कहीं सजन कुँअर और कहीं सजह कुँअर तथा कहीं बात कुँअर पढ़ा गया | इसी मुकदमे में उदितनारायण का नाम उदयनारायणतथा वैजनाथ का नाम जपनाथ पढ़ा गया|पुन: हरदयाल राय केमुकदमे में भी यही गड़बडी हुई। इन मुकदमों का पूरा आनन्द उस समय आवेगा जबइनकी सुनवाई हाइकोर्ट में प्रारम्भ होगी। ये दो-तीन दृष्टान्त साधारण रीति के यहाँ दिएगए हैं। न जाने ऐसे कितने मुकदमे प्रतिदिन हुआ करते हैं। यह कहना तो कदाचित् ठीकहो कि अदालत इन नामों को जैसा पढ़ती है वह ठीक है पर यदि यह मान भी लियाजाय तो यह समझ में नहीं आता कि वादी, जज आदि सब लोग अक्षरों के लिये हीइतना कष्ट क्योंउठावें? इससे तो अदालत के समय का तथा गरीब प्रजा के धन काव्यर्थ अपव्यय होता है। प्रथम तो नागरी अक्षर निर्दोष हैं। फिर भी यदि नागरी अक्षरों में भी उतनी हीत्रुटियाँ होतीं जितनी फारसी में हैंतो भी नागरी अक्षरों का ही प्रचार होना इसलियेआवश्यक था कि उन अक्षरोंको प्रजा भली भाँति जानती है। श्री बडेन् महोदय के कथनानुसार तो नागरी अक्षरों का कोई कितना ही बड़ाविरोधी हो और घोर शत्रु ही क्यों न हो, वह यह नहीं कह सकता कि इनमें किसी प्रकारकी त्रुटि है। इन अक्षरोंकी मनोहरता, सुंन्दरता, स्पष्टता, पूर्णता, और शुद्धता की विद्धानोंने केवल प्रशंसा ही नहींकी है बल्कि उसी के आधार पर रोमन में अन्य भाषाओं केशब्दों के लिखने के लिये नियम और चिह्न बनाए गए हैं। प्रोफेसर मोनियर विलियम्सकहते हैंकि “स्थूल रूप से यह कहा जा सकता है कि देवनागरी अक्षरों से बढ़कर पूर्ण और उत्तम अक्षर दूसरे नहीं हैं””। प्रोफेसर साहब ने तो इनको देवनिर्मित तक कह दियाहैं| किन्तु उपर्युक्त प्रोफेसर महोदय के ध्यान में नागरी अक्षर इतने अधिकसर्वांगपूर्ण हैं कि उनसे प्रतिदिन का कार्य नहीं चल सकता। उसके उत्तर में यह कहाजा सकता है कि भारतवर्ष के कई स्थानों में बहुत काल से नागरी अक्षरों का प्रचार हैऔर आज तक वहाँ कार्य करने में किसी प्रकार की भी कठिनता नहीं हुई। फिर यहकहा जा सकता है कि नागरी अक्षरों में रोमन के 'जेड्' और 'एफ्' और अरबी तथाफारसी के 'फे', 'काफ़', 'गैन' और 'जाल' अक्षरों के लिये कोई चिह्न नहीं हैं। इसकेउत्तर में रेवरेण्ड बेट्स कहते हैं कि नागरी अक्षरो के नीचे एक बिन्दी देने से अरबीतथा फारसी अक्षरों का उच्चारण ठीक-ठीक हो सकता है, और उन्हेंकोई भी साधारण शिक्षा-प्राप्त पुरुष सुगमता से समझ सकता है। सर आइजेकृ पिटमैन ने कहा है कि “संसार में यदि कोई सर्वांगपूर्ण अक्षरहैं तो नागरी के हैं”| बम्बई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सर अर्सकिन पेरी ने 'नोट्सटु ओरिएण्टल केसेज’की भूमिका में लिखा है कि एक लिखित लिपि की सर्वान्गपूर्णता इसी से जान पड़ती है कि प्रत्येक शब्द का उच्चारण उसके देखने से ही ज्ञात हो जायऔर यह गुण भारतवर्ष के अन्य अक्षरों की अपेक्षा देवनागरी अक्षरों में अधिक पायाजाता है, जिसमें संस्कृत लिखी जाती है। उस गुण से लाभ यह है कि हिन्दूबालकों ने जहाँ अक्षर पहचान लिए कि वे सुगमता से तथा बिना रुकावट के पढ़ने लग जाते हैं।इस कारण जिस भाषा का पढ़ना सीखने में यूरोप में जहाँ बहुधा कई वर्ष लग जाते हैं वह भारतवर्ष में बहुधा तीन मास में ही आ जाती है।" ‘पायनियर’पत्र ने भी १० जुलाई सन् १८३७ ई. के अंक में लिखा है कि “नागरी अक्षर मन्द गति से लिखे जाते हैं, परन्तुजब एक बार लिख जाते हैं तो वे छपे हुए के समान हो जाते हैं, यहाँ तक कि उनमेंलिखे हुए शब्द को उसका अर्थ न जानने वाला व्यक्ति भी शुद्धतापूर्वक पढ़ लेगा|” सरकार ने सदा अनेक प्रकार से प्रजा को सुखी करने की चेष्टा की है तथा उसकी सदा यह इच्छा रही है कि लोग सुगमता से कचहरियों की कार्रवाईयों को समझ सकें| ऐसा होने पर भी यह विचारकर दु:ख होता है कि हजारों वर्षो से प्रचारित नागरी जैसे उत्तम और पूर्ण अक्षरों का निरादर करके यहाँ की कचहरियों में बहु-दोष-पूर्णतथा अत्यन्त भ्रामक फारसी अक्षरों का सरकार ने प्रचार कर रक्खा है। यहाँ यह बात ध्यान में लाने की आवश्यकता है कि बारह सौ वर्ष तक फारसी अक्षरों के सम्मान औऱनागरी अक्षरों के तिरस्कार होने पर भी नागरी अक्षरों पर से यहाँ की प्रजा का अविकलप्रेम जरा सा भी नहीं घटा है, बल्कि आजतक उसी में अथवा महाजनी, कैथी आदिउसके अन्य रूपों में सर्वसाधारण का सब काम चलता है। यह कहा जा चुका है कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यूने अपने ८ मई सन् १८५७ के आज्ञापत्र में यह लिखा था कि यहाँकी साधारण प्रजा काश्तकार और जमीन्दारों में नागरी अक्षरों का प्रचार है और इसी आधार पर यह आज्ञा दी थी कि पटवारियों के कागजात उन्हीं अक्षरों मेंलिखे जायँ।इस कथन के साथ-ही-साथ यहाँ एक बात और कह देनी आवश्यक है कि टॉम्सनमहोदय के समय में इन प्रान्तों में प्रारम्भिक शिक्षा का प्रादुर्भाव हुआ और उसी समयकुछ स्कूलीय पुस्तकें हिन्दी और उर्दूमें छापी गईं। सन् १८५०-५१ में १४३३१ पुस्तकें बिकीं, जिनमें से ९०८७ हिन्दी की, १३०७ उर्दू की औऱ ९३७ उर्दू-हिन्दी की थी। शिक्षा-विभाग के सन् १८६३-६४ के विवरण के इकसठवें पृष्ट में लिखा है कि इस वर्ष ३०५७४८ पुस्तकें छपीं और खरीदी गईं। इनमें से ५०२६० उर्दू की, २०९९८० (जिनमें २००० नक्शे थे)हिन्दी की,१०००० फारसी की,और १९८०८ अंग्रेजी की थीं, तथा ९००० हिन्दी-उर्दू के नक्शेथे। इसी प्रकार नॉर्थ इण्डिया बाइबिल ऐण्ड ट्रैक्ट सोसाइटी के विवरण में हिन्दी ग्रन्थों की अधिकता प्रतिवर्ष देख पड़ती है। श्री ग्राउस महोदय ने एजुकेशनल कमीशन को सन्१८८२ ई. में लिखा था कि “बुलन्दशहर जैसे मुसलमानी जिले में म्युनिसिपल कमेटियों के आधे से अधिक सभासद इस देश के अक्षरों (नागरी) को ही पढ़ सकते हैं |तहसीली कमेटियों में तो इनकी संख्या इससे भी अधिक होगी। सन् १८९१ की मनुष्य-गणना लिखने के लिये जितने लोग नियुक्त किए गए थे उनमें से ८०११८ने हिन्दी में,४०१९७ ने कैथी में (जो हिन्दी का एक रूपान्तर है) लिखा, अर्थात् सब मिलाकर १२०३१५ लोगों ने हिन्दी में और ५४२४४ ने फारसी में लिखा | जिस समय गाँवोंमें स्कूल खोले गए, उस समय हिन्दी पढ़नेवालों की संख्या उर्दू पढ़नेवालों से छ:गुनी थी और पचास वर्ष तक उर्दूका आदर और हिन्दी का निरादर रहने पर भी ३१ मार्च सन्१८९६ को १०५४४६ बालक हिन्दी और ५२६६९ बालक उर्दूपढ़तेथे। इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि हर तरह से हतोत्साह हाने पर भी इन प्रान्तों में फारसी अक्षरों से कहीं अधिक नागरी अक्षरों का प्रचार है और वे अधिकप्रयोजनीय हैं। फारसी अक्षरों का जो कुछ प्रचार है वह केवल इसीलिये है कि अदालतों का काम उन्हीं अक्षरों द्वारा होता है | आज यदि नागरी अक्षरों का प्रचार फारसी अक्षरों के स्थान पर हो जाय तो कल ही फारसी य उर्दू पढ़ने वालों की संख्या घट जायेगी|३१ मार्च सन् १८९६ ई. को वर्नैक्यूलर प्राइमरी स्कूलों में १३५४९७ हिन्दू और २१५१० मुसलमान बालक शिक्षा पाते थे। उनमें से ५२६६९उर्दू पढ़ते थे | अब यदि यह मान भी लिया जाय कि प्रत्येक मुसलमान उर्दूपढ़ता है (यद्यपि वास्तव में यह बात नहीं है) तो ३१००० हिन्दू बालकों को बाल्यावस्था से ही उर्दू सीखनी पड़ती है, जिसके सीखने मेंउन्हें हिन्दी सीखने के बनिस्बत अधिक समय लगता और विशेष कठिनता होती है। इस प्रकार उर्दू सीखने का मुख्य कारण यही हैकि जीविका-निर्वाह के लिये वह अत्यन्त आवश्यक है। यह दृढ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि यदि अदालतों में नागरी अक्षरोंका प्रचार हो जाय तो केवल हिन्दूही नहीं बल्कि मुसलमान भी उर्दू सीखना छोड़कर गुणागरी नागरी सीखने में अपना समयऔर द्रव्य लगावेंगे। इससे यह स्पष्ट है कि न्याय, उपयुक्ता और आवश्यकता पर ध्यानदेकर अब नागरी अक्षरों के प्रचार की आज्ञा देने में कोई बाधा न होनी चाहिए। कुछलोगों का यह कहना है कि नागरी अक्षरोंमें उतनी शीघ्रता से कार्य नहीं हो सकताजितना फारसी में। प्रथम तो इस बात में सन्देह है कि वास्तव में इन प्रान्तों कीकचहरियों और दफ्तरों मे मुहर्रिर लोग उससे अधिक शीघ्रता से काम कर सकतेहैं जितनी शीघ्रता से कुमाऊँ, बिहार, मध्यप्रदेश आदि स्थानों में हिन्दी में होता है। यदि यहमान भी लिया जाय कि फारसी में अधिक शीघ्रता से काम चलता है तो भी यह बातऐसीनहींहै जिससे नागरी के गुणों तथा स्वत्तवोंमेंकोई कमी आवे । शिकस्त: लिखनेमें यदि अदालत का कुछ थोड़ा सा समय बच जाता है तो इस बात पर भी ध्यान देनाचाहिए कि उन्हीं कागजों के पढ़ने में कितना समय नष्ट होता है और अन्त में नामों आदिके विषयमें जो सन्देह बाकी रह जाता है वह घलुए में है। नागरी अक्षरों में लिखने सेयदि समय कुछ अधिक लग जाता है तो पुन: उसके पढ़ने में न कोई कष्ट होता है औरन कुछ सन्देह बाकी रह जाता है। सर्वसाधारण का बहुमूल्य समय व्यर्थ नष्ट करनाकदापि उचित नहीं है। सर्वसाधारण के समय के अन्तर्गत केवल क्लर्कों तथा साक्षी आदि लिखनेवाले अफसरों का समय ही नहीं समझना चाहिए; बल्कि नकल करने वालों, अनुवाद करने वालों और उन अदालतों का समय भी उसमें सम्मिलित है जिन्हेंकागजों को अन्त में पढनाया पढ़वाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त न्याय और प्रजा के सुभीते पर भी ध्यान रखना उचित है | कागजों और पत्रों के शुद्ध और स्पष्ट लिखे जाने के गुण टाइपराइटरों के अधिक प्रचार से इतने अधिक स्पष्ट हो रहे हैं कि अब इस बात के कहने की कोई आवश्यकता नहीं है कि नारारी अक्षरों के प्रचार में केवल इन्हीं कारणों से बाधा न होनीचाहिए कि ये शिकस्त: के बराबर शीघ्र नहीं लिखे जा सकते। रीवाँ, बिहार, मध्यप्रदेश और कुमाऊँ आदि स्थानों में नागरी अक्षरों के प्रचार से यह बात अब स्वत:सिद्ध हो गईहै कि ये अदालतों को आवश्यकता के अनुकूल उतनी शीघ्रता और सुगमता से लिखेजा सकते हैं। यदि फारसी अक्षर नागरी की अपेक्षा अधिक सुगमता से लिखे जा सकतेहैं तो वे नागरी के रूपान्तर गुजराती, बंगाली, मराठी और कैथी आदि से भी शीघ्र लिखेजा सकते हैं। परन्तु सरकार ने प्रजा के सुभीते और न्याय पर ध्यान न देकर इन्हीं अक्षरोंका प्रचार कर रक्खा है। इसलिये यह आवश्यक है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध कीकचहरियों और वहाँ के दफ्तरों में फारसी के स्थान पर नागरी अक्षरों का प्रचार कियाजाय| और भी कई कारण ऐसे हैं जिनसे इन प्रान्तवालों की भाषा को और उनकेअक्षरों को दफ्तरों और कचहरियों में उनके योग्य स्थान मिलना चाहिए। इनमें से मुख्य कारण प्रारम्भिक शिक्षा और प्रजा की उन्नति है। सन् १८५४ ई. के शिक्षा विषयकआज्ञापत्र में कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने लिखा था कि “कई आवश्यक विषयों में से शिक्षाके विषयोंपर हम लोगों से बन पड़े (तो) भारतवासियों को वे भौतिक और नीतियुक्तपुरस्कार देंजो विद्या के प्रचार से मिलते हैं और जिन्हें भारतवर्ष ईश्वर की दया से इंग्लैण्डके साथ अपने सम्बन्ध के कारण प्राप्त करे।" इसके उपरान्त सरकार का कार्य औरउसका कर्त्तव्य दिखलाकर कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने लिखा कि “हम लोगों को अब एकदूसरे विषय पर ध्यान देना आवश्यक है, जिस पर हमने आज तक कुछ भी ध्यान नहींदिया। अर्थात् वह कौन सी रीति है जिससे हम लोग भारतवर्ष की इस प्रजा को, जो स्वत:किसी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी या कर सकती, ऐसी आवश्यक और अर्थकारीशिक्षा दे सकें जो सब वर्ग की प्रजा के उपयुक्त हो? हम लोगों कीयह इच्छा है किसरकार विशेषत: भविष्य में इस उद्देश्य की सफलता के लिये प्रयत्नशील हो और हमलोग इसके लिये विशेष धन व्यय करने की आज्ञा देने को उद्यत हैं।" इसके २८ वर्ष उपरान्त भारत सरकार ने ‘एड्युकेशन कमीशन’नियुक्त करतेसमय लिखा था कि “श्रीमान् गवर्नर-जनरल की यह इच्छा है कि कमीशन कोइस बातका ध्यान रखना चाहिए कि सरकार प्रारम्भिक शिक्षा के विषय को कितना अधिकमहत्त्वपूर्ण समझती है। अतएव कमीशन की जाँच का मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए किभारतवर्ष भर में प्रारम्भिक शिक्षा की क्या अवस्था है और उसकी उन्नति तथा उसकेप्रचार के लिये क्या-क्या उपाय करने चाहिए?" जाँच और विचार करने पर एड्युकेशनकमीशन ने एक मत होकर यह सम्मति दी कि "सरकार को प्रारम्भिक शिक्षा पर हीविशेष ध्यान देना चाहिए और उसके लिये वह सब धन व्यय होना उचित है, जो शिक्षाके लिये स्थानीय कोष (लोकल फण्ड) के निमित्त अलग कर दिया गया है। प्रान्तों की आय से भी इसके लिये अधिक धन लेना चाहिए।" यह सम्मति गवर्नर-जनरल और भारत-सचिव दोनों ने स्वीकार की और तब से श्रीमान् वाइसराय प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति पर हर्ष के साथ यह आशा करते हैं कि प्रान्तीय सरकारों का उद्योग इसओरप्रतिदिन बढ़ता जाय | श्रीमान् सर एण्टोनी मेकडौनल ने भी प्रारम्भिक शिक्षा पर पूराजोर दिया है तथा वे इसकी उन्नति को अपने शासनकाल का मुख्य कर्त्तव्य मानते हैं।अतएव अब प्रारम्भिक शिक्षा की आवश्यकता और उसके सम्बन्ध मेंसरकार की इच्छाके विषय में कोई सन्देह नहीं रह गया और न इसी बात में कोई सन्देह है कि इस शिक्षाका सफलतापूर्वक प्रचार देश-भाषा के द्वारा ही हो सकता है। श्री फ्रेड्रिक जॉन शोर नेलिखा है कि "भारतवासियों में से अधिकांश लोगों को उनकी देश-भाषा द्वारा शिक्षित बनाना चाहिए तथा उसी के द्वारा वे शिक्षित बनाए भी जा सकते हैं।" विद्धान् मैकॉले ने भी यही बात कही है कि जब केवल प्रारम्भिक शिक्षा हीउद्देश्य हो तो देशवासियों की ही भाषा द्वारा सिखाना सबसे सुगम है। कोर्ट ऑफडाहरेक्टर्स ने सन् १८५४ के आज्ञापत्र में लिखा है कि हमलोगों का न तो यह उद्देश्यही है और न इच्छा ही है कि देशभाषा के स्थान पर अंग्रेजी पढ़ाई जाय | हम लोगों नेसदा उन भाषाओं के प्रचार की आज्ञा पर उचित ध्यान दिया हैं जिन्हेंदेशवासियों कासमूह जानता हो। हम लोगों ने अंग्रेजी की उपेक्षा कर इन्हीं भाषाओंकी कचहरियों मेंतथा सरकारी अफसरों और प्रजा के परस्पर व्यवहार में फारसी के स्थान पर प्रचलितकिया है। यह अनिवार्य है कि शिक्षा प्रणाली में इन देशी भाषाओं की शिक्षा परदृढ़तापूर्वक ध्यान दिया जाय और इन्हीं के द्वारा उन आवश्यक उन्नत विद्याओं काभारतवासियों मेंप्रचार हो जिन्हेंवे विदेशी भाषा की कठिनाइयों या अपनी दुरवस्था केकारण न सीख सकते हों। शिक्षा देने के लिये अंग्रेजी उन्हीं स्थानों मेंपढ़ाई जानी चाहिएजहाँ उसकी चाह हो। परन्तु अंग्रेजी के साथ-साथ उस जिले की देशी भाषा का तथाउस भाषा मेंजिन विषयोंकी शिक्षा हो सकती हो उन अन्य बातों को सिखाने पर भीध्यान रहे। जिन्होंने अंग्रेजी द्वारा विद्याध्ययन करने की योग्यता प्राप्त कर ली है उन्हें उसीके द्वारा शिक्षा दी जाय, पर जो लोग अंग्रेजी न जानते हों, उन लोगोंकी शिक्षा देश-भाषा द्वारा ही हो।" इस मत का अनुमोदन भारत-सचिव ने सन् १८५९ ई. में कियातथा एड्युकेशन कमीशन ने जाँच और विचार के उपरान्त यह निश्चय किया कि“प्रारम्भिक शिक्षा वह है जो देशभाषा द्वारा जनसाधारण के उपयोगी विषयों में दी जायऔर जो यूनिवर्सिटी-शिक्षा के आरम्भिक रूप न समझी जाती हो।" इस परिभाषा कोसरकार ने स्वीकार किया और तभी से इसे निश्चित समझना चाहिए। इस लेखके आरम्भमें यह बात सिद्ध की जा चुकी है कि इस प्रान्त की भाषा हिन्दी है। फारसी तथा अरबीशब्दों की भाषा हिन्दी है। फारसी तथा अरबी शब्दों की अधिकता होने से तथा उसकेविदेशी अक्षरों में लिखे जाने के कारण शिक्षित मुसलमानों और राज्य-कर्मचारियों कोछोड़कर जनसाधारण में उर्दूकभी प्रचलित न हुई। इसी कारण से इसके द्वारा प्रारम्भिकशिक्षा का प्रचार यथेष्ट नहीं हो सकता। पश्चिमोत्तर प्रदेश की सरकार ने इस बात को प्रारम्भ में समझकर यह आज्ञा दी थी कि स्कूलों में हिन्दी पढाई जाय, परन्तु जब उर्दू का प्रचार अदालतों में किया गया तोयह आवश्यक समझा गया कि उसके अध्ययन में लोग उत्साहित किए जायं। इसी उद्देश्य से सरकार ने सन्१८४४ ई. में इसबात पर जोर दिया कि उर्दूके पढ़नेवाले उत्साहित किए जायँ। परन्तु किसी प्रकार के उत्साह की आवश्यकता न थी। अदालतों में उर्दूका प्रचार ही उसकी उन्नति का प्रधान साधन हुआ| इससे हिन्दी को अधिक हानि पहुँची, यद्यपि हिन्दी के द्वारा ही केवल प्रारम्भिकशिक्षा उत्तम रीति से दी जा सकती है। उर्दू पढ़ने वालों को सऱकारी नौकरी की आशा थी, पर बेचारे हिन्दी पढ़नेवालों का भविष्य बिलकुल अन्धकारमय था। जिन्हेंसरकारी नौकरी की इच्छा थी या जो वकालत करना चाहते थे उन्होंने उर्दू पढ़ना आरम्भ किया। परन्तु जिन्हेंकिसी बात की आवश्यकता नथी और जो सरकारी नौकरी के लिये भी लालायित न थे एक कठिन विदेशी भाषा के सीख़नेमें न तो कोई लाभ ही समझा और न यही चाहा कि अपनी मातृभाषा हिन्दी के सीखनेके लिये वे स्कूलों के नियमोंसे बद्ध हों। क्योंकि प्रथम तो उर्दू पढ़ने वाले लोग उन्हेंअनादर की दृष्टि से देखने लगे और फिर इसके पढ़ने में किसी प्रकार का उत्साह तोकहींसे मिलता ही न था। बस हिन्दी की उन्नति तथा उसके प्रचार का अन्त तो इसप्रकार से हो गया। जिन्हें किसी प्रकार से नागरी जानना आवश्यक हुआ उन्होंने उसे घरपर या पाठशालाओं मेंपढ़ लिया। इसलिये जनसाधारण में हिन्दी के प्रचार का कोई विशेष प्रयोजनीय कारण न रहा। इस प्रकार से जहाँ किसी समय बड़े-बड़े पण्डित औरसभ्य आर्य लोग बसते थे, आज़ उसी पश्चिमोत्तर-प्रदेशको सब प्रान्तों से अधिक जड़और अशिक्षित बनने का दिन नसीब हुआ। सन् १८४३ ई. में इस प्रान्त के शिक्षा-विभाग का प्रबन्ध सरकार ने प्रान्तीयसरकार के हवाले किया। उस समय यहाँ के लेफ्टिनेण्ट गवर्नर श्री टॉम्सन थे। उन्होंनेदेशभाषा में प्रारम्भिक शिक्षा देना निश्चय किया और उसी उद्देश्य से प्रत्येक तहसील मेंएक-एक वर्नाक्यूलर स्कूल खोला गया। इसके थोड़े ही समय बाद हल्काबन्दी स्कूलखुले। निदान सरकार के उत्साह, प्रोत्साहन और सहयोग से देशी स्कूलों की संख्या बढ़ी और जमीन्दारों ने अपनी आय पर एक रुपया सैकड़ा शिक्षा के लिये देना स्वीकार किया। इस प्रबन्ध से प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति तथा उसके प्रचार की पूर्ण आशा और सम्भावना हुई तथा कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने अपने १८५४ ई. के आज्ञापत्र में श्रीयुत टॉम्सन के प्रबन्ध की बड़ी प्रशंसा की और अन्य प्रान्तीय सरकारों को उसका अनुकरण करने की सम्मति दी। उसके अनुसार सब प्रान्तों में आवश्यक परिवर्तन सहित प्रबन्ध भी हुआ। पश्चिमोत्तर प्रदेश को छोड़कर अन्य प्रान्तोंमें इस प्रारम्भिक शिक्षा के प्रबन्ध को पूर्ण सफ़लता मिली, परन्तु जहाँ इसका जन्म हुआ वहाँकी दशा अत्यन्त शोचनीय होती गई|इसका कारण यही है कि अन्य प्रान्तों में वहीं की भाषा में शिक्षा का प्रचार हुआ। परन्तु यहाँकी कचहरियों में मातृभाषा हिन्दी के बदले उर्दूका प्रचार किया गया जो प्रारम्भिक शिक्षा का मुख्य अवरोधक हुआ। सन् १८६३ ई. में एक महाशय ने “ “कलकत्ता रिव्यू”” में “उडीसा में देशभाषा की शिक्षा” शीर्षक एक लेखलिखा था |उसके अनुसार सन् १८५३ ई. में पश्चिमोत्तर प्रदेश के उन आठ जिलों में केवल ३,४६९ स्कूल और ३६,८८४ विद्यार्थी थे, जहाँ प्रारम्भिक शिक्षा के प्रचार का पूर्ण उद्योग किया गया था और जहाँ ४२,७२०००मनुष्य बसते थे। सन् १८५४ ई. में उड़ीसा के कटक, पुरी तथा बालासोर जिलों में ३,०८५स्कूल और २७,००० विद्यार्थी थे, जहाँ के ( पुरूष) वासियों की संख्या कोई १,००,००००के लगभग होगी। पश्चिमोत्तर प्रदेश में राजा और प्रजा दोनों के उत्साह से जो सफ़लता नहीं हो सकी वह उड़ीसा में केवल प्रजा के ही उत्साह और उद्योग से प्राप्त हो गई। इसका कारण यही है कि उडीसा की कचहरियों मे वहाँ की मातृभाषा उड़िया का प्रचार है, परन्तुपश्चिमोत्तर प्रदेश में एक विदेशी भाषा और विदेशी अक्षरों में ही सब सरकारी काम होताहै। हसी कारणउड़ीसामें विद्याध्ययन की अधिकता और यहाँ उसी बात का अभाव हुआ।कचहरियों में उर्दू का प्रचार होने पर भी ३० सितम्बर सन् १८५४ ई.के आज्ञापत्र में‘बोर्डऑफ रेवेन्यू’ने यह उपदेश किया कि पटवारियों के कागजात हिन्दी भाषा और नागरीलिपि में लिखे जायँ। इस पर लोगों को यह आशा हुई कि अब सरकार हिन्दी के स्वत्त्वों पर विचारकर उसका कचहरियों मेंप्रचार करेगी। इसलिये हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या उर्दू पढ़नेवालों से छ:गुनी हो गई थी, परन्तु यह अवस्था बहुत थोड़े काल तक रही। जब लोगोंने यह देखा कि कचहरी की भाषा में कोई परिवर्त्तन नहीं हुआ और न होने की आशाही है, उर्दूजानने वालों की पूछ है, और वे उच्चपद प्राप्त कर अपनी प्रत्येक प्रकार सेउन्नति कर रहे हैं और हिन्दी जानने वालों की कहीं कोई भी सुध नहीं लेता तो उन्हेंहारकर अपने मातृ-भाषा-प्रेम को तोड़ना पड़ा और उर्दू भाषा की ओर दत्तचित्त होनापड़ा। पर इस भाषा की कठिनता ने उनको कृतकार्य न होने दिया और अन्त मेंकेवलवे ही लोग शिक्षाकाँक्षी रह गए, जिनके पास जीविका निर्वाह के लिये नौकरी केअतिरिक्त और कोई अवलम्ब न था। इस प्रकार सरकार का जनसाधारण में विद्या फ़ैलाने का उद्योग निष्फल हुआ। इस कथन की पुष्टि निम्न्लिखित तालिका से होती है। पश्चिमोत्तर प्रदेश के प्राइमरी (हल्काबन्दी) स्कूलों में सन् १८६० से १८७४ ई. तक हिन्दी तथा उर्दूपढ़ने वालों की तुलनात्मक संख्या ।

 वर्ष  पश्चिमोत्तर प्रदेश (कुमाऊँ तथा गढ़वाल को छोड़कर)    कुमाऊँ और गढ़वाल
   उर्दू या फारसी  हिन्दी  हिन्दी
उर्दू या फारसी हिन्दी हिन्दी १८६०-६१ १८६१-६२ १८६२-६३ १८६३-६४ १८६४-६५ १८६५-६६ १८६६-६७ १८६७-६८ १८६८-६९ १८६९-७० १९७०-७१ १९७१-७२ १९७२-७३ १९७३-७४ ११,४९० १७,४३१ २०,०७३ २०,१८० २१,६१८ २१,९८२ २४,०५८ २५,६५७ ३२,३७७ ३२,४४५ ३४,६२१ ४८,६६५ ४३,६२९ ४८,२२९ ६९,१३४ ७२,६४८ ७३,७२६ ७३,६२५ ६०,६७३ ७६,५१६ ८०,९६१ ७६,३०० ७९,०२३ ७४,३७२ ७७,७७८ ८८,१७९ ७६,४७६ ८५,८२० .... .... १,१८७ १,५६७ २,१२७ १,३६३ १,४१२ १,५०२ १,३३६ १,०५५ ३,१७३ ४,१४५ ५,१९८ ६,७०८ ये सब आँकड़ेशिक्षा-विभाग के विवरण से लिए गए हैं। इसके पीछे के विवरण में हिन्दी और उर्दूपढ़ने वालोंकी संख्या अलग-अलग नहीं दी गई है, परन्तुयह पता लगा है कि ३१ मार्च सन् १८९२ ई. को ५०,३१६ बालक उर्दू और१,००,४०४ बालक हिन्दी पढ़ते थे। अब इन संख्याओं से यह सिद्ध होता है किप्रश्चिमोत्तर प्रदेश में (गढ़वाल और कुमाऊँ को छोड़कर) जहाँ कचहरियों में उर्दू भाषा का प्रचार है, सन् १८६२-६३ में उर्दू और हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या ९३,७९९ थीऔर बारह वर्ष उपरान्त सन् १८७३-७४ में यह संख्या केवल १,३४,०४९ हुई, अर्थात् दुनी से कुछ कम | गढ़वाल और कमाऊँ में, जहाँ की कचहरियों में हिन्दी भाषा का प्रचार है, सन् १८६२-६३ में पढ़ने वालों की संख्या १,१८७ थी, बारह वर्ष बाद६,७०८, अर्थात् छ:गुनी हो गई। इससे स्पष्ट हुआ कि बारह वर्ष में हिन्दी भाषा और नागरी अक्षरों के कारण पढ़ने वाले छ: गूने अधिक हो गए। इस बात का अनुभवसर्वप्रथम राजा शिवप्रसादजी ने किया था और उन्होंने अपने "कचहरी की लिपि परअभ्यर्थनापत्र" (मेमोरेण्डम ऑन कोर्ट कैरेक्टर) शीर्षक लेख में दु:ख प्रगट किया है।राजा शिवप्रसादजी ने प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार न होने का कारण कचहरियों मेंफारसी अक्षरों का प्रचार होना ही बतलाया था, तथा इस आपत्तिको दूर करने के लियेनागरी अक्षरों के प्रचार करने को सम्मति दी थी, पर किसी ने उस पर ध्यान न दिया।इसके कुछ काल उपरान्त सर विलियम म्योर की सेवा में एक अभ्यर्थना पत्र भेजा गयाजिसमें कचहरियों और दफ्तरों में नागरी अक्षरों के प्रचार के लिये प्रार्थना की गई थी।इस अभ्यर्थना पत्र में भी दिखाया गया था कि बिना नागरी अक्षरों के प्रचार के इस देश में विद्या नहीं फैल सकती। सन् १८७४ के जनवरी मास में सरकार ने यह उत्तर दिया कि यथावसर सरकार उस पर भलीभाँति विचार करेगी । सन् १८७३-७४ के विवरण में,शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर ने भी हिन्दी के प्रचार पर जोर दिया। उनकी यह सम्मतिथी कि उर्दूकेवल उन्हीं जगहों मेंपढ़ाई जाय जहाँ उसकी आवश्यकता या चाह हो और सर्वसाधारण की शिक्षा हिन्दी भाषा के द्वारा ही होनी चाहिए। सर्वसाधारण की प्रार्थना और शिक्षा-विभाग के डाइरेक्टर की सम्मति पर कोई ध्यान न दिया गया और सरकार ने यह स्पष्ट रूप से कह दिया कि हिन्दी का प्रचार कचहरियों में नहीं किया जा सकताऔर न उसके पढ़ने वालों को उत्साहित करने की आवश्यकता है, क्योंकि हिन्दी जाननेवालों की संख्या उर्दूजानने वालों से कहीं अधिक है। सरकार ने केवल यही नहीं कहा,बल्कि दो वर्ष उपरान्त सन् १८७७ ई. में यह आज्ञा दे दी कि जिसने उर्दू या फारसीमें एन्गलों वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा न पास की हो वह किसी दफ्तर में दस रुपयों याउससे ऊपर कीनौकरी न पावे, चाहे उस दफ्तर में केवल अंग्रेजी की ही आवश्यकताक्यों न हो। इस प्रकार हार कर लोगोंने हिन्दी छोड़कर उर्दू पढ़ी । इस आज्ञा का प्रचारसन् १८९६ ई. तक रहा, जब सर एण्टनी मेकडौनल ने इसे रद्द कर दिया। पर २० वर्षतक सन् १८७७ की आज्ञा के पालन से जो विद्या के प्रचार तथा हिन्दी की उन्नति कीहानि हुई है उसका पूरा होना तब तक असम्भव है जबतक कि इसका उचित उपाय नकिया जाय| परन्तु यह बात दिखाई जा चुकी है कि हिन्दी के पढ़ने से कोई लाभ नहींहै। क्योंकि इससे जीविका-निर्वाह का ठिकाना नहीं लग सकता। इसलिये उर्दू के पढ़नेमें ही लाभ है। यह भी दिखाया जा चुका है कि उसी सिद्धान्त के अनुसार हिन्दी पढ़नेवालोंकी संख्या घटने लगी। सन् १८७७ ई. वाली आज्ञा से यह बात और भी बढ़ी। सन्१८७३-७४ की वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा के लिये ४३४ बालकों ने उर्दू और १,३१५ने हिन्दी पढ़ी, अर्थात् हिन्दी पढ़ने वालों की संख्या तिगुनी थी। और सन् १८९५-९६में २,८१४ बालकों ने उर्दूमें और ७८५ बालकों ने हिन्दी में परीक्षा दी, अर्थात् उर्दू पढ़नेवालों की संख्या चौगुनी हो गई। जब हम परीक्षा के परिणाम पर ध्यान देते हैं तो यह दीख पड़ता है कि हिन्दीमें पास करने वालों की संख्या उर्दू वालों से अधिक होती है। यहाँ पर इस कथन की पूष्टि के लिये गत पाँच वर्षो की अवस्था नीचे दिखाते हैं। उर्दू हिन्दी वर्ष परीक्षा दी पास हुए प्रति सैकड़ा परीक्षा दी पास हुए प्रति सैकड़ा १८९१-९२ १८९२-९३ १८९३-९४ १८९४-९५ १८९५-९६ २,२२७ २,६८९ २,९६७ २,९३१ २,८१४ १,१२१ १,२५४ १,४२८ १,२०५ १,२४७ ४१ ४७ ४८ ४१ ४४ ६२८ ७२४ ७९२ ८१४ ७८५ ३५१ ४२६ ४०६ ३८६ ४७४ ५६ ५९ ५१ ४७ ६० वर्नाक्यूलर मिडिल परीक्षा में व्याकरण तथा साहित्य को छोड़कर हिन्दी तथाउर्दूके सब ग्रन्थ एक से ही हैं। अतएव जब हिन्दी पढ़ने वाले अधिक पास होते हैं तोउससे यही सिद्धहोता है कि उस भाषा में सुगमता से विद्या उपार्जन कर सकते हैं।यह सब होने पर भी सरकार का ध्यान हिन्दी की ओर क्यों नहीं जाता, इसका कुछकारण समझ में नहीं आता। उर्दू के आदर और हिन्दी के अनादर सेकेवलयही परिणामनहीं हुआ कि केवल हिन्दी पढ़ने वालों को हठात्उर्दूपढाई जाय और इसमें उद्योग व्यर्थ नष्ट किया जाय, बल्कि इससे बड़ी भारी हानि तो यह हुई है कि पढ़ने वालोंकी संख्या घट गई। जिन अन्य प्रान्तों में वहाँ की देशभाषा का कचहरियों में प्रचार हैवहाँ पढ़ने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ती चली जाती है। सबसे पहले प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार बम्बई और पश्चिमोत्तर प्रदेश में हुआ।बम्बई की जनसंख्या पश्चिमोत्तर प्रदेश से आधी है, पर वहाँ सन् १८७०-७१ में १,५९,६२८ बालक प्रारम्भिक स्कूलों में पढ़ते और यहाँ १५३,२५२, अर्थात् बम्बई से छ: हजार कम | इसके पहले और किसी प्रान्त में प्रारम्भिक शिक्षा के लिये नियमितरूप से कोई उद्योग नहीं हुआ था इसी कारण से यहाँ इतनी सफलता दीख पड़ती थी।पर जब सन् १८७०-७१ के उपरान्त अन्य प्रान्तों में भी प्रारम्भिक शिक्षा आरम्भ हुई तोयह देखा गया कि पश्चिमोत्तर प्रदेश प्रारम्भिक शिक्षा में सबसे पीछे रह क्या है, सरकारकी ओर से किसी प्रकार की ढिलाई नहीं हुई बल्कि प्रारम्भिक शिक्षा के लिये और भीअधिक उद्योग किया गया। उसका फल यह हुआ कि सन् १८७१ से १८८२ तकविद्यार्थियों की संख्या १,५३,२५२ से २,०४,५१२ हो गई। इसी ग्यारह वर्ष के अन्तर मेंअन्य प्रान्तोंमें बालकों की संख्या कितनी बढ़ी यह नीचे दिखाया जाता है। प्रान्त का नाम जनसँख्या सन १८७०-७१ ई० सन १८८१-८२ ई० मद्रास बम्बई बंगाल ३,५६,३०,४४० २,६९,६६,२४२ ७,१३,४६,९८७ ६८,२३७ १,५९,६२८ ६,८५,४३ ३,४०,२७८ ३,१२,७७१ ८,८०,९३७ एड्युकेशन कमीशन के वक्तव्य के अनुसार जनसंख्या के हिसाब से प्रतिसैकड़ा २.६ बालक बम्बई के, २.५ बंगाल के, २.२ मद्रास के और .८९ प्रति सैकड़ापश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध के प्रारम्भिक स्कूलों में शिक्षा पाते हैं। सन्१८८१ में हमारेप्रान्त की यह अवस्था थी। सन् १८९५-९६ में बालकों की संख्या मद्रास में ५,१०,०६३ बम्बई में ५,००,१२२ और बंगाल में १२,०६,६१९ हो गई; परन्तु अभागे पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में घटकर १,५५,५५२ हो गई, अर्थात्४८,९६० बालक कम होगए। इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि बम्बई, बंगाल और मद्रास में प्रारम्भिक शिक्षा की सन्तोषजनक उन्नति हुई है। इन तीनों प्रान्तों की कचहरियों मेंवहीं की देशभाषाओंका प्रचार हैं। पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नति के स्थान पर पूरी अवनति हुई है और इन स्थानों की कचहरियों में देशभाषा और देशी अक्षरों के स्थान पर एक विदेशी भाषा और विदेशी अक्षरों का प्रचार है | अब जरा बिहार तथा मध्यप्रदेश पर ध्यान दीजिए|जब सन् १८३९ ई. में सरकार ने यह आज्ञा दी कि कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में फारसी के स्थान पर देशभाषा का प्रयोग हो तो उर्दूइस प्रान्त की भाषा समझकर प्रचलित की गई। परन्तुवास्तव में यहाँ की भाषा हिन्दी ही थी और अब भी है, जो नागरी या कैथी अक्षरों मेंलिखी जाती है, जब बंगाल के लेफ्टीनेण्ट गवर्नर सर जॉर्ज कैम्बल हुए तो उन्होंने अपनेशासनकाल का मुख्य कर्त्तव्यजनसाधारण मेंविद्या फैलाना बनाया और इसी उद्देश्य सेसन् १८७२ ई. में चार लाख रूपये का व्यय स्वीकार किया। पर उनको यह अनुभव हुआ कि जब तक उस देश की भाषा और लिपि का प्रचार कचहरियों और दफ्तरों में न होगा तब तक विद्या का यथेष्ट फैलाना सम्भव नहीं है। अतएव उन्होंने आज्ञा दी कीकेवल अर्जियों को छोड़कर और सब सम्मन, नोटिस आदि हिन्दी में लिखे जायं, परन्तुराज्य कर्मचारियों की दया से कई वर्ष तक इस आज्ञा का पालन न हुआ। अन्त में सरऐशले ईडेन् के समय में इस बात पर सरकार का ध्यान पुन: दिलाया गया औरतदनुसार जनवरी सन् १८९१ ई. से पटना और भागलपुर कमिश्नरी में हिन्दी का हीप्रचार है। इस न्याययुक्त और आवश्यक सुधार का फल अत्यन्त सन्तोषजनक हुआ है,क्योंकि ३१ मार्च सन् १८७२ ई. में बिहार के प्रारम्भिक स्कूलों में केवल ३३,४३०बालक थे और सन् १८९५-९६ के अन्त में २,६०,४७१,अर्थात् आठगुने हो गए| मध्यप्रदेश के हिन्दी-भाषी स्थानों में सन् १८७२ ई. तक फारसी का प्रचारथा। सन् १८७२ ई. मेंभारत सरकार ने यह आज्ञा दी कि नागरी अक्षरों का प्रचार हो,परन्तु राज्य कर्मचारियों की अपार दया से सन् १८८१ ई. तक इस आज्ञा का प्रत्यक्षफल न देख पड़ा। इस वर्ष जुडिशल कमिश्नर ने चीफ कमिश्नर के आदेशानुसार यहआज्ञा दी कि अर्जीदावे हिन्दी में लिखे जाया करें तथा डिग्री,हुक्म, फैसले आदि हिन्दीमें लिखे जायँ, और जो मनुष्य शीघ्रता तथा शुद्धता से हिन्दी न लिख-पढ़ सकता हो,वह-नौकर न रक्खा जावे। इस आज्ञा का पालन अब पूर्ण रीति से हो रहा है, और शिक्षापर इसपरिवर्त्तन का प्रभाव अच्छा पड़ा है। फलस्वरूप सन् १८८१ ई. मेंप्रारम्भिकस्कूलों में जहाँ ७४,५२९ विद्यार्थी थे, वहाँ १८९५-९६ के अन्त में १,१७,८९६, अर्थात्लगभग ४३,००० अधिक हो गए; पर पंजाब में, जहाँ विश्वविद्यालय और आर्यसमाज प्रारम्भिक शिक्षा के लिये पूर्ण उद्योग कर रहे हैं, गत १५ वर्षों में केवल १६,०००विद्यार्थी बढ़े और पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में ४९,००० घट गए। इसका कारण केवल यही है कि इनदोनों प्रान्तों की कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में देशभाषा औरदेशी अक्षरों के बदले फारसी अक्षरों तथा उर्दू भाषा का प्रचार है। और जगहों को जाने दीजिए। आप इसी प्रान्त के अन्तर्गत कुमाऊँ कमिश्नरी पर ध्यान दीजिए। इस प्रान्त में प्रारम्भिक शिक्षा की अवनति का कारण लोग यह बतलाते हैं कि किसान लोगोंकी रुचि इस ओर नाममात्र को भी नहीं है। ठीक है। पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध सबकमिश्नरियों में कुमाऊँ से बढ़कर किसानों की बस्ती और कहीं नहीं है। वहाँ ८३.७ प्रति सैकड़ा किसान हैं | कुमाऊँ से बढ़कर गरीब कमिश्नरी भी दूसरी नहीं है | अतएव शिक्षा देने में यहाँ जितनी कठिनता हो सकती है उतनी किसी अन्य स्थानमें कदापि सम्भव नहीं है; परन्तु प्रारम्भिक शिक्षा में जितनी सफलता सरकार को यहाँ प्राप्त हुई है उतनी और कहीं नहीं देखी जाती। यह ऊपर देखाजा चुका है सन् १८३० और १८७४ के बीच में जब पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवधभर में बालकोंकी संख्या दूनीभी न हो सकी थी,कुमाऊँ में छ:गुनी हो गई और अब तक यही अवस्था है। इसका श्रेय केवल कचहरियों में नागरी अक्षरों के प्रचार को है। आश्चर्य तो यह है कि एक ही प्रकार की शिक्षा पश्चिमोत्तरप्रदेश और अवध में दी जाती है, पर जितनी सफलता कुमाऊँ के गढ़वाल में दिखाई देती है उतनी और स्थानों मेंक्यों नहीं दीख पड़ती? जब एड्युकेशनल कमीशन नियत किया गया तब अल्मोड़ा के श्री बडेन् ने एकलेख कमीशन के विचारार्थ छपवाया था। इस लेख में उन्होंने यह दिखाया था कि हिन्दीही उत्तर भारतवर्ष में हिन्दुओं की मातृभाषा है, उर्दूनहीं, और उनको समझाने तथा उनकेहृदय पर प्रभाव जमाने का सर्वोत्तम साधन यही है। उनका कहना है कि तबतकसफलतापूर्वक विद्या का प्रचार नहीं हो सकता है और न उससे कुछ लाभ ही मिल सकताहै जबतक कि यहाँ की ही देशभाषा का पूर्ण रूप से आदर न हो और उससे बिनाप्रतिबन्ध कार्य न लिया जाय।क्योंकि यह बात सिद्ध है कि विद्या का वास्तविक औरउत्तम प्रचार केवल पढ़ने वालों की मातृभाषा द्वारा ही होता है। अतएव इस बात को स्वीकार करके उसके अनुकूल कार्य करने में विलम्ब करना न्याय से दूर भागना, विद्याके प्रचार को रोकना और भारतवासियों की उन्नति में बाधा डालना है। राजा शिवप्रसादने भी इसी आशय की साक्षी एड्युकेशन कमीशन में दी थी तथा हिन्दी के प्रचार पर जोरदिया था। और भी अनेक महाशयों ने हिन्दी के पक्ष मेंकहा था और अभ्यर्थनापत्र भी भेजेथे। इलाहाबाद के मेयो हॉल में कमीशन को अभिनन्दन-पत्र दिए गए थे। १९ अगस्त सन् १८८२ ई. के “पायोनियर” के अनुसार कमीशन के सभापति ने उसके सभासदों से कुछकहने को कहा। इस पर माननीय श्री सय्यद महमूद ने हिन्दी और उर्दूके विवादित विषयपर एक वकृत्ता दी जिसमें उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि प्रजावर्ग का अधिकांशहिन्दी के पूर्ण प्रचार के पक्ष में जान पड़ता है। यह विवाद हिन्दी और उर्दू भाषाओं कानहीं है,बल्कि नागरी (देवनागरी) और फारसी अक्षरों का है। इसके उपरान्त इस विषयपर दिए हुए बयानों और अभ्यर्थना-पत्रों के सम्बन्ध में कहा,और अन्त में यह कहा कियदि कमीशन पश्चिमोत्तर प्रदेश के स्कूलों में हिन्दी के अधिक प्रचार की सम्मति देगातोमैं उसका समर्थन करूँगा। इसके उपरान्त सभापति महाशय ने कहा कि हम लोग आपकेनिवेदनों पर पूर्ण विचार करके तब कुछ सम्मति देंगे। ऊपर यह कहा गया है कि कमीशन ने अपने विवरण में लिखा है किपश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध के प्रारम्भिक स्कूलों में पढ़ने वालों की संख्या .८९ प्रति सैकड़ाहै। इस सिद्धान्त को स्थिर करते समय, जो-जो कारण प्रारम्भिक शिक्षा के प्रचार न होने के बताए जाते हैं उन पर कमीशन ने पूरी तरह से विचार किया | वे कारण ये हैं- (१) किसानों की दरिद्रता, (२) हल्काबन्दी स्कूलों का तहसीली स्कूलों की नकल करना, ( ३) देशी स्कूलो पर ध्यान न देना और (४) हिन्दी के स्थान पर उर्दूका प्रचार। कमीशन ने इन कारणोंपर इस प्रकार से विचार किया: (१)-प्रथम कारण ठीक तथा सन्तोषजनक नहीं है, क्योंकि बम्बई में किसान फीस देकर पढ़ते हैं और पश्चिमोत्तर प्रदेश में बिना फीस लिए शिक्षा दी जाती है, (२) दूसरा कारण उन्हेंउचितन जान पड़ा और (३) तीसरे कारण पर कमीशन ने पूर्ण रूप से विचार किया।कमीशन के विवरण में लिखा है कि “ऐसा जान पड़ता है कि जिस नीति का योग श्रीटॉम्सन ने कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स की सहानुभूति के साथ कियाथा, उस नीति केप्रतिकूल कार्य हुआ है। कई देशी स्कूल सरकार के अधीन नहीं किए गए। और गत वर्षो में शिक्षा-विभाग भी उन्हेंकुछ सहायता नहीं दी गई और न वे उत्साहित ही किएगए। तो भी उनमें से अधिकांश लोग अपने बालकों की शिक्षा के लिये द्रव्य व्यय करसकते हैं। जिन्हेंऐसा करने का बल भी है वे अब तक देशी स्कूलों (पाठशाला, मकतबआदि) के पक्ष मेंहैं। जो लोग शिक्षा-विभाग के नियमानुसार अपने बालकों को पढ़ानाचाहते हैं और जो अपने बालकों को घर का काम छुड़ाकर पढ़ने के लिये अवकाश देसकते हैं, उन पढ़ने वालों की संख्या सीमा तक पहुँच गई है। बम्बई प्रान्त मेंडिपार्टमेण्टल स्कूलों की आवश्यकता उनमें बालकोंकी बृद्धि से ही सिद्ध है; परन्तुपश्चिमोत्तर प्रदेश के हल्काबन्दी स्कूलों में ऐसी उन्नति नहीं दीख पड़ती। ............यहाँभी देशी स्कूलोंपर ध्यान न दिया जाता तो सन् १८७१ से ८२ के बीच में पश्चिमोत्तरप्रदेश में प्रारम्भिक शिक्षा की उतनी ही उन्नति होती जितनी भारतवर्ष के अन्य प्रान्तों मेंहुई है; परन्तु प्रजा के ध्यान न देने से टॉम्सन महोदय की नीति का अनुसरण नहीं कियागया।" कमिश्नर लोग अपने विवरण के उन्नीसवें पृष्ठ में लिखते हैं कि “सन्१८५०में जो नियम स्थिर किए गए थे उन्हीं के अनुकूल चार-पाँच वर्ष तक काम हुआ। यहसम्भव है कि देशी स्कूलों को उपयुक्त सहायता न दी गई हो। परन्तु इनस्कूलों कीउन्नति पर ध्यान देकर प्रान्तीय सरकार ने यह स्थिर किया है कि वह अत्यन्त असन्तोषजनक है और इसी से शिक्षा का ऐसा प्रबन्ध किया गया कि उसका पूरा-पूराअधिकार सरकार के अधिकार में हो। इस प्रकार जमीन्दारों की सहायता और सरकारीअफसरों के प्रबन्ध से मकतबों और पाठशालाओं के स्थान पर ग्राम स्कूलों (विलेजस्कूलों) का प्रचार हुआ और अन्त मेंकेवल इन्हीं के द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा की उन्नतिपर सरकार ने ध्यान दिया। इसके अतिरिक्त देशी स्कूलों की शिक्षा की अन्य कोई उत्तमरीति हो ही नहीं सकती थी। देशी स्कूलों की उन्नति और बृद्धि तभी तक सम्भव है, जबतक देशी भाषा और लिपि का व्यवहार हो। जिन प्रान्तोंमें कचहरियों और दफ्तरोंमें देश-भाषा का प्रचार है वहाँ इन स्कूलों की वृद्धि हुई है और इन्हींके द्वाराकरोड़ोंबालक शिक्षा प्राप्त करते हैं। केवल पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध तथा पंजाब, इन्हीं दोप्रान्तों में देशीस्कूलों द्वारा शिक्षा फैलाने में सफलता नहीं प्राप्त हुई है, और ये ही ऐसेप्रान्त हैं जहाँ कचहरियों और दफ्तरों में देशवासियोंकी भाषा और लिपि का अनादरकर उर्दू भाषा तथा फारसी अक्षरों का आदर है। देशी स्कूलों को उत्साहपूर्वक बढ़ानेकी सम्मति तोनिस्सन्देह उत्तम थी; परन्तु जो अभी कहा गया है उससे यह स्पष्ट है कि सन् १८७१ से ८२ के बीच में देशी स्कूलों की उन्नति न होनेके कारण यह नहीं हैकि श्रीयुत् टॅाम्सन की नीति के प्रतिकूल कार्य हुआ और उसका त्याग किया गया,बल्कि जिस कारण से उस नीति के अनुसार कार्य करने में सफलता प्राप्तकरना हीअसम्भव था वह उर्दू का आदर और देश भाषा हिन्दी का तिरस्कार था | अब यह स्पष्ट है कि साधारण प्रजा में विद्या का प्रचार कचहरियों में हिन्दीके प्रचलित होने के साथ-ही-साथ होगा। अतएव यह आज्ञा की गई थी कि एड्युकेशन कमीशन, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रारम्भिक शिक्षा की जाँच करना और उसकी उन्नति केउपाय बताना था,यह सम्मति देगा कि कचहरियों और सरकारी दफ्तरों में उर्दूके स्थान पर हिन्दी का प्रचार किया जाय,पर दुर्भाग्यवश उन्होंने इस विषयपर कुछ भी नलिखा। पंजाब में प्रारम्भिक शिक्षा पर विचार कर वे लिखते हैं कि उर्दू अभी तकसरकारी कचहरियों की भाषा है और जबतक यह रहेगी तबतक प्रारम्भिक स्कूलों मेंउसकी वृद्धि अवश्य होगी। बहुत से लोग ऐसे हैं जो उर्दूके बदले हिन्दी का प्रचार होनाचाहेंगे; परन्तु उसका उतना ही सम्बन्ध राज्य प्रबन्ध से है जितना शिक्षा विषय से।अतएव यह एक ऐसी बात है जिस पर कमीशन अपनी सम्मति नहीं दे सकती। कमीशनने यह सम्मति दी कि म्युनिसिपल और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के स्कूलों में किस भाषा मेंशिक्षा देनी चाहिए,यह उन स्कूलों की प्रबन्धकारिणी कमेटी बोर्ड की सम्मति लेकरनिश्चय किया करे। गत पन्द्रह वर्षो के अनुभव से यह सिद्ध हो गया है कि यह सम्मतिनिरर्थक है और फिर इस अनुभव के होने तथा और प्रान्तोंमें प्रारम्भिक शिक्षा केइतिहास पर ध्यान देने से यह आशा नहीं की जा सकती कि कोई स्कूल-कमेटी तबतकविद्या के प्रचार में कृतकार्य हो सकेगी जबतक कि देशवासियों की भाषा अर्थकरी न हो,अर्थात् जबतक उसके पढ़ने वाले उसकी सहायता से अपनी जीविका का प्रबन्ध न करसकें। और यह तबतक नहीं हो सकता जबतक सरकारी कचहरियों तथा दफ्तरों मेंहिन्दी का प्रवेश न हो। इस सिद्धान्त में किसी प्रकार की विचित्रता नहीं है। केवलपश्चिमोत्तर प्रदेश मेंही नहीं, बल्कि और-और देशों में भी लोंगों ने तबतक अपनी भाषाके अध्ययन में उत्साह नहीं दिखाया जबतक कि कचहरियों की भाषा विदेशी रही। इंग्लैण्ड के इतिहास से इस कथन की पुष्टि होती है। नॉर्मन लोगों की विजय से लेकरसन् १३६२ ई. तक फ़्रांसीसी भाषा में कचहरियों का काम चलता था। अतएव लोग उसीभाषा के सीखने में रुचि रखते थे, अंग्रेजी का प्रचार किया गया। तब से जो उन्नति उसभाषा की हुई है उसे सब लोग जानते हैं। यद्यपि उर्दू और हिन्दी में उतना भेद नहीं है जितना अंग्रेजी और फ्रांसीसी में है, पर तो भी इतना भेद अवश्य है जिसमें इंग्लैण्ड के इतिहास पर ध्यान देकर हम शिक्षा ले सकते है। अतएव जबतक फारसी और अरबी के शब्दों से पूरित होकर तथा फारसी अक्षरों में लिखी जाकर उर्दूकचहरियों में उस निष्कण्टक राज्य पद पर प्रतिष्ठित रहेगी, जो वास्तव में ब्रिटिश राज्य की नीति के अनुकूल हिन्दी को दिया जाना चाहिए (क्योंकि उसी नीति के अनुसार न्याय विचार करके पजाब और पश्चिमोत्तर प्रदेश कोछोड़कर सब प्रान्तोंमें सरकार ने देश-भाषा का प्रचार किया है) तबतक जनता मेंहिन्दी की विशेष उन्नति नहीं हो सकेगी और न विद्या और सभ्यता, प्रचार ही किसीप्रकार से सम्भव है। गत २५ वर्षो में इस प्रान्त में जो विद्या की उन्नति हुई है उस पर ध्यान देनेसे बड़ा दु:ख होताहै, पर रेवरेण्ड बडेन् और श्री राजा शिवप्ररपादजी की सम्मति कीगम्भीरता स्पष्ट दीख पड़ती है। सन् १८७०-७१ के अन्त में प्रारम्भिक स्कूलों में बालकऔर बालिकाओंकी संख्या १,५३,२५२ थी और सन् १८९५-९६ के अन्त में १,६३,९१५,अर्थात् २५ वर्ष के बीच में केवल १०,००० विद्यार्थियोंकी संख्या बढ़ी। पर जब हमइस बात पर ध्यान देते हैं कि इस अवसर में जनसंख्या ५० लाख बढ़ गई तो विद्यार्थियों की १०,००० संख्या नाममात्र की रह जाती है। अस्तु, अब यह भी जान लेना उचित हैकि किन लोगों ने शिक्षा से लाभ उठाया है? इस विषय पर श्रीयुत् ग्राउस महोदय काकथन है कि आजकल स्कूलों में वे ही लोग पढ़ते हैंजिन्हेंसरकारी नौकरी करने की इच्छा रहती है, क्योंकि गाँवों के स्कूल यदि आज बन्द कर दिए जायँ तो ये लोग अपना काम किसी-न-किसी भाँति चला ही लेंगे। पश्चिमोत्तर प्रदेश में स्कूल जाने योग्यबालकोंमें से पढ़ने वालों की संख्या अधिक है। इसका कारण यही है कि आजकल नौकरी केलिये लोग विद्याध्ययन करते हैंऔर सरकारी नौकरी में बिना अंग्रेजी के काम चल नहींसकता, इसलिये स्कूलों से आजकल उन्हींलोगों को लाभ पहुँचता है जिनका सरकारी नौकरी से कोई सम्बन्ध हैया जो सम्बन्धकरना चाहते हैं। पर शिक्षा-विभाग का यहीएक उदेश्य नहीं है। इसका उद्देश्य सब लोगों को शिक्षा देना होना चाहिए और उसको ऐसी रीति निकालनी चाहिए जिससे वह अपने उद्देश्य मेंसफलता प्राप्त कर सके। और प्रान्तोंकी अपेक्षा यहाँ शिक्षा में कितना कम व्यय होता है यह इस स्थानपर दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमें इस बात की पूर्ण आशा है किसर एण्टोनी मैकडोनेल के समय मेंइस अभाव की भली प्रकार पूर्ति हो जायगी। यह बात लोगोंको भलीभाँति विदित है कि सरकार की यह बड़ी भारी इच्छा है कि प्रारम्भिक शिक्षा का अधिक प्रचार हो। उसकी पुष्टि के लिये सरकार की उस आज्ञा कोदेखिए जो शिक्षा-विभाग के सन् १८९४-९५ के विवरण पर दी गई है। सरकार की इच्छा पूर्ण होने का एक यही मार्ग है कि प्रजामात्र को शिक्षा प्राप्त करने में उत्साह हो।ज़बतक यह न होगा तबतक कितना भी द्रव्य क्यों न व्यय किया जाय प्रारम्भिक शिक्षा को वृद्धिहोनी असम्भव है। इस असाध्य कार्य को साध्य बनाने का उपाय देशी भाषाऔर लिपि का सत्कार करने के अतिरिक्त और दूसरी कुछ नहीं है। प्रति वर्ष इस बात का रोना सुनने में आता है कि अन्य प्रान्तों की अपेक्षा पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में प्रति बालक पर औसत व्यय अधिक पड़ता है। इसके प्रमाण में और प्रान्तों की अवस्था को देख लेना आवश्यक है | सन् १८९५-९६ में मद्रास प्रान्त में ४,३५,६१९ बालक सहायता-प्राप्त तथा असहाय स्कूलों में, और १,५६,२०० सरकारी स्कूलों में थे, परन्तु पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में १,५३,८०० बालक सरकारी स्कूलों में, और केवल १०,१७५ सहायता-प्राप्त तथा असहाय स्कूलों मेंपढ़ते थे। यह हाल केवल प्रारम्भिकस्कूलों का है। जो अवस्था बालकों की है वही अवस्था खर्च की भी है। बंगाल में१८९५-९६ में प्रारम्भिक शिक्षा के लिये ३२,४५,५४३ रुपए दिए गए, अर्थात् सरकार का व्यय प्रजा से छ:गूना अधिक हुआ, अस्तु। अब यह स्पष्ट है कि इस पश्चिमोत्तर प्रदेशकी इस अधोगति का कारण यही है कि शिक्षा फैलाने में प्रजा की और से उद्योग नहींहोता और न वह इस कार्य में सरकार की सहायता ही करती है। यही मत एड्युकेशनकमीशन ने दिया था, और यह ठीक भी है। राजा तथा प्रजा जब दोनों मिलकर विद्याफैलाने का उद्योग करेंगे तो अवश्य यथेष्ट परिणाम प्राप्त होगा। पर बात यह है कि प्रजाका उत्साह उस भाषा और उन अक्षरों की शिक्षा के लिये क्योंहोने लगा, जिसके कारणउन्हेंअसंख्य कष्ट उठाने पड़ते हैं? यदि उन्हें उनकी अपनी भाषा और लिपि के सिखानेका उद्योग होता तोउन्हेंभी सहायता देने में उत्साह होता। इसलिये जबतक सरकारदेशभाषा और देशी अक्षरों का यथोचित आदर न करेगी तबतक और प्रान्तोंकी अपेक्षायहाँ उसे अधिक व्यय करना पड़ेगा, और फिर भी यहाँ के रहनेवालों में पूर्ण रीति सेविद्या न फैलेगी। अब इस विषय पर और कुछ कहने की आवश्यकता बाकी नहीं रह गई है। जोकुछ कहा गया है उससे यह स्पष्ट है कि नागरी के प्रचार के साथ-ही-साथ पश्चिमोत्तरप्रदेश तथा अवध की प्रजा में प्रारम्भिक शिक्षा का यथेष्ट प्रचार होगा। प्रजा में हिन्दू औरमुसलमान दोनों शामिल हैं, और इसी अर्थ की पुष्टि में ये प्रमाण दिए जाते हैं। इस लेखके प्रारम्भ में यह दिखलाया जा चुका है कि यहाँ की देशभाषा हिन्दी है और उस पर पुन:कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। सन् १८९१ की मनुष्य-गणना के अनुसार ४,६९,०५,०८५ लोग इस प्रान्त में बसते हैं। इनमें से ४,०३,८०,१६८, अर्थात् ८६.१ प्रति सैकड़ा हिन्दू,और ६३,४६,६५१, अर्थात् १३.५ प्रति सैकड़ा मुसलमान हैं। मनुष्य-गणना की रिपोर्ट सेयह भी प्रगट होता है कि प्रति चार मुसलमानों में से एक शहर में तथा तीन गाँवों में रहतेहैं। इस बात को सब लोग स्वीकार करेंगे कि गाँवों के मुसलमानों की भी वही भाषा हैजो हिन्दुओकी अर्थात्, हिन्दी। सन् १८८१ और १८९१ की मनुष्य-गणना के समयगणना करनेवालों की ओर से कहा गया था कि वे साधारण बोली के स्थान पर “ “हिन्दुस्तानी” नाम लिखें, तथा श्रीयुत बेली ने अपने सन् १८९१ के विवरण में लिखा हैकि हिन्दुस्तानी शब्द के अन्तर्गत शहरोंकी उर्दूतथा गाँवों की हिन्दी है। इस नियम के अनुसार ४,६९,०५,०८५ लोगों में से ४,५८,८२,२६२ हिन्दुस्तानी बोलते थे। श्रीयुत बेन्स ने अपने विवरण में “हिन्दुस्तानी” शब्द का प्रयोग करना अस्वीकार किया और पश्चिमोत्तर प्रदेश की भाषा को हिन्दी ही नाम दिया। सन् १८७२ ई. में ४,३२,२०,७०५ मनुष्य यहाँ बसते थे, जिनमें से ४,२१,९३,००४ हिन्दी बोलते थे। इस वर्ष के विवरण में लिखा है कि शहरवालों में और उच्च श्रेणी के लोगों में उर्दूबोली जाती है,परन्तु यह सर्वसाधारण की बोली नहीं है। शहरों में और उच्च श्रेणी के लोगों में भी उर्दू तभी तक बोली जाती है, जब तक बोलने वाला किसी फारसीदाँ के पास रहता है। सबकी घरेलू भाषा हिन्दी ही है। शिक्षा-विभाग सन् १८९४-९५ के विवरण में श्री लुई महोदय लिखते हैं कि नित्यप्रति केव्यवहार में एक ही भाषा बोली जाती है, और वह केवल हिन्दी है। यदि यह भाषा अपनेदेशी अक्षरों में लिखी जाती तो हम लोगों को उर्दू तथा हिन्दी में कोई भेद न दिखाई देता| तब एक ही भाषा रही होती और इसमेंकेवल ऐसे विदेशी शब्दों का प्रयोग होता, जोउसमें अच्छी तरह से घुलमिल गए होते। परन्तु फारसी अक्षरों के प्रचार से यह न होनेपाया और साधारणभाषा में अरबी और फारसी के कठिन कठिन शब्द मिल गए, जिससे सर्वसाधारण के लिये उसका समझना कठिन हो गया। अस्तु, भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त केमुसलमानों मे विद्या की कैसी उन्नति हुई है, यह नीचे दिखाया जाता है। प्रान्त सन् १८९१ की मनुष्य-गणना के अनुसार मुसलमानों की बस्ती स्कूल जाने योग्य मुसलमानों की संख्या प्राईमरी स्कूलों में मुसलमानों की संख्या मुसलमान विद्यार्थियों की संख्या मद्रास मध्यप्रदेश बम्बई बंगाल पंजाब पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध २२,५०,३८६ ३०,८४,७९ ४३,९०,९९५ २,३४,३७,५९१ १,१६,३४,१९२ ६३,४६,६५१ ३३,७५,५७ ४६,४२१ ६,५८,६४९ ३५,१५,६३८ १७,४५,१२८ ९,५१,९९७ ६३,७७३ ८,००६ १,०६,३२९ ३,७०,००७ ५२,६०२ २२,६०३ ९३,०८८ १०,५९० १,४१,२३७ ४,९४,२९४ १,२९,९४२ ६९,४४७ मद्रास, बम्बई, बंगाल और मध्यप्रदेश में मुसलमान उस प्रान्त की भाषा औरअक्षरों को साधारणत: सीखते हैं, इसलिये उनमें विद्या की इतनी उन्नति है, परन्तु पंजांबतथा पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में उर्दू भाषा का प्रचार है, और यही कारण है किमुसलमानों मेंभी विद्या का इतना कम प्रचार है। ऊपर जो दिखाया गया है, उससे यहस्पष्ट प्रगट होता है कि फारसी अक्षरों को दूर करने का उपाय केवल नागरी अक्षरों काप्रचार करना है। सन् १८९० में २,०४,९८७ मुसलमान ऐसे थे जो पढ़-लिख सकते थे।यदि खोज की जाय तो यह प्रगट होगा कि इनमें से बहुत से नागरी अक्षर पढ़ सकतेहैं, क्योंकि मुसलमान पटवारी और हिन्दूदुकानदार इन्हीं अक्षरों में अपना हिसाब रखतेहैं। पून: श्रीयुत् नैस्फील्ड ने एड्युकेशन कमीशन के सम्मुख कहा था कि अवध केस्कूलों में कैथी पढ़ने वालों का तिहाई हिस्सा मुसलमान है। अतएव अब यह सिद्ध हो गया, और इसमें किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि नागरी अक्षरों के प्रचारसे मुसलमानों को किसी प्रकार हानि न होगी, बल्कि पूर्ण लाभहोगा| कचहरियों और दफ्तरों में नागरी अक्षरों के प्रचार से बहुत लाभ होंगे, अर्थात्लोगों को न्याय प्राप्त करने में सुगमता होगी। वे स्वयं नोटिस,सम्मन आदि पढ़ तथालिख सकेंगे। यूरोपीय अफसरों को एक ही भाषा और एक ही अक्षर सीखने पड़ेंगे औरसबसे बढ़कर यह लाभ होगा कि विद्या का अधिक प्रचार होगा और लोग उन्नति करसकेंगे। आजकल यूरोपीय अफसरों को उस प्रान्त की भाषा सीखनी पड़ती है, जहाँ वेरहना चाहते हैं, और प्रारम्भ में उनको फौजदारी के मुकदमे दिए जाते हैं। इससे वेप्रतिदिन कचहरी में सुनी हुई बातों तथा भाषा को कुछ दिनों में समझने लग जाते हैं,पर शिकस्त: के भय से वे कचहरी के कागजों को नहीं पढ़ सकते, इसलिये दर्ख्वास्तोंआदि के समझने के लिये उन्हें अन्य राज्य कर्मचारियों की सहायता लेनी पडती है। पुन:वे साधारण बोल-चाल की भाषा को नहीं जानते, क्योंकि कचहरी में वे जिस भाषा को सुनते है, उसमें फारसी तथा अरबी के शब्द भरे रहते हैं। इससे जो हानि होती है वहस्पष्ट है। नागरी अक्षरों के प्रचार से यह असुविधा भी दूर हो जायगी। यूरोपीय अफसरभाषा और अक्षर को सुगमता से पढ़ सकेंगे और इससे राज्य प्रबन्ध में कोई त्रुटि न रहजायगी तथा प्रजा को सुख प्राप्त होगा। ऊपर जो कुछ लिखा गया है, उससे यह स्पष्ट है कि न्याय की रक्षा औरशिक्षा के हित के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध कीअदालतों और सरकारी दफ्तरों में फारसी के स्थान पर नागरी अक्षरों का प्रचार कियाजाय| ऐसा करने में किसी को भी कष्ट न होगा, क्योंकि इस प्रान्त में प्रत्येक असिस्टेण्टमजिस्ट्रेट, कलेक्टर, असिस्टेण्ट कमिश्नर, डिप्टी कलेक्टर, नहर और जंगल केआफिसर, तहसीलदार तथा अवध के प्रत्येक मुन्सिफ़ को नागरी अक्षरों में लिखी हुईहिन्दी की परीक्षा देनी पड़ती है। इसलिये इन लोगों को इस परिवर्त्तन से कोई कष्ट न होगा। हाँ, राज्यकर्मचारियों को अवश्य नागरी सीखनी पड़ेगी। यदि यह अक्षर सीखने पड़ें तो भी यहकोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिये न्याय का पथ छोड़ा जाय, विद्या का प्रचार रोकाजाय, और एक अत्यन्त आवश्यक सुधार करने में विलम्ब किया जाय। सर अर्स्किन पेरी का कहना है कि बालक तीन मास में नागरी अक्षरों का पढ़नासीख सकते हैं। यदिपढ़े-लिखे लोग केवल एक घण्टा प्रतिदिन उसके लिये लगावें तो इससे भी कम समयमें उनको पढ़ना आ जायगा। हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम भाषा के परिवर्त्तनके लिये प्रार्थना नहीं कर रहे हैं, क्योंकि इस विषय में जो सरकार की आज्ञाएँ हैं उन्हींके अनुकूल कार्य होने से सब अर्थ-सिद्धि हो जायगी। केवल आवश्यक यह है किअदालतों की कार्रवाई नागरी अक्षरों में लिखी जाय। हिन्दुस्तान को भाषा हिन्दुस्तानी हो,जो प्रतिदिन की बोलचाल की भाषा से मिलती-जुलती हो, अर्थात् जिसमें न फारसीऔर अरबी के कठिन शब्द हों और न हिन्दी तथा संस्कृत के। केवल ऐसे ही शब्दों काउसमें प्रयोग हो जो अत्यन्त सरल और सब लोगों की समझ में आते हों। नागरी अक्षरोंके प्रचार से ऐसी भाषा का स्वत: व्यवहार होने लगेगा। इसके लिये उद्योग करने कीजरा-सी भी आवश्यकता न पड़ेगी। शान्ति और सुख का फैलना तथा पाप और अपराध रोकना और घटानासरकार का बड़ा भारी उद्देश्य है, और इस बात को सभी स्वीकार करते हैं कि विद्या के प्रचार के साथ पाप और अपराधों की कमी होती है। यह प्रान्त शिक्षा-सम्बन्ध मेंसबसे पीछे है और अपराधों की गिनती मेंसबसे आगे। इस बात को स्वयं सर एण्टनी मेकडॉनेल साहब ने शिक्षा-विभाग के सन् १८९४-९५ के विवरणमें स्वीकार किया है|उस कथन की पुष्टि मेंकिसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इतिहास से इसके अनेकदृष्टान्त मिलते हैं। इसलिये यह आवशयक है कि प्रारम्भिक शिक्षा का प्रचार हो जिससेपाप और अपराधों की कमी हो,तथा लोगों में बुद्धि और सभ्यता बढ़े। बार-बार यहाँके लोगों को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं, जिससे यह आवश्यक जान पड़ता है कि वेअपनी अवस्था को सुधारें तथा अपने रहन-सहन में आवश्यक परिवर्त्तन कर अपने को समय के उस प्रवाह के साथ ले चलें जो किसी के रोके नहीं रुक सकता और जिसकासाथ एक बार छूट जाने से फिर वह हाथ नहीं आता। परन्तु इसके लिये उस विवेक कीआवश्यकता है जो बिना विद्या के प्राप्त नहीं हो सकता, और जिसके अभाव के कारण राजा और प्रजा दोनों असह्य दु:ख सहते हैं। इसलिये पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध कीप्रजा में शिक्षा का फैलना इस समय सबसे आवश्यक कार्य है, और गुरुतर प्रमाणों सेसिद्ध किया जा चुका है कि इस कार्य में सफलता तभी प्राप्त होगी जब कचहरियों औरसरकारी दफ्तरोंमें नागरी अक्षर जारी किए जायेंगे । अतएव अब इस शुभ कार्य में जरा-सा भी बिलम्ब न होना चाहिए और न राज्य कर्मचारियोंतथा अन्य लोगों के विरोध परकुछ ध्यान देना ही चाहिए। हमें पूर्ण आशा है कि वे बुद्धिमान और दूरदर्शी शासक जिनके प्रबल प्रतापसे लाखों जीवों ने इस घोर अकाल रूपी काल से रक्षापाई है, अब नागरी अक्षरों को जारी करकेइन लोगोंकी भावी उन्नति औरवृद्धि का बीज बोएंगे, और विद्या केसुखकर प्रभाव के अवरोधों को अपनी क्षमता से दूर करेंगे,जिससे इस दीन देश केवासी सदा सर्वदा के लिये ब्रिटिश राज्य के ऋणी रहकर उसका यश गावें और अपने को धन्य मानें।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सन् १९०४ की प्रस्तावित योजना
प्राक्कथन

हिन्दू विश्विविद्यालय की योजना की प्रमुख विशेषताएँ पहले पहल सन् १९०४ में मिण्ट-हाउस बनारस में श्रीमान् महाराजाधिराज बनारस के सभापतित्त्व में होने वाली सभा में प्रकट की गई थीं। इस योजना का अधिकांश भाग लिख लिया गया था, और महीनों के वाद–विवाद और विचार के पश्चात् जुलाई के अंत में यह छपने के लिये भेज दी गयी थी। सन् १९०५ के अक्तूबर महीने में इसकी अनेक प्रतियाँ भिन्न –भिन्न प्रान्तों के प्रमुख हिन्दुओं को भेजी गई थीं और उन्होंने इस योजना का हार्दिक स्वागत किया था। ३१ दिसम्बर सन् १९०५ में बनारस टाउन हॉल में समस्त भारत की हिन्दू जनता के प्रतिनिधियों और सुप्रसिद्ध शिक्षा-प्रेमियों की सभा हुई, जिसमें एक समिति नियुक्त हुई, जो इस योजना की अभिवृद्धि में सहयोग दे और उसका निश्चित स्वरूप निर्णय करे। अन्त में यह योजना प्रयाग में २० से २१ जनवरी १९०६ ई. तक आयोजित सनातनधर्म महासभा के अधिवेशन के सम्मुख रक्खी गई। समस्त भारतवर्ष के हिन्दुओं ने इस सभा के कार्यक्रम में भाग लिया था। परमहंस परिव्राजकाचार्य जगद् गुरु श्री शंकराचार्यजी के सभापतित्त्व में सुप्रसिद्ध साधुओं तथा विद्वानों की इस सभा ने निम्नांकित प्रस्ताव पास किए कि.......... १. भारत विश्वविद्यालय के नाम से काशी में एक हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की जाय, जिसके निम्नांकित उद्देश्य हों ......... (अ) श्रुतियों तथा स्मृतियों द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमधर्म के पोषक सनातनधर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करने के लिये धर्म शिक्षक तैयार करना । (आ) संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन की अभिवृद्धि करना । (इ) भारतीय भाषाओँ तथा संस्कृत के द्वारा वैज्ञानिक तथा शिल्प-कला-सम्बन्धी शिक्षा के प्रचार में योग देना । २. विश्वविद्यालय में निम्नांकित संस्थाएँ होंगी........ (अ) वैदिक विद्यालय--- जहाँ वेद-वेदांत, स्मृति, दर्शन, इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाय । ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष-सम्बन्धी तथा अन्तरिक्ष-विद्या-सम्बन्धी वेधशाला भी निर्मित की जाय । (आ) आयुर्वेदिक विद्यालय ---जिसमें प्रयोगशाला हो तथा वनस्पति-शास्त्र के अध्ययन के लिये एक उद्यान भी हो | एक सर्वोत्कृष्ट चिकित्सालय तथा पशु-चिकित्सालय की स्थापना की जाय | (इ) स्थापत्यवेद व, अर्थशास्त्र---जिसमें तीन विभाग होंगे | (१) भोतिकशास्त्रा विभाग (सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक), (२) प्रयोगों तथा अन्वेषण के लिये एक प्रयोगशाला और (३) मशीन तथा बिजली का काम सीखने वाले इंजीनियरों की शिक्षा के लिये मंत्रालय की स्थापना की जाय | (ई) रसायन विभाग----जिसमें प्रयोगों और अन्वेषणों के लिये प्रयोगशालाएँ तथा रासायनिक द्रव्यों के बनाने की शिक्षा के लिये यंत्रालय स्थापित किया जाय | (उ) शिल्पकला विभाग ---जिसमें मशीन द्वारा व्यवहार में आने वाली नित्यप्रति की वस्तुएँ तैयार की जायँ | इस विभाग में भूगर्भशास्त्र, खनिज तथा धातुशास्त्र की शिक्षा भी सम्मिलित रहेगी | (ऊ) कृषि विद्यालय---जहाँ प्रयोगात्मक तथा सैद्धान्तिक दोनों प्रकार की शिक्षाएँ कृषिशास्त्र के नवीन अनुभवों के अनुसार दी जाय | (ए) गन्धर्व वेद तथा अन्य ललित कलाओं का विद्यालय | (ऐ) भाषा विद्यालय---जहाँ अंग्रेजी, जर्मन तथा अन्य विदेशी भाषाएँ इस उद्देश्य से पढ़ाई जायँ कि उनकी सहायता से भारतीय भाषाओँ का साहित्य-भण्डार नये रत्नों से परिपूर्ण हो तथा विज्ञान कला के नवीन शोधों द्वारा उनके विकास में अभिवृद्धि हो | ३. (अ) इस विश्वविद्यालय का धर्म-सम्बन्धी कार्य तथा वैदिक कॉलेज का कार्य उन हिन्दुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातनधर्म के सिद्धान्तों के माननेवाले होंगे | (आ) इस विद्यालय में वर्णाश्रमधर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा | (इ) इस विद्यालय के अतिरिक्त अन्य सब विद्यालयों में सब धर्मावलम्बियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा की अन्य शाखाओं की शिक्षा बिना जाती-पाँति का भेदभाव किए सबको दी जायगी | ४ (अ) निम्नांकित सज्जनों की एक समिति बनाई जाय जिन्हें अपने सदस्यों की संख्या बढ़ाने का अधिकार हो, जो इस विश्वविद्यालय की आयोजना को कार्य रूप में परिणत करने के लिये आवश्यक उपाय काम में लावें, जिसके मंत्री माननीय पण्डित मदन मोहन मालवीय हों | (आ) बनारस टाउन हॉल की सभा में जो समिति नियुक्त हुई थी, उसके सदस्यों से प्रार्थना की जाय कि वे इस समिति के भी सदस्य हो जायँ | ५. (अ) विश्वविद्यालय के लिये एकत्र किया हुआ समस्त धन काशी के माननीय मुंशी माधोलाल के पास भेजा जाय जो उसे “”””” “”बैंक ऑफ बंगाल, बनारस’’ में जमा कर दे , जबतक कि उपर्युक्त समिति इस सम्बन्ध में कोई और आज्ञा न दे | (आ) इस विश्वविद्यालय के लिये आए हुए रुपयों में से तबतक कुछ भी धन व्यय न किया जाय जबतक कि विश्वविद्यालय समिति एक संगठित संस्था की तरह रजिस्टर्ड न हो जाय | और जबतक इसके नियम निश्चित न हो जायँ तबतक इसका व्यय सनातनधर्म महासभा के लिये आए हुए धन में से होना चाहिए | इस प्रकार जो समिति बनी , उसने अपना कार्य चालू कर दिया है | यह सोचा गया है कि विश्वविद्यालय का शिलारोपण ३० लाख रूपया एकत्र हो जाने पर अथवा एक लाख रूपया वार्षिक सहायता का वचन मिल जाने पर हो जाना चाहिए | दाताओं की इच्छानुसार दान तथा चन्दे द्वारा आया हुआ धन विश्वविद्यालय के विशेष विभागों तथा विशेष कार्यो के लिये , अथवा विश्वविद्यालय के लिये खर्च किया जायगा | प्रयाग मदन मोहन मालवीय मार्च १२ , सन् १९०६ ई. मंत्री प्रथम भाग इसकी आवश्यकता क्यों हुई? भारतीय हिन्दू जनता की वर्तमान दशा समस्त विद्वान् हिन्दुओं द्वारा विचारणीय है| हिन्दुओं की वर्तमान आर्थिक दशा की तुलना एक सुसम्पन्न अँग्रेज जैसी जाति से करने से सम्भवत: हिन्दुओं की दशा का पता चल जाय | भारतवासियों की प्रतिदिन की आय का औसत ,(जिसमें अधिकांश हिन्दू ही हैं और जनसंख्या का केवल १/६ भाग ही मुसलमानों का है ), लगभग एक आना प्रति व्यक्ति है, अर्थात् इंग्लैण्ड के प्रति व्यक्ति औसत आमदनी का केवल बीसवाँ भाग | पिछले ५० वर्षो के इतिहास से प्रकट है कि यह थोड़ी सी आय भी प्रतिदिन घटती जा रही है | हिन्दुओं की शिक्षा का भी इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि जनसंख्या का ९४.१ प्रति सैकड़ा भाग अशिक्षित है| कुछ प्रान्तों-- जैसा कि संयुक्तप्रान्त, में देखा गया है कि जनसंख्या का ९७ प्रतिशत भाग अशिक्षित है| अशिक्षितों की संख्या का औसत इंग्लैण्ड में ४.७ प्रतिशत तथा जर्मनी में 0.११ प्रतिशत है| भारतभर में हिन्दू जाति के अधिकांश लोग खेती या मजदूरी करते हैं, उनकी सूखी हुई हड्डियाँ, धंसी हुई आँखें, फटे कपड़े और टूटे मकान ही घोर दरिद्रता की साक्षी दे रहे हैं, फिर आँकड़ों की आवश्यकता ही क्या ? प्रत्येक दसवें वर्ष इनमें से लाखों दुष्काल के कराल गाल में चले जाते हैं और बहुत से प्रतिवर्ष प्लेग के शिकार बन जाते हैं| यह बात भलीभाँति विदित है कि हिन्दू लोग अन्य जातियों की अपेक्षा प्लेग के जल्दी शिकार बनते हैं| हिन्दुओं का स्वास्थ्य और उनका शारीरिक सौन्दर्य प्रतिदिन नष्ट होता जा रहा है| जनसंख्या की गणना के हर अवसर पर हिन्दू जाति की शक्ति-क्षीणता, शीघ्र मृत्यु और उत्पत्ति-हीनता निरंतर दृष्टिगोचर होती जा रही है| हिन्दुओं का उच्च वर्ग इसलिये नष्ट हो रहा है कि उन्हें अपनी जीविका का मार्ग बन्द सा मालूम पड़ता है, तथा निम्न श्रेणी के लोग इसलिये दुःखी हैं कि उनकी शक्ति अत्यधिक जीवन प्रतियोगिता के कारण नष्ट हो रही है| हिन्दू कृषक, जो समाज के आधारस्तम्भ हैं, अधिकांश प्रान्तों में, जमीन की प्रतियोगिता के कारण अनुचित भूमि कर देने के लिये बाध्य किये जाते हैं और इसलिये वे भूखों मरते हैं| देश के बहुत से भागों में जमीन्दार कर्ज के असहनीय भार से दबे हुए हैं| जो धनवान् हैं वे या तो मुक़दमेबाजी के शिकंजे में जकड़े हुए हैं अथवा उन्हें अपनी इन्द्रिय-लोलुपता से ही छुट्टी नहीं मिलती, अथवा वे भिन्न-भिन्न समुदायों में बंटकर अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर रहे हैं| जनसंख्या का अधिकांश भाग सरकार को इसके लिये दोषी ठहराता है| यद्यपि वर्तमान शासन-प्रणाली तथा कानूनों का स्वरूप हमारी आर्थिक दुरवस्था के लिये अधिकांश में उत्तरदायी है, परन्तु केवल एक यही बात ही किसी देश का भविष्य निर्णय करने में सहायक नहीं होती | यद्यपि सरकार के समर्थक भी शाशन की त्रुटियों का अनुभव कर रहे हैं तथापि इसमें कोई भी सन्देह नहीं कि वर्तमान शासन-प्रणाली सरकार के प्रमुख कर्त्तव्यों का पालन कर रही है, अर्थात् शान्ति –स्थापन तथा देशवासियों के जानमाल की रक्षा करना इसके प्रशंसनीय कार्य हैं | सरकार ने सभ्यता की अभिवृद्धि के लिये और भी अधिक कार्य किए हैं और इसकी छत्रच्छाया में हम यश, योग्यता तथा धन प्राप्त कर सकते हैं | बम्बई के पारसी और भाटिया तथा कलकत्ते के सुसम्पन्न तथा वैभवशाली मारवाड़ी इसके जीते जागते उदाहरण हैं | और भी अन्य जातियाँ इसी तरह अथवा इससे भी अधिक उन्नति कर सकती हैं| तब क्या कारण है कि इन सब बातों के होते हुए भी वर्तमान हिन्दू जाति की यह दशा है? वे धन-धान्य से परिपूर्ण देश के निवासी हैं, उनका देश संसार के अन्य देशों की भांति उपजाऊँ है और अच्छे-से-अच्छे खाद्य पदार्थ तथा फल भी इसी भूमि में उत्पन्न होते हैं| इस देश के जंगलों में ईंधन तथा लकड़ी की भी प्रचुरता है| देश की खानों से बहुमूल्य खनिज पदार्थ प्रतिवर्ष निकलते हैं| देश के कृषक परिश्रमी, गम्भीर और मितव्ययी हैं| उद्योग-धन्धी पुरुष चतुर और व्यवसायी हैं, देश के मजदूर सन्तोषी और परिश्रमी हैं, देश की ऊँची श्रेणीवाले लोगों में ऐसे व्यक्ति हैं जो संसार के सभ्यातिसभ्य मनुष्यों के साथ सभ्यता की प्रतियोगिता में खड़े किए जा सकते हैं, और वे उचित अवसर आने पर संसार के सभ्य पुरुषों द्वारा किए जाने वाले सभी महत्त्वपूर्ण कार्य करने की क्षमता रखते हैं | प्राचीन समय में भारत में अनेक महापुरुष उत्पन्न हुए हैं और उन्होंने अनेक महान् कार्य भी किए हैं | हिन्दू समाज उस समय एक उच्च तथा सुन्दर नींव पर खड़ा था | अब वह एक निराधार जनसमूह मात्र रह गया है | यह अवस्था किसी भी कारण से हुई हो, किन्तु यह बात सर्वसम्मत है कि हिन्दू समाज के ह्रास का प्रमुख कारण यह है कि समाज के अधिकांश अंगों ने समाज को धारण करने वाली शक्ति धर्म के पालन करने में शिथिलता दिखलाई है | सहस्त्रों वर्षों से हिन्दू लोग इस बात के लिये प्रसिद्ध रहे हैं कि उन्होंने जीवन के अन्य अंगों की उपेक्षा कर धर्म को अधिक महत्व दिया है| प्रोफ़ेसर मेक्समूलर से अधिक भारत के प्राचीन इतिहास के ज्ञाता सम्भवतः कोई भी हमारे सम्मुख नहीं है| उन्होंने हमारे कथन की पुष्टि करते हुए कहा है कि “” महाभारत के वर्णनों के आधार पर, यूनानी आक्रमणकारियों की सम्मति को लेकर, बौद्धों के त्रिपिटिकों तथा स्वयं उपनिषदों और वेदमन्त्रों के आधार पर, महाराज हर्ष के समय से लेकर अब तक भारतीय संस्कृति में हमें जो बात मुख्य दिखलाई पड़ती है वह यह है कि भारतवासियों ने सदा से आध्यात्मिक उन्नति की ओर ही विशेष ध्यान दिया है, तथा भारतीय जाति हमें दार्शनिकों तथा विचारकों की एक जाति दिखलाई पड़ती है”’’ “( Six Systems of Hindu Philosophy, 1st Ed.,p.42)| दुःख है कि जिस स्वरूप का चित्रण उक्त सुप्रसिद्ध विद्वान् ने किया है, समय के परिवर्तन से आज समाज का वह स्वरूप नष्ट हो गया है| धर्म आज मुख्यतः समाज के थोड़े से इधर-उधर के लोगों तक ही परिमित है | थोड़े से व्यक्तियों को छोड़कर अधिकांश विद्वान् तथा अग्रणी मनुष्य सरकारी नौकरियों के पीछे दौड़ते हैं और सांसारिक उन्नति की ही चिंता करते हैं| वे धर्म का नाम लेना एक प्रकार से भूल ही जाते हैं| जो धनिक तथा शक्तिशाली हैं वे अपने निजी झगड़ों तथा सांसारिक पचड़ों में इस प्रकार उलझे हुए हैं कि वे अपनी आध्यात्मिक उन्नति की ओर बिल्कुल ही ध्यान नहीं देते | बचे हुए लोगों में अशिक्षित कृषक, छोटे दुकानदार, नौसिखुए उद्योग-धन्धेवाले, भूख से व्याकुल श्रमजीवी तथा पूर्णतया दुखी और आतुर पुरुष सम्मिलित हैं| थोड़े से व्यक्तियों को छोड़कर प्रत्येक हिन्दू इस बात को भूल रहा है कि उसके कार्यों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और वह अपनी डफली पर अपना राग अलाप रहा है | संगठित जीवन के चिन्ह, पारस्परिक विश्वास तथा सहयोग हिन्दू समाज से पूर्णतया लुप्त हो गए हैं | जनसमुदाय का सुचारू रूप से संचालन करने वाले व्यक्ति बहुत ही कम हैं, और जो हैं भी उनमें सहयोग के साथ संगठित रूप से कार्य करने की क्षमता प्रायः नष्ट सी हो गई है| वर्तमान शोचनीय दशा में परिवर्तन का एकमात्र उपाय यही है कि जनसमाज में शिक्षा का व्यापक प्रचार किया जाय तथा धर्म को उचित आसन पर प्रतिष्ठित किया जाय | भारत का प्राचीन धर्म इस बात की शिक्षा दे रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने को समस्त संसार का एक अंग समझे और समस्त संसार के लाभ के लिये कार्य करे तथा जीवन-धारण करे, क्योंकि कोई भी व्यक्ति तबतक समस्त संसार के कल्याण में सहायक नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपने साथियों के साथ सहयोग नहीं करता | इसलिये धर्म ने जो कुछ नियम बनाए हैं और प्रतिबन्ध रक्खें हैं, वे यदि उचित रूप से कार्य में लाए जायँ और उनका उचित रूप से मनन किया जाय तो मनुष्यमात्र में अच्छे सम्बन्ध स्थापित हो जायं; समाज प्रेम तथा उदार भावनाओं से ओत-प्रोत हो जाय और उसके द्वारा संसार का अधिकाधिक कल्याण हो| हममें से बहुतों की राय है कि यदि हम भारतवर्ष के प्राचीन धर्म का पालन करेंगे तो संसार से विरक्त और उदासीन बन जायेंगें | यह सत्य है कि हिन्दू लोग कभी उस समय में भी माया के फेर में नहीं पड़े जब वे संसार में सबसे अधिक धनी समझे जाते थे | उनका ध्येय लक्ष्मीपूजा छोड़ अन्य ध्येयों की ओर अग्रसर होना था, और उन ध्येयों में उन्होंने वह सफलता प्राप्त की, जिसके लिये कोई भी राष्ट्र अभिमान कर सकता है | किन्तु हिन्दू समाज के संस्थापकों ने तो धन को भी मनुष्य जीवन का उद्देश्य माना है | वास्तव में यह मनुष्य जीवन के चार प्रमुख उद्देश्यों, अर्थात् धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में से, एक उद्देश्य रहा है | धर्मशास्त्र तथा अध्यात्मशास्त्र के साथ-साथ अर्थशास्त्र का भी अध्ययन होता था | केवल एक अथवा दो अंगो में ही उन्नति करने वाला व्यक्ति पूर्ण रूप से उन्नत नहीं समझा जाता था | भारत का प्राचीन धर्म मनुष्य की इहलौकिक और पारलौकिक, दोनों जीवन सम्बन्धों को मानता था | हिन्दू सभ्यता का समस्त ढाँचा हिन्दू धर्म के आधार पर खड़ा है | वर्तमान संस्कृत साहित्य में सुरक्षित उस सभ्यता के अवशेष चिन्हों में एक ऐसी योजना दी गई है जिससे प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, नैतिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक उन्नति कर सके और वे सुसंगठित समृद्ध जाति बन सके | प्राचीन धर्म का सबसे पहला उद्देश्य मनुष्य जीवन को सुरक्षित तथा उसे स्वस्थ रखना था| आयुर्वेद धर्मशास्त्र का प्रमुख अंग समझा जाता था और उस समय यह उपवेद के नाम से प्रसिद्ध था | भारत का आयुर्वेद यूरोपीय औषधि-विज्ञान का भूला हुआ पिता समझा जाता है -------- जिसके पुत्र को कुछ भी ज्ञान नहीं है, और यद्यपि इस शास्त्र में पिछली सात-आठ शताब्दियों से कोई विशेष उन्नति नहीं हुई, तथापि चरक, सुश्रुत तथा अन्य आयुर्वेदिक विषयों का ज्ञान रखने वाले आयुर्वेद चिकित्सक कलकत्ते जैसे प्रसिद्ध स्थान में भी धन और मान प्राप्त कर रहे हैं, जहाँ यूरोपीय सभ्यता का इतना अधिक प्रचार है, और जहाँ यूरोपीय ढंग से चिकित्सा की जाती है, जिसकी उन्नति में समस्त पाश्चात्य देशों ने योग दिया है, और जिनको सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने अपनी विद्वत्तापूर्ण गवेषणाओं द्वारा उपकृत किया है | व्यक्तिगत तथा घरेलू स्वास्थ्य के नियम, खाने – पीने के नियम तथा प्रतिबन्ध इस कथन को भली प्रकार पुष्ट करते हैं | वे हिन्दू समाज के सामाजिक नियमों के अन्तर्गत आ जाते हैं तथा उनका पालन वर्त्तमान हिन्दू धार्मिक कृत्य समझ कर अब तक करते आ रहे हैं | प्राचीन हिन्दुओं का बौद्धिक स्तर ज्ञान–प्राप्ति तथा मस्तिष्क को संयत और उन्नत करने के लिये भारत के ऋषि महात्माओं ने जिन नियमों को प्रतिपादित किया है, तथा जो साधन बनाए हैं, वे पूर्ण रूप से तर्क तथा बुद्धि के आधार पर अवलम्बित हैं | भाषा, जो मनुष्य के मानसिक विकास के लिये सर्वप्रथम तथा सबसे आवश्यक साधन है, तथा जो मनुष्यमात्र के एक दूसरे पर विचार प्रगट करने का सबसे अच्छा तथा सुगम उपाय है, सर्वप्रथम हिन्दुओं द्वारा परिश्रम तथा बुद्धिमानी से संस्कृत की गई तथा नियमानुसार बनाई गई थी | भाषा की ऐसी पूर्णता का उदाहरण संसार में और कहीं नहीं मिलता | संस्कृत भाषा संसार की समस्त भाषाओं में सर्वोत्कृष्ट समझी जाती है | यह भाषा मनुष्य के उच्चातिउच्च विचारों को सुन्दर तथा सम्यक् रूप में प्रकट करने के लिए सर्वथा उपयुक्त पाई गई है | यह भाषा स्वर तथा छन्द के नियमों द्वारा इस प्रकार व्यवस्थित की गई है कि मनुष्य जाति के विचारों के संकलन, स्मरण तथा एक दूसरे पर प्रकट करने के लिये संसार में इस प्रकार की दूसरी भाषा मिलना कठिन ही नहीं, बल्कि असम्भव है | सर मोनियर विलियम्स के कथनानुसार ‘संस्कृत भाषा का अध्ययन मनुष्य को एक ऐसा आनन्द देता है, जिसका प्रभाव कभी किसी अन्य साधन द्वारा कम नहीं किया जा सकता”’’ |” यह बात सर्वसम्मत है कि संसार के किसी और देश ने व्याकरण तथा भाषाशास्त्र के ऐसे सुन्दर नियमों को----- जैसे प्रसिद्ध वैयाकरण पाणिनि तथा पतंजलि ने अगाध परिश्रम तथा विद्वत्ता के साथ बनाए--- जन्म नहीं दिया, जैसा भारतवर्ष ने संस्कृत भाषा द्वारा संसार को दिया | असत्य तथा माया का परित्याग करते हुए वास्तविक सत्य की खोज का मार्ग निर्धारित करना सुविद्वान् भारतीय दर्शनकारों का ही कार्य था, जिसकी विद्वत्ता को देखकर संसार आज भी दाँतों तले उँगली दबा रहा है | मनुष्य के विचारों तथा दिव्य भावों के अधिकाधिक विकास के लिये पतंजलि के योगसूत्र द्वारा निर्धारित माध्यम के समान प्रयत्न करने पर भी आज तक संसार के किसी भी राष्ट्र द्वारा प्राचीन तथा वर्त्तमान समय में माध्यम नहीं खोजा जा सका | यह सत्य है कि हिन्दू दर्शनशास्त्र के समस्त सम्प्रदायों द्वारा प्रतिपादित मार्गों का प्रधान उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति का विकास तथा आत्मा की मुक्ति ही था; किन्तु यह बात भी निस्सन्देह कही जा सकती है कि उसके मार्गों का केवल अध्ययन ही करने से सांसारिक ज्ञानों में भी अभिवृद्धि होती है | ऐसा मनुष्य जो ऐसे मार्गों तथा ऐसे दर्शनशास्त्र से भलीभाँति परिचित है, जबतक निश्चित सत्य तथा सिद्धान्तों को नहीं पाता, तबतक उसकी सन्तुष्टि नहीं होती | प्रत्येक वास्तविक ज्ञान तथा प्रत्येक प्रबल अनुभूति का यह सिद्धान्त मानो आधारस्तम्भ है | जिन ॠषियों ने हिन्दू समाज की संस्थापना की, वे सत्य के बड़े भारी पक्षपाती थे और उन्होंने भलीभाँति निर्धारित सत्य सिद्धान्तों के आधार पर ही अपनी सभ्यता तथा संस्कृति की रक्षा की थी | नैतिक और आध्यात्मिक उच्चता जिस नैतिकता का हमारे ॠषियों तथा महात्माओं ने समर्थन किया है, उसमें मनुष्य जाति के अक्षय अस्तित्त्व और शान्तिपूर्ण सहयोग के गुण भलीभाँति निहित हैं | इसका ध्येय तो पशुपक्षियों तक को हिंसा से बचाना है | अहिंसा मनुष्य के सबसे सुन्दर गुणों में से एक गुण समझा गया है और समाज के समस्त मनुष्य इस नियम का यथाविधि पालन करते हैं | जो मनुष्य अपनी वर्त्तमान अवस्था से ऊँची अवस्था में जाना चाहता था, उसे अहिंसा की प्रतिज्ञा लेनी पड़ती थी| सत्य मनुष्य का मुख्य धर्म तथा कर्त्तव्य समझा जाता था | सत्यान्नास्ति परो धर्म: | श्रुति, स्मृति, इतिहास तथा पुराण सबमे सत्य को मनुष्य का सर्वप्रथम मुख्य धर्म माना है, और सबमें मनुष्य को प्रत्येक समय तथा प्रत्येक अवस्था पर सत्य जैसे अमूल्य रत्न की रक्षा करने का आदेश दिया है| प्राचीन समय में बालक को सर्वप्रथम गुरु द्वारा यह पाठ पढाया जाता था – ‘सत्यं वद, धर्म चर’| भारत का साहित्य हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर तथा दशरथ जैसे महानुभावों के चरित्रों से रंगा पड़ा है, जिन्होंने सत्य की वेदी पर अपने जीवन की बलि दे दी थी, और जिसके लिये हिन्दुओं में अब भी उतना ही सम्मान है, और उतनी ही श्रद्धा है | हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों का दूसरा आदेश लोकसेवा का भाव है, जिसकी वर्त्तमान समय में बहुत आधिक आवश्यकता है | हिन्दुओं के पवित्र साहित्य में किसी सिद्धान्त पर इतना जोर नहीं दिया गया जितना मोह को पूर्णरूप से जीत लेने के सिद्धान्त पर | प्राचीन समय के हिन्दुओं के लिये यह सबसे अधिक गौरव की बात थी कि उन्होंने स्वार्थ की भावना का पूर्ण रूप से परित्याग कर वास्तविक सभ्यता के निर्देशन, वसुधैव कुटुम्बकम् के उच्च सिद्धान्त को पूर्ण रूप से अपना लिया था| अपने शरीर, अपने साथियों, तथा अपने बाल – बच्चों की चिन्ता तो पशु भी कुछ समय तक करते हैं| सभ्यता की उच्च कोटि पर पहुँचने से पहले स्वार्थवाद का भाव प्रत्येक मनुष्य समाज में पूर्ण रूप से उपस्थित रहता है| केवल बहुत समय से सभ्यता के उत्तम आदर्श का पालन करती रहने वाली जातियाँ ही विश्च – बन्धुत्व के उच्च आदर्श की रक्षा कर सकती हैं| केवल वे ही मनुष्य लोक – संग्रह का कार्य कर सकते हैं जिन्होंने सांसारिक मोहमाया को जीत लिया है (गीता,३/२०,२४)| चरित्र-गठन की शिक्षा धन संग्रह से सदा उच्च समझी गई थी ( वृत्तं यत्नेन संरक्षेद्वित्तमायाति याति च )| वेदशास्त्रों के कोरे ज्ञान की अपेक्षा चरित्र की पवित्रता को बहुत अधिक उच्च स्थान दिया गया था ( सावित्रीमात्रसारोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रित:| नायन्त्रितस्त्रिवेदोऽपि )| हिन्दू शास्त्रों में क्षमा, धैर्य, शम, दम, दया, परोपकार, अर्थात् वे सब गुण सुन्दर उपदेशों, कथाओं, तथा आख्यायिकाओं द्वारा भली प्रकार निर्देशित किए गए हैं, जिनके पालन से मनुष्य का चरित्र अधिक दिव्य, अधिक पवित्र, अधिक उदात्त बनता है, जिनके ऊपर मनुष्य समाज सधा हुआ है, तथा जो मनुष्यमात्र में शान्ति और कल्याण के बीज बोते हैं | हिन्दू काव्य ने हिन्दू दर्शनशास्त्र के साथ मनुष्य के चरित्र को उच्च बनाने में पूर्ण सहयोग दिया है – उसने यह भलीभाँति शिक्षा दी है कि संसार के समस्त प्राणी दूसरे रूप में उसी के प्रतिबिम्ब हैं, तथा संसार के जिन व्यक्तियों के साथ सह सम्पर्क में आता है उनके कल्याण की चिन्ता करने से वह मनुष्य रूप देवता स्वरूप है, तथा इसके विरुद्ध आचरण करने से वह पशुओं से भी गिरा हुआ है | पुनर्जन्मवाद तथा कर्मवाद के सिद्धान्त इस प्रकार मनुष्य को देवता बनाने में बहुत अधिक सहायक होते हैं| भारत के पवित्र धार्मिक साहित्य में आध्यात्मिक उन्नति के लिये भारत के ऋषियों, महर्षियों तथा मनीषियों ने जो नियम निर्धारित किए हैं, वे संसार के इतिहास में अद्वितीय हैं| प्राचीन भारत की महान संस्थाएँ और राष्ट्रीय एकात्मता तथा समृद्धि को उनकी देन संस्कृत साहित्य के विद्वान् तथा चतुर विद्यार्थी इस बात का अवश्य अनुभव करेंगे कि हिन्दू समाज के प्राचीन संस्थापकों का उद्देश्य एक शक्तिशाली, विकसित, वैभव-सम्पन्न तथा सुसंघटित समाज की स्थापना करना था | उन लोगों ने देवी देवताओं के लिये जो प्रार्थनाएँ लिखी हैं, उनमें भी यह उद्देश्य निहित है | सांख्यिक शक्ति इस कथन से यह स्पष्ट हो गया होगा कि किसी भी जाति की उन्नति के लिये उसकी जनसंख्या की अभिवृद्धि आवश्यक है | यह भी भलीभाँति विदित है कि वर्तमान समय में इस कमी की पूर्त्ति के लिये फ्रांस तथा अमेरिका के प्रजातन्त्रों में यथासाध्य प्रयत्न किया जा रहा है | प्राचीन समय में हिन्दुओं के लिये यह बात धार्मिक कर्त्तव्य के रूप में सब लोगों पर लागू थी कि सब नागरिकों को इसके लिये यथासाध्य प्रयत्न करना चाहिए | केवल नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही लोकसेवा के लिये कौमार्यव्रत धारण करते थे जिनके जीवन का ध्येय समस्त जीवन शिक्षा प्राप्त करना था | किन्तु केवल जनसंख्या की अभिवृद्धि ही किसी जाति को शक्तिशाली नहीं बनाती | इसी बात को ध्यान में रखकर हिन्दू शास्त्रकारों ने विवाह-सम्बन्धी नियम बनाए थे, जिससे वर्णसंकर तथा अयोग्य व्यक्ति जन्म लेकर समाज को कलंकित न करें, बल्कि वे ही लोग जन्म लें जो शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक सब दृष्टियों से पूर्ण हैं | चार आश्रम, जीवन की चार अवस्थाएँ इन दिव्य गुणों के विकास के लिये प्रत्येक द्विज के लिये आवश्यक था कि सुयोग्य गुरु की संरक्षता में रहकर ब्रह्मचर्य के साथ विद्यार्थी-जीवन व्यतीत करे| पूर्ण पवित्रता तथा संयम के साथ इस जीवन को बिता लेने के पश्चात् उसे गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकार था, किन्तु वहाँ भी लोक-सेवा और परोपकार के सुन्दर नियमों का उसे पालन करना पड़ता था, और इस प्रकार उसे व्यावहारिक ज्ञान बढ़ाने १. हे परमात्मन् ! हमारे देश के ब्राह्मण ज्ञानवान तथा पवित्रता के प्रचारक हों, क्षत्रिय शूरवीर, पराक्रमी तथा तेजस्वी हों, कृषकों की गायें प्रचुर दुग्धवर्षा करें, वृषभ शक्तिशाली हों, अश्व द्रुतगामी हों, स्त्रियाँ चतुर गृहिणी हों, पुत्र विजयी योद्धा हों, जो अपने तेज से संसार को प्रदीप्त करें ! इस देश में मेघ इच्छानुसार जल बरसाएँ ! हमारी भूमि शस्यपूर्ण हो ! हम धनधान्य तथा वैभव से पूरिपूर्ण हों ( शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयी संहित, अध्याय २२, मन्त्र २२ ) का अवसर दिया जाता था| गृहस्थ जीवन का त्याग उस समय अनिवार्य था, जब मनुष्य को वृद्धावस्था आ घेरती थी और उसके बाल बच्चे बड़े हो जाते थे| यह समय उसके वानप्रस्थ जीवन का था, जबकि मनुष्य सांसारिक चिन्ताओं तथा नागरिक जीवन से विमुक्त हो एकान्तवास करने लगता था, और उसका मस्तिष्क पूर्ण शान्ति तथा विश्राम का अनुभव करता था, जो उच्च तथा पूर्ण विचारों के चिन्तन के लिये परमावश्यक है | सबके अन्त में सन्यास आश्रम का समय आता था, जब कि मनुष्य का मन पूर्णतया परमपुरुषार्थ के चिन्तन में लीन हो जाता था, और इस संसार के विचारों से एकदम उदासीन हो उसी के लिये प्रयत्न करता था| इस अवस्था में आत्मा को पूर्णतया पवित्र तथा विकसित होने का अवसर मिलता था, और यह अभ्यास उस समय तक रहता था जब तक की यह आत्मा परमात्मा में पूर्णतया लीन न हो जाय, या यों कहिए, जबतक उसे ब्रह्मपद की प्राप्ति ना हो जाय | श्रम-विभाजन, प्रतिभा और अभिक्षमता का वंशानुगत संचरण सामाजिक उन्नति के लिये समाज का कार्य भिन्न-भिन्न व्यक्तियों तथा वर्गों में बँटा हुआ था, जिनका कर्त्तव्य उस कार्य को सुचारू रूप से पूर्ण करना था, और अपने अनुभव, योग्यता, चतुराई आदि को अपनी सन्तान के लिये छोड़ जाना था | ज्ञान के विकास और उसकी रक्षा करने, नियमों और धर्मिक संस्थाओं द्वारा समाज को नियमित करने तथा शिक्षा – सम्बन्धी साहित्यिक तथा वैज्ञानिक कार्य द्वारा सभ्यता को उन्नत करने का उत्तरदायित्व समाज के एक ऐसे अंग को सौंप दिया गया था, जो बचपन से ही ज्ञान और सद्गुण को अपनी परम निधि मानते थे, और जिन्हे कठोर आत्मत्याग और आत्म – निर्भरता की शिक्षा दी जाती थी| समाज की रक्षा का भार उन मनुष्यों को सौंप गया था, जो अपने बाहुबल तथा राज्यशासन – प्रबन्ध की योग्यता के कारण इस कार्य के लिये सर्वथा उपयुक्त थे | धन की उपज और उसको समाज में विभाजन करने का काम एक ऐसे वर्ग को सौंपा गया था, जो अपने परिश्रम, मितव्ययिता, ज्ञान तथा व्यवहार – कुशलता द्वारा इस कार्य को भलीभाँति पूर्ण कर सकता था | यद्यपि क्षत्रिय तथा वैश्य अपने अपने निर्धारित कार्य के लिये शिक्षित बनाए जाते थे, तथापि उनके लिये वेदों तथा शिक्षा के अन्य अंगों का ज्ञान उतना ही आवश्यक था, जितना ब्राह्मणों के लिये | नीची श्रेणी के लोगों को समाज के उच्च अंगों की सेवा करने का विधान था| यह बात संसार के सब देशों में तथा सब समय पर होती आई है | प्रत्येक जाति के लिये इस प्रकार जो जाति धर्म बनाए गये थे, समाज – हित के लिये उस जाति ने उनका पालन भली प्रकार किया, और इसी रूप में कुलधर्म का कुछ कुलों ने पालन कर समस्त समाज के हितों का ध्यान उसी प्रकार रक्खा, जिस प्रकार शरीर का प्रत्येक अवयव शरीर के हित के लिये प्रत्येक समय कार्य करता हुआ शरीर–रक्षा में योग देता है | सामाजिक संस्थाओं के वास्तविक परिणाम हमारा प्राचीन वर्णविभाग वर्त्तमान समय के उन नियमों के अनुसार ही था जिन्हें आज सभ्य संसार श्रमविभाजन तथा ‘रूचि और बुद्धि की परम्परागत प्राप्ति’ के नाम से पुकारता है | ये नियम आश्रम-विभाग की संस्था के हित के लिये कार्य करते थे, और इन्हीं नियमों के परिणामस्वरूप भारतवर्ष शताब्दियों तक संसार के सबसे धनाढ्य और वैभवसम्पन्न देशों में से एक समझा जाता था| यूनानी इतिहासकार हेरदतुस् ने भारतवासियों को अपने समय की सबसे बड़ी जातियों में से एक कहा था | उस समय यूनान से बढ़कर सभ्य समझी जाने वाली थ्रेशियन जाति भी भारतवासियों की अपेक्षा कम बलवती थी | भारत के धनधान्य की प्रचुरता से सिकन्दर के समय से लेकर अब तक अनेक विदेशी आक्रमणकारियों के मुँह में पानी भर आया | भारत की बनी हुई वस्तुओं की प्रशंसा संसार में प्रत्येक जगह होती थी | एशिया तथा यूरोप के देशों में भारत की बनी वस्तुओं की खूब बिक्री होती थी | कर्नल टॉड द्वारा वर्णित राजस्थान के इतिहास के समय तक सिपाही लोग अपनी शूरवीरता तथा युद्धकौशल के लिये विख्यात थे, जिस समय कि हमारा जातीय इतिहास पराकाष्ठा को पहुँच गया था | संस्कृत साहित्य में भारतीय वैभवपूर्ण जातियों, शक्तिशाली राज्यों, सुन्दर नगरों, दर्शनीय प्रासादों, उद्यानों, क्रीड़ास्थलों, व्यापारिक उन्नति, उद्योग-धन्धों, कलाकौशल तथा विद्वत्ता के सुन्दर तथा हृदयग्राही वर्णन मिलते हैं| ये वर्णन केवल कवियों के दिमाग की उपजमात्र ही न थे, जैसा कि कुछ लोगों का विचार है, बल्कि मेगस्थनीज तथा ह्वेनशांग आदि विदेशी यात्रियों के लिखे वर्णन भी इसी कथन की पुष्टि करते हैं | भारतीय समाजशास्त्र का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाला विचारपूर्ण व्यक्ति इस बात को निस्संकोच मानेगा कि प्राचीन समय में भारतवासियों ने खनिज पदार्थों से भरपूर भारत जैसी उर्वरा भूमि में विद्वान् परोपकारी ॠषि महात्माओं द्वारा बनाई संस्थाओं में पलकर जीवन के भिन्न-भिन्न अंगों में कैसी आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त कर ली थी | यूरोप के संस्कृत विद्वान् अब इस बात को स्वीकार करते हैं कि धर्म, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष, आयुर्वेद, कविता, नाटक, वास्तुकला, संगीतशास्त्र, कला-कौशल, उद्योग-धन्धों, तथा विद्या के समस्त अंगों को भारतीयों ने ही जन्म दिया और अपने परिश्रम से उन्होंने जो रूप उन्हें दिया है उसका दूसरा उदाहरण सम्भवत: और कहीं भी न मिलेगा | शास्त्रीय संस्कृति, धार्मिक शिक्षा एवं नियंत्रण का अभाव वर्त्तमान समय में भारतीय हिन्दुओं की जो शोचनीय दशा हो गई है, वह मुख्यत: हमारे प्राचीन साहित्य तथा धर्म से उदासीनता के कारण है| कोई ऐसी संस्था भारत में नहीं है जो जनसमाज में, सत्य, पवित्रता, कार्यशीलता तथा आत्म-नियंत्रण जैसे सद्गुणों का प्रचार करने के लिये शिक्षक उत्पन्न कर सके, जिसकी आवश्यकता तथा महत्ता भारत के प्राचीन धर्मग्रन्थों में भली प्रकार दिखाई गई है | दो-एक को छोड़ कर सारे हिन्दू शासक, धनी-मानी पुरुष तथा शिक्षित लोग, यहाँ तक कि ब्राह्मण भी नियमानुसार धार्मिक तथा आध्यात्मिक शिक्षा से पूर्णतया वंचित रह जाते हैं| यह तो हमारे समाज की दशा हुई | दूसरी ओर अमेरिका तथा यूरोप के देशों पर दृष्टि डालिए जहाँ शिक्षा के साथ धर्म का भी अध्ययन नियमानुसार होता है, जहाँ अच्छे-अच्छे गिरजाघरों में धार्मिक शिक्षा की पूरी व्यवस्था है, जहाँ पादरी लोग राजकीय आज्ञा से श्रोतागणों को शिक्षा देते हैं, जहाँ धनिक शिक्षित समाज तथा अन्यान्य समुदायों को रोम और यूनान के प्राचीन साहित्य की शिक्षा दी जाती है, जो उन्हें सुसंस्कृत तथा सभ्य बनाने में बहुत अधिक सहायक होते हैं, और जिनके परिणामस्वरूप वे अपने जीवन में प्रसिद्ध महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करते हैं | यूरोप का पठित समाज रोम तथा यूनान के प्राचीन साहित्य से भलीभाँति परिचित तथा शिक्षित है, किन्तु हिन्दू समाज में अधिकांश व्यक्ति ऐसे हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा तो प्राप्त कर ली है, किन्तु वे अपने देश के प्राचीन तथा पवित्र साहित्य में पूर्णतया पारंगत नहीं हैं, और उनमें से ऐसे लोगों की तो संख्या और भी कम है, जिन्होंने संस्कृत साहित्य के अगाध सागर में गोते लगाकर अमूल्य रत्न निकालने का प्रयत्न किया हो | रोम एवं यूनान के साहित्य के प्रति यूरोपीय सभ्यता की कृतज्ञता यूरोपीय इतिहास के विद्वान् इस बात से भलीभाँति परिचित हैं कि वर्त्तमान यूरोप की सभ्यता, उनका कला – कौशल तथा उनकी वैज्ञानिक उन्नति उसी आन्दोलन के फलस्वरूप है जो पुनरुत्थान के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका उद्देश्य मुख्यत: यूनान तथा रोम की सभ्यता का पुनरुत्थान करना था, और जिसका सूत्रपात रोमन सभ्यता के घर इटली में हुआ, और जो क्रमश: फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, इंग्लैण्ड तथा यूरोप के अन्यान्य देशों में फैल गयी | संस्कृत विद्या की पुर्नस्थापना की आवश्यकता हिन्दुओं की किसी वास्तविक उन्नति से पहले यह आवश्यक हो जाता है कि हिन्दू विद्या की महान् पुर्नस्थापना हो | उनके उद्धार की प्रत्येक योजना में उनकी एतिहासिक प्रगति तथा उनके पुरुषों द्वारा किए गए महान् कार्यों में उचित सामंजस्य स्थापित हो जाना चाहिए | प्रत्येक हिन्दू भाषा और साहित्य की उन्नति के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपनी जननी संस्कृत भाषा के साहित्य से उचित परामर्श तथा सामग्री लेती रहे | जो इस साहित्य से भलीभाँति परिचित हैं, वे भली प्रकार जानते हैं कि इस साहित्य में नौतिक तथा सांसारिक उन्नति के लिये अनमोल रत्न भरे पड़े हैं| १. प्रो. मैक्सम्यूलर इस बात से सहमत है कि संस्कृत साहित्य में ऐसे अनमोल रत्न है, जिनका पाश्चात्य विद्धानों को बहुत ही थोड़ा ज्ञान है | उनका कथन है कि वास्तव में हमसे पीछे आने वाले सज्जनों के लिए अब भी बहुत सा कार्य करना शेष है, क्योंकि अब तक जो कुछ किया गया है, उससे हम भारतीय दर्शन तथा साहित्य की पहली सीढी पर पहुँचे हैं | हम उस बच्चे की तरह हैं, जिसके सामने प्राचीन साहित्य का अगाध समुद्र है, और वह उसके किनारे खड़ा हुआ है | उसे कभी कभी पत्थर के टुकड़े तथा घोंघे मिल जाते हैं | ( six system of Hindu philosophy , 1st ed ., p.42 ) पाश्चात्य विद्वान् भी संस्कृत साहित्य की वर्त्तमान यूरोप के साहित्य तथा सभ्यता के जनक, यूनानी तथा लैटिन साहित्यों से तुलना करके संस्कृत को श्रेष्ठतर बताते हैं | भारत में अँग्रेजी शिक्षा अंग्रेजी भाषा की शिक्षा वर्त्तमान अवस्था देखते हुए हिन्दू जाति के केवल अल्पांश को ही मिल सकती है | भारत की समस्त संख्या में १००० पीछे ६.८ मनुष्य अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त हैं | इनमें यूरोपियन तथा युरेशियन भी सम्मिलित है | भारत में अंग्रेजी शिक्षा पास हुए अधिकांश ऐसे मनुष्य हैं, जो अपने व्यवसायों और नौकरियों में सम्मान – प्राप्त हैं और कार्यों को योग्यतापूर्वक कर रहे हैं | परन्तु ऐसे बहुत कम स्थान हैं, जहाँ अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों की खपत हो | इसी शिक्षा की प्राप्ति के लिये समाज की शक्ति तथा आर्थिक अवस्था का जो भयंकर ह्लास हो रहा है वह अलग, क्योंकि किसी विदेशी भाषा के द्वारा जो शिक्षा किसी देश के बच्चों को दी जाती है, उससे समय तथा धन का भारी अपव्यय होता है, और इससे बचने का एक ही मार्ग है कि उससे देश के बच्चों को उन्हीं की भाषाओं के माध्यम द्वारा शिक्षा दी जाय | जिन्होंने अंग्रेजी भाषा के सीखने में अपने जीवन के पन्द्रह या बीस वर्ष व्यतीत किए हैं, उनमें से ऐसे लोगों की संख्या तो और भी कम है, जो इस भाषा द्वारा अपने भावों से संसार के कल्याण में सहायक हो सकें | जो भारत प्राचीन समय में तत्त्वज्ञों के लिये प्रसिद्ध था, वह आज अपने मौलिक विचारों को मानो खो ही बैठा है | विचारों में मौलिकता लाने के लिये किसी व्यक्ति की मातृभाषा जो सहायता दे सकती है, वह सहायता कोई भी विदेशी भाषा नहीं दे सकती | विदेशी भाषा उन व्यक्तियों के लिये लाभदायक है, जिनके पास उसे प्राप्त करने के लिये पर्याप्त साधन हैं, किन्तु किसी पूरे देश तथा जाति को शिक्षित करने के लिये वह भाषा कदापि सुगम साधन नहीं हो सकती | जो लोग सरकारी पदों के इच्छुक हैं, उन्हीं के लिये अंग्रेजी भाषा की शिक्षा की सदैव आवश्यकता रहेगी | यह भाषा वैज्ञानिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये तथा उसे जन-समाज में फैलाने के लिये पढ़नी चाहिए | क्योंकि इस भाषा के द्वारा हमारे देशवासियों १. यह तुलना सर मोनियर विलियम्स ने अपनी ‘संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी’ की प्रस्तावना में की है| उनका कथन है कि “”कोई भी व्यक्ति, जिसकी मानसिक तथा शारीरिक शक्तियाँ परिमित हैं, एक अथवा दो से अधिक इतनी विस्तृत विभागों को पूर्ण रूप से अध्ययन नहीं कर सकता, जिनमें कि एतिहासिक पुरात्तत्वशास्त्र के अतिरिक्त कोई एक विशेष विषय ऐसा नहीं है, जिसके कि एक-एक विभाग में संसार की अन्य भाषाओं की अपेक्षा आधिक पुस्तकें न लिखी गई हों | कुछ विशेष विषयों में, विशेषतया प्राकृतिक दृश्यों तथा गृहस्थ-प्रेम में तो संस्कृत साहित्य रोम तथा यूनान के प्राचीन साहित्य से भी बाजी मार ले जाता है, और विद्वत्ता, भाव – गाम्भीर्य तथा नैतिक उच्चता में तो संस्कृत साहित्य के सुन्दर वर्ण संसार के इतिहास में अद्वितीय हैं | इन सब बातों के अतिरिक्त प्राचीन हिन्दुओं में ज्योतिषशास्त्र, बिजगणित, अंकगणित, वनस्पतिशास्त्र तथा आयुर्वेद में यूरोप के प्राचीन देशों की अपेक्षा प्रशंसनीय उन्नति कर ली है | उनके व्याकरण जैसी उन्नति तो संसार में आज तक नहीं हुई | नि:सन्देह यह प्राच्य देश हमारे समस्त प्रकाश तथा ज्ञान का स्रोत रहा है | को, यूरोप तथा अमेरिका में पिछले सत्तर या अस्सी वर्षो में हुए वैज्ञानिक अनुसन्धानों तथा यंत्र के प्रचार और रासायनिक पदार्थों से अधिक क्षेत्र में हुई आश्चर्यजनक उन्नति का ज्ञान हो सकेगा| भारतीय भाषाओं के द्वारा ही भारत की अधिकांश जनता शिक्षित हो सकती है, और उनका पोषण भी संस्कृत जननी द्वारा होना चाहिए| हिन्दू संस्कृति का ह्लास एक समय था जब भारतवर्ष समस्त आर्यजगत् को केवल अपनी धार्मिक तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं द्वारा ही नहीं, अपितु विज्ञान, कला-कौशल, उद्योग-धन्धे आदि समस्त विद्याओं द्वारा उपकृत करता था | यूरोपीय विद्वानों तथा अन्वेषकों का कथन है कि भारतवर्ष ने ही अंकगणित, बीजगणित, रेखागणित, ज्योतिषशास्त्र तथा आयुर्वेद को जन्म दिया है, और वे हमारे पूर्वजों को इसके लिये धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने ही संसार को धातुओं का प्रयोग बतलाकर संसार की सभ्यता की अभिवृद्धि में सहयोग दिया था | दुःख है कि समय के परिवर्त्तन से भारत ने कला-कौशल तथा विज्ञान में पिछली नौ या दस शताब्दियों से कुछ भी नहीं किया | इतना ही नहीं, बल्कि उसकी सब उन्नतियों का वर्त्तमान समय में भयंकर ह्लास होता जा रहा है | भास्कराचार्य के समय से लेकर अब तक गणित में कोई उन्नति नहीं हुई, तथा आयुर्वेद ने भी वाग्भटट् के समय से लेकर अब तक बहुत ही थोड़ी उन्नति की है | भारतीय विद्वत्ता का पौधा, जिसको विद्वानों ने अपने सराहनीय परिश्रम से सींचा था, आज दिनोदिन सूखता जा रहा है | प्रत्येक कला-कौशल तथा व्यापार भी आज नितान्त चौपट होता जा रहा है | जिन वेदों के ज्ञान का हमें किसी समय बड़ा अभिमान था, वह आज हमारे देश से लुप्तप्राय होता जा रहा है | वास्तव में यूरोप में वेदों का अध्ययन भारत की अपेक्षा अधिक उत्साह से किया जाता है| हमारी आँखों देखते ही कितने संगीतज्ञ तथा दार्शनिक महापुरुष अपनी कला तथा विद्वत्ता को सुयोग्य वक्तियों के हाथ सौंपे बिना ही इस संसार से कूच कर गए हैं | कच्ची धातुओं से फौलाद बनाने की कला भी प्राचीन समय में भारत के कई भागों में काम में लाई जाती थी, किन्तु आजकल के कारीगर उस कला को भूल गए हैं | बारीक सूती कपड़े भी हमारे ही देश में बुने जाते थे, जिनको हम ‘शबनम’ तथा ‘आबेरवाँ’ कहकर पुकारते थे | इस कला को तो हमने अभी-अभी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में खोया है | अवनति का यह क्रम पिछले १२०० वर्षों से अबाध गति से चला आ रहा है | वर्त्तमान समय के हमारे ह्लास पर दृष्टिपात करने से सम्भवत: हमारी सभ्यता का हमें कुछ पता लग जाय| हमारे उत्तरोत्तर ह्लास के होते हुए भी भारत उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण तक संसार के अन्य देशों से आर्थिक सम्पन्नता में किसी प्रकार कम न था | उस समय तक भारत यूरोप तथा अन्यान्य देशों को बारीक़ कपड़े तथा अन्य वस्तुएँ भेजी थीं | किन्तु पिछले पचहत्तर वर्षों से यूरोप तथा अमेरिका में भौतिक तथा रसायनशास्त्र में जो उन्नति हुई है, भाप तथा बिजली के आविष्कार ने उद्योग-धन्धों को तैयार करने में जो सराहनीय सहयोग दिया है, उसने भारत के उद्योग-धन्धों, उसके व्यवसायों तथा उसकी शिल्पकला को एकदम चौपट कर दिया है | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता भारत अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त करने में तबतक सर्वथा असमर्थ है, जब तक वह वर्तमान वैज्ञानिक अन्वेषणों का अध्ययन नियमित तथा अनिवार्य नहीं बनाता | विज्ञान उस समय तक राष्ट्र की सम्पत्ति न हो सकेगा, जब तक कि उसका अध्ययन देश के बच्चों के लिये राष्ट्रभाषा में नहीं होता| समाज को भयंकर गरीबी से मुक्त करने के लिये विज्ञान आवश्यक है, किन्तु उसकी उन्नति उस समय तक देश में सुचारू रूप से नहीं हो सकती, जबतक उसके अध्ययन का क्रम देश ही में और देशी भाषाओं द्वारा न हो जायगा | विदेशों में शिल्प-सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने के लिये विद्यार्थी भेजने का जो स्तुत्य कार्य देशवासी कर रहे हैं, निस्सन्देह राष्ट्र की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं| किन्तु वे भी वास्तव में देश-सेवा का कार्य बहुत छोटे पैमाने पर कर रहे है | शिल्पविद्या उस समय तक वास्तविक उन्नति नहीं कर सकती, जबतक समस्त देश में एक केन्द्रीय संस्था न हो, जहाँ विद्यार्थियों को शिल्प-सम्बन्धी सिद्धान्तों का पूर्ण परिचय तथा उन्हें कार्य रूप में परिणत करने की उचित शिक्षा दी जा सके| धार्मिक शिक्षा की आवश्यकता किन्तु भारत केवल औद्योगिक विकास के बल पर ही संसार में वह स्थान नहीं प्राप्त कर सकता, जो उसे प्राचीन समय में संसार के सभ्य देशों में प्राप्त हुआ था, और भारत में औद्योगिक उन्नति भी तबतक नहीं हो सकती, जब तक कि समाज में पारस्परिक विश्वास तथा परस्पर सहयोग की भावना नहीं उत्पन्न होती, और ये दिव्य गुण उसी समय आ सकते हैं जब समाज के अधिकांश व्यक्ति अपने प्रत्येक कार्य में विश्वास रखने लगें | ऐसे मनुष्य प्रचुर संख्या में समाज को उसी समय प्राप्त हो सकेंगे, तथा उसी समय उसे संघटित, सुचारू तथा हृस्ट-पुष्ट दशा में रख सकेंगे जब कि समाज एक धार्मिक तथा जीवित संस्था के प्रभाव में रहेगा | उपर्युक्त विचार इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हिन्दू जाति को एक शिक्षासूत्र में बाँधने की इस समय नितान्त आवश्यकता है, जो इसके सदस्यों को जीवन के ध्येय (त्रिवर्ग) की ओर अग्रसर होने में सहायता देगी | हिन्दू शास्त्रों के अनुसार जीवन के मुख्यत: निम्नलिखित ध्येय हैं--- (१) धार्मिक कर्त्तव्यों का पालन करना (धर्म) (२) धन की प्राप्ति (अर्थ) और, (३) आनन्द का उपभोग (काम) | प्रत्येक प्राणी को अपने प्रयत्न द्वारा धार्मिक गुरु की संरक्षता में अपने जातिगत तथा व्यक्तिगत मतानुसार जीवन का चौथा ध्येय मोक्ष प्राप्त करना चहिए | द्वितीय भाग हिन्दू विश्वविद्यालय, अन्तरिम योजना शिक्षा का जो स्वरूप पिछले पृष्ठों में निर्धारित किया गया है, उसको कार्य रूप में परिणत करने के लिये एक ऐसे विश्वविद्यालय की आवश्यकता है, जो (अ) हिन्दू समाज तथा संसार के हित के लिये भारत की प्राचीन सभ्यता की अच्छाई और महत्ता की रक्षा और उसके प्रचार के लिये संस्कृत विद्या का विकास करे | इसका उद्देश्य विशेषत: उन उपदेशों की रक्षा भी होगा, जिसने ऐसे महात्माओं को जन्म दिया, जो अपनी सादगी तथा पवित्रता के लिये संसार में प्रसिद्ध थे, और जिन्हें लोक तथा समाज की सेवा में हार्दिक आनन्द प्राप्त होता था | यह संस्कृत भाषा वर्त्तमान वैज्ञानिक अनुसन्धानों को भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्त्त करके देश के कल्याण-साधन में सहायक हो, और जो (ब) देश के नवयुवकों को देश के आर्थिक कल्याण के लिये वैज्ञानिक तथा शिल्प सम्बन्धी शिक्षा दे | संस्कृत विद्या का अध्ययन केवल ब्राह्मणों तक ही परिमित है, और उनमें भी बहुत कम लोग पढ़ते हैं, और वे भी किसी निश्चित ध्येय से अध्ययन नहीं करते | ब्राह्मण-बालक संस्कृत का अध्ययन या तो धार्मिक कर्त्तव्य समझ कर करते हैं, या असंख्य वर्षों से चली आई रूढ़ियों का पालन करने के लिये | उनमें से बहुत से तो सांसारिक लोभ तथा धन का लालच त्यागकर इसके वास्तविक गुणों के कारण इसके पक्षपाती बन जाते हैं | आर्थिक प्राप्ति तो उस घोर परिश्रम तथा समय के मूल्य की तुलना में प्राय: नहीं के बराबर है | साधारण कोटि के पण्डितों को तो यह विचार स्वप्न में भी नहीं होता कि संस्कृत भाषा के अध्ययन से उन्हें धन-धान्य की भी प्राप्ति हो सकती है| वे यह नहीं जानते हैं कि संस्कृत के अध्ययन से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है, जिससे मनुष्य बुद्धि-साध्य व्यवसायों के लिये योग्य बन जाता है, तथा इसके अध्ययन में मनुष्य-चरित्र अधिक उदात्त तथा पवित्र बनता है, जिससे मनुष्य संसार में वास्तविक उन्नति कर सकता है | विश्वविद्यालय के अन्यान्य उद्देश्यों में से एक यह भी है कि संस्कृत भाषा के अध्ययन का क्रम सभी वर्ग के लोगों के लिए इतना विस्तृत कर दिया जाय कि जो उसके अध्ययन के लिये उत्युक हैं, वे इसकी शिक्षा पा सकें, इसके द्वारा जाति के चरित्र को उच्च बना सकें, राष्ट्र के मानसिक विकास में सहयोग दे सकें, तथा समाज-सेवा आदि अन्य कर्त्तव्यों को अत्यन्त सुगमतापूर्वक कर सकें | इस प्रकार संस्कृत देश के सब भागों के पठित समाज की फिर वैसे ही भाषा हो जायगी जैसे यह प्राचीन समय में थी | संस्कृत अध्ययन के अवसर-क्षेत्र इस विश्वविद्यालय में संस्कृत साहित्य के समस्त अंगों, विशेषत: वेद-वेदांग, उपवेद, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण तथा अन्य हिन्दू राजनीतिक मूल विषयों की शिक्षा दिया जाना प्रस्तावित है| शिक्षा के इस क्रम की व्यवस्था ठीक उसी प्रकार की है, जैसी श्रीयुत् जोनाथन डंकन१ ने काशी के क्वीन्स कॉलेज के लिये निर्धारित की थी | उक्त महोदय के क्वीन्स कॉलेज स्थापन-कार्य के लिये देश सदैव उपकृत रहेगा | किन्तु पीछे इस सिद्धान्त के अनुसार, कि इसाइयों के राज्य में इसाई धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मो की शिक्षा में सहयोग देना अधार्मिक कार्य है-- वेद तथा अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों के अध्ययन का क्रम रद्द कर देना पड़ा | वेद वेदाध्ययन के लिये शिक्षा-संस्थाओं का पूर्ण अभाव होने के कारण वेदों का नाम हमारे देश से उठता जा रहा है | कुछ यूरोपीय विद्वानों ने पिछले पचास या साठ वर्षों से वेदाध्ययन का क्रम जारी किया है, किन्तु उन्हें अपने देश में वैसी सुविधाएँ प्राप्त नहीं, और उन्हें बहुत सी वैदिक पुस्तकों का अर्थ स्पष्ट नहीं होता | इसके अतिरिक्त उनका अध्ययन भाषाशास्त्र तथा ऐतिहासिक ज्ञान के लिये होता है | इसी से उनका परिश्रम भारतवासियों के लिये तबतक लाभदायक नहीं हो सकता जबतक कि वे स्वयं संस्कृत साहित्य के इस प्रमुख विभाग के अध्ययन की ओर पूर्ण रूप से दत्तचित्त न हो जायँ| ------------------------------------------- १. क्वींस कॉलेज बनारस के इतिहास से उधृत (कॉलेज संग्रहालय में सुरक्षित ) ““रेजिडेण्ट १७ नवम्बर १७७१ को इस नये कॉलेज में पहली बार आए और सरकार को प्रेषित अपने पहले प्रतिवेदन में उन्होंने हिन्दू साहित्य का विश्लेषण प्रोफेसरों को यह इंगित करते हुए देना प्रारम्भ किया कि विद्या की इन विविध शाखाओं का पोषण, और शायद बाद में परिष्कार करना भी उनका उद्देश्य होना चाहिए | अग्निपुराण से साहित्य का विश्लेषण अठारह विद्याएँ वेद :ॠग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद उपदेव :आयुर्वेद (चिकित्सा, बनस्पतिशास्त्र आदि), गान्धर्ववेद (संगीत आदि), धनुर्वेद (शस्त्र) अथर्वेद (मशीनी कला) वेदांग :शिक्षा (शुद्धोच्चारण), व्याकरण, छन्द शास्त्र, निरुक्त (पवित्र शब्द कोश), कला (कर्मकाण्ड), ज्योतिष (गणित) दर्शन : मीमांसा आदि (तत्त्व विज्ञान), न्याय आदि (तर्कशास्त्र) धर्म : संहिता (विधि) पुराण : १८ पुराण आदि (१८ इतिहास नीतिशास्त्र आदि) नौ विद्याओं में समाहित १. वेद: (प्रधानत: उपनिषद) ब्रह्म विज्ञान, २.आयुर्वेद : चिकित्सा एवं प्राकृतिक इतिहास, ३. गान्धर्व वेद : संगीत सिद्धान्त, गीत एवं नाठ्यशास्त्रीय कविता, ४. व्याकरण : व्याकरण, छन्दशास्त्र और काव्य, ५. ज्योतिष : खगोल विज्ञान, भूगोल, शुद्ध गणित, ६. मीमांसा एवं वेदान्त : दर्शन एवं तत्त्व विज्ञान, ७. न्याय : तर्क एवं दर्शन, ८. धर्मशास्त्र : नागरिक एवं आध्यात्मिक विधि, ९. पुराण : इतिहास, नितिशास्त्र, वीर गाथाएँ संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद्, श्रौत, गृह्यसूत्र तथा धर्मसूत्र, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा अन्य पुराणों के अध्ययन का क्रम इस विश्वविद्यालय में रक्खा जायगा और हिन्दू समाज के विकास तथा संघटन का अध्ययन विशेष रूप से करने का आयोजन होगा | इस प्रकार का अध्ययन हिन्दू संस्थाओं के कार्य-क्रम को ठीक-ठीक समझाने में सहायक होगा, और इसके परिणामस्वरूप अधिकाधिक संख्या में विद्वान् उपदेशक निकलेंगे, जो समाज को नैतिक तथा आध्यात्मिक सत्य का मार्ग बता सकेंगे, जिससे समाज का कलेवर वर्त्तमान समय की अपेक्षा एकदम बदल जायगा | वेदांग वेदांगों में से केवल व्याकरण का ही अध्ययन कुछ उत्साह के साथ किया जाता है | ज्योतिष का भी अध्ययन जहाँ-तहाँ जारी है, किन्तु इसकी उचित शिक्षा का पूर्ण अभाव है | थोड़े से व्यक्ति छन्दशास्त्र का भी अध्ययन करते हैं, किन्तु वैदिक छन्दशास्त्र को हमने एकदम भुला ही दिया है | शिक्षा, कल्प तथा निरुक्त का ज्ञान तो किसी बिरले को ही है | व्याकरण के अध्ययन को अधिक व्यावहारिक बनाने की तथा अन्य वेदांगों, विशेषतया ज्योतिष तथा अन्तरिक्षशास्त्र अध्ययन के लिये एक वेधशाला बनेगी तथा संस्कृत साहित्य इन विषयों के समस्त अन्वेषणों से भरा-पूरा रहेगा | दर्शन प्रत्येक दर्शन के लिये एक-एक सुयोग्य विद्वान् नियुक्त किए जायेंगे | पूर्व मीमाँसा तथा दर्शन के लिये विशेष आयोजन किया जायगा, जिनका अध्ययन एकदम भुला दिया गया है | संस्कृत साहित्य का विशेष अध्ययन करने वालों तथा धर्मोपदेशकों के लिये पद, वाक्य तथा प्रमाण का ज्ञान आवश्यक होगा| उपवेद (अ) आयुर्वेद उपवेदों में आयुर्वेद को विशेष महत्त्व दिया जायगा | अन्य जातियों द्वारा चिकित्साशास्त्र तथा शरीर –विज्ञानशास्त्र में जो आश्चर्यजनक उन्नति हुई है, वे सब भी आयुर्वेद के अध्ययन में सम्मिलित किए जायेंगे | इस विभाग का मुख्य उद्देश्य देश को ऐसे वैद्यों से भर देना है जो औषधिशास्त्र तथा चीरफाड़ दोनों विषयों में पारंगत हों | औषधि में काम आने वाली जड़ी-बूटियों के लिये एक वनस्पति –वाटिका भी बनाई जायगी | रसों, तेलों तथा आसवों के बनाने के लिये एक प्रयोगशाला भी होगी, जहाँ आयुर्वेदिक अन्वेषण के प्रयोग किए जायेंगे | यूरोपीय देशों से प्रसिद्ध वैद्य तथा डॉक्टर बुलाए जायेंगे जो आयुर्वेद के विद्यार्थियों को चिकित्साशास्त्र, शरीर-विज्ञानशास्त्र तथा स्वास्थ्यविज्ञान की पूर्ण रूप से शिक्षा देंगे तथा संस्कृत और देशी भाषाओं में इन महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों के तैयार करने में वैद्य लोगों को सहायता देंगे | (ब) स्थापत्य वेद ( वैज्ञानिक तथा तकनीकी ) इस विश्वविद्यालय का सबसे मुख्य कार्य नवीन रूप से स्थापत्यवेद अथवा अर्थशास्त्र के अध्ययन का क्रम होगा, जिसका अध्ययन एक प्रकार से भारत में भुला दिया गया है और बहुतों को इसके नाम में ही शंका होती है |यह कार्य सबसे कठिन तथा व्यय–साध्य होगा | भौतिकशास्त्र तथा रसायनशास्त्र, प्रयोगात्मक तथा सैद्धान्तिक दोनों पढ़ाए जायेंगे| कातना, बुनना, रंगसाजी, छापने का काम, शीशे का काम तथा अन्य उपयोगी काम यहाँ अच्छी तरह सिखाए जायेंगे| देश के लिये चतुर कारीगर उत्पन्न करने के लिये लकड़ी तथा लोहे के कार्यालय खोले जायेंगे| अन्वेषणों तथा प्रयोगात्मक शिक्षा के लिये भौतिक तथा रासायनिक प्रयोगशालाएँ होंगी | देश को समृद्धिशाली बनाने के लिये इंजीनियर तैयार किए जायेंगे | मशीनों को बनाने तथा प्रयोग करने की शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जायगा | (स) कृषि विज्ञान भारत कृषि-प्रधान देश है | कृषि की उन्नति के लिये इस विश्वविद्यालय में कृषि-सम्बन्धी शिक्षा भी दी जायगी, जिसकी सहायता से पाश्चात्य देशों में भूमि में अधिक फसलें उगाई जाती हैं तथा अधिक परिमाण और गुणवाले फल तथा अन्न उपजाए जाते हैं | बड़ी प्रसन्ता का विषय है कि भारत सरकार ने अब कृषि-सम्बन्धी अन्वेषणों तथा कृषि-विज्ञान की शिक्षा का महत्त्व स्वीकार कर लिया है | किन्तु देश के लिये इस विषय की महत्ता को स्वीकार करते हुए तथा इसके तात्कालिक परिणामों पर विचार करने से पता चल जायगा कि जनता के इस विश्वविद्यालय में कृषि की उन्नति तथा शिक्षा के लिये भी उचित आयोजन होना चहिए | इसी उद्देश्य को सम्मुख रखते हुए एक कृषि महाविद्यालय की भी स्थापना होगी, जहाँ पर कृषि–सम्बन्धी विषयों पर देशी भाषाओं द्वारा वर्त्तमान ढंग पर सर्वोच्च शिक्षा दी जायगी | (द) गान्धर्ववेद और अन्य ललित कलाएँ यद्यपि इस विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य उपर्युक्त विषयों द्वारा धर्म तथा अर्थ की शिक्षा देना है तथापि मनुष्य-जीवन के तृतीय अंग ‘काम’ को भी यह अपने कार्य-क्रम में सम्मिलित रक्खेगा | भारतीय सभ्यता के संस्थापकों ने यद्यपि नैतिक उच्चता के लिये कठोर-से-कठोर नियम बनाए हैं, तथापि वे कलापूर्ण तथा सौन्दर्यमय जीवन के भी एकदम विपरीत न थे | वास्तविक सभ्यता के रहस्य को समझ कर उन्होंने मानव-आनन्द के विषय संगीत, काव्य, नाट्यकला, चित्रकला, वास्तुकला तथा मुर्त्तिकला में पर्याप्त उन्नति की थी | हिन्दू सभ्यता पर समय–समय पर आने वाली आपत्तियों के फलस्वरूप ये कलाएँ कुछ तो पूर्ण रूप से तथा कुछ अधूरे रूप से नष्ट–भ्रष्ट हो गई हैं | हिन्दू विश्वविद्यालय इस बात का प्रयत्न करेगा कि इन कलाओं का पुनरुत्थान हो जिससे ये हिन्दू घरों को फिर प्राचीन समय की भाँति अलंकृत करें | महाविद्यालय विश्वविद्यालय में निम्न संस्थाएँ होंगी १. संस्कृत विद्या का एक महाविद्यालय, जहाँ वेद, वेदांग, स्मृति, दर्शन, इतिहास तथा पुराणों एवं संस्कृत साहित्य के अन्य विभागों की शिक्षा दी जायगी | वेदांगों के अंग ज्योतिष विभाग में एक खगोलीय तथा मैासम विज्ञान सम्बन्धी वेधशाला संयुक्त की जाएगी जो महाविद्यालय का एक अंग होगी| २. एक आयुर्वेदिक महाविद्यालय, जिसमें प्रयोगशालाएँ तथा वनस्पति-वाटिकाएँ भी होंगी | एक उच्च कोटि का अस्पताल तथा पशु चिकित्सा विभाग भी इस महाविद्यालय में होंगे | सुन्दर-सुन्दर घोड़ो तथा पशुओं को उत्पन्न करने का प्रबन्ध होगा | ३. एक स्थापत्यवेद अथवा अर्थशास्त्र का विद्यालय, जिसमें अलग-अलग भवनों में तीन विभाग होंगे- (अ) भौतिक विज्ञान-विभाग, सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक, जिसमें प्रयोगों तथा अन्वेषणों के लिये प्रयोगशालाएँ भी होंगी | यान्त्रिक (मैकेनिकल) तथा वैद्युतीय (इलेक्ट्रिकल) अभियन्ताओं के प्रशिक्षण के लिए कार्यशालाएँ (वर्कशाप्स) होंगी | (ब) रसायनविज्ञान विभाग, जिसमें प्रयोगों तथा अन्वेषणों के लिये प्रयोगशालाएँ भी होंगी | अम्लो, रंगों, चित्रकारी के सामनों, सीमेण्ट, रोगन तथा अन्य रासायनिक पदार्थों के उत्पादन की शिक्षा के लिये कार्यशालाएँ होंगी | (स) मशीनों के माध्यम से निजी एवं घरेलू उपयोग में आने वाली प्रमुख वस्तुओं के उत्पादन की शिक्षा देने के लिए एक शिल्प विज्ञान विभाग होगा जिनके लिए भारत अभी बाह्य देशों पर निर्भर है | खनिज विज्ञान तथा धातुविज्ञान इस विभाग के महत्त्वपूर्ण भाग होंगे | ४. एक कृषि महाविद्यालय, जहाँ प्रयोगात्मक तथा सैद्धान्तिक दोनों प्रकार की शिक्षाएं कृषिशास्त्र के नवीन अन्वेषणों के आधार पर दी जायगी | ------------------------------------------- १. जब मार्च १७०६ में पहला विवरण-पत्र (प्रास्पेक्टस) अन्तत: जारी किया गया तो इस महाविद्यालय का नाम “ ‘वैदिक महाविधालय’” रखा गया, जिसके नीचे निम्नलिखित टिप्पणी जोड़ दी गई थी | टिप्पणी- इस विश्वविद्यालय का धर्म-सम्बन्धी कार्य तथा वैदिक महाविद्यालय का कार्य उन हिन्दुओं के अधिकार में होगा, जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातनधर्म के मानने वाले होंगे | धार्मिक शिक्षकों की शिक्षा तथा परीक्षा आदि का प्रबन्ध भी इसी महाविद्यालय में होगा | इस महाविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के आधार पर प्रवेश होगा | अन्य सब महाविद्यालयों में सब धर्मावलम्बियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो | संस्कृत भाषा की अन्य शाखाओं की शिक्षा बिना जाती-पाँति का भेदभाव किये सबको दी जायेगी | ५. गान्धर्व वेद तथा अन्य ललित कलाओं का महाविद्यालय | इस महाविद्यालय का कार्य होगा कि- (अ) प्राचीन भारत के रागों में अन्तरनिहित सौन्दर्यमय तथा दिव्य जगत् को मुर्त्तिमान कर देना और उसे संस्कृत वर्गों के लिये सुलभ कर देना | (ब) नाट्यकला को उसकी पूर्वकालीन परिशुद्धता पर पुनर्स्थापित करना तथा नैतिक शिक्षा के लिये इसे उपयुक्त साधन बना देना | (स) सुयोग्य शिक्षकों द्वारा चित्रकला तथा मूर्तिकला के शिक्षण को उनके लिए प्रोत्साहित करना जिनके अन्दर उन कलाओं के लिए नैसर्गिक रुझान है | (द) विदेशी नमूनों के नकल करने की दासता की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने एवं विभिन्न सज्जा-कलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कलात्मक वस्तुओं के उत्पादन में डिजाइन की शुद्धता की रक्षा करना | ६. भाषाशास्त्र-सम्बन्धी एक महाविद्यालय, जहाँ अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाएँ इस उद्देश्य से पढ़ाई जायँगी कि भारतीय साहित्य, विज्ञान तथा भाषा में उनसे भली प्रकार समृद्ध हो सके | भाषाएँ इस रोचक तथा परिष्कृत ढंग से पढ़ाई जायँगी कि उसे पढ़ने वाला आसानी से उस भाषा को बोल तथा लिख सकेगा तथा इसके साहित्य को सुगमता से हृदयंगम कर सकेगा | अन्य महाविद्यालयों के अध्यापकों तथा पण्डितों से अनुरोध किया जायगा कि वे इस महाविद्यालय में अध्ययन कर भारतीय साहित्यों को नवीन वैज्ञानिक तथा साहित्यिक रत्नों से भरपूर कर दें | आवासीय भवन इन महाविद्यालयों और उनके अन्तर्गत विभागों के अतिरिक्त अध्यापकों तथा विद्यार्थियों के लिए आवासीय भवन होंगे | प्राचीन ब्रह्मचर्याश्रम के पुनरुत्थान के लिये महत्वपूर्ण प्रयत्न किया जायगा | देश के कोने-कोने से मेधावी विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में आवेंगे जहाँ उपनयन के पश्चात् ब्रह्मचर्याश्रम में उसका प्रवेश होगा | देश के गण्यमान्य व्यक्तियों के बालकों एवं अन्य सम्बन्धियों को इस आश्रम में प्रविष्ट होने के लिये आमंत्रित किया जाएगा | महाविद्यालयों में प्रवेश करने से पहले विद्यार्थियों की शिक्षा के लिये एक पाठशाला होगी, जिसका सम्बन्ध इसी आश्रम से होगा | इस स्थान पर उनको अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य करने के योग्य बनाया जायगा | विश्वविद्यालय की सीमा के अन्दर रहने वाले अध्यापकों का कर्त्तव्य होगा कि वे विद्यार्थियों का जीवन उन्हीं आदर्शों पर ढालें जिसके लिये हमारे प्राचीन साहित्य में आदेश किया गया है | सत्य, दया, तप, शैाच, तितिक्षा, शम, दम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, धृति, क्षमा, आर्जव, विनय, शील, निर्ममत्त्व, निरहंकार, पौरुष, उत्साह, धैर्य, वीर्य, औदार्य, मैत्री, तथा हमारे पवित्र साहित्य में दिए हुए अन्य गुणों का विद्यार्थियों से उनके दैनिक जीवन-आचार में पालन कराया जायगा | अध्ययन का पाठ्यक्रम अध्ययन का क्रम इस प्रकार निर्धारित किया जायगा कि साधारण कोटि का विद्यार्थी बारह वर्षों में आधुनिक प्रणाली द्वारा शिक्षा दिए जाने पर (अ) संस्कृत भाषा तथा साहित्य में धर्मज्ञता की योग्यता बिना अपनी शक्ति पर अधिक भार डाले ही प्राप्त कर सके, जिससे उसके धार्मिक तथा नैतिक विचारों में दृढता आ जाय और वह संस्कृत भाषा की उन शाखाओं से भी परिचित हो जाय जो बिना किसी विशेषज्ञ की सहायता के ही वह प्राप्त करने में समर्थ हो जा सके | (आ) विद्यार्थी किसी अर्थकरी कला में दक्ष हो सके तथा उस कला के सिद्धान्तों से भी भलीभाँति परिचित हो जाय| ब्रह्मचर्याश्रम के जिन विद्यार्थियों के चरित्र निष्कलंक पाए जायेंगे, तथा जो निश्चित पाठ्यक्रम समाप्त कर लेंगे, वे स्नातक पद पाने के अधिकारी समझे जायेंगे | स्नातक होने के पश्चात् जो विद्यार्थी विश्वविद्यालय में या उसके बाहर अन्यत्र कहीं अपने अध्ययनक्रम को जारी करेंगे, उसको आचार्य पद दिया जायगा| तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के लिये जो विद्यार्थी चैादह या पन्द्रह वर्ष की अवस्था के बाद विश्वविद्यालय में प्रवेश करेंगे निश्चित पाठ्यक्रम पूरा करने के पश्चात् उन्हें अनुज्ञप्ति-पत्र (लाइसेन्सिएट) के रूप में डिप्लोमा दिया जायगा | यदि वे संस्कृत न जानते होंगे तो उन्हें देश-भाषा द्वारा धार्मिक तथा नैतिक शिक्षाएँ दी जायगी| तकनीकी महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को धनोपार्जन की जो शिक्षा दी जायगी वह उन्हें रूपये पैसे की चिन्ता से मुक्त कर देगी, और यह आशा की जाती है कि महाविद्यालय छोड़ने से पहले ही वे धन कमाने लगेंगे और उनकी प्रशिक्षुता की अवस्था में ही उनके द्वारा कमाए धन में से कुछ छात्रवृत्ति भी उन्हें दी जाने लगेगी | वे लोग जीवन में मजदूरों को नियुक्त करने वाले, उद्योगों के संचालक भूसम्पत्तियों तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के प्रबंधक, वैज्ञानिक और साहित्यिक विद्वान्, अभियन्ता, प्राध्यापक, धार्मिक शिक्षक, साहित्यिक क्षेत्रों में शोधकर्ता, और प्राकृतिक नियमों, तथ्यों के अन्वेषक के रूप में विशिष्टत: स्थापित होंगे | गौरवपूर्ण साधनों द्वारा धन कमाने में सक्षम होने के कारण वे अयोग्य आचरण के प्रलोभनों से परे रहेंगे और संस्कृत विद्या के श्रेष्ठ सिद्धान्तों से प्रेरित होने के कारण वे निष्ठावान् ईमानदार और अविकृत सत्यनिष्ठा सम्पन्न लोग होंगे | उनका ब्रह्मचर्य उन्हें शारीरिक और मानसिक दृढता प्रदान करेगा जो उन्हें बौद्धिक कार्य के दबाव को, चाहे वह व्यावसायिक हो या सामाजिक, झेल सकने की सामर्थ्य देगा | वे सभ्य होने के कारण समाज में आदरणीय तथा सुचरित्रता के कारण विश्वासपात्र बनेंगे| उनके वचन की गारंटी बड़े औद्योगिक उद्यमों के लिए पूँजी आकर्षित करेगी | प्रत्येक धार्मिक, शिक्षा-सम्बन्धी, व्यापारिक तथा औद्योगिक क्षेत्र में हमारे नवयुवक अपनी योग्यता तथा कार्य-कुशलता के कारण सफलता प्राप्त करेंगे | हिन्दू विश्वविद्यालय के आधार पर वे देश के भिन्न-भिन्न भागों में स्कूल तथा कॉलेज स्थपित करेंगे, फिर वे स्कूल विश्वविद्यालय से सम्बद्ध हो जायेंगे | समाज में जहाँ कहीं अशान्ति तथा कलह होगी, वहाँ उनके सतत प्रयत्न से शान्ति तथा संघटन का राज्य हो जायगा | शिक्षण का माध्यम उन सबको, जो संस्कृत के माध्यम से शिक्षा चाहते हैं, संस्कृत में शिक्षा दी जायगी | धर्मशिक्षकों तथा चिकित्सा विज्ञान में सर्वोच्च उपाधि पाने के इच्छुक लोगों के लिये संस्कृत के अध्ययन पर बल दिया जाएगा | औरों के लिये संस्कृत का इतना ही ज्ञान पर्याप्त होगा कि वे सरल धार्मिक ग्रन्थों को आसानी से समझ सकें तथा देशी भाषाओं पर अधिकार प्राप्त कर सकें| शेष व्यक्तियों के लिये शिक्षा का माध्यम हिन्दी होगा, जो देश के अधिकांश भाग द्वारा समझी जाती है | यह आशा है कि ऐसे भारतीय विद्यार्थी, जो टोकियो विश्वविद्यालय में दिए जाने वाले व्याख्यानों को समझने के लिए जापानी भाषा सीखने के इच्छुक हैं, इसे बहुत कष्टसाध्य नहीं समझेंगे यदि उनसे प्रस्तावित विश्वविद्यालय में अध्ययन हेतु हिन्दी के पर्याप्त ज्ञान की अपेक्षा की जाए | वर्त्तमान समय में भी मद्रास से, जो देश का एकमात्र ऐसा भाग है जहाँ के अधिकांश लोग हिन्दी नहीं समझ पाते, बहुत से विद्यार्थी विद्याध्ययन के लिये काशी आते हैं | वे संस्कृत सीखने के लिए यहाँ आते हैं और साधारण तथा थोड़े ही समय में हिन्दी का ज्ञान भी उन्हें हो जाता है | हमारी जाति की शोचनीय आर्थिक अवस्था को देखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि एक केन्द्रीय स्थान पर समस्त शक्तियों तथा साधनों को एकत्र करके एक ऐसी संस्था बनाई जाय जहाँ विभिन्न कला-कौशल तथा विज्ञान की शिक्षा जो देश के लोगों में समृद्धि को पल्लवित-पुष्पित करे, देश के अधिकाधिक युवकों को दी जाय | जब ऐसी संस्था एक स्थान पर स्थापित और पूर्णत: सज्जित हो जायगी तब उसकी शाखाएँ प्रत्येक प्रान्त तथा देश के समस्त भागों में स्थापित करने का आयोजन किया जायगा | इस स्थान पर यह पूछा जा सकता है कि कम-से-कम प्रारम्भ में अंग्रजी को शिक्षण का माध्यम क्यों न रखा जाय, क्योंकि यह प्राध्यापकों के लिए, मात्र उनके लिए ही नहीं जो विदेशी है, बल्कि मद्रास तथा बंगाल से आने वालों के लिए भी आसान होगा | कारण यह है कि चूँकि व्याख्यानों के लाभों को देश के अधिकतम युवकों को उपलभ्य करना लक्ष्य है, इसलिये उसी भाषा के द्वारा शिक्षा देना उचित होगा जिसको अधिकाधिक व्यक्ति आसानी से समझ सकें या सीखना आसान मान सकें | किसी विषय को अंग्रेजी माध्यम द्वारा सीखने के लिये अंग्रेजी भाषा के जितने ज्ञान की आवश्यकता है, उतना ज्ञान प्राप्त करने के लिए जो वर्षो का परिश्रम अपेक्षित है, यदि उस समय तथा परिश्रम का उपयोग किसी विषय का अध्ययन करने के लिये किया जाय तो उससे देश का कितना लाभ होगा, इसका विचार प्रत्येक विचारशील व्यक्ति कर सकता है | दूसरा कारण यह भी है कि यदि प्रारम्भ ही से देशी भाषाओं के माध्यम द्वारा शिक्षा नहीं दी जायगी तो देशी भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों की रचना का मार्ग विलम्बित होगा, जो शिक्षण के माध्यम के रूप में वस्तुत: अँग्रेजी के लगातार प्रयोग को ही पुष्ट करेगा | पाठ्यपुस्तकों की रचना विश्वविद्यालय द्वारा उठाए गए कदमों में सबसे पहला काम होगा विभिन्न विज्ञानों तथा कलाओं पर संस्कृत तथा अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं में ऐसे विशेषज्ञों द्वारा लिखी पुस्तकें प्रकाशित करना जो अपने विषयों में विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न होने के साथ-साथ सही और परिष्कृत भाषा में भी पर्याप्त दक्ष होंगे एवं जो औषधिशास्त्र, खगोलशास्त्र, मैासम-विज्ञान, दर्शन, संगीत एवं अन्य तकनीकी विषयों पर संस्कृत के मानक ग्रन्थों में प्रयुक्त विचक्षण और प्रभावी विधियों में भी पारंगत होंगे | इन पुस्तकों की रचना इस प्रकार की जाएगी कि उनके द्वारा किसी भी विदेशी भाषा के न जानने वाले भारतीय विद्यार्थी उन विषयों को समझ सकें | वे पुस्तकें विज्ञान एवं कलाओं को ऐसे प्रस्तुत करेंगी जैसे कि वे भारत में ही विकसित हुई हो | संक्षेपत: आधुनिक सभ्यता में जो कुछ भी उपयोगी या लाभकारी है, उसको भारतीय सभ्यता में सरलता से समावेश और आत्मसात करने के लिए अनुकूलन किया जाएगा | देशी भाषाओं में उस साहित्य का निर्माण करना एक दुस्तर कार्य है, जिसके माध्यम द्वारा वैज्ञानिक तथा तकनीकी विषयों में उच्च शिक्षा दी जा सके | इसके लिये अगाध परिश्रम तथा समय की आवश्यकता होगी | किन्तु आत्मविश्वास तथा दृढ निश्चय के सम्मुख सब कठिनाइयाँ सरल बन जाती हैं | परन्तु जो हमारा अभीष्ट है, उसको आज ही प्रारम्भ कर देना चाहिए, चाहे उसको पूरा करने में कितना ही समय क्यों न लगे | इस दिशा में उन राष्ट्रों द्वारा की गई उन्नति, जिन्होंने उत्तराधिकार में वैसा राष्ट्रीय साहित्य नहीं पाया, जैसाकि हमारा है, भी एक उदाहरण प्रस्तुत करती है जिसे हमारे उद्यमों को उस दिशा प्रोत्साहित करना ही चाहिए | प्राध्यापक विश्वविद्यालय के भिन्न-भिन्न विभागों में शिक्षा देने के लिये देश अथवा विदेश से सुयोग्य व्यक्ति निमंत्रित किए जायेंगे | कुछ अध्यापकों के व्याख्यान प्रारम्भ में हिन्दी में अनूदित किए जायेंगे, किन्तु यह आशा की जाती है कि कुछ समय में वे हिन्दी की व्यावहारिक योग्यता से परिचित हो जायेंगे और हिन्दी में व्याख्यान देने लगेंगे | अहिन्दी –भाषा-भाषी अध्यापक महोदयों के साथ एक सहकारी रक्खा जायगा जो उनके व्याख्यानों का अनुवाद विद्यार्थियों को हिन्दी द्वारा समझा सकेगा | विश्वविद्यालय के लिए कोष इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण विस्तृत योजना के लिये निस्सन्देह बहुत धन की आवश्यकता होगी | भूमि प्राप्त करने, आवश्यक भवनों के निर्माण और सुसज्जित करने, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं एवं कारखानों के साज-सामनों, अध्यापकों की सेवाएँ सुनिश्चित करने, एवं सुपात्र, किन्तु निर्धन छात्रों को वजीफा देने के प्रारम्भिक खर्चों की पूर्ति के लिए काफी धनराशि की आवश्यकता होगी| प्रारम्भिक खर्चों की व्यवस्था एवं एक स्थायी निधि निर्माण के लिए एक करोड़ रुपया एकत्र करना प्रस्तावित है, जिसका ब्याज इस संस्था की व्यवस्था के लिए पर्याप्त होगा | इस राशि का कम से कम आधा वैज्ञानिक, तकनीकी एवं औद्योगिक शिक्षा के समुन्नयन हेतु निर्धारित किया जाएगा | वार्षिक, अर्धवार्षिक तथा मासिक चन्दे भी आमंत्रित किये जायेंगे और ऐसी आशा है कि स्थायी निधि से होने वाली आय में वे पर्याप्त राशि की संपूर्ति कर पायेंगे | किसी गैर सरकारी शिक्षण संस्था के लिये एक करोड़ रुपया इकट्ठा करना आसान कम नहीं है | निस्सन्देह, किन्तु यह विश्वास करने के कारण मौजूद हैं कि यदि समूचे भारत के हिन्दू राजा, कुलीन लोग, और हिन्दू जाति के अन्य प्रधान जन एक साथ इस बात के कायल हो जायँ कि योजना ठोस व विश्वसनीय है, या यों कहें कि यह प्रस्ताव लोगों की प्रसन्नता और समृद्धि में पर्याप्त वृद्धि करेगा, ऐसा लगे तो धन आना प्रारम्भ हो जायेगा | अनेकानेक हृदय यह सोचकर व्यथित होते हैं कि भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से अति उर्वर देश में लोगों का एक बड़ा भाग, जिन्होंने विरासत में एक श्रेष्ठ धर्म तथा अति उन्नत सभ्यता पाई है, अज्ञानता और गरीबी के कीचड़ में पड़े हैं और न जाने कितनी सामाजिक तथा आर्थिक संकटों एवं असुविधाओं से ग्रस्त हैं | जनता की वर्त्तमान दशा को सुधारने के लिये देश के अनेक भागों में पिछले वर्षों में कई संस्थाएँ खोली गई हैं | इन प्रयासों ने प्रशंसनीय कार्य किया है और वे कर भी रहे हैं, किन्तु चूँकि वे अपना संबल सीमित क्षेत्र एवं वर्ग से ग्रहण करते हैं इसीलिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता में बाधित हैं और स्वभावत: उनके द्वारा प्रदत्त लाभ भी सीमित ही हैं| यह समय, इसलिए ऐसी संस्था को स्थापित करने के लिए सर्वतोभावेन उपयुक्त है, जो भारत के सभी भागों की हिन्दू जाति के संसाधनों से अपना अवलंब ग्रहण करेगी और जो उस पूरे समुदाय की नैतिक और भौतिक उन्नति हेतु कार्य करेगी | यदि ऐसी संस्था अस्तित्त्व में ला दी जाती है, तो यह विश्वास है कि अपने देश के हजारों शुभेच्छु प्रसन्नतापूर्वक अपना समय, शक्ति और संसाधन उसकी सफलता हेतु अर्पित करेंगे | विश्वविद्यालय का स्थान देश के विभिन्न भागों में हिन्दू समुदाय के नेताओं की स्वीकृति की दशा में एवं पर्याप्त भूमि की अवाप्ति की शर्त पूरी होने की स्थिति में, विश्वविद्यालय का स्थान काशी में गंगा के तट पर होगा, जो अनादि काल से हिन्दू विद्या का केन्द्र रहा है | काशी वास की प्राचीन प्रथा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जायगा तथा हिन्दू समाज के विद्वान् तथा गण्यमान्य व्यक्तियों को विश्वविद्यालय के परिवेश में रहने के लिए आमंत्रित किया जायगा | अब भी बहुत से हिन्दू अपने जीवन के अन्तिम भाग को काशी में व्यतीत करने के लिए काशी की शरण लेते हैं | ऐसी आशा करना युक्तिसंगत लगता है कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय के स्थापित हो चुकने पर अपने विद्वान् और धर्मनिष्ठ लोग काशी के प्रति आकृष्ट होंगे और अपने जीवन के अन्तिम वर्षों को अपने देश और अपने धर्म हेतु अर्पित करना अपना सौभाग्य मानेंगे | प्रबन्ध-समिति का गठन ऐसी राष्ट्रीय संस्था की प्रबन्ध-समिति का समुचित गठन इस योजना की सफलता के लिए सर्वाधिक महत्त्व का विषय है | समस्त हिन्दू शासकों एवं गणमान्य श्रेष्ठजनों को इस संस्था के संरक्षक होने हेतु आमंत्रित किया जाना एवं प्रबन्ध समिति में, जो प्रमुख कुलीन जनों एवं भारत के विभिन्न भागों में हिन्दू समुदाय का नेतृत्त्व करने वाले विद्वद्जनों को मिलाकर गठित होगी, अपने प्रतिनिधियों की नियुक्ति हेतु अनुरोध किया जाना प्रस्तावित है | संस्था के नियम तथा परिनियम आदि बनाये जायेंगे एवं जब योजना व्यापक रूप से स्वीकृत हो जायेगी तो इसे ठोस एवं क़ानूनी आधार देने हेतु आवश्यक कदम उठाए जायेंगे| उपसंहार यह योजना हिन्दू शासकों एवं अन्य हिन्दू विद्वद्जनों एवं नेताओं के विचारार्थ इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत है, कि वे प्रवर्तकों को अपने विचारों से अवगत करायें तथा इसमें संशोधन तथा सुधार हेतु सुझाव दें ताकि यह विकासमान वैज्ञानिक ज्ञान की सहायता से लोगों की भौतिक समृद्धि की अभिवृद्धि में प्रभावी साधन साबित हो सके तथा वे अपने पवित्र ग्रन्थों की शिक्षाओं के आधार पर अधिक पवित्र तथा सुखी जीवन व्यतीत कर सकें|

काशी हिंदू विश्वविधालय यह क्यों वांछित है और इसके लक्ष्य क्या हैं? काशी में एक हिंदू विश्वविधालय स्थापित करने का प्रस्ताव सर्वप्रथम काशी-स्थित मिंट हाउस में १९०४ में काशी नरेश के सभा पतित्व में हुई बैठक से प्रस्तुत किया गया था| अक्टूबर सन १९०५ में प्रस्तावित विश्वविधालय पत्र का एक विवरण प्रकाशित और वितरित किया गया था|काशी के तोवन हॉल में ३१ दिसम्बर सन १९०५ इ. को देश के प्रमुख शिक्षा के आचार्यो तथा भारत के लगभग सभी प्रान्तों के हिंदू समुदाय के प्रतिनिधियों के समक्ष इस विवरण पर एक विशिष्ट बैठक में विचार किया गया था| सन १९०६ इ. के जनवरी महीने में प्रयागम में सनातन धर्मं महासभा द्वारा भी इस पर विचार विमर्श एंव सवीकृति दी गई| जनता तथा समाचार पत्रों द्वारा इस प्रस्ताव को अतिअधिक अनुमोदन तथा सहारा प्राप्त हुआ| इस हिंदू विश्वविधालय की स्थापना के लिए “पयोनिअर” ने एक अग्रलेख में कहा कि,”......... हार्दिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए| एक करोड रुपयों की राशि ऐसे उदेश्य के लिए अतियाधिक नहीं लगती जो स्पष्टता इतना श्रेष्ठ है, और जो निसंदेह अधिसंख्य लोगो को आकर्षित करेगा| यदि इसे एंवं मुस्लिम लोग इस नवीन विधा केन्द्र द्वारा दिए गए सर्वाधिक उदार अवसरों को अंगीकार करने हेतु अग्रसर ना भी हो तो कम से कम एक वास्तविक मात्र संस्था के रूप में बीस करोड हिन्दूओ को ज़रूर आकर्षित करनी चाहिए और निश्चय ही इससे बड़े समर्थक वर्ग की आकांक्षा भी नहीं की जानी चाहिए| संयुक्त प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माननीय सर जेम्स ला टूश ने निम्नांकित शब्दों में इसको आशीर्वाद दिया- “